Saturday, November 21, 2015

सत्य और इमानदारी एश और आराम की जिदंगी जीने का मंत्र नही है

सत्य और इमानदारी एश और आराम की जिदंगी जीने का मंत्र नही है. ना ही यह आदर और सम्मान पाने का आसान रास्ता. सत्य और इमानदारी को राजा हरीशचन्द्र की  तरह अपने ही बेटे की मौत पर अपनी ही पत्नी से कफन पर भी टेक्स वसूल करने पर मजबूर होना पडता है. मीरा को जहर का प्याला पीना पड्ता है, इसा को सूली पर चढाया जाता है.  
 सत्य और इमानदारी तो तपस्या है जो लोग आदर और सम्मान की परवाह किये बिना करते रहते है क्योंकी यह उनका विशवास है की मानव जाति को अनंत काल तक बनाये रखने का यही एक सही रास्ता हो सकता है. इसी विश्वास के कारण वो हंसते हंसते जहर का प्याला पी लेते है, फांसी पर चढ जाते है या सूली पर लटक जाते है. इसलिये आगर आप सत्य का या इमानदारी को आदर या सम्मान पाने का आसान रास्ता समझ बैठे है तो भगवान आपका भला करे!!...राम हो या कृष्ण वो आग में तप कर कुंदन बने....मै नही मानता वो सब उन्होने आदर या सम्मान पाने के लिये किया होगा. उस समय आदर या सम्मान राजसत्ता के साथ मिलकर कंही आसानी से पा सकते थे....पर तब वो इश्वर तुल्य नही हो पाते.....आदर के साथ....दुर्वेश

स्मार्ट शहर?


