Saturday, November 29, 2008

Mumbai attack

(its mix of hindi and english=hinglish ) Yesterday incidence in mumbai has made this more revelant again. Its a blog on 26/11/2008 Mumbai attack. U can too refresh those news and read this. I would like to discuss with u on this let us see where our discussion leads… Let us go beyond right n wrongs to get into the roots. I m sure it will certainly enhance us. I know its not a easy task waise bhee easy kuch nahi hai. So get ready for 180 deg turn n b serious..yes dear kabhi kabhi serious hona chahiye…bcoz its good then crying afterwards…when I posted this article to mails frnds I got mixed replies. But nothing gone into discussion..let us see how u react…next 2 weeks I will b around n in Mumbai only…whenever possible I will try to check mails too.

So read…n comment!

Again one more serious attack on countries major city…Ek bar phir mumbai atankwadi hamle ka shikar hui. Jisney dekha wo dar se saham gaya…phir gussey se ubal pada. That’s wat a common people do. Aor phir kuch dino bad hum sab bhool jayengey…na hamey ye din yaad rahega na ye incident…we will b sitting in front of tv to hav some more spicey news aisee news jo hame dara sake hame thrill de sake hamey maja de sakey jise bare mei chaay kee chuski yaa phir yoonhi paan chabatey hue uss par baat kar sake. Media too would be desparate to hav more of this so that there TRP is increased. Kyonki unhe 24hrs ke liye masala news chahiye. Nahi to viewer bor nahi ho jayengy. Aor agar viewer bor ho gaya to unki TRP ka kaya hoga..!!

Now it is clear that we r at war. Aor ye war kisi desh ka kisi doosre desh ke khilaf nahi hey. This war is between shetaniyat n insaaniyat. Shetan jiski shakal to insaan jaisee hai but deemag shetan ka hai. Inka koi desh nahi hai koi dharam nahi hai. Wo dikhatey hamare jaise hai but wo hamse alag hai. They want to destroy the basic delicate fibre of the society. Inhe aap moot ka dar nahi deekha saktey… and they have prooved this again n again. There number is increasing day by day.

yaad hey na ek kahani kee ek rakhchhas ko devtaa jab bhee martey thai to uski har boond jo jameen par girti thee us sey ek aor rakhchhas paida ho jata thaa…eske babjood bhee wo rakhash khatam hua .... …tha..par kaise kuch yaad hai…?

Waisa he ek aor rakhchhas hamre samne hai. they r in millions…and now found all over the world. They use our resources lawfully/unlawfully. Underworld is there life support system. Dar aor dehshat ke mahol is good for them. Ye aap ke pados mey ho saktey hai apkey colleague ho saktey hai. Ye apka apnaa ladlaaa ho skata hai. So let us think seriously kee how to isloate them…wat we should do that they don’t get advantage of our system. How we can make them weak. How to make sure that we r not directly or indirectly helping them.

we can not remain neutral either we are with them or we are against them.

Major concern is the role of media. media has to think seriously on this issue..knowingly or unknowingly they are helping them by spreading there message across the world. They try to cover event live so that we get news without delay. And wat we do after getting to the news !!!

by doing live telecast terrorist are at advantage. Live telecast spread Dar aor dehshat. They get publicity across the world without delay. and they get latest updates. Hence they plan stragtegy accordingly. Attacking hotel taj…or nariman buliding was to get publicity world wide. And to get there logical n illogical demands fulfilled. And terrorist are happy n smiling as media did publicity for them free.

Is that so important kee usey common public ko live deekhaya jaye. What advantage a common public gets out of it. Think over it seriously. Bcoz these news is there weapon. Can’t we make a system that news goes to the immediate concern. N then in later stage worlds knows how we won over them. That’s what islariel n Americans r doing, they don’t wait for people/ world opinion they excute with no time delay. And then show wining story to the world.

Do u feel that fighting against terrorsim is NSG/ security forces jobs! there any role of common man in fighting against terrorism?

I m sure tons n tons of phone must b ringing of those who r staying in mumbai but r not from mumbai. like those who r here on duty. Unke gharwale unhe wapas surakhshit bulane chatey honge…they must be telling ke bahar mat nikalana. Kanhi jana nahi…teen char din kaam par  nahee jao..akele tumhare bal par mumbai nahi chal rahi….etc..etc. common people has major role to play….And the role is not to panic. And help administration in normalizing the situation. I invite u to think on this issue seriously n decide do n don’t for us. Few of them I am listing below….do a little brain storming add your ideas to it.

1. most of us use mobile phone. Store your emergency contact number against ICE (in case of emergency) it is internationally accepted code after 9/11 blast. This will help rescue team to identify your emergecy contact.

2. Don’t panic. Perform your daily duties kee jaise kuch nahi hua.

3. Help administration and security forces to perform there duties.

4. Raise voice against those who delay decision.

5. Make yourself aware about your padosi…your colleagues. terrorism is at doorstep. one has to be vigilant.

6. don’t discourage your family memebers in performing there duties. Rather u should feel proud that they are helping to make the situation normal.

7. if u find suspect or suspecious object…. Act fast.

8. And if u see news alive n at any point of time  u think that this can give advantage to terrorist…phone to the news channel to stop telecast immediately.

9. look around u…n see that none of your act is towards unjustice. Bcoz later on it becomes the breading ground. Those who r joining terrorist group…are the people jo hamse naraj hai. Narajgi kee wajah is injustice.

10. ??

Monday, November 17, 2008

सीता वनबास

हम आज खुलकर बहस नही कर पाये. कारण नेट...आज राम रावण को लेकर मूड बना भी तो नेट ने बात नहीं बनने दी. बहस की मकसद, अपनी अक्ल की धाक जमाने का नहीं...बहस जीतने के लिये भी नहीं! यह कुछ खोजने के लिये होती है. जो सच के करीब हो उस मुद्दे को और गहराइ से समझने में मदद करे.

हम मुद्दे खोजते हे फिर उस पर बहस करते है. अकसर बहस दो तरफा होती है. मतलब की आप एक साइड मैं दूसरी साइड....हम जीतने के मकसद से सिर्फ वो ही बोलते हे जिसे बोलने से आपनी साइड मजबूत बने ..... बिलकुल आदालती बहस की तरह! नतीजा हम अकसर सच से दूर हो जाते हे..जिस सच की तलाश के लिये बहस शुरू की थी उससे भटक जाते है.

मजा तब हे की जब मैं आपकी नजर से देख सकू और आप मेरी नजर से. और फिर जब दोनों एक साथ देखे तो कुछ नया दिखे...कुछ ऐसा मिले जो हम दोनो की मिली जुली खोज हो...

