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Tuesday, February 27, 2018

हे वैज्ञानिक सोचवाले इंसानों आप सभी को होली की शुभकामनायें


विज्ञान का विद्यार्थी होने के  नाते मेरा विज्ञान का पक्षधर होना स्वाभाविक होना चाहिये, एसे मे जब अंधविश्वास पर वार करते हुये लेख पढने को मिले तो मुझे अच्छा लगना चाहिये, पर मे क्या करू मुझे दूसरे अनदेखे पहलू पर नजर डालने की बुरी आदत जो है, लीक से हटकर सोचने की आदत है. इधर विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मेरे साथी मुझ से यह उम्मीद करते है की माफिया, पूजीपतियों  और राजनेताओं की सांठ्गांठ को नजर अंदाज करते हुये हर अच्छी बुरी वैज्ञानिक सोच का मै समर्थन करू. यह भी भुला दू की आज विज्ञान हमे किस दिशा मे ले जा रहा है.
इन दिनों मेरे आस पास विज्ञान और तकनीक के नाम पर जो हो रहा है उसे देखकर चिंतित और व्यथित हू  और अपने को असहाय महसूस कर रहा हू. गलत का विरोध भी करू तो केसे ?  विरोध करने के लिये और अपनी बात कहने के लिये उन्ही के पास जाना होगा जिनका विरोध करना है, यही मेरी मजबूरी है.  इस हद तक की निर्भरता इसी विज्ञान की ही तो देन है.
अगर आज मुझे अपनी बात आप तक पहुचानी है तो करोडो का चेनल चाहिये.... एसा एक नही सेकडो चेनल चाहिये, क्योंकी मे जिनके बारे मे कहना चाहता हू उनके पास मुझे गलत साबित करने के प्रचार साधन आपार है. इतना असाहाय तो मेरे पूर्वजों ने भी पहले कभी महसूस नही किया होगा. यह सच है की वो कम ज्ञानी थे, अंधविश्वासी भी थे. शायद हमारी तरह गलत और सही की पहचान नही कर पाते थे. उन्हे नही पता था की पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर काटती है. पर उनकी अपनी एक जीवनशेली थी जिसे अपना कर वो हजारो सालो से पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाये रखते हुये इंसानी जीवन को जीवत बनाये रखा. पर आज क्या ?
आज हम हद दर्जे तक मतलबी और लालची हो गये है हमारी कथनी और करनी मे फर्क बढ गया है.  हमारी जिंदगी इतनी आराम तलब और मतलब परस्त हो गई है की हमने अपने आनेवाले  संकट से आंखे मूद ली है. इस विज्ञान ने इंसान मे मोजूद जानवर की हसरत को हजारो गुना बढा दिया है. आज हम वही बोलते और सोचते है जो हमारी हसरतो को पूरा करने मे मदद करे...किसी भी कीमत पर.
लालच को हमने कोरपोरेट का रूप दे दिया है. जो बस कमजोर को अपनी मालकियत समझता है प्राकृति संसाधनो का बेहिसाब दोहन इसी लालच की देन है. यही लालच धर्म और विज्ञान को अपने मतलब के लिये एक दूसरे को खून का प्यासा बना देता है. लाखो मार दिये जाते है और दोष धर्म का. हो सकता है,  दोष धर्म का ही हो,  पर हथियार किसके है ...वो तो विज्ञान की ही देन  है ना ?  वरना मात्र नाखून और पंजो से आप इतनो का मार पाते ?   
प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक विज्ञान और उसके द्वारा किया गया तकनिकी विकास का असर बहुत सिमित क्षेत्र मे होता था. ये वो समय था जब सभ्यताये प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुये अपनी परंपराओं और समाजिक संरचना को हजारों सालो तक बनाये रही, और  वंही कुछ समाज अन्य सभ्य समझे जाने वाले समाजों की तुलना मे  अपने को  आदिम, जंगली बनाये रहे.  उस समय वो एसा कर भी पाये क्योंकी विज्ञान उतना उन्नत नही था.  
सभ्यताये आती- जाती रही पर हजारों सालो से मानव जाति अपना वजूद बनाये रही, प्रथम विश्व युद्ध के  बाद यह सब तेजी से बदला गया. जिस तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है वो अब किसी से छुपा नही है, विज्ञान और तकनीकी की मदद से इसकी अंधाधुंध उपयोग सभी सीमाये पार कर रहा है.
यह सच है की अंधविश्वास ने मानवजाति का नुकसान किया  है. पर क्या कभी इसका किसी ने हिसाब लगाया की विज्ञान और तकनीकी ने मानव जाति का कितना नुकसान किया है. इसलिये अंधविश्वास पर वार करने से पहले हमे यह देखना होगा की जिस  विज्ञान की उगंली पकडकर हम चलना चाहते है वो हमे किस दिशा मे ले जा रहा है. यह तब, और भी जरूरी हो जाता है जब व्यवस्था भ्रष्ट हो  और वो लालची मतलबी एह्सान फरामोस राजनेताओं और धर्म के ठेकेदारों और पूजीपतियो की लिये काम कर रही हो.
अंधविश्वास और गलत पंरपराये मात्र उनको  प्रभावित करते थी जो उन्हे मानते है, पर  विज्ञान उनको भी प्रभावित कर रहा है जिसका उससे दूर दूर तक कोइ लेना देना नही है. पृथ्वी का जीवन इससे पहले इतने संकट मे कभी नही था. हर गुजरते दिन के साथ कोइ ना कोइ प्रजाति विलुप्त होती जा रही है. आज हम मे से कोइ भी पक्के र्तौर पर यह नही कह सकता की अगले 50 साल मानव जाति भी बनी रहेगी या नही.
एल्बर्ट आंस्टीन को आज अगर विज्ञान के लिये याद किया जा रहा है तो उन्हे परमाणुबम के लिये और उससे हुई लाखों हत्याओं के लिये भी याद किया जाये ...  जो उनके रहते नागासाकी और हिरोशिमा मे हुई .... कितना असाहाय महसूस किया होगा एल्बर्ट आंस्टीन ने ...या किया भी होगा या नही...कोन जानता है....इतिहास तो जीतने वाले लिखते है. 
