Monday, June 5, 2017

जय पर्यावरण...जय हो उसे उसे मनाने वालों की


यह लेख उन  जिम्मेदार नागरिकों को  समर्पित है जो पोलीथीन को नंबर एक दुश्मन घोषित करने के लिये कमर कस चुके है. गुजारिश है की एक बार इस लेख को पूरा पढे और उसके बाद सही निर्णय लें.  
पैपर बेग, जूट बेग या फिर पोलीथीन बेग मे से कौन सा बेहतर विकल्प है. आज पोलीथीन को दोषी करार दिया गया है. अब आप पैपर  बेग को इस्तेमाल के बाद उसे कचरे मे फेंकने को आजाद है पर पोलेथीन को फेंका तो कडी सजा.  आज सारे प्रयावरण वादी और सरकारें एक साथ पोलीथीन के विरूध उठ खडे हुये है, और बहुत से राज्यों की तरह मध्यप्रदेश मे भी पोलीथीन बेग के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है.  इसे इस्तेमाल करने वालों के विरूध  कडी सजा का प्रावधान किया जा चुका है.  
एक बार फिर 5 जून को मनाये जाने वाले पर्यावरण दिवस पर मेरी कोशिश दोनों के बारे मे उपलब्ध जानकारी का विशलेषण करने की है जिससे आप सभी अपने स्तर पर सही निर्णय ले सकें. जब भी पोलीथीन और पैपर/जूट बेग के बीच चुनने की बात आती है तो आजकल पैपर और जूट बेग के इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है. इसके पक्ष मे दलील दी जाती है की पैपर /जूट बेग बायोडिग्रडेबल है और इसे रिसायकल भी किया जा सकता है, वंही पोलीथीन बायोडिग्रडेबल नही है. इसे अगर जानवर, चिडिया  खाले तो उसकी जान पर बन आती है. यह नालियां चोक कर देती है नदी और तालाब को गंदा कर पर्यावरण के लिये गंभीर खतरा बन जाती है. यह गंदगी हमारी आंखो को खटकती है. इधर उधर बिखरी पोलीथीन की पन्नियां भला किसको अच्छी लग सकती है.
प्लास्टिक केरी बेग पोलीथीन से बनाया जाता है. दुनिया भर में इसे खाद्य पदार्थ, दवा, और पानी को स्टोर करने के लिये सुरक्षित माना गया है. भारत में भी BIS मानक (refer IS 10146:1982 Reaffirmed on Feb-2003). के अंतर्गत इसे सुरक्षित माना गया है.   पोलीथीन Recyclable, reusable, light-weight, high strength, low carbon and water footprint, tear resistent, space saving, bacteria resistant, waterproof and tear resistant, सस्ता, सास्थ्यकरप्रयावरण के लिये सुरक्षित, कम उर्जा खपत के साथ साथ पैपर या जूट बेग से बहुत सस्ती होने के बावजूद यह आज हमे पर्यावरण की दुशमन नम्बर वन नजर आ रही है.
पोलीथीन रैपर और पैकिंग मिठाइ, नमकीन, ब्रेड, केक, बिस्कुट उद्योग और खान पान से जुडे दूसरे व्यवसाय जिसमें खाद्य पदार्थ को सुरक्षित रखना हो तो उसे पोलीथीन पैक किया जाता है. इसे आसानी से वेक्यूम् और नाइट्रोजन फिल पैक में भी बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके इस्तेमाल से खाद्य पदार्थ अब 6 महिने तक आसानी से स्टोर किया सकता है. हमारे देश और अन्य विकासशील देशों मे 10% से 15% प्रतिशत खाद्य पदार्थ खराब पैकिंग और स्टोर की वजह से खराब हो जाता है.  इसकी वजह से सीधा नुकासान तो होता ही है इसके सडने की वजह से निकली मिथेन और कार्बनडाइओक्साइड गेसों के कारण ग्रीन हाउस प्रभाव पर्यावरण पर उल्टा प्रभाव डाल रहा है. इस सच को हम नकार नही सकते की पोलीथीन रैपर के कारण आसानी से  खराब हो जाने वाले खाद्य पदार्थ को भी अब अधिक दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है. दूर दराज के इलाकों मे इसे सुरक्षित पहुचाया जा सकता है. बाढ और भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा के समय पोलीथीन पैक सुरक्षित खाद्य सामग्री, पानी, दवाइयां जीवनरक्षक का काम करती है.
यह सच है की आज पालीथीन पर्यावरण के लिये खतरा साबित हो रही है, पर क्या इसके लिये हम पूरा दोष पालीथीन को दे सकते है? सच है की जो जानवर इसे खा जाते है उनके जीवन के लिये खतरा साबित होती है इससे नालियां चोक हो जाती है. इधर उधर बिखरी पालीथीन की पन्नियां  देखने मे किसी को भी अच्छी नही लगती.
पर यह तो पोलीथीन निष्पादन का दोष हुआ क्योंकी हम शान से इसे कंही भी फेंक देते है जेसे आजाद देश मे हमारा यह जन्म सिद्ध अधिकार हो. इसे सही ठिकाने लगाने का काम नगर निगम का अदना से सफाइ कर्मचारी को दे दिया गया है. वो गरीब भी क्या करे बायोमास के बदबूदार कचरे मे से वो पन्नियां केसे अलग करे?
 मजबूरी मे वो भी इसे अनदेखा कर कूडे के ढेर पर पटक देता है या फिर यहां वहां उडती हुई पन्नियां कभी नाली को जाम कर देती है कभी नदी तलाबों के तैरती नजर आती है. जिस पोलीथीन को आसानी से रियासकल किया कजा सकता था हमारी गलत आदतों के कारण हमारे लिये खतरा बन गई.
इसके लिये हम अपनी आदतों को सुधारे या फिर अपनी शाही आदर्तों को बरकरार रखते हुये पैपर और जूट बेग को अपना कर उस से बढे खतरे को अपने गले लगा लें! हमारी इस बेवकूफी को सही निराकरण पर्यावरणवादी और पर्यावरण को समर्पित हमारी सरकार को कागज या जूट से बने बेग के उपयोग मे दिखाइ देता है. इसे इस्तेमाल करो और फिर सडने के लिये इसे कंही भी फेंक दो यह जाने बिना की जब यह सड्ता है तो पर्यावरण का ज्यादा नुकसान करता है. यह नुकसान हमे समझ मे नही आता क्योंकी हमे दिखाइ नही देता. पोलीथीन पन्नियां हमे दिखाइ दे रही है शायद इसलिये हमारी आंखो मे ज्यादा खटक रही है.