आज की बहस में, राम ने सीता के प्रति लोकाचरण के चलते जो किया मेरी चिंता वो नहीं है ..मेरी चिंता यह हे की अगर में राम की जगह होता तो क्या करता. मामला संदर्भ के साथ...की जब राज्य व्यवस्था यह मानती हे आपका अपना दोषी हे, वो जो आप के दिल के करीब हे. वो जो आप को जान से प्यारा हे दोषी हे, तो आप क्या करेंगे...क्या आप अपने का साथ देंगे... अपने राज्य का साथ देंगे...या फिर बेशर्म होकर नियम ही बदल देंगे. या फिर तानाशाह की तरह अपने जान से प्यारे को बचा लेंगे. या फिर नियम के तहत जो सज़ा हे उसे देगे.

एक बात और अगर राज्य किसी को दोषी मानता हे. राजा को मालूम हे कि वो दोषी नहीं हे...पर उसके पास सबूत भी नहीं जो यह बता सके की वो दोषी नहीं हे. उस वक्त राजा क्या करे. राज्य के लिये उसे उस अपने को बलि (सज़ा) देना चाहिये या फिर राजा को अपना अधिकार दिखाते हुये उसे बचा लेना चाहिये. अगर वो उसे बचा लेता हे तो ...राज्य को क्या रास्ता दिखा रहा है....राज्य उस घटना को कैसे देखेगा.

मुझे इस बहस को आगे बढाने मे खुशी होगी.... 

रेगीस्तान ट्रेक

गोपालसर मोड आते ही बस कंडक्टर अवाज ने लगाई...और में उतर गया...ठसाठस भरी बस से बाहर निकलते जेसे सांस में सांस आई। पर तेज गर्म हवा के थपेडों का सामना हुआ। लगा जेसे किसी ने मुझे तंदूर के अदंर झोक दिया हो। जल्दी से अपने चेहरे को टावल से कवर किया। और तेजी से बरगद के पेड़ की छांव की तरफ दौड गया। इन्दरा गांधी नहर होने के कारण पानी हे और हरियाली भी. स्टेट हाइवे से दांयी तरफ का रास्ता रेंज में जाता हे. में अपने सिर और चेहरे को फिर से ढक लेता हू. एक चाय की दुकान, एक साइकिल पंक्चंर जोडने की दुकान, एसटीडी बूथ और एक ककडी बेचने वाले का हाथ ठेला और एक परचूनी की दुकान...बस यही गोपालसर चौराहा हे… भरी दुपहर में बस चाय वाला जागता सा दिखा।

दुपहर 2 बजे हे...मुझे ले जाने के लिये कोई कार या जीप दिखाई नहीं दे रही, ओह शायद, आने वाली होगी! पेड की छांव में आराम करते कुछ लोग. चायवाला मुझे देखकर मुस्कराया उसे लगा की में चाय के लिये उससे कहूगा. चलो चाय पी जाये इस बहाने उससे कुछ बात भी हो जायेगी, पर इतनी गर्मी में चाय. बोटल के खोलते गर्म पानी से तो बेहतर ही होगी. मे उसे चाय बनाने का इशारा करता हू और समान लेकर उसके पास आकर बेंच पर बेठ जाता हू. भरी तपती दुपहरी में गर्मा गर्म चाय.

साहब रेंज जायेगे क्या?


पर अभी-अभी तो एक गाडी रेंज को गई.. बस थोडी सी देर हो गई.

कोई बात नहीं मेरे लिये अलग से गाडी आयेगी...

हां साहब, बिना गाडी के थोडी ही आप जायेगे और वो हंस दिया,

18 km अभी और जाना हे तब कही जाकर गेस्ट हाउस पहुंच पायेगे. देखा एक और बस आकर रुकी, एक जवान उसमे से उतरा और तेजी से हमारी तरफ आया. उसे देखकर में समझ गया की अब मे अकेला नहीं हू...एक मुसकराहट से अजनबी पन जाता रहा..

मेने उसके लिये भी चाय बनाने को कहा. हम दोनों ही एक घंटे तक गाडी का इतिजार करते रहे.
पेड की छांव में भी जेसे आग बरस रही हे...तेज गर्म हवा...मे बार बार पानी से अपना गला तर करता हू...पर ये गाडी क्यों नहीं आई अब तक ...! वो जवान भी शायद मेरे ही भरोसे पर हे...

क्यों तुम कैसे जाओगे...!

बस साहब थोडी देर इतिजार करते हे ..कोई गाडी आती हे तो ठीक वरना पैदल मार्च...

पैदल!!..18 km पैदल.... पागल हो गये हो क्या!

वो हंस दिया...हां साहब ये पागल कर देने वाली जगह हे...आज केंप में रिपोर्ट करना हे मुझे..अगर गाडी नहीं मिली तो पैदल ही जाना होगा...एक बार जा चुका हू...फिर हम तो जवान हे...पर आप...वो भी इतने सामन के साथ..?

‘अगर गाडी नही आई तो आप क्या करेगे’.

‘अरे गाडी ना आने का सवाल ही नहीं हे’.

नहीं साहब इतना भरोसा मत किजिये यहाँ कुछ भी हो सकता हे...

अरे डरा नहीं यार ...मेने हंसते हुये कहा!

डरा नहीं रहे सच कह रहे हे...रास्ता कभी भी बंद हो जाता है..रेत के चलते फिरते टीले...ये रेत के पहाड कभी भी रास्ता बंद कर देते हे. इतनी देर से कोई गाडी आती दिखाई नहीं दी...इसलिये शक बढ रहा है!

देखिये साहब अभी 4 बजे यहां से आखरी बस शहर जायेगी. आप चाहो तो वापस जा सकते हो..उसके बाद शहर जाने का कोई साधन नहीं...वेसे भी यहां रात में रुकने का कोई इतिंजाम नहीं....
देखो भाइ...वापस जाने का तो सवाल ही नहीं...रही गाडी की बात, तो हो सकता हे किसी कारण से देर हो रही हो...वो आयेगी...यार यहां मोबाइल भी तो काम नही कर रहा हे
हां साहब ना रेंज में काम करेगा ना यहां पर...बस इस std बूथ का ही सहारा हे...इसी से घर पर बात होती हे...पर रेंज मे टेलीफोन नही हे..इसलिये यहा से रेंज मे कोई बात नही हो सकती

आखरी बस भी आकर चली गई..गाडी को ना आना था ना आई...शाम के 5 बज गये..जो लोग रुके हुये थे वो भी चले दिये...चाय वाला भी दुकान बंद करने लगा...जवान भी जाने के लिये बेचेन होने लगा..उसे हर हाल में आज रिपोर्ट करना हे नहीं तो जबरदस्त पनिशमेंट ..

साहब अब में नहीं रुक सकता आप भी मेरे साथ चलिये कहो तो आप का सामान् मैं उठा लेता हू...मेरे पास एक लेप टाप बेग और एक ट्राली बेग और पानी की बोटल.. प्लास्ट्क की थेली में कुछ खाने का सामन.