आज विश्व की 20% आबादी का पृथ्वी के 80% संसाधनों पर कब्जा है. ये बेहद ताकतवर है. यही  लोग विज्ञान और तकनीक का सहारा लेकर बाकी 80% आबादी को डर और मजबूरी के साये मे जीने को मजबूर कर दिया है. यही वो लोग है जिनका असिमित लालच जंगल , पहाड को बरबाद कर दे रहा है.  आखिर प्राक़ृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हमे किस ओर ले जा रहा है?
कल ही ल्यूसी रोबोट का विडियो देखा ...उसमे वो बोल रही है की “ अगर आप मेरे साथ सही सलूक करोगे तो मै भी आपके साथ सही सलूक करूगी” ? हो सकता है की यह किसी का मजाकिया विडियो हो? पर यह मात्र धमकी नही है. आर्टी फीशियल इंटेलीजेंस से युक्त ये रोबोट समय के साथ और बेहतर होते जायेगे और वो समय दूर नही जब हम पूरी तरह इन पर निर्भर होंगे इसके नतीजे कितने विनाशकारी हो सकते है यह तो भविष्य की बात है पर आज जो  कुछ  अफगानिस्तान, इराक मे हुआ उसे क्या आप नजर अंदाज कर पायेगे, किस तरह रिमोट मे बैठे कुछ लोग विज्ञान की देन ड्रोन और एसे ही कितने हथियारों से सब कुछ तबाह करने पर तुले हुये है ... और जो विरोध मे है वो बस आंतकवादी  करार दिये जा रहे है.  मै यह नही कह रहा हू की आप फिर से आदिम बन  जाओ और अंधविशवास का दामन थाम लो. पर इसका मतलब यह भी नही की विज्ञान और तकनीक का अंध भक्त हो जाया जाये.
हमे धर्म और विज्ञान से परे जाकर जीवन को देखना और समझना है. जीवन को सरल बनाना है. आज विश्व की आबादी 770 करोड़  से भी ज्यादा है और अगले 10 वर्षों मे वो 900 करोड़ का आकडा पर कर जायेगी. 
लालची और मतलबी लोगो से शासित 900 करोड़ लोग जो अपने ही बनाये विज्ञान और तकनीक के दानव से डरे और सहमे हुये होंगे ..... जिसे हम प्रगति कहते है क्या सच मे यह प्रगति है ...और यह केसी प्रगति, किसकी प्रगति ? इस सब से इंसानियत ने क्या पाया ?
आज विकास के नाम पर हमने लंगोठ पहने मूल निवासी को जींस पहना दी है हाथ मे मोबाइल थमा दिया है देखने को टीवी भी लगा दिया है ...क्या यह सब करके उस सीधे सादे इंसान को अपनी तरह  लालची और मतलबी नही बना दिया. अब हम चाहते है की हम उसके जंगल और पहाड ले ले और वो उफ तक ना करे
मै आदतन ट्रेकर हू ....अब  भी ट्रेकिंग के दौरान मुझे जंगल और पहाड मे एसे लोग मिल जाते है जिनके पास भले ही खाने को एक रोटी हो पर उसमे से भी  वो आधी रोटी मुझे देना चाहता है ...अपनी खटिया मुझे सोने को देता है और खुद  नीचे जमीन पर सो जाने की जिद्द करता है ...उस समय  सच मै अपनी इतनी बढी वैज्ञानिक सोच और तकनीक होने के बावजूद खुद को बहुत छोटा महसूस करता हू ...आज वो संकट मे है और मे बस वाट्सएप पर यह लिख पा रहा हू . उसका साथ दूंगा तो आप सब मुझे आंतक वादी और माओवादी घोषित करने मे कतई परहेज नही करोगे ... हो सकता कुछ लोग इस लेख को पढकर एसा सोच भी रहे हो
क्या ही अच्छा होता अगर विज्ञान इस धरती पर  रह रहे इंसानों को समझा पाता की इस पृथ्वी पर उसके जीने के लिये जरूरत से ज्यादा है. काश विज्ञान हम सब को विश्व ग्राम का अहसाहस दिला पाता. हमे समझा पाता की राष्ट्र , धर्म, रंग  और जाति मे बटा वो प्राकृति की एक मात्र एसी अनूठी रचना है जो चाहे तो जानवर से खुद इश्वर बन सकता है.
अफसोस विज्ञान एसा नही कर पाया उस पर  राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार पहले भी हावी थे और अब तो हद ही हो गई है. आज वो एसे विचार पागल पन की हद तक जनूनी होकर इसी विज्ञान की मदद से फेल रहे है. कुछ लोगों ने पृथ्वी के संसाधनों पर बेशर्मी की हद तक कब्जा कर लिया है और बाकीयों को राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार से आपस मे लडाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है. 
सब को मौत की सच्चाई मालूम है सब को मालूम है की वो कितना ही अमर होने का जतन कर ले, मौत से वो बच नही पायेगा. जो पैदा हुआ है उसे मरना ही होगा. हमारी पागल पन की हद देखो की वो हमे दिखाई नही दे रहा है. 
आज विज्ञान बंदर के हाथों उस्तरा ही तो है ...ना भई ना उस्तरा नही..क्योंकी उससे तो वो खुद अपना ही नुकसान कर सकता था. उसके हाथ मे विज्ञान एक एसे रिमोट की तरह है जो किसी भी एटम बम को फोड सकता है .... जो अब फूटा की तब.
एटम बमों का भोडा प्रदर्शन शान से हो रहा है, जितना बढा बम उतना ही वैज्ञानिक और तकनीकी उन्नत देश.  हमने इतिहास  से ना सीखने की कसम खा रखी है.  आज हमने रक्षा के नाम पर इतने हथियार जमा कर लिये है जो इस पृथ्वी को सेकडो बार तबाह कर सकती है. फिर भी चेन नही
 हमे और घातक हथियार चाहिये. और एसे लोगों को आप विज्ञान देने की बात कर रहे हो.  मेरे हिसाब से अंधविश्वास पर काम करने से पहले हमे अपने लालच और डर पर काम करना चाहिये, और इस बात का जबाब हमे अपने अंदर खोजना चाहिये की लालच ज्यादा खतरनाक है या अंधविश्वास.
कहने को अब भी बहुत कुछ है पर लेख लंबा हो रहा है ...इसे पढते रह जाओगे तो होली कब मनाओगे. .. इस लिये आगे की बात किसी ओर दिन 