यह सही है की पैपर रिसायकल हो सकता है पर क्या आपको मालुम है कि हमारे नदी नालों को प्रदूषित करने मे पैपर उद्योग का बडा हाथ है. सच तो यह है की पैपर या जूट बेग पोलीथीन से कंही बडा खतरा है क्यों विशवास नही होता ना? गूगल करो और खुद जान जाओ. 
पैपर उद्योग को बढावा यानी जंगलों का और तेजी से सफाया. प्लास्टिक बेग की तुलना में  जूट या पैपर् बेग की बनाने में तीन गुना ज्यादा उर्जा की खपत होती है. इसके बावजूद जब जूट बेग के सडने से  मिथेन और कार्बनडाइओक्साइड गेसें निकलेगी उसका दुषप्रभाव क्या होता है यह भी हम सब को मालूम है.
बुराइ पोलीथीन बनाने या इस्तेमाल में नही है बल्की इसके इस्तेमाल करने के बाद उसके निस्पादन के तरीके मे है. हम खराब आदत से मजबूर कचरे को मिक्स कर देते है यानी की बायो कचरे के साथ प्लास्टिक कचरा जिसे बाद मे अलग करना असंभव हो जाता है या फिर बेहद मंहगा साबित होता है. हम यह समझ लें की प्लास्टिक बेग अपने आप मे इतनी बडी समस्या नही की उसकी जगह हम पैपर बेग या जूट बेग को इस्तेमाल करने को मजबूर हो जाये समस्या की जड तो हमारी गलत आदत है.
लोगों द्वारा कूडा कचरा केसे भी और कंही भी फेंक देने से रोकने का काम किसका है. क्या इसके लिये भी हम को पुलिस का डंडा चाहिये. क्यों नही उस क्षेत्र की साफ रखने की नैतिक जिम्मेदारी उस जगह के आसपास या उसका उपयोग करने वालों के उपर डाली जाये. और जो ना करे उस पर भारी जुर्माना. यूरोप और अमेरिका, सिंगापुर, जिन शहरों की सफाइ की दुहाइ हम देते है वंहा गंदगी फेलाने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है. इसी जुर्माने की डर से लोगों ने कचरा सही तरह से ठिकाने लगाना शुरू किया और अब वो उनकी आदत बन गया है.
अगर पोलीथीन को कंही भी फेकने की जगह उसे सही कचरे के डिब्बे मे डाला जाये तो समस्या ही नही बचती. अगर सफाइ कर्मचारी मिले जुले कचरे को उठाने से ही मना कर दे और रहवासियों को कचरे के किस्म के अनुसार अलग अलग डिब्बे मे डालने पर जोर दे तो समस्या ही ना रहे. क्या आपको पता है की पालीथीन और प्लास्टिक कचरे से कमाइ हो सकती है. अगली बार भंगार वाला  जब आपकी गली में आवाज लगाये तो उससे इस बारे मे बात करके देखना.
हम सब को मालुम है की पोलीथीन और प्लास्टिक पेट्रोलियम उत्पाद से बनते है, वही जिससे पेट्रोल और डिजल बनता है. 93% पेट्रोलियम इधंन के रूप में इस्तेमाल होता है मात्र 4% ही प्लास्टिक या पोलीथीन बनाने मे इस्तेमाल होता है. हर बार बहस का मुद्दा होता है की प्लास्टिक और पोलीथेन का इस्तेमाल होने के बाद उसके कचरे का निस्पादन केसे होगा. अगर 4% प्लास्टिक कचरे को अंत भी इधन के रूप् मे जला दिया जाये तो क्या बुराइ है!
पोलीथीन को पूरी तरह से रिसायकल किया जा सकता है, अब तो प्लास्टिक और पोलीथीन कचरे को सडक बनाने मे भी इस्तेमाल होने लगा है और उसके उतसाहवर्धक नतीजे मिल रहे है.
याद रहे पैपर और जूट उद्योग का पानी के स्र्तों को दूषित करने में बडा हाथ है. आजकल पैपर बेग या पैपर कोन/ ग्लास को बनाने मे एसे पदार्थों का इस्तेमाल होता है जो इसे तुरंत सडने से रोकते है, इसके कारण यह भी नालियों को चोक करते है. सडे-गले कागज से मिथेन उत्सर्जित होती है जो कार्बनडाइओक्साइड  से 20 गुना ज्यादा हानीकारक है. पैपर बेगे के पक्ष मे कहा जाता है की पैपर रिसायकल किया जा सकता है. पर क्या आपको मालूम है रिसायकल पैपर नये पैपर से ज्यादा मंहगा होता जिसे सरकारी अनुदान देकर सस्ता किया जाता है. माना की  रिसायकल पैपर को बनाने में नये पैपर की तुलना मे कम पनी की खपत होती है. पर इंधन की खपत करीब 31% ज्यादा होती है.
मै मानता हू की हमारी बहुत सी पर्यावरण  समस्याओं की तरह पोलीथीन / पैपर बेग की समस्या का हल आसान नही है, पर हम सब के सम्मलित पर ठोस प्रयास अच्छे नतीजे ला सकता है. अपनी आदतों मे थोडा सा सुधार लाकर हम पोलीथीन को अपना और पर्यावरण का दोस्त बना सकते है. इसके लिये हमे, हमारी कचरा फेलानी की नबाबी आदत से निजात पानी होगी. कचरा निस्पादन के लिये उचित प्रबंधन पर ध्यान देना होगा. देखा जाये तो शहरो द्वरा उत्पन्न कचरे मे मात्र 5% ही प्लास्टिक कचरा होता है. बाकी का कागज, मिट्टी, डायपर्स बायोमास होता है इसलिये पोलीथीन पर रोक इसका सही इलाज नही है उल्टा इसके बंद होने से स्थति और बिगडेगी. इसका सही इलाज हम सब मे उचित आदत का विकास है, जो कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही डिब्बे मे डाले और सही समय पर और सही तरीके से कचरे का प्रबंधन करे. जेसे बयोमास से बनी अच्छी खाद से हाजारों करोड रूपये की बरबादी को सीधे सीधे बचाया जा सकता है.
हम प्रण लें की :