मुझे भी चिंता ने आ घेरा...गाडी क्यों नही आई..मुझे बोला गया था की गाडी मेरा इतिंजार करेगी...एक बात साफ हो गई की अब यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं...बस अब हम दो....साहब एक काम करते हे धीरे धीरे आगे बडते हे ...अगर कोई गाडी रास्ते में मिल गई तो ठीक वरना 9-10 बजे तक पहुंच ही जायेगे.

उसकी बात में दम था...अब यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं...मुझे नहीं मालूम उन्होने गाडी क्यों नहीं भेजी..जो हुआ बुरा हुआ...अब हमें ही कुछ करना था..

शाम के 5 बज गये पर अभी भी हवा बेहद गर्म ...रेत से निकलती आग ...जवान के पास बस एक रग-शेक बेग उसने उसे कंधे पर लगाया और एक पानी की बोटल...अब वो जाने के लिये तैयार हे ...... आपना बेग मुझे दीजिये.... आप बिना बेग थोडा तेज चल पायेगे...मेरा ही फायदा होगा.. उसने हंसते हुये कहा.... लेपटाप मेने सँभाला, उसने Trolly बेग को ले लिया उसमे लगे पहिये..वो आसानी से उसे सड़क पर चलाने लगा...भला हो जिसने पहिये लगे बेग बनाये..जरूर वो एसे ही किसी जगह फंसा होगा और पहिये का ख्याल आया होगा. आदि मानव ने पहिया बनाया और VIP वालों ने पहिये वाला trolly bag...

रेत के पीछे छुपता सूरज का लाल गोला...आशचर्य मुगध और चकित सा उसे डूबता देखता रह गया...जो सारे दिन से आग बरसा रहा था..अब कितना शांत होकर विदा ले रहा हे. सूरज डूबते ही रेत तेजी से ठंडी होने लगी...आसमान में बदलते रंगो की छटा और किशन का गुनगुनाते हुये मस्ती से चलना ...देखा 1 घंटे में ही हम ने 5 km का रास्ता तय कर लिया. अभी भी बार बार पानी पी रहा हू। 2 लीटर की बोटल खत्म होने को आई..अब गला सूखने लगा.. किशन भी पसीने से नहा गया...मुझे देखकर मुस्कराया...

साहब..थक तो नहीं गये...

नहीं मेने अपनी सांसो को काबू में लेते हुये, मेने बोटल से चाय की तरह गर्म पानी के 2 घूटं पीया देखो किशन सामने गांव दिखाइ दे रहा है।

साहब इसे ही गोपाल सर गांव कहते हे इस रास्ते का सबसे बढा गांव. यहाँ से हो सकता हे कोई गाडी मिल जाये..कोई उट वाल जाने को तैयार हो जाये.. 20-25 घर का छोटा सा गांव...जमीन में शायद थोडा पानी हे...सब नहर के कारण. कुछ खेत दिखाई दे रहे हे. और खजूर के बहुत सारे पेड भी. गांव में एक भी ऊठ गाडी दिखाई नहीं दी...सब शहर में जो गये हे देर रात वापस आयेगे..अब क्या करे... अब गाडी मिलने की सारी उम्मीद खत्म हो गई हे...समझ गये सारा रास्ता पेदल ही जाना होगा...

घरो से उठता धुआ..शाम के खाने की तैयारी.....हम लोग थोडा सुस्ताने के बाद फिर से चल दिये...पूरब से उगता चाँद...मंत्र मुग्ध ..शाम के 7 बज गये पर अभी भी काफी रोशनी है। हम चलते रहे …चलते रहे गांव में पानी मिल गया था…वेसे भी अब हवा में ठडंक थी। पूर्व में चाँद उग आया… रेत पर बिखरती चांदनी...अब मे कैसे बयान करू...बस देखता ही रह गया. शायद आज पूर्णिमा हे. अंधेरा होते–होते हमने आधे से ज्यादा रास्ता तय कर लिया...बस साहब 6-7 km के बाद चौकी मिल जायेगी..हो सकता हे वहां से हमे कुछ मदद मिल जाये.

नहीं किशन भाई आज मदद की कोई उम्मीद मत दिलाओ...मे हंस दिया...वो कुछ ना कुछ गाता रहा... देखा रास्ते के किनारे बंजारे रेत पर डेरा जमाये हुये हे...सडक के किनारे खाट पर हुक्का गुडगुडाता बूढा....मेने उसे नमस्ते की... तेज चलने के कारण पसीने से नहाया बदन..उसने हमें रुकने का इशारा किया

आप लोग पैदल..!!

हां दाद्दा आज गाडी लेने नहीं आई...

मालूम हे ... आज रास्ता बंद हे..आगे रेत ने सारा रास्ता बंद कर दिया...दुपहर बाद कोई गाडी नहीं निकली...मेरे लडके उधर ही काम पर गये हे...

ओह तो यह बात हे...

आप लोग थक गये हो। आज रात आराम करो..सुबह किसी गाडी से चले जाना..नही तो मेरी ऊठ गाडी आपको छोड आयेगी..

दद्दू की शुद्ध हिंदी सुनकर में चोंक गया...किशन थोडा सुस्ता लेते हे...उसने अपने पास ही दूसरी खाट लगवा दी...पता चला वो सेना में कभी जवान था...उसके लडके भी रेंज में ठेका लेते हे,..थोडी देर सुस्ताने के बाद किशन जाने की जिद्द करने लगा..उसे हर हाल में आज रिपोर्ट जो करना था...पर में उस बुजुर्ग के निमंत्रण को ना ठुकरा सका..चूल्हे पर सिकती रोटिया..भूख भडक उठी...उपर से थकान और चांदनी रात... यह दिलचस्प बुजर्ग...उससे बहुत सारी बाते करनी थी...मेने किशन को अपनी जरुरी जानकारी देकर उसे विदा किया...और में रुक गया.

खुली जगह पर लगा डेरा..सेकडो की तादाद में भेडे...4-5 ऊठ गाडी पर लदा घर का समान.... शाम का खाना खाते और मस्ती करते 10-12 बच्चे, 2 जलते चूल्हे..और उनके किनारे बेठी औरते. ये भरी दुपहर मे भी खुली जमीन पर डेरा लगाते हे. किसी पेड के नीचे डेरा लगाना इन्हे पसंद नही. तपती धूप मे उनके बच्चे यों रेत पर खेलते रहते हे जेसे दिस्मबर की सर्द सुबह मे धूप का आनंद ले रहे हो. अभी तक इन्हे दूर से ही देखा था..आज पहले बार इनके पास बैठा हू,,,किशन चला गया...