शुभ होली
                                                                                                                                     सादर
       दुर्वेश      

Sunday, March 8, 2015

गर्मा गर्म पानी ....यानी चाय की एसी की तैसी

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पीलिया होने क बाद मुझे चाय और काफी को छोडना पडा क्योंकी उनके पीते ही उबकाइ करने का मन होता था. हमारे घरों मे चाय और काफी अनिवार्य स्वागत पेय है. किसी भी अतिथी का स्वागत आजकल अब इसी से करते है. एसी हालत मे मेरा इसे पीने से मना करना मेजबान को परेशानी में डाल देता और फिर वो ठंडा, सोडा या कोला पीने की पेशकस करने लगते. इसलिये सोची समझी रणनिती का तहत मेने उनसे इसके विकल्प में गर्म पानी मांगना शुरू कर दिया, वेसे भी उन्हे चाय और काफी बनाने के गर्म पानी करना ही होता है. इस तरह में गर्म चाय की जगह गर्म पानी पीने वाला बन गया.
मेने लोगों को पानी मे नीबूं या फिर ग्रीन चाय मिलाकर पीते देखा है, पर मेने चाय की तरह सिर्फ गर्म सादा पानी ही पिया. जब जितनी बार मन ने चाहा उतनी बार पिया, बिना इस डर से की इससे मुझे कोइ नुकसान होगा. इस बात का जरूर ध्यान रखता कि इससे कंही मे अपने होंठ और जीभ ना जला बेंठू. उसकी वजह से मुझे इसे चाय की तरह ही धीरे धीरे पीना पडता. शुरू शुरू मे बेस्वाद लगा पर कुछ दिनों मे ही मुझे उसमें स्वाद आने लगा. अपने ही स्लाइवा का स्वाद जो कभी हल्का मीठा तो कभी कडवा तो कभी खट्टा सा या कभी कभी नमकीन. इसे मेने पहले कभी महसूस नही किया था. महसूस होता भी केसे नोर्मल पानी को एक ही सांस में जो गटक जाता था. वेसे भी स्वाद, अच्छा या बुरा नही होता, यह सब हमारे दिमाग मे है, देखा जाये तो शराब से बुरा स्वाद भी कुछ हो सकता है! पर इसके स्वाद के बारे मे उसके किसी पीनेवाले से पूछों और फिर उसकी आंखों की चमक देखो.
मेरा तो इतना कहना है की आप भी इसे चाय के विकल्प के तोर पर शुरू किजिये और फिर कुछ दिनों मे ही इसका असर देखिये. शुरू-शुरू मे हो सकता है की आपको इसके पीने से एसीडीटी होने लगे या फिर गला सूखा-सूखा सा लगे. अगर एसा हो तो बस आपको पानी की मात्रा को ओर बढाना  है कुछ दिन मे एसीडीटी का एहसास खत्म हो जायेगा.
एक महिने बाद अगर आपको लगे की  चाय इससे बेहतर है तो कोइ बात नही आप फिर से चाय शुरू कर देना. पर मुझे विश्वास है की मेरी तरह आप भी इसके चमत्कारी असर को अनदेखा नही कर पायेंगे.
हमारी बहुत सारी बिमारीयों और शारारिक परेशानीयों की वजह कम पानी पीना है. एक नोर्मल व्यक्ति को अपने शरीर के वजन का 0.06 से 0.08  गुना पानी एक दिन मे पीना चाहिये. यानी की अगर आपका वजन 80 किलो है तो कम से कम 4.5 लीटर पानी आपको पीना चाहिये.  
अगर हम लगातार कम पानी पीते रहे तो कुछ समय बाद शरीर कम पानी को ही अपनी नियती मान लेता है और हमारा शरीर अंगों के महत्व के हिसाब से पानी की राशनिंग तय कर देता है. कम महत्वपूर्ण अंग जेसे स्किन, डाइजिस्टिव ट्रेक, पैनक्रिया, किडनी, हड्डियों के जोड और मांसपेशियां के लिये जबरदस्त राशनिंग और दिमाग और ह्रदय जेसे महत्वपूर्ण अंग मतलब कोइ राशनिंग नही.  
कभी आपने महसूस किया है प्यास से गला सूख रहा है और आप एक-एक बूंद पानी के लिये तरस रहे है. उसके बावजूद आपको भरपूर पसीना आ रहा होता है. जिस समय आप एक-एक बूंद के लिये तरस रहे होते है आपका शरीर पानी को पसीने की शक्ल मे बरबाद कर रहा होता है. असल मे तब वो आपके तापमान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा होता है. जो आपकी जान बचाने के लिये उस समय ज्यादा जरूरी है.