1.     हम  पोलीथीन और पैपर बेग के अति प्रयोग से बचेगें.
2.     पैपर पैक की जगह पोलीथीन को प्राथमिकता देगें पर उसके निस्पादन को भी सुनिन्श्चित करेगें. जब पोलीथीन बेग का सही निस्पादन करने में संदेह हो, तो ही हम पैपर बेग का इस्तेमाल करेगें.
4.    कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही कचरे के डिब्बे मे डालेगें.
5.     अच्छा हो की दुकानदार केरी बेग के लिये ग्राहक से पूछे. जब तक ग्राहक ना मांगे उसे पोलीथीन या पैपर बेग देने से बचे. अगर ग्राहक पोलीथीन या पैपर बेग मे लेने से मना कर घर से लाये अपने बेग मे सामान ले  तो उसे धन्यवाद दें.
6.     सामान की अतिरिक्त पैकिंग से बचे. हम अकसर पहले से ही पैक किये सामान को एक बेग में और फिर वो बेग दूसरे बेग मे डालते है, जब की उस सामान को कुछ दूर खडी गाडी में रखना भर होता है.
7.     हमारी गलत आदतों के कारण सरकारी एजंसियों को मजबूरन बाजार मे 40 माइक्रोन से कम मोटाइ की पोलीथीन बेग पर रोक लगानी पडी जबकी 10 से 15 माइक्रोन की पोलीथीन भी एक सामान्य पैपर बेग का आसानी से मुकाबला कर सकती है. बस हमे इतना करना है की इस्तेमाल के बाद उसे सही कचरे के डिब्बे मे डालें.  
8.     हम कचरे को पोलीथीन में डालकर उसे सीधे कचरे मे डाल देते है. एसा कभी ना करें. पोलीथीन बेग के कचरे को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डालने के बाद पोलीथीन को भी उसके लिये किये गये नियत डिब्बे मे डाल दें.
9.     हम अकसर घरों मे पैदा होने वाले कचरे को पोलीथीन मे भर देते है और फिर उस कचरे को पोलीथीन के साथ ही कचरे की डिब्बे डाल देते है. जो गलत है. इससे पोलीथीन और बायोमास एक साथ मिसक्स हो जाता है जिसे बाद मे अलग नही कर पाते. हमें पोलीथीन मे मोजूद गंदगी को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डाल कर पोलीथीन को भी उसके सही कचरे के डिब्बे डालना चाहिये.