दद्दू...इस तपते रेगीस्तान मे बसे लोगों को लेकर बहुत से सवाल हे...आपने तो सेना की जिदंगी जी हे...शहर में भी रहे हो..वापस इस जिदंगी में आ गये कुछ समझ नहीं आया. एसा क्या हे यहां कि, लोगों यहा बसे हुये हे...क्या ये व्यवसायिक मजबूरी हे या फिर जमीन से जुडना हमारी फितरत ...कि जो जहां पैदा हुआ उसी जगह से जुड गया..उसे उसी जगह से प्यार हो गया. जीवन देने वाला एसा कुछ भी यहां नही हे...फिर भी आप यहां हो..और यह बंजारा जिदंगी..!

साहब आपने सच्च कहा...अब अगर इस जगह के बारे में समझना हे तो यहाँ कुछ दिन रह कर देखो. या तो भाग जाओगे...या फिर रुक जाओगे...अगर रुके तो सारे सवालों का जबाब तुम्हे खुद मिल जायेगा...और अगर भाग खडे हुये तो इसका मतलब यह की आपको मेरी बात समझ नहीं आयेगी...उसने गोल मोल जबाब दिया...और अपनी मूछों पर ताव देता हुआ मुस्कराने लगा.

उसकी बातों में दम हे...पर मेरा भूख से बुरा हाल...ब्च्चे मुझे घेर कर खडे हो गये..मै उन्हें टाफी देता हू...वो खुशी खुशी ले लेते हे...

आते ही बच्चो को बिगाडने लगी आप...वो हंसते हुये बोला.

अच्छा अब हाथ मूह धो लो ...और खाना खाओ...उसने पानी का लोटा मेरी और बढाते हुये कहा...

दद्दा एक बात बोलो आप पानी कहां से लाते हो।

साहब लडके उठ गाडि से रास्ते में जो गांव मिला था ना वहां से ले आते हे।

वो तो ठीक हे पर इतने सारे लोग फिर तुम्हारे जानवर भी हे नहाने धोने का काम …पानी तो बहुत लगता होगा।

नहीं साहब हमने कम पानी में जिंदा रहना सीख लिया हे कई बार तो एक बालटी पानी से ही हम सब का गुजारा हो जाता हे।

बस एक बाल्टी पानी …???दद्दू आपको मालूम हे अभी अभी 2-3 घटे में ही मेने इस पूरी बोतल का पानी पी लिया वो भी शाम के समय में।

जिंदगी सब सिखा देती हे साहब! जानवर क्या और आदमी क्या सब पानी का मोल जानते हे।

खाना शानदार रहा ..और शानदार रही उनकी मेहमानबाजी...देर रात तक वो गाते बजाते रहे..कुछ समझा..और बहुत कुछ ना समझ में आने वाले गीत संगीत...ठंडी रेत पर, नंगे पाँव घूमने लगा ...

साह्ब राते ठंडी होती हे...और खतरनाक भी...अकसर सांप और बिच्छू निकलते रहते हे. जरा देखकर चलना...

वो चाहे तो आसानी से इससे अच्छी जगह बस सकते हे पर फिर भी यहां हे और खुश हे..जिदगी को कुछ एसा बना लिया की, जो हे, जितना हे, उसी मे खुश...ये आधी बालटी पानी...मे 2 दिन निकाल देते हे...और हम 2 घंटे नही निकाल पाते. अपनी शारारिक जरूरतो को उसी हिसाब से ढाल लिया. खुश होने और खुश रहने के अपने- अपने तरीके...एक ही बात समझ आयी की कष्ट और दुख तुलनात्मक होता हे. अब यह हम पर हे की हम किससे तुलना करते हे.

सुबह 4 बजे ही ऊठों की आवाज ने मुझे जगा दिया...वो अभी अभी वापस आये हे, रास्ता साफ हो गया हे..सुबह होने को हे...पूर्व में लाली हवा में ठंडक...सूरज की सुनहरी किरणों के साथ भेड का दूध और रोटी का नाश्ता...अब ऊट की सवारी का आनंद लेने के लिये तैयार हू..
अरे तुम ...स्वामी की आंखे मुझे इतनी सुबह देखकर आश्चर्य से फेल गई. और फिर जेसे उसे कुछ समझ आ गया हो वो खुशी से चीख उठा ....और मुझे से कस कर लिपट गया...

मुझे कुछ समझ नही आया ...

क्या हुआ...!!

यार कल तुम्हे आना था..रास्ता बंद था तो गाडी नहीं भेज पाये..सब बोले की तुम गाडी नहीं देखकर 4 बजे वाली बस से वापस चले जाओगे...पर मुझे पता नहीं क्यों लगा की तुम नहीं जाओगे और किसी भी तरह बेस पर आजाओगे..बात की बात...हम लोगों में शर्त लग गई थी...अब जब रात तक तुम नहीं आये तो में यह शर्त के 500/- हार गया.

..पर अब लग रहा हे की तुम सच में वापस नहीं गये थे...तभी तो इतने सुबह बेस पर हो...हां तुमने सही कहा ...

पर मेरी खबर लेकर जवान नहीं आया आपके पास.?

नहीं तो!

हो सकता हे वो दूसरी रेजीमेंट का जवान रहा होगा..और फिर रात थी..जाने दो... मेरा हाथ पकडकर मेस ले जाने लगा...चलो अभी तो 500/- वसूल किये जाये।

देखा सब नाश्ते पर जमे हे..मुझे देखकर हेरत में...स्वामी को 500 मिल गये..वो जीत गया था...आज रात को जीत की पार्टी तय हे...पर उन्हे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा की में रात भर बंजारो के साथ था. उन्हें अभी भी लग रहा हे की में शहर से कार किराये पर लेकर सीधे बेस तक आ गया हू. वो बाहर आकर पक्का करते हे की में कोई गाडी लेकर नहीं आया हू.....और फिर बोले ..एक और सिरफिरा...

बाबारामदेव और स्वामीसत्यवेदांत की फ्रीसेक्स चर्चा पर प्रतिक्रिया

13 मार्च 2010 को नव भारत टाइम्स में प्रकाशित बाबा रामदेव और स्वामी सत्य वेदांत की फ्री सेक्स पर चर्चा को पढा. फ्री सेक्स जानवरों में देखा गया पर उसमे भी मादा नर पर या नर मादा पर एका अधिकार करने की कोशिश करता है. ये अपने जोडे के लिये मर मिटने तक को तैयार रहते है इनमे रिश्तों कि समझ नही होती, इसलिये मा पुत्र के साथ या बहन भाई के साथ सेक्स कर सकता है. इंस के वाबजूद प्रकति ने इन्हे समय से बांध रखा है ये साल के कुछ महिनों मे ही अकसर सेक्स करते है और सृजन का सुख पाते है.