उसके बाबवजूद अगर आपने कोइ जहरीली चीज खा ली तो तुरंत कई लीटर पानी उबकाई की शक्ल मे भी बाहर आ सकता है, यह सब पानी उसने कंहा से पाया.  सिम्पल, इसे उसने शरीर के दूसरे अंगो से जबरदस्ती हासिल किया. इसे ही राशनिंग कहते है. कब किस अंग को कितना पानी देना है इसका निर्णय लगातार हमारा शरीर लेता रहता है. इसलिये आप इतना पानी पीते रहे की हर समय शरीर में इतना पानी बना रहे की उसे राशनिंग की कम से कम जरूरत पडे. क्योंकी राशनिंग का सबसे पहला असर किडनी फिल्टर पर होता है. हो सकता है पानी की कमी के कारण आपकी पूरी पेशाब ही ना बने. जिसके कारण आपके शरीर का टाक्सिन जो पेशाब के रास्ते आसानी से निकल सकते थे, उनके पूरी तरह ना निकलने के कारण वो बिमारी का कारण बन जाये. 
दुर्गंध युक्त पीली, कथ्थई पेशाब शरीर मे पानी की कमी का संकेत हो सकता है. पानी की लगातार कमी  हमारे कुछ अंगों पर बहुत बुरा असर डालती है. अब पेनक्रिया को ही ले ले इसका हमारे हमारे भोजन के पाचन मे और शरीर में शुगर नियंत्रण मे सबसे बडा हाथ है. अगर हम लगातार कम पानी पीती रहे तो कुछ समय बाद पेनक्रिया कमजोर हो जायेगा. जिसके कारण पहले हमारा पाचन प्रभावित होगा और उसके बाद शुगर नियंत्रण प्रणाली कमजोर हो जायेगी और नतीजा डायबटीज, एसीडीटी और ना जाने क्या क्या.
हमारे खून का PH 7.35 से 7.45 के बीच रहना चाहिये अगर यह 7.35 से कम हो जाता है तो खून अम्लिय (acidic) माना जाता है और अगर यह 7.45 से उपर हो जाता है खून क्षारीय (alkaline) माना जाता है और दोनों ही स्थति मे इसके हमारे शरीर पर गंभीर प्रभाव होते है इसलिये हमारी क़िडनी लगातार इसको नियंत्रित करती रहती है और अतिर्रिक्त अमल्ता या क्षार को पेशाब के द्वारा निकालती रहती है. पर इसके लिये उसे भरपूर मात्रा मे पानी चाहिये होता है.
अगर पानी की कमी बनी रहे तो अमल्ता को नियंत्रित करने के लिये हड्डी मे से कल्सियम लेना शुरू कर देती है और नतीजा ओस्टो प्रोसिस की पूरी संभावना बन जाती है. इसी तरह ब्ललड प्रेशर के कंट्रोल मे भी पाने का बडा महत्व है.   
पानी खाली पेट आसानी से पच जाता है यानी की आंतो द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है. इसके लिये उसे ज्यादा से ज्यादा 20 से 40 मिनिट का समय लगता है शायद इसीलिये हमारे बुजर्गों ने सुबह की शुरूआत भरपूर पानी पीकर करने की सलाह से दी. जिससे रातभर में हुई पानी की कमी को शरीर आसानी से पूरा कर सके.   
भोजन के दौरान या उसके तुरंत बाद पिया गया पानी किये गये भोजन का हिस्सा बन जाता है और वो उस भोजन के साथ ही पचेगा और पाचन को धीमा कर देता है. इसलिये अकसर भोजन के साथ लिया गया पानी पाचन पर अतिरिक्त बोझ साबित होता है और पाचन को कमजोर बनाता है. इसलिये इसे उस समय विष के समान माना गया. 
अच्छा हो की आप पानी को भोजन से आधा घंटा पहले भरपूर मात्रा में पी लें जिससे भोजन शुरू करने से पहले ही वो पानी आसानी से पच जाये. इसी तरह खाने के 1 घंटे के बाद आप भरपूर मात्रा मे पानी पी सकते है. इससे आपका पाचन दुरस्त बना रहेगा. इसके अतिरिक्त जब भी इच्छा हो गर्मा गर्म पानी पीते रहे.
गर्म पानी शरीर की मेटाबोलिक रेट बढा देता है और नतीजा आप बेहतर अनुभव करते है. मेरा अपना अनुभव यह है की गर्म पानी आपके वजन को घटाने मे भी मदद करता है. मेने बिना कीसी अतिरिक्त जिद्दो-जहद के आसानी से 6-7 किलो वजन कम कर लिया है. अब मे पहले से ज्यादा फिट हू स्वस्थ हू.