10.  100% रिसायकल हो सकने वाली पोलीथीन का फायदा समाज को दें.

Sunday, June 4, 2017

पर्यावरण दिवस

हम एक बार फिर पर्यावरण दिवस मना रहे है. आज फिर लफ्फाजी का दिन है बडी बडी हांकने का दिन है. यह बताने का दिन है की जगंल और शेर खतरे मे है और अगर वो खतरे मे है तो हम खतरे मै है. पानी की बरबादी सूखा लायीगी...भयंकर सूखा. यही सब सुनकर और सुनाकर इस दिन को मनाया जाता है. पिछले कुछ समय से 1 घंटे के लिये बिजली बन्द करने का चलन भी शुरू हुआ है. जेसे हम किसी को श्रृद्धाजंली दे रहे हो. आज मै ना कुछ एसा करूगा ना ही सुनुगां. कुछ अलग करने का मन है, आज कोइ बडी बातें नही, बस आत्मावलोकन की जो मै कर रहा हू क्या उससे अच्छा कर सकता हू.
छोटे छोटे पर ठोस कदमों को प्लान करने का मन है. कुछ एसे कदम जो मेरे आसपास के माहोल को कुछ ओर अच्छा बना सके मुझे बेहतर बना सके. मेरा  बदमाश मन उकसाता है की तुम्हारे एक के अच्छे हो जाने से या कुछ अच्छा कर देने भर से दुनिया नही बदल सकती. अरे... मै दुनिया की नही अपने आसपास के माहोल की बात कर रहा हू...वेसे भी मै अकेला कंहा हू मेरी तरह लाखों करोडो लोग है जो कर रहे है और मै उनमे से एक बनना चाहता हू जो बोल कर नही करके दिखा रहे है.
1.    साल मे कम से कम 2 बडे पेड लगाउगा और पक्का करूंगा की वो फले फूलें.
2.    धीरे धीरे सोलर आधारित उर्जा इस वर्ष 200 वाट और फिर प्रति वर्ष 200 वाट जोडते जाना है.
3.    घर की कम से कम एक लाइट को प्रतिमाह को रेगुलेटड LED लाइट में बदलना है.
4.    ह्वाइ यात्रा मैं कम से कम 25% कटौती जब जरूरी हो तभी करू.
5.    कूलर और एसी में प्रतिदिन 1 घंटे की कटौती
6.    एसी का तापमान 28 deg-C
7.    कम से कम 70% पोलीथीन रिसायकिल्, कम से कम 25% पोलीथीन को खुद रिसायकिल करूंगा
8.    माह में कम से कम एक बार पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग
9.    सोलर वाटर प्यूरीफायर बनाना है ( 1 ltr per day, experimental)
10.           नहाने के साबुन में 70% कमी.
11.           40% कच्चा खाना, 50% उबला खाना 10% प्रोसेस्ड खाना ( present status 5-80-15)
12.           किचिन गार्डन.
13.           प्यूरीफायर वाटर ड्रेन किचिन गार्डन में
14.           कागजी पैपर और मेगजीन की जगह ई-पैपर और मेगजीन
15.           कागज में 50% कटौती.
16.           किचिन कम्पोस्टींग
17.           Install water level alarm in roof top tank
चलो अब कुछ काम भी किया जाये....जय पर्यावरण...जय हो उसे उसे मनाने वालों की.   

Wednesday, March 15, 2017

खंण्ड- 16 पुनर्जन्म केसे


सफर (खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट)
सफर (खंण्ड-2/16 देवदूत)
सफर ( खंण्ड-3 उलझन)
सफर (खंण्ड-4 स्वर्ग-नरक)
सफर (खंण्ड-5 नया आयाम)
सफर (खंण्ड-6 समझ)
सफर (खंण्ड-7 धरर्ती पर वापसी)
सफर (खंण्ड-8 हे इश्वर अभी क्यों नही)
सफर (खंण्ड-9 कल्पना की उडान)
सफर (खंण्ड-10 संगीत)
सफर (खंड-11 इश्वर से मिलने की जिद्द)
सफर (खंड -12 नर्क का अहसाहस)
सफर (खंण्ड- 13 दर्द क्यों)
सफर (खंण्ड- 14 जीवात्मा)
सफर (खंण्ड- 15 पुनर्जन्म)
सफर (खंण्ड- 16 पुनर्जन्म केसे)