हम मनुष्यों के साथ एसा नही है , हमने रिशतों की अहैमियत को समझा और समाजिक होने के फायेदे के बारे मे भी समझा. हमने समूह मे रहने के लिये एसे नियम बनाये जो आपस मे सदभाव बनाते हुये एक अच्छे समाजिक ढांचे को बनाये. हमारे बच्चे पैदा होते ही जानवरों की तरह स्वांलबी नहीं हो जाते उनकी आज भी 15 से 25 साल तक परवरिश करनी होती है. फ्री सेक्स की बात करने वाले यह कैसे सुनुश्चित करगे की फ्री सेक्स से पैदा हुये बच्चे का पालन पोषण कैसे होगा और वो किसकी जिम्मेदारी होगी. समाज उन्हे किस दर्जे मे रखेगा.

हमने समझा की सेक्स सृजन के लिये होता है. पर कुछ लोगों के लिये उसमे मिलने वाला क्षणिक सुख उन सब से उपर हो गया. वो इसे ध्यान और समाधी का रास्ता समझने लगे. हो सकता है कुछ लोग आपसी सहमति से एसा करने मे सक्ष्म हुये हों पर इसे पूरे समाज मे लागू नही किया जा सकता. जिस मानसिकता को हमने हजारों सालों से अपनाया है उसमे यह संभव नही. और फिर ध्यान और साधना के उससे बेहतर उपाय हम जानते है. तो फिर हम नई समस्या को जन्म क्यों देना चाहते है. क्या कम समस्यायें आज हमारे सामने है!

कुछ लोग टेंशन और परेशानियों का इलाज सेक्स समझते है. अगर ऐसा है तो यह भी एक नशा ही हुआ. जो एक बार इस में फंसा वो बाहर नहीं निकल पाया इस बात को इंटर नेट पर मिलयन डालर की सेक्स प्रोनोग्राफी से अच्छी तरह समझा जा सकता है. फ्री सेक्स और सेक्स से समाधि तक पर बात करने वाले प्रोनोग्राफी से बरबाद हुये लाखों लोगों के बारे मे भी सोचे. यह भी समझ लें की सेक्स उर्जा और समय खर्च करती है. जब आप सेक्स के बारे में सोचते है तो कोई दूसरा काम नहीं कर सकते.

वेसे भी अगर सेक्स से अपराध बोध होता हो तो वो और भी खतरनाक हो जाता है. 

मेरा इश्वर

दोस्तों यह कोइ धर्मगुरू का प्रवचन नही है, ना ही यह किसी धर्म की स्थापना मे लिखा गया है. यह तो आप जेसे की एक शख्स के दिमाग की कुलबुलाहट है जो यंहा व्यक्त की है.  मकसद सिर्फ इतना भर की हम जान सके की हमारे होने कि वजह क्या है. इंसान होने का मतलब क्या है. इंसान के रूप में हमारी क्या जिम्मेदारी है. हमारी क्या सीमायें है क्या हम सच में इश्वर रूप है क्या सच मैं उसने हमे अपनी सब ताकतों से नवाजा है. अगर यह सच है तो उसने ऐसा क्यों किया ?
सबसे पहले हम यह जान ले की, इस सृष्टी में सब कुछ चेतन है, अचेतन कुछ भी नहीं. जो हमे अचेतन नजर आता है वह सिर्फ इसलिये की हम उसकी चेतना को समझ या पकड नही पा रहे, स्थूल नजर आने वाली हर वस्तु सूक्ष्म या अणु स्तर पर यह हमारे शरीर मे मोजूद अणुओं जितनी ही चेतन है.  यह अपने अदंर असिमित संभवानओं को समाये असिमित बुध्दीमान है, असीम क्षमता की स्वामी, यह सर्व व्यापी है हर जगह हर काल मैं है, वो अनंत काल में थी और अनंत काल तक रहेगी, इसका ना कोई आदी है ना अंत
ज्ञान असीम है और सर्व व्यापी है, वो सबके लिये उपल्ब्ध है अब यह ज्ञान लेने वाले के उपर है की वो क्या लेना चाहता है कैसे लेना चाहता है. उसे पूरी आजादी है की उसका क्या मतलब निकालता है और उसे कैसे उपयोग करता है,. पर साथ ही उससे होने वाले अच्छे बुरे परिणाम से भी वो बच नहीं पायेगा.. वो ही नहीं उसका असर उन पर भी हो सकता है, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होगा. शायद इसी डर से गुरु से अपने शिष्य को ज्ञान देने के पहले पात्र और कुपात्र के बारे में सोचने के लिये कहा गया.
अच्छा, बुरा, पाप, पुण्य, सापेक्ष है. किसी के लिये जो पाप है वो दूसरे के लिये पुण्य हो सकता है, कोइ घटना किसी के लिये अच्छी तो वही घटना किसी ओर के लिये बुरी हो सकती है. धर्म और धार्मिक आचरण काल और स्थान के साथ बदलते रहते है.
हमारी प्रगति का मुख्य कारण हमारी याददाश्त और तर्क बुद्धी  है. हम ईंसानों में इन दोनों का भरपूर उपयोग किया. हम इंसान को छोडकर बाकी जीव आपनी सिमित याददाश्त और तर्क बुद्धी के साथ वो अपने चारों और के माहोल के साथ सामंजस्य बैठाकर किसी तरह जीते रहे और जब माहोल बदला तो उनका जीना दूभर हो गया. पर हम इंसान इस से अलग साबित हुये हमने अपने तर्क बुद्धी से असीम संभावनाओं को पहचाना और उसका विकास किया. विज्ञान, खोज और आविष्कार सब तर्क बुद्धी का ही तो कमाल है. हम में से कुछ ने सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों में जीना सीखा है. हमने हर बदली हुई परिस्थ्ति में जीना सीखा. हमने जाना की ब्रहमांड और जीवन कुछ भौतिक और प्राकृतिक नियमों से चलते है. जिसे  हम बदल नही सकते पर उसे समझ कर उसका मन चाहा उपयोग जरूर कर सकते है.
एक इंसान के रूप मे हमे पूरी आजादी है की हम जो चाहे वो नियम बनाये और जब चाहे उन्हे तोड दें. इंसान के रूप में कैसे जिदंगी जीना चाहते है और उसके नियम क्या होगे, हम समाज में रहना चाहते है या अकेले ... क्या पाप होगा और क्या पुण्य होगा क्या धर्म होगा और क्या अधर्म, किस धर्म को माने किस का विरोध करे..क्या खाना है क्या पीना है किस के साथ प्यार करना है किस से नफरत. हमारे अदंर सृजन की और विनाश करने की असीम ताकत है. हमे कभी भी कुछ भी करने की पूरी आजादी दी. इसीलिये शायद ज्ञानी घबरा गये और उन्होने धर्म की स्थापना कर दी और धर्म से बाहर सोचने  औरसमझने की सख्त मनाही.