ध्यान रहे, प्यास लगना एक तुलनात्मक अहसास है, जरूरी नही की वो सही समय पर आपको चेतावनी सिगनल दें, इसलिये आप प्यास लगने का इंतिजार ना करे. अकसर जब हम किसी महत्व्पूर्ण कार्य मे लगे होते है तो हमे भूख और प्यास का पता भी नही चलता. पर इसका यह मतलब तो नही की हमारे शरीर को पानी और खाने की जरूरत ही नही है.
तो फिर क्यों ना भरपूर पानी पिया जाये. पानी धीरे धीरे स्वाद लेते हुये उसे आदर देते हुये पिया जाये. एक बात ओर समझ लीजिये चाय या काफी सादे पानी का विकल्प  नही है. सच तो यह है की चाय और काफी के रूप मे जो टाक्सिन लिया है उस टाक्सिन को निकालने मे ही शरीर को उस से दुगना पानी व्यय करन होगा.
आजकल जूस के नाम पर बजार में ना जाने क्या मिल रहा है. पेप्सी और कोला के नुकसान के बारे मे गूगल करो और खुद जान जाओ.  इसलिये इसे भी सादे पानी का विकल्प मानने की भूल ना करें.
अगर आपको नीचे दी गई लिस्ट मे से किसी एक से भी परेशान है,
·           मोटापा   
·           जोडो मे दर्द
·           हर समय थकान बनी रहना
·           सुबह उठने का मन नही करता है शरीर थका थका सा लगता है   
·           मांस पेसियों मे एंठन रहना
·           त्वाचा रूखी सूखी है
·           सिर मे रूसी
·           डायबटीज
·           क़िडनी इंफेक्शन  
·           जुकाम
·           सिर दर्द रहना  
·           पेट खराब रहना
·           एसीडीटी
·           अकसर कब्ज
·           हाथ पैर ठंडे रहना
·           पाइल्स
·           ब्ल्ड प्रेशर
तो अपने डाक्टर से इस बारे मे बात किजिये और पानी से इसके सबंध के बारे मे पूछिये.
इस बात पर जरूर बहस हो सकती है की पीने के पानी का तापमान क्या हो. कुछ लोग नोर्मल तापमान के पानी को पीने की सलाह देंगे तो कुछ ठंडा पानी पीने का, तो कुछ मेरे जेसे लोग गर्म पानी की. पर कोई भी पानी के महत्व को नजर अदांज नही कर सकता है.
लोग कहते है गर्मी में और गर्म पानी?...कोइ पागल ही एसा सोचेगा.
अजीब लोग है, गर्मी मे गर्म चाय पी सकते है पर गर्म पानी पीने को कहो तो! ..... भगवान ही एसी सोच वालों का भला कर सकता है. वेसे भी डाक्टरलोग पानी उबालकर पीने की सलाह देते है जिससे कि उसके अदंर मोजूद बेक्टिरिया और वायरस खत्म हो सके. अतंर सिर्फ इतना है की लोग उसके बाद उसे फ्रिज मे ठंडा करने के लिये रख देते है. जबकी मेरी सलाह है की उसे चाय की तरह गर्मा गर्म पिया जाये, कम से कम चाय की जगह तो इसे पिया ही जा सकता है.
मेने लोगों को दिन भर में 1 लीटर से भी कम पानी पीते हुये देखा है. उन्हे पता ही नही होता की उनके शारारिक कष्टों की वजह कम पानी पीना है और वो डाक्टरो के यंहा किसी रामबाड दवाइ की उम्मीद मे लाइन लगाये बेठें है.
अति महत्वपूर्ण : आप सुबह की शुरूआत चार से पांच गिलास ( 1 से 1.25 लीटर ) पानी पीने से करे. अगर इसके पीने से आपको चक्कर आने लगे, या हाथ पेरों मे सूजन आने लगे, या नाक से पानी बहने लगे  तो इसे आगे नही करना है और इस बारे मे अपने डाक्टर से बात करे क्योंकी यह कुछ खास बिमारी के लक्षण हो सकते है जेसे हाथ पेरों मे सूजन क़िडनी के ठीक से काम नही करने के कारण हो सकती है. इसी तरह नाक से पानी आना फेफडों की प्राब्लम के कारण हो सकता है और चक्कर आना न्यूरोलोजिकल परेशानी के कारण हो सकता है. 
उम्मीद है की एक महिने तक हर रोज 8 से 10 कप गर्म पानी जरूर पियेंगे. लेख लंबा हो गया है और आप मेरे फंडे से पूरी तरह पक गये है. इसलिये पानी के महातम पर आगे चर्चा किसी ओर दिन, पानी कब, केसे और कितना पीना चाहिये उसके बारे में आयुर्वेद मे विस्तार से समझाया गया है पर उस पर भी चर्चा अगले ब्लाग में.