खंण्ड- 16  पुनर्जन्म केसे

मै पृथ्वी पर मन चाहा शरीर केसे प्राप्त करूगा , मुझे केसे पता चलेगा की जिस घर मे पैदा होना चाहता हू वो अमीर है गरीब. वो किस धर्म का है. जिस शरीर को मे धारण करूगा वो नर है या मादा..किशन एसे बहुत से सवाल है जिस का जबाब मे जानना चाहता हू.
किशोर कोइ पुनर्जन्म क्यों लेना चाहेगा,
आप बताइये !
इसकी बहुत सारी वजह हो सकती है जेसे,
अधूरी वासनाओं को पूरा करना चाहता है
चोरी, हत्या, ठगी, धोखा इनके बारे मे सीख अधूरी हो
 नये अनुभव के लिये  
इश्वरीय संदेश देने के लिये
यदि किसी व्यक्ति को धोखे से, कपट से या अन्य किसी प्रकार की यातना देकर मार दिया जाता है तो बदले की भावना से वशीभूत होकर उसकी चेतना पुनर्जन्म अवश्य लेना चाहेगी। छल कपट का यह खेल चलता रहता है जब तक की उसकी जीवात्मा यह नही समझ जाती की उसका विकास उन सब को माफ करने मे है और इस सब को भूलाकर आगे बढने मे है.
पारिवारिक रिश्तों की समस्या भी पुनर्जन्म का एक बढा कारण होती है. इसी तरह अगर इसी दोस्त ने धोखा दिय तो वो इस बार उसी धोखा देने का सबक देगा. इस तरह उसकी योनी , समाज, धर्म तय हो जाते है.
मजेदार बात यह है की नया जन्म लेने के बाद पिछले जन्म कि याद बहुत ही कम लोगो को रह पाती है। वो भी कुछ लोगो बचपन मे ही उसे याद कर पाते है और जेसे जेसे उअमर बढती है वो उसे भूल जाते है. बस एक भावना रह जाती है. और जब भी उससे मिलती जुलता घटना होती है हम बैचेन हो जाते है.
किशन, एक तरह से अच्छा ही होता है वरना पिछले जन्म की यादों के साथ दूसरा जन्म जीना बहुत लोगों के लिये किसी नर्क के समान ही होता.
अब तुम्हारा भी समय हो गया है की तुम धरती पर दुबारा जन्म लो
मुझे तो मलुम ही नही की इस बार मुझे क्या करना है,
तुम्हे मालुम करने की जरूरत भी नही. तुम्हे तो बस हर पल निर्णय लेना है और कर्म करना है. वो सब तुम्हारे पिछले अनुभव का ही नतीजा होंगे. मेने कहा ना शिक्षक भी तुम हो और शिष्य भी तुम हो.    वेसे किशोरतुम्हारी अंतरआत्मा को मालुम है , अगर गंभीरता से उस पर मनन करोगे तो समझ जाओगे. 
 दूसरा जन्म इतनी जल्दी, अभी तो मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना और समझना है ?
मेन कहा ना यंहा समय अलग तरीके से काम करता है. मुझे जो समझना था वो समझा चुका हू. क्या तुम्हे इस बात का जरा भी अंदाज है की तुम्हारी धरती पर मृत्यु को कितना समय हो गया है
यही कोइ कुछ वर्ष  ...
पूरी एक शताबदी गुजर चुकी है
विश्वास नही होता
यानी अगर मे अभी जन्म लू तो वंहा 2116 चल रहा होगा
सही कहा
वंहा तो सब बदल चुका होगा मै उत्सुक हू यह जानने के लिये इन 100 सालों मे हम इंसानों ने क्या उन्नति की है
तुम तो इश्वर से मिलने को उत्सुक थे ...किशन ने हंसते हुये कहा
आपने सही कहा किशन अभी मेरा इश्वर से मिलने का समय नही हुआ है. वेसे भी यह दरवाजा तो मेरा ही बनाया हुआ है. उनकी प्रेरणा तो मेरे साथ हर समय है.
तो फिर देर किस बात की किशोर, आगे बढो और सामने दिख रहे दरवाजे को खोलो, वंहा तुम्हे इश्वर के बारे मे फेली बहुत सी भ्रांतियों को दूर करना है.तुम्हे वंहा बहुत बढे काम करने है. यंहा जो कुछ भी सीखा है देखते है उसे केसे तुम अपने नये जीवन मे उपयोग करते हुये अपना और लोगों का जीवन बेहतर बनाते हो.
पर उसके दूसरी तरफ तो इश्वर है , मेरे चेहरे की उलझन देखकर किशन मुस्करा दिया
हां भई हां वंहा इश्वर आपका अपनी पूरी श्रृष्टी के साथ इंतिजार कर रहा है.
इस बार किशन के  चेहरे की गूढ मुस्कान है ... जेसे वो ओर कोइ नही मेरे कृष्ण हो , अचानक उनकी बांसुरी की धुन मेरी सारी चेतना पर छाने लगी ... मेरा इश्वर मेरे सामने था...दरवाजा खोलते ही एक तेज प्रकाश से मेरा सामना हुआ .... मेरी चेतना उसमे वीलीन होती चली गई.