सवाल है कि हमे इश्वर की जरूरत क्यों है!
आदम अंधेरी सर्द रात. वो ठंड से ठिठुरता हुआ सीलन भरी बदबूदार गुफा में अकेला, तन्हा बैठा है. डर से उसका बुरा हाल, रात के अंधेरे साये मे कही से भी उस पर हमला होने का डर. कभी कडती बिजली तो कभी शेर की दिल दहला देने वाली दहाड. रह-रह कर मच्छर काट रहे है. कई दिनों से खाने को कुछ नहीं मिला. भूखा-प्यासा डर से कांपता रात  यूही खुली आंखो से गुजार देता है.....तो कभी सुबह की सुनहरी धूप की गरमाहट भरपूर भोजन, चिङियों की चहचहाहट, चारों तरफ फेले रंग-बिरंगे फूल, रंग-बिरंगी तितलीयों.....खनकती आवाज पर पीछे मुडकर आंखें फाड़े देखता, अब ना उसे प्यास ना भूख...डर भी ना जाने कहां चला गया.... शायद इसी तरह की छोटी छोटी घटनाओं से उसे ईश्वर के होने का अहसाहस हुआ होगा.
हमे उसने एसे विकिसित दिमाग से नावाजा जो सोच सकता है विशलेषण कर सकता है, तर्क कर सकता है, और याद रख सकता है. यही सब हमे एक जानवर से अलग करता है. हमने जेसे ही आग का इस्तेमाल करना और खेती करना सीखा हमारी जिंदगी बदल गई. इन खोजों ने हमे रोज खाने के लिये भटकने से बचा लिया. हम घुमंतु खाना बदोश से अब विकिसित सभ्यता के साथ गांव और शहर बनाने लगे. इतना सब होने के बाबजूद जन्म, मृत्यु, बिमार होना, और प्राकृतिक विपदाये जेसे भूकंप, बाढ, सूखा, महामारी एसे अन सुलझे रहस्य थे जिन्हे वो नहीं सुलझा पाया. और इन सब का जबाब उसे ईश्वर में दिखाइ देने लगा.
इश्वर के कई रूपों में व्याख्या होने लगी जिसमे से दो रूप ज्यादा प्रचलित हुये. एक निराकार सर्व व्यापी रूप और दूसरा साकार  जिसमे उसे एक राजा या नेता के रूप में देखा गया. उसकी व्यव्स्था राजतांत्रिक व्यवस्था से मिलती जुलती मानी गई यानी कि एक राजा और उसके नीचे उसके कई विभाग और हर विभाग का एक मंत्री सलाहकार जो उसके हुक्म को तामिल करते है कुछ ऐसी ही व्यव्स्था इश्वर की भी मानी ली गई.
समाज और शहर जेसे जेसे जटिल होते गये उनकी व्यवस्था को चलाने के लिये ईश्वर के नाम की जरूरत पडने लगी. ईश्वर अंधो का हाथी हो गया. अंधे को हाथी का जो अंग पकड में आया वो उसकी वेसे ही कल्पना करने लगा. अपने अपने ईश्वर के अपने अपने धर्म बने जिसे अपना कर वो उस तक जा पाने का दावा करने लगे ...उसके साथ ही पाप और पुण्य का जन्म हुआ. पुण्य वो जो उसे ईश्वर के पास लाता था और पाप वो जो उसे ईश्वर से दूर करता था. राजानिति ने धर्म का दामन थामा उसके बाद दोनों एक दूसरे के पूरक बन गये. धर्म के नाम पर अब लोग मरने मारने के लिये तैयार थे. धर्म के नाम पर जितना खून बहा शायद और किसी वजह से नहीं बहा.
इंसान मूलत: समाजिक प्राणी है उसका अकेले जीना सभंव नही है. उसे चाहे या अनचाहे समाज की जरूरत होती है. हम अपने संस्कारों और समाज और इश्वर के डर से वही करते है जो उस समय  के हिसाब से ठीक होता है. धर्म और राज निती एक अच्छे समाज को बनाने मे जब तक सायहक है तब तक तो सब अच्छा है जब एसा नही होता तो असली मुसीबत की शुरूआत होती है. हमने नये समाज बनाये, नगर बसाये, नित नई खोज और आविष्कार किये और बहुत सारा सृजन किया. उसके साथ ही हमारे पास इतनी विनाश की ताकत आ गई की हम पृथ्वी पर मोजूद जीवन को कई बार समाप्त कर सकते है.

हम इश्वर को कब याद करते है!
आम आदमी को रोजमर्रा की परेशानियों का हल उसे इश्वर मे दिखाई देता है. उसके लिये तो वही इश्वर बन जाता है जो उसे मुसीबत से बचा सके जो समय पर काम आ सके. वो जब बिमार होता है तो उसे इश्वर याद आता है जब मुसीबत में होता है तो उसे इश्वर याद आता है. जब खुश होता है तो भी उसके हाथ उसकी इबादत में उठ जाते है. वो तो बस यह चाहता है की कोई उसे गुनाहों से बचाये और उस पर गुनाह होने से रोके. उसे कोई प्यार करेने वाला हो और कोई हो जिसे वो प्यार कर सके. यह सब उसे जिस से भी मिला जाये वही उसके लिये इश्वर बन जाता है.
कुछ एसे लोग भी होते है जो राज करना चाहते है खुद इश्वर बनना चाह्ते है, वो चाह्ते है उसके हर अच्छे और बुरे हुक्म का अक्षरश: पालन हो. जिसके साथ चाहे उसके साथ वो जेसा चाहे कर सके. उनमे से कुछ को हम जाने अनजाने अपना सरताज बना लेते है और कुछ जबरदस्ती हमारे उपर हुक्म चलाने लगते है. इनमे से कोइ हमे गुंडा नजर आता है तो किसी मे हमे अपना नेता नजर आता है. किसी को हम आंतकवादी के नाम से जानते है तो किसी को स्वतंत्रता सेनानी. इन्ही के बडे रूप को हम देवता या दानव और उनका सरदार ....इश्वर ,कुछ एसी ही हमारी कल्पना है उस इश्वर के बारे मे जिसे हम रोज अगरबत्ती लगाकर और नारीयल चढाकर हाथ जोडे और आंखे मुदे प्राथना करते है एक एसे चमत्कार के लिये जो हमे मन चाहा दिला दे. हमे रातोंरात हमारे पापों को भुलाकर हमे  सर्वश्रेष्ठ बना दे.