यह लेख एक सलाह मात्र है. आपके लिये आपके डाक्टर की सलाह सर्वोपरी है.

Sunday, November 10, 2013

ICE- in case of emergency (...?.....)



उत्तरा खंड के वासी और और वंहा गये प्रयटक और तीर्थ यात्री गंभीर त्रासदी से गुजर रहे है. यह एक प्राकृतिक आपदा थी जिसने यह भीषण तबाही मचाइ. पर एसा पहले भी हुआ है और आगे भी होता रहेगा. क्योंकी एसा बहुत कुछ है जिस पर अब भी हमारा कोइ बस नही है. कुछ लोग इसके लिये बेतरतीव विकास और इंसानी लालच को दोष दे रहे तो कुछ लोग ग्रह-नक्षत्रों को.
यह भी सच है की अगर हमने कुछ एतिहियाती कदम उठाये होते तो इसकी गंभीरता को कम किया जा सकता था. हर बार की तरह हमारी सेनाओं ने एक बार फिर अपने को साबित किया की वो शांति के समय भी किस तरह अपने फर्ज को निभाने मे सबसे आगे खडी होती है.  वो शायद एसा इसलिये कर सकी क्योंकी वो इसके लिये प्रशिक्षित थी.
इसके साथ ही बहुत सारे NGO और देश भर मे मोजूद बहुत सारी स्थानिय संस्थाओं ने इसमे बढचढ कर मदद की. पर इसमे आपसी सामंजस्य का अभाव हम सब ने महसूस किया.
यह सच है की जिन पर यह गुजरी उसे शब्दों मे व्यक्त नही किया जा सकता पर एसे समय मे लोगों की थोडी सी मदद और हिम्मत फिर से अपने पेरों पर खडा मे एक अहम भूमिका अदा करते है. इसलिये यह समय उन्हे पहचानने का  भी है जो इस कष्ट के समय आपके साथ कंधे से कंधा मिलाये खडे है. जिन्होने समय पर हस सभंव मदद की. हम उन्हे पहचाने और उन्हे और मजबूत बनाने के लिये हर जरूरी कदम उठाये और उन्हे भी पहचानने जो इस त्रासदी की अनेक वजहों मे से एक थे.
इस त्रासदी से कुछ प्रमुख सबक जो मेरी समझ मे आये वो इस तरह है:

1.   खतरनाक और नाजुक स्थलों को पूरे देश मे चिन्हित करना और उन्हे खतरे के अनुसार ग्रेडिंग़ करना और उसकी सूचना सार्वजनिक करना और उससे जुडे खतरों के बारे मे आम नागरिकों को जागरुक करना.
2.   आपदा कंही भी और किसी भी रूप मे आ सकती है फिर वो चाहे भूकंप हो, दंगे हो, महा मारी हो, बाढ हो, सुनामी हो या फिर न्यूकिलियर रेडियेशन, ट्रेन एक्सीडेंट या फिर आंतकवादी हमला. हर नागरिक यह सुनिशिचित करे की उसे केसे इससे निबटने के लिये सहयोग करना है क्योंकी आप इस मुगालते मे ना रहे कि एसा आप के साथ नही हो सकता .
3.   आपदा प्रबंधन जरूरी नागरिक ट्रेनिंग का हिस्सा हो. इसे हम स्कूल शिक्षा मे शामिल कर बच्चों के लिये अनिवार्य कर सकते है. NCC को स्कूलों और कालेजों मे अनिवार्य किया जाये. कब तक शिक्षा को हम किताबी ज्ञान तक सिमित रखेगें.
4.   अति खतरनाक जगहों पर रहने वाले आम नागरीकों को जरूरी ट्रेनिंग देना. और यह सुनिश्चित करना की जो लोग अति खतरनाक जगहों पर पर जाना चाहते है उन्हे इसके लिये जरूरी ट्रेनिंग मिली हो.
5.   एसी व्यवस्था हो जिससे एसी जगहों पर लोगों का सही संख्या और लिस्ट का पता लग सके.
6.   शांति के समय moke drill  जिसमे आम नागरिक इसका हिस्सा हो , समय समय पर आयोजित की जानी चाहिये. जो हमारी तैयारी को सुनिश्चित करेगी. अब तक यह सिर्फ सेनाओं के लिये ही आयोजित की जाती है. या फिर कभी कभी फायर बिर्गेड इसको करती नजर आती है.
7.   सभी अपने मोबाइल मे उस जगह से संबधित आकस्मिक नम्बर जरूर स्टोर करे
8.   ICE(in case of emergency) के नाम से एसा नम्बर स्टोर करे जिसे अगर आप किसी मुसीबत मे फंस गये हो तो मददकर्ता आपके मोबाइल से उस पता कर उस नम्बर पर मेसेज दे सके. एसे समय मे बेहद किमती समय अकसर सही नम्बर पता करने मे नष्ट हो जाता है.

जेसे जेसे ओर सुझाव मुझे मिलते जायेगे मे उसे इस पोस्ट में उसे शामिल करता जाउग़ा.

Friday, November 8, 2013

Hot water drinking




 
I was forced to leave tea and coffee due to health reason as after jaundice, drinking these  causes vomiting sensation due increased acidity. Later on it created social problem as teas and coffee is now normal welcome drinks. So if u don’t drink, then it creates a very embarrassing situation for the host as well as for me….to overcome this I switched to hot water drink , a plain hot water in place of tea and coffee.  Switching to hot water was not an accident it was well thought and after more then a year of practice I can say that I was not wrong, certainly better option then tea and coffee…
Yes, I’m a convert to drinking hot water because being hot it forces you to drink it in sips — you can’t drink a whole lot at once like you can with room temperature tap water or cold water. my theory is, because of this, it is less of a shock to your body. ie. lots of small sips over a longer period of time vs. big gulps at much longer intervals.
Doesn’t cold constrict blood vessels and heat dilate blood vessels? So wouldn’t it follow that dumping mass quantities of frigid ice water into your body constrict the blood vessels in your stomach thereby hindering it’s performance in digesting food. While drinking warm water would dilate the blood vessels and enhance stomach function? People drink iced beverages from huge containers. Drinking large volumes of iced fluid in one sitting from a Big Gulp has zero or negative effect on digestion? Anyway, I am not saying that digestion can’t occur at different temperatures, but certainly the body function is not optimized and dull digestion process invites certainly more problems.  

