Saturday, May 30, 2015

किसान आत्मह्त्या क्यों ना करे ?


Image result for farmer suicide
वर्ष 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था. आज यह 1450 रुपए प्रति क्विंटल है यानी बीते 45 वर्षों में इसमें करीब 19 गुना वृद्धि हुई है. समर्थन मूल्य का किसान की आमदनी के साथ सीधा रिश्ता है. इसकी तुलना दूसरे तबकों के वेतन में हुए इजाफे से करें. इन वर्षों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह 110 से 120 गुना, स्कूल शिक्षकों की 280 से 320 गुना और कॉलेज शिक्षकों की 150 से 170 गुना बढ़ी है. कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वालों की आमदनी 350 से 1000 गुना तक बढ़ गई है. यदि खर्चोँ की अोर नजर डालें तो इस दौरान स्कूल फीस और इलाज के खर्चों में 200 से 300 गुना और शहरों में मकान का किराया 350 गुना तक बढ़ गया है. पेट्रोल और डीजल 30 से 40 गुना बढ गये. सोने का मूल्य 200 गुना इजाफा हुआ.  
  किसानों को खाद्यान्नों की कम कीमत का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. इस साल भी गेहूं का समर्थन मूल्य 50 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है, जिससे खाद्यान्न की कीमतें नियंत्रित रहें. धान के मूल्य में भी इतना ही इजाफा किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 3.2 फीसदी ज्यादा है. इसी बीच केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की दूसरी किस्त भी मिल गई, जो पहले से 6 फीसदी ज्यादा है. उन्हें जल्दी ही सातवें वेतन आयोग के अनुरूप वेतन और भत्ते भी मिलने लगेंगे. इसमें सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी का वेतन भी 26 हजार रुपए महीने करने की मांग हो रही है.
आज भी किसान के पूरे परिवार की ओसत आय 3 से 4 हजार रूपये महिने से ज्यादा नही है. एसे मे भूख पेट सोना उसकी नियती बन जाती है. उपर से मोसम की मार से फसलों के बरबाद हो जाने पर उसे ना कोइ बीमा कंपनी राहत देती है ना कोइ सरकारी मदद.  
यदि 45 वर्षों में सबसे कम वेतन वृद्धि के आधार पर भी देखा जाए तो किसान के लिए गेहूं के मूल्य में कम से कम 100 गुना इजाफा होना चाहिए था. इसका मतलब यह कि प्रति क्विंटल गेहूं के लिए किसान को 7,600 रुपए मिलने चाहिए, लेकिन उसे केवल 1450 रुपए मिल रहे हैं. हम मानें या नहीं मानें, लेकिन यह उसका हक है. किसान का हक दिलाने से बजार मे खाने पीनी की चीजों के मूल्य मे बेहताशा वृद्धी हो सकती है जिसे कुछ समय के लिये सरकार सबसिडी देकर रोके और उसके बाद बाजार को ही उसका असली मूल्य तय करने दो. उसी तरह जिस तरह आपने पेट्रोल और डिजल को बाजार के भरोसे छोड दिया. मेरा मानना है कि सारा बोझ गरीब किसानों के ऊपर डालने की बजाय उसे फसलों की ज्यादा कीमत दें. फिर कृषि उत्पादों को सब्सिडी के दायरे में ले आएं जिससे आम उपभोक्ताओं को भी ज्यादा कीमत न देनी पड़े. जापान के अलावा कई अमीर देशों में ऐसा ही होता है.

आसान और कम ब्याज पर ऋण की सुविधाएं बढ़ाने से भी किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते. किसान को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए. हम वर्षों से किसानों को बेहतर कमाई से वंचित करते रहे हैं. एक के बाद एक आने वाली सरकारें जानबूझकर किसानों को गरीब बने देखना चाहती हैं. 

Friday, May 22, 2015

रवीवारिय संस्करणों में योग


टेलीविजन और अखबारों के रवीवारिय संस्करणों में योग, व्ययाम और क्या खाये और क्या ना खाये इस पर लेखों की भरमार होती है. हर लेख पहले आपको डराता है फिर बताता है की अगर आप ने उसके बताये तरीके पर अमल किया तो आप सुंदर और शक्तिशाली शरीर  के मालिक होंगे. अगर उनके बताये रास्ते को नही अपनाया तो आपका बेडा गर्क तय है.
  अगर बैठना खतरनाक है तो दौडना भी खतरनाक हो सकता है.  अगर आप एसा नही मानते तो किसी दिन 8 घंटे दौड  कर देखिये या फिर उनकी शक्ले देखिये जो सारा दिन दौडते रहते है. बात खुद बा खुद समझ आ जायेगी. मुझे नही लगता की दौडने वाले लोगों की जिंदंगी बैठने वालों से बेहतर है. समस्या यह है की हम कुछ कामों में अति कर देते है फिर वो चाहे टिवी देखना हो, सोना हो, खाना हो, या फिर कुर्सी पर बैठे बैठे सारा दिन गुजार देना हो. अति बेमकसद बैकार है, मकसद के लिये की गई अति आपके लिये मकसद हासिल करने की कुजीं है.

सत्य तो यह है कि हमारे हर काम के पीछे डर छुपा होता है. फिर चाहे वो भागना हो, खडे रहना हो, या फिर बैठना हो ओर जो डर गया,  समझो मर गया. 
इसलिये जिंदगी में जो भी करिये आनंद से करिये, दिल से करिये. फिर चाहे वो सोना हो , रोना हो, हंसना हो, जागना हो, बैठना हो, खडा रहना हो या दौडना ... उसके बाद हार्ट अटेक से मर भी गये तो कोइ अफसोस नही....बल्की लोग तो एसी दुआ करते है की जब भी उपर वाला उठाये तो एक झटके मे उठाये.