हमारे होने का मकसद
इस ब्रहमांड में लाखों करोडों आकाश गंगाये है और हर आकाशगंगा में अरबों तारे है और उसमे से एक तारा सूर्य है और उसका एक ग्रह पृथ्वी जिस हम रह्ते है. पृथ्वी को कुछ किलोमीटर उपर से देखें तो हम नजर आना बंद हो जाते है, कुछ हजार किलोमीटर उपर से देखे तो हमारे शहर दिखना बंद हो जाते है. अब आप समझ सकते है की इस ब्रहमांड की तुलना में हमारी हेसियत क्या है. हम भले ही अपने को कुछ भी समझे पर ब्रहमांड में हमारी हेसियत नगण्य है.
इस सृष्टी के चलने के कुछ नियम है और वो नियम सब पर लागू होते है. विज्ञान उन नियम को समझ कर उसका उपयोग करने की कोशिश करता है. सृष्टी के चलने के नियम इश्वर ने बनाये है पर इश्वर भी इन नियमों में रहकर ही काम करता है. सवाल इस बात का नहीं है की वो नये नियम बना सकता है या नहीं या फिर वो अपने बनाये नियम तोड सकता है या नहीं सवाल यह है की वो ऐसा क्यों करेगा और कितनी बार करेगा. यह सच है की जो नियम बना सकता है वो नियम बदल भी सकता है या उसे तोड भी सकता है. पर अगर वो ऐसा करता है तो फिर उसमे और हम मैं कोइ अतंर ही नहीं रहा.
हम मानते है की वो परम ज्ञानी है, और उसने जो कुछ भी बनाया उसका कोइ ना कोइ मकसद है. कुछ भी बे-वजह नहीं है. इस विशाल सृष्टी में हमारी औकात बहुत तुच्छ है. और जिस पृथ्वी के हम वासी है वो दूसरे सितारे से दिखाइ भी नहीं देती. अब यह बताओ की हम में ऐसा क्या है की वो हमारे लिये अपने ही बनाये नियम को तोडता रहे. असल में हम समझ बेठे है की हम इंसान इश्वर की सबसे बेहतर और अनूठी (अच्छी) रचना है. और वो हमे हर हाल में और हर कीमत पर बनाये रखेगा.
पर क्या आप विश्वास करोगे की यही शरीर अरबों जीवाणुओं का घर है. हमारे शरीर मे मोजूद हर एक सेल के मुकाबले 10 जीवाणु. हम उनके लिये उत्तम भोजन और घर है. वेज्ञानिक कहते है की हमारे शरीर मे मोजूद दोस्त जीवणु अगर ना हो तो हम भोजन पचा नही सकते. क्या पता हमारे जीने का मकसद इन अरबों जीवाणु के लिये घर और भोजन है. हमारे शरीर मे इन जीवाणुओं की पूरी एक दुनिया मोजूद है क्या पता वो हमारी भावनाओं और सोच को भी नियंत्रित करते हो.

लेख अधूरा है.....वो अधूरा ही रहेगा जब तक हमे उपर दिये बुनियादी सवालों के सही जबाब ना मिल जाये. इसलिये चिंतन जारी रहेगा...और देखा गया ना सब सिर के उपर से ....चलो अब बहुत हुआ... आप चाहो तो इस चिंतन का हिस्सा बन सकते हो..... क्या पता इसी बहाने वो तुम्हे भी दर्शन दे दे जिसकी चाह दिल मे बसी है.

faith beyond believes

On a personal level we can live a fine, high quality life, without the burden of beliefs forcing us to judge. On a societal level these hard bound beliefs are what divide us, segment us, and keep us apart. A society without such beliefs is society rooted firmly in reality, and thus has a much better chance of being harmonious.
Psychologically, such beliefs either bolster or undermine our ego. Some of such believe that we are smart, so we present our self as smart, even to the extent that sometimes we act like a smart ass! Similarly a belief feel us unattractive, so we do all kinds of grossly expensive things – get cosmetic surgery, buy pricey clothes, plaster on the make-up with what we believe to be our inadequate appearance.
As one can see, belief and judgment are more than kissing cousins; they are more like conjoined twins. Our beliefs create  judgments and  judgments create  beliefs. It’s hard to tell where one stops and the other begins.
What if we just did what we could? What if we just did what needed to be done to the best of our ability? What if we just presented the world our authentic self? It’s worth a try.
Judgement separate us from others. Oh, sure, there are some people who believe pretty much the same as we do. we tag them brilliant! Sometimes we even call them friends. But, far and away, most people on this planet hold beliefs quite different than ours. we call them ignorant, misguided, sinful, Republican, or just plain wrong!
On a societal level, beliefs are the things that wars, crime, hatred, inequity, and injustice are made of. It’s capitalism versus socialism, rich versus poor, the saved versus the damned, Jew versus Muslim, democracy versus dictatorship, the Koran versus, the Bible, and the thing is all are merely ideas! None of them have a shred of reality to them. And yet, we fight over them, live and die by them, place them on pedestals like graven idols, and cling to them like a drowning man. The thing is, what they believe is really none of our damn business! As a variation on an old saying goes, “Beliefs are like assholes. Everyone’s got them, and most of them stink!” That includes all beliefs, even mine, even yours.
So what other alternative do we have? Other option is belief without judgement such belief transcends belief to faith. Faith is intuitive, not rational. If there were an Ultimate Reality that we could see, something that our discursive minds could understand and our physically bound senses could grasp, we wouldn’t need belief or faith!
lets have faith in the Universe and in ourselves, in others and in all of creation, both manifest and unmanifest. One universe one sprit. And we are all in this thing called life together. Lets not discriminate or exclude. Lets accepts, support and sustains all.
a belief that a non-cognitive understanding of the energy or Spirit that animates all. surrender our long-cherished opinions, eradicate our most precious ideas, and jettison our most tightly held judgments in order to let the two – the physical world and the Spirit – become one again.
When we totally accept the presentation of physical reality and intuitively understand the spirit that precedes, imbues, and transcends it. Allow change to happens – not through belief but through faith, not through cognition but through intuition, not through competition but through cooperation. we will begin to act from that Oneness, and then, who knows what will happen?...i know it's  a high funda ...atleast make room for other's believes and don't eradicate them bluntly.

learn to let go

Pain is not some thing to welcome. Everybody hates pains but every one of us go thro’ it many times. Pain and pleasure are 2 sides of same coin. It means that more u are running towards pleasure more u are inviting pain…or few pains one face now more pleasure it will brought later…Iknow this logic has no direct relevance to the real world we live. But still knowingly and unknowingly we adopt it. We take pain deliberately with a hope that once it is over it will lead to more joy and pleasure.

Nature developed Pain and pleasure so that we can move away from unfavourable condition to favourable condition. Pains are either physical or emotional. We can overcome physical pain by altering physical world and most of us know how to do it. So it is not a concern for this article. In this article we will deal with emotional pain. Emotional pain is expressed through negative emotion like anger, fear, anxiety, depression, grief or guilt. We all do it in our day to day life. Problem occurs when it take major part of our conscious life to the extent that we start identifying our selves with it.