Benefits of Drinking Hot Water:
1.    Cleanses the Digestive System : Water helps to break down the food in your stomach and keep your digestive system on track, hot water is found to break down food faster than cold water, which makes the food easier to digest. When the digestive system does not have to work as hard to break down foods, it uses less energy, which results in improved health.
2.    Flushes Out Toxins: Drinking hot water can cause slight increase in body temperature above 98.6 degrees, causing your body to flush toxins out of the body and purify the bloodstream, thus improving your overall health.
3.    Enhances Stamina and Performance: When your body is not overloaded with toxins, it is better able to perform at peak performance.  Because drinking warm water helps to flush toxins out of your body, it increases stamina and results in better overall functioning on a physical level.
4.    Improves Emotional Responses and Thoughts: Holistic practitioners believe that toxic deposits from the body’s nervous system can have a negative effect on your emotions and thoughts.  They believe that drinking hot water will help to remove those built up deposits from our nervous system. Drinking warm or hot water is also said to help purify your mind and body and obtain a balanced mental state, allowing you to think more clearly.  Deepak Chopra recommends drinking hot water as part of a pacifying diet, particularly during late fall and winter, to maintain balance of the body and mind and keep you vibrant and grounded.
5.    Improves Blood Circulation: Drinking hot water is said to improve your blood circulation.  Good circulation is needed to move blood throughout your body in order to deliver oxygen and nutrients to your tissues and organs. In addition to drinking warm water, soaking your body in warm water, particularly your feet, is said to boost blood circulation as well.  If you notice symptoms of poor circulation, including tingling in the feet and hands, cold fingers and toes, bluish-tinted skin and slow-healing wounds, be sure to talk to your doctor.
6.    Treats Constipation: Constipation is a very uncomfortable condition that typically occurs when the intestines lack proper hydration, causing stools to turn hard and dry and making them difficult to pass.  Drinking hot water several times a day is said to help stimulate the bowels, returning your body back to normal functioning.  But be careful of other drinks such as juice and soda, because they tend to contain excessive sugar that could actually make the constipation worse.
7.    Helps Congestion: Drinking hot water can help to cleanse your nasal cavities, bringing relief  when you’re congested.  The hot water vapor helps to loosen the mucus build up in your nasal cavities, helping to clear your nasal passages.  Also, because the hot water makes you sweat out toxins, it promotes a quicker recovery if congested due to illness. Flowing warm saline water through your nasal passages using a neti pot is another amazing remedy for nasal congestion.  If you’ve never tried a neti pot before, you may want to check it out!
8.    Sooths Sore Throats: Warm water can help to sooth a sore throat.  If your throat is sore because you’ve been breathing through your mouth – perhaps because of nasal congestion – then drinking hot water can work to soothe your throat and help break up the congestion. Gargling with warm salt water (1 teaspoon of salt per glass of water) is also supposed to be a good home remedy to relieve/ treat the pain of a sore throat.

Tips for Drinking Your Water Hot
I found that the hot water actually has a soothing taste and is readily available most places I go.  although some people have recommended putting a bit of tea or lemon in the water, but I prefer drinking plain hot water, taking small sip and allowing  your saliva to mix with that sip. I enjoy the taste of my own saliva because I believe that saliva has many advantages then any tea or lemon.
Oh about taste!
Its all in our mind. ask any alcholic about his first sip…and then his later experiences. Or the smoker experience about his first puf. hence drink hot water and repeat in your mind that it taste good, feel good and think about the benifit it will bring to you …and belive me in few days you will feel good. You will develop your own taste..the taste you will love to have and never forget.
To get the detoxification benefits, it’s best for the water temperature to be hot enough to cause you to sweat, but not so hot that it burns your mouth.   Boiling water is recommended over using the hot side of the kitchen faucet, due to impurities that can come through from your water heater.  To get the benefits of detoxification, try drinking hot water once or twice daily make it habit to drink  before bed and after bed.  Think seriously to replace tea/ coffee with simple plain hot water.
Do you know why we get a fever when we’re sick? The increased body temperature helps fight off the nasties. We all know we are more likely to “catch a cold”, when we subject ourselves to the cold. Yes, they are viruses, but it’s the ‘coldness’ that weakens our immune system, making us less able to deal with the invaders. So why make it harder for ourselves by drinking ’cold’ things…not to mention the disastrous consequences it has for our digestive ‘fire’. Right now, go and get your favorite mug. Boil the kettle and start sipping warm/hot water regularly throughout the day.
Drink it more often as part of a regular routine. Most importantly, it’s best to develop a routine of drinking water throughout the day, regardless of temperature.   Happy hydration!


THE BOTTOM LINE
Hot water from the tap should never be used for cooking or drinking....why???

 The reason is that hot water dissolves contaminants more quickly than cold water, and many pipes in homes contain lead that can leach into water. And lead can damage the brain and nervous system, especially in young children. cold tap water should always be used for preparing hot water