खंण्ड- 15 पुनर्जन्म

सफर (खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट)
सफर (खंण्ड-2/16 देवदूत)
सफर ( खंण्ड-3 उलझन)
सफर (खंण्ड-4 स्वर्ग-नरक)
सफर (खंण्ड-5 नया आयाम)
सफर (खंण्ड-6 समझ)
सफर (खंण्ड-7 धरर्ती पर वापसी)
सफर (खंण्ड-8 हे इश्वर अभी क्यों नही)
सफर (खंण्ड-9 कल्पना की उडान)
सफर (खंण्ड-10 संगीत)
सफर (खंड-11 इश्वर से मिलने की जिद्द)
सफर (खंड -12 नर्क का अहसाहस)
सफर (खंण्ड- 13 दर्द क्यों)
सफर (खंण्ड- 14 जीवात्मा)
सफर (खंण्ड- 15 पुनर्जन्म)
सफर (खंण्ड- 16 पुनर्जन्म केसे)

खंण्ड- 15 पुनर्जन्म

 किशोर जेसे तुम्हे पता है की पेड पोधों में भी जीवन होता है. उनमे भी भावनाये होती है उन्हे भी दर्द होता है. वो भी खुश होते है. उन्हे कोई भी आसानी से काट देता है, उखाड देता है. जानवर उनकी पत्तीयों को खा जाते है. हर मौसम का सामना एक ही जगह रह कर करते है. जब जंगल मे आग लगती है और सब जानवर वंहा से भाग जाते है वो उसी जगह खडे रहने को मजबूर होते है.
किशन ... उसके बाबजूद उन्होने अपने को ज्यादा नही बदला है.
किशोर, इनमे से ज्यादतर को पता ही नही होता की इसके परे भी बहुत सी संभावनाये है. वो बार बार पेड का ही जीवन चुनते है. 
हां किशन... उसके बाबजूद करोडो सालों से पेड पौधे है.
यह सच है की उनके पास जानवरों की तरह विकिसित इन्द्रीयां नही है उसके वाबजूद वो जानते है की कौन उनके दोस्त है और कोन दुश्मन. वो अपने सीमित दायरे मे ही अपने विकास की संभावनाओ को खोजते रहे. अपने को विकिसित करते  रहे.
किशोर, कुछ ही होंगे जिन्होने अपनी चेतना मे क़्वाटंम जम्प लिया होगा और प्राणी जगत का हिस्सा बन गये होंगे.  
पृथ्वी पर जीवन को समय ने बांध रखा है. पर चेतना समय के बंधन से आजाद है.
किशोर अगर तुम्हे मौका मिले तो तुम कोन सा पेड बनना  चाहोगे.
मै और पेड केसी बातें कर रहे हो, वो भी कोइ जीवन है. एक जगह खडे खडे सारा जीवन निकाल दो. मै क्या कोइ भी मानवीय चेतना एसा जीवन नही चाहेगी.
नही एसा नही है किशोर, एसी बहुत सी चेतानये जो निम्न से निम्न होती गई. जड हो गई, विलीन हो गई या फिर किसी ओर चेतना मे समा गई.  
तुम्हारी कल्पना की दुनिया और भौतिक दुनिया मे एक ही अतंर है. भौतिक जगत मे चेतनाये पदार्थ के द्वारा एक दूसरे पर प्रभाव डालती है. भौतिक जगत मे चेतना पदार्थ से जुड जाती है. जब तक वो पदार्थ खत्म ना हो जाये उस से वो अलग नही हो पाती. वो उस पदार्थ का गुण धर्म बन जाती  है. जब भी दो पदार्थों का आपस मे जुडते है तो एक नये पदार्थ की रचना करते है. उसका नया भौतिक लक्षण होता है. पर जेसे ही वो अलग होते है वो अपनी पूर्व स्थति मे आ जाते है.
किशन धरती पर हमारा शरीर सामूहिक चेतना का प्रणाम होता है.  सामूहिक चेतना मे शरीर  का हर सेल, हर अंग की भूमिका होती है. वो एक दूसरे से संवाद स्थापित कर सामूहिक चेतना का निर्माण करते है. जन्म लेने के बाद एसे शरीर के पास अपना कोइ अनुभव नही होता. समय के साथ वो अपने माता पिता और समाज से सीखता जाता है. वो अपने माता पिता की भाषा सीखता है. जीने के गुर सीखता है, समाज और गुरू जनों से जीने के तौर  तरीक सीखता है वो अपने आस पास के पर्यावरण से सीखता है. उसका चेतन मन सभी अनुभवों को दर्ज  करता रहता है, जो अनुभव उसके जीवन के लिये खतरा होते है  उसे उसका अवचेतन मन एक टेम्पलेट की तरह दर्ज करता है जिससे वो अगली बार खतरे को पहचान कर अपना बचाव कर सके.  