Emotional pain is generated as response to the judgement. If we can change judgement we can change pain to pleasure. Or if we can stop judging we can simply avoid pain. We always held other’s responsible for the pain, and we try hard correct them, blame them or indulge into endless fight with them. If other one are with in us, in that case we fight with ourselves, we harm ourselves, we punish ourselves.

Some times these pains seems to trigger of it own because of some external stimuli… I agree that in such case immediate reaction is not under your conscious control. Immediate response will be as per the anagram available in your subconscious they are not in direct control of conscious thinking. But once these anagram generate reaction it becomes part of consciousness and keep disturbing us. So later part is always depends on how we tackle it consciously. So most of time its our choice either to cling and get in thought of infinite loop and allow it to go further deep making us depressed or Burst into anger or suffer anxiety. or we can get rid of it by letting go.

Surprisingly we experience these pains, when either we think about past or future. It has no relation with present. Anybody who is physically and mentally at present moment of time never feels such pains. It means emotional pains are holding a thought or a memories. When we are holding on to something that we don't need - we should learn to let go. It sounds simple. So why do we find it so difficult?

Remember that ‘letting go’ is not ‘getting rid of’ or ‘throwing away’. Say I’m holding onto mobile and you say, ‘Let go of it!’, that doesn’t mean ‘throw it out’. I might think that I have to throw it away because I’m attached to it, but that would just be the desire to get rid of it.

We tend to think that getting rid of the object is a way of getting rid of attachment. But if I can contemplate attachment, this grasping of the mobile, I realise that there is no point in getting rid of it - it’s a good mobile; it keeps good in communicating n playing game and is not heavy to carry around. The mobile is not the problem. The problem is grasping the mobile unnecessarily.

So what do I do? Let it go, lay it aside - put it down gently without any kind of aversion. Then I can pick it up again, and lay it aside as and when necessary. Now if u still thinking about mobile and its desire of holding it again, is over riding your mind after placing it aside over the table!. ……if not ..then as far as mobile is concerned its real let go for that moment.

Also, understand Letting go is not Forgo and forget. It is more then that. Letting go is like third party observer. It is like referee of the game..good referee remain emotionally unattached to the players. He allows them to play and prompts at mistake without emotionally involving into it. So make your self ready to learn and use let go with a faith that your life is not to live in depression, fear and anger…and nobody..who so ever has a right to make you feel like that.

When you are feeling depressed and negative, the moment that you refuse to indulge in that feeling is an enlightenment experience. When you see that, you need not sink into the sea of depression and despair and wallow in it. You can actually stop by learning not to give things a second thought.

You have to find this out through practice so that you will know for yourself how to let go of the origin of suffering. You have to contemplate the experience of letting go and really examine and investigate until the insight comes. This does not mean that you are going to let go of desire forever but, at that one moment, you actually have let go and you have done it in full conscious awareness. There is an insight then. This is what we call insight knowledge or profound understanding.

Let us understand cause for the emotional pains, by nature attached to thoughts and words rolling in our mind. . it is either for your enemy or your friend. Either you trying hard to escape from it Or you need it badly. you want to take revenge or you want to teach lesson at any cost. Or you want to clarify your point of arguments. Or you want to pass judgement. They are all source of negative emotion.

Now for example take Judgements. It is the judgement which forces you see some one as enemy or as friend. It is not always possible to change external environment responsible for it. But it is always possible for us to decide how we react to it. How we judge and why we judge. It requires reprogramming of our mind. like you r not alone responsible for all the suffering all over the world. Nor you the only one suffering in this world. With a Understand that we all have power to execute. remember it is execution and not jus worry which brings changes. so if you worry beyond your capabilities then you r miss utilizing your own resources…and it may happen that you r worried for world and your immediate neighbour needs simple help from u. and you r not available for that simple help.

Learn to let go. If you cant let matter how hard you try source of pain will remain in u. letting go is not for others benefit. it is for ourselves. the process looks, tedious and painful, but once it is mastered it is easy and effortless and brings magical benefits …so start learning let go. Believe me anybody can learn it. It is wonder tool in over coming pain. So start practicing, before pain reaches to point of no recovery…it will not happen in a single day but it will happen one day…n that day is not far away.

I agree that contemplation is good and most of the time we start with contemplation and ends up with anxiety. Please Remember, any thought process if it generating emotions then it is not contemplation. Specially watch negative emotions.

Attachment shapes our life from childhood. We form a bond with our parents, and these early relationships have an impact on all future relationships. When these relationships change, or when we experience a loss, we are faced with the difficult process of letting go. We usually don't want to let go. We want to continue the attachment which has given us such fulfilment. We often want to continue the attachment even when it is no longer rational to want it.

You under go pains of anxiety, fear anger and depression or guilt and grief due to these thoughts. , letting go is stopping yourself giving second thought to these words. Letting go is recognising what is disturbing u inside and then immediately put those thought to the halt. Many time letting go is miss understood by running away from responsibility. No it is not. Letting go is not running away ….it is rather stopping mind who is running in infinite loops.

I thought that I knew a lot about this process, but it was different when I had to go through it myself. I remember when I left home and secure shield of parents to remote place first time for the work, when friends abused me. When boss fired me left right n right made me to loose seniority. when I left illusive and tempting world pornography.

Now with personal problems and obsessions, to let go of them is just that much. It is not a matter of analysing and endlessly making more of a problem about them, but of practising that state of leaving things alone, letting go of them. At first, you let go but then you pick them up again because the habit of grasping is so strong. But at least you have the idea. Even when I had that insight into letting go, I let go for a moment but then I started grasping by thinking: ‘I can’t do it, I have so many bad habits!’. It is just a matter of practising letting go. The more you begin to see how to do it, then the more you are able to sustain the state of non-attachment.

There are health benefits to letting go. People who worry a lot and hold on to problems may be more vulnerable to physical problems than people who are able to let go. Anger and hostility have even been associated with heart attack risk. At least two personality types have been connected with an increased risk of heart attack. Type A and Type D personalities, both involve an inability to let go. The type A person is pressured and driven, while the type D person is worried and anxious. By learning to let go of cares, worries, anger, deadline pressure, and similar concerns we may be lengthening our lives. We are certainly making them more enjoyable.

Say your loved one move out of your life because he/ she finds better one. leaving u under shock…u cry, u desperately runs then u burst in to anger and then you’re your self to acute depression. Where as one who left you , your state is hardly matter, in such situation let go and to forgive brings magical results.

Everybody around us talk about benefits of forgiveness. We are told from child hood to forgive. But very few knows how to forgive. More over nobody told us how to know that we have really forgave some one we want. It is simple to notice. Think about the one, u think u have forgiven …check out emotion emerging in u as u think about it. If u really forgive then u wont feel any negative emotion…More on forgiveness in next post…