पर यह सब तो शरीर सीख रहा है वेसे ही जेसे किसी रोबोट को प्रोग्राम किया जा रहा हो, एसे मे इसे पुनर्जन्म केसे कह सकते है.
सही कहा किशोर इसे पुनर्जन्म नही कह सकते.
शरीर का पुनर्जन्म केसे हो सकता है उसका तो मात्र जन्म होता है.
किशन आप मुझे फिर से कंन्फयूस कर रहे हो.
तो फिर पुनर्जन्म, क्या है. और वो कब और केसे होता है.  पुनर्जन्म को लेकर मेरे मन मे शुरू से ही जिज्ञासा रही है
किशोर अगर शरीर चाहे तो रोबोट की तरह शरीर अपनी सिमित चेतना के आधार पर अपना जीवन गुजार सकता है  जरूरी नही की हर शरीर पुनर्जन्म का कारण बने. समाज से वो धीरे धीरे सब कुछ सीख जाता है. सच तो यह है की 99% शरीर मे पुनर्जन्म जेसा कुछ नही होता है. वो  जन्म लेते है और मृत्यु के बाद उनकी चेताना भी विलीन हो जाती है. खो जाती है.
समझा एसे शरीरों के उपर चर्वाक के सिद्धांत लागू होता है की जीवन के खत्म होते ही सब कुछ समाप्त हो जाता है. कुछ नही बचता. मिट्टी का शरीर मिट्टी मे मिल जाता है. चेतना शरीर के साथ ही समाप्त हो जाती है.
पर कुछ शरीर अजर अमर जीवत्मा को धारण करते है वो अकसर अपने आस पास के लोगों से हटकर होते है. .कुछ बातों के लिये जुनूनी होते है. लीक से हटकर चलते है. उनके फेसले उनके कर्म बाकी लोगों के लिये अचंभा होते है. उनको देखकर ही लगता है की जेसे वो कुछ करने के लिये ही पैदा हुये है. वो समाज को नई सीख दे जाते है.
किशन यह सब तो आप अच्छी जीवत्माओं के बारे मे बता रहे हो , पर उनका क्या जिनके फेसले ह्जारो के कत्ले आम का कारण बनते है. हर कोइ जो भी करता है अपनी समझ के अनुसार सही कर रहा होता है. ..बाद मे आने वाले उसकी समिक्षा अच्छे और बुरे की तरह करते है.
यंहा तक की तुम लोगो ने कृष्ण के कार्यों को भी एसी ही नजरो से देखा है कुछ लोग उन्हे बुरा तो कुछ लोग अच्छा समझते थे. 
चेतनाये एक दूसरे से जुड सकती है. एक दूसरे से अलग हो सकती है.  एक दूसरे पर हावी हो सकती है.
किशन इसका मतलब यह हुआ की जब मे धरती पर फिर से जन्म लेना चाहूगा तो जिस शरीर के साथ भी अपनी चेतना जोडूगा तो,उसने पहले सी उसकी अपनी चेतना भी होगी.
सही कहा ...पर वो चेतना बहुत ही निम्न  स्तर की होती है पूरी तरह शरीर केन्द्रित रोबोट की तरह निशिचित क्रम मे काम करने के लिये.  हां एसे शरीर के लिये असल जीवात्मा प्रेरणा का काम करती है. अगर तुम्हारी चेतना तीव्र हुई तो उसमे मोजूद चेतना तुम्हारा अनुसरण करेगी, इसलिये अधिंकांश चेतनाये नव जात शरीर के पसंद करती है क्योकी वो उस गीली मिट्टी की तरह होती है जिसे कुम्हार मन चाहा रूप दे पाता है.
एसे शरीर बहुत तेजी से सीखते है. उनका व्यवाहर बाके सब से लग होता है. उन्हे देखक्र लगता है जेसे वो किसी ओर दुनिया से हों. अपनी उअमर से आगे की बाते करते है.   
किसी बडे की चेतना पर हावी होने पर उसमे पहले से मोजूद चेतना जो समय के साथ मजबूत हो जाती है उसके साथ तालमेल नही कर पाती और अंतर विरोध होता है ...उसे कई बार प्रेत बधा माना जाता है.

खंण्ड- 14 जीवात्मा

सफर (खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट)
सफर (खंण्ड-2/16 देवदूत)
सफर ( खंण्ड-3 उलझन)
सफर (खंण्ड-4 स्वर्ग-नरक)
सफर (खंण्ड-5 नया आयाम)
सफर (खंण्ड-6 समझ)
सफर (खंण्ड-7 धरर्ती पर वापसी)
सफर (खंण्ड-8 हे इश्वर अभी क्यों नही)
सफर (खंण्ड-9 कल्पना की उडान)
सफर (खंण्ड-10 संगीत)
सफर (खंड-11 इश्वर से मिलने की जिद्द)
सफर (खंड -12 नर्क का अहसाहस)
सफर (खंण्ड- 13 दर्द क्यों)
सफर (खंण्ड- 14 जीवात्मा)
सफर (खंण्ड- 15 पुनर्जन्म)
सफर (खंण्ड- 16 पुनर्जन्म केसे)

खंण्ड- 14 जीवात्मा

भले ही चेतना को पूरी आजादी है की वो जन्म कंहा और केसे लेना चाह्ती है. उसके बावजूद अगले जन्म का पिछले अनुभव के आधार पर ही निर्णय हो जाता है. पिछले अनुभव आगे होने वाले अनुभवों का आधार बनते है. अकसर चेतन जिस जन्म मे पहले होती है उसी जन्म को दुबारा दोहराती है जब तक की उसकी चेतना मे कोइ बडा बदलाव ना हो गया हो.
इसे ठीक से समझाओ
जेसे जब तुम सडक  पर गाडी चला रहे थे तो सडक की दिशा मे ही क्यों गाडी चला रहे थे. तुम अपनी मर्जी से दांये बाये कंही भी जा सकते थे.
अरे केसे जा सकता था वंहा सडक ही नही थी
क्यों नही बीच मे कई  मोड आये थे, तुम उन मोडों पर चले जाते.
सडक पर चलने का निर्णय कोन कर रहा था. तुम्हे लगा की सडक पर चलना ही सबसे सही काम है तो तुमने वो किया कुछ लोगों को कुछ ओर सही लग सकता है वो हो सकता है सडक पर ना चल कर किसी ओर कच्चे रस्ते पर चले जाते.
वो इसलिये नही मुडा क्योंकी मुझे भोपाल जाना था
किसी ओर रास्ते से भी भोपाल जा  सकते थे....
मुझे यही रास्ता सबसे सही लगा इसलिये मेने इसे चुना.
ओर भोपाल ही क्यों
ओह अब समझा मेरी चेतना ने पहले ही तय कर लिया की मुहे क्या अनुभव लेना है उस हिसाब से मेरा रास्ता तय हो गया है, मुझे वही रास्ता दिखाई देता है, मुझे  और रास्ते या विकल्प समझ ही नही आते है.
बहुत सी संभावनाये हो सकती है जिस मे से एक का चुनाव तुमने किया. हर पल आप के सामने असिमित संभावनाये होती है जिस मे आप और आपका शरीर कुछ का चुनाव उस वक्त रहा होता है.  
अगर एसा है किशन,  तो जब मे धरती पर था मुझे क्यों नही पता की मेरी चेतना आखिर क्या अनुभव करना चाहती है.
क्योंकी तुमने कभी उसे सुनने और समझने की कोशिश ही नही की. किशोर...शरीर मे रहते हुये तुम्हारी चेतना ज्यादातर समय शरारिक इन्द्रीयों के अनुभव तक ही सिमित होती है, जिसकी वजह से तुम्हारे हर कर्म की वजह डर या फिर सुख होता है.
बहुत ही कम लोग एसे होते है जो अंत:प्रेरणा से उपर उठ कर सोच पाते है. वरना ज्यादतर लोगों मे जीवात्मा मात्र शरीर का अनुसरण भर करती है. 
तुम्हारे अवचेतन को शांत करने के बाद ही तुम अपनी जीवात्मा की सुन सकते हो उस तक पहुच सकते हो. जब भी एसा होता है तो लोगों को लगता है की उन्हे  इश्वर मिल गया हो
शरीर के रहते यह असान नही होता  क्योंकी जागृत शरीर हमेशा इन्द्रीयों से से संचालित होता है तो मन उससे अलग केसे रह सकता है. मन और शरीर 99% कार्य वही करता है जो इन्द्रीयों चाहती है.
अवचेतन मे इस जन्म के और पिछले जन्मों के कर्म संचित है यंही से सारी शारारिक भावनाये और इच्छाये जागृत होती है जिनके आधार पर हमारा शरीर और मन प्रतिक्रिया देता है. तुम्हारा अवचेतन जानता है इसलिये जब भी चुनाव करना होता है तो तुम वही सब चुनाव करते हो जो तुम्हारी नियती मे है.
जेस तुम्हे लाख सिखया गया होगा की झूठ बोलना पाप है, क्रोध करना अच्छी बात नही है पर अकसर तुम झूठ बोलते हो और अपने से कमजोर पर क्रोध करते हो, क्योंकी पिछले अनुभव तुम्हे बताते है की उससे सब काम आसान हो जाता है.
इसके बाबजूद तुम ने बहुत से लोगों को देखा होगा की त्म्हारी सजेसी प्रस्थति मे उन्होने झूठ का सहारा नही लिया और ना ही क्रोध किया...दोनों मे कोन सही है ?
एक सी प्रस्थति मे लोग अलग अलग चुनाव करते है क्योंकी उनके अलग अलग मकसद होते है.  उनकी अपनी अपनी सुख और दुख की परिभाषाये होती है,  दोस्त होते है, उनके शोक अलग अलग होते है.
अगर तुम्हे अपनी जीवात्मा के साथ सीधा संवाद करना है तो तुम्हे अपने अवचेतन को शांत करना सीखना होगा. धरती पर इसे ही ध्यान या मेडीटेशन भी कहते है.