Image result for smart city
प्रधानमंत्री की 100 स्मार्ट शहर की घोषणाओं के बाद हर दूसरे दिन मिडिया मे इस पर कुछ ना कुछ आता रहता है. बताया जाता है  केसे सेकडो करोंड रूपये एक शहर को स्मार्ट बनाने मे खर्च होंगे. उस रूपये का केसे इंतिजाम होगा. क्या इन शहरो का काया कल्प दूसरे शाहरों से टेक्स मे वसूले रूपयों से होगा या उसके लिये किसी विश्व बेंक से लोन लिया जायेगा. लोन को चुकाने का इतिंजाम केसे होगा. क्या यह सारी योजना सरकारी होगी या इसमे जन भागदारी सुनिशिचित की जायेगी. एसी बहुत सारी बातें है जिस का जिक्र रोज ही मिडिया मे होती रहता है. 
अगर यह योजना भी सरकारी है तो भगवान मालिक, क्योंकी जिन शहरों मे अदने से पुल के निर्माण मे दसियों साल लग जाते हो. शहर की सडकों पर गड्डे ज्यादा और सडक कम हो. जिसकी अधिकांश आबादी अब भी झोपडपट्टी मे बसती हो. शहर के बाहर और अदंर गंदगी की अंबार हो. स्वास्थ शिक्षा और सुरक्षा और न्याय जेसी बुनायदी चीजे आम लोगों से दूर होती जा रही हो . एसे शहरों का स्मार्ट शहर बनना एक सपना सा लगता है.
यह योजना भी बाकी सब सरकारी योजना की तरह उपर से थोपी हुई लगती है , एयर कंडिशंड कमरो से निकला एक दिमागी फितूर जो आम लोगों की बुनायादी जरूरतों से कोसों दूर उन पर एक मजाक सा है. आज किसी से भी पूछो की आखिर ये स्मार्ट शहर हे क्या बला. तो उसका जबाब कम से कम उस शहर के वासियों के पास नही है जिन्हे अगले कुछ सालों स्मार्ट सिटी का वासी होने का गोरव मिलने वाला है. जबाब के नाम पर इक्का दुक्का सपने जरूर है जो वो पूछने पर बताने लगते है. वो अपनी ही कही इन बांतो पर उतना ही यकीन करते है जितना यकीन उन्हे अपने सपनों पर है. यह बात कोइ नही समझ रहा की स्मार्ट नागरिकों के बिना स्मार्ट शहर का कोइ वजूद नही हो सकता. एसे स्मार्ट सिटी के होने का क्या फायदा जो एक नई लूट संस्कृति को जन्म देगा. कुछ लोगों को लूटने के और बहुत सारे लोगों को लुटने के नये अवसर देगा.
स्मार्ट शहर की कल्पना करते ही हमारे दिमाग में एक एसे शहर की तस्वीर उभरती है जिसमेंहंसते मुस्कराते वैभव शाली लोग,  चमचमातीचौड़ी सड़केंसाफ-सुथरी गलियांसुंदर इमारतेंहरे भरे पार्क और प्रदूषण रहित पर्यावरण है.  जहां आपकी सारी जरुरतें पुरी हो जाएं. 
लेकिन एक शहर का स्मार्ट सिटी बनना इतना आसान भी नहीं है। सिर्फ साफ-सफाई के नाम पर कचरे को एक जगह से दूसरी जगह फेंक देने से कोई सिटी स्मार्ट शहर नहीं बनता. 100 शहरों की बात छोडिये किसी एक शहर को  सही मानों मे स्मार्ट शहर बना दिजिये तो वर्तमान सरकार के उपर इस देश क बहुत बढा उपकार होगा.  पर उससे पहले हम यह तो जान ले की  असल मे स्मार्ट शहर हम कहेगे किसको. मेरे हिसाब से निम्नलिखित सारी बातें किसी शहर को स्मार्ट शहर बना सकती है;
1.                    सभी को काम और काम का सही वेतन
2.                    जन्म आधारित जाति व्यवस्था को पोषित ना करता हो और सभी को विकास के समान अवसर प्रदान करता हो
3.                    सभी को विकास का अवसर और सभी को उसके अनुभव के अनुसार कार्य 
4.                    दुरस्त न्यायिक व्यवस्था जो सबकी पहुंच मे हो और त्वरित न्याय करती हो. 
5.              जिसमे अमीर और गरीब के बीच का अंतर 1: 100 से ज्यादा ना हो ( सब समान हो एसी सोच मेरे सपनों से भी बाहर की सोच है...:( )
6.                  शहर मे रहने वाले हर व्यक्ति एक जिम्मेदार नागरिक हो जो शहर के विकास के लिये समर्पित हों , स्मार्ट शहर को बनाये रखने के लिये जो भी खर्च हो उसे उसके नागरीकों में वहन करने का जज्बा हो.
7.                    सरल नियम, कानून और आसान टेक्सिंग   
8.                    बुनियादी सुविधाएं जैसे किसी चीज की बुकिंगबिल जमा करनाआदि बेहद सरल हो। 
9.                    विश्व स्तरीय सार्वजनिक यातायात  से युक्त बेहतरीन परिवहन व्यवस्था जिससे ट्रैफिक जाम ना हो
10.                स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराना,  जहां जलवायु शुद्ध होलोग खुली हवा में सांस ले सकें।
11.            शहर की सड़केंइमारतेंशापिंग मालसिने प्लेकस पार्क, पार्किंग, स्कूल, अस्पताल, स्टेडियम, सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से बने हों। 
12.                एसी संचार व्यवस्था जिससे सब आपस मे बिना किसी विलम्ब के सूचना का आदान प्रदान कर सके.
13.                एक जागरूक केन्द्रीय प्रणाली जो सबके 
                                                               i.      स्वास्थ और सुरक्षा का ध्यान रखे
                                                             ii.      सार्वजनिक जगहों का विकास और रखरखाव जेसे सडकेपार्क ,  तालाब और नदियां
                                                            iii.      संचार और यातायात का सही व्यवस्था 
                                                           iv.      उर्जा की न्यूतनम पर दक्ष उपयोग
                                                            v.      परिवहन व्यवस्थासार्वजनिक यातायात
                                                           vi.      जल निकासी की सही व्यवस्था 
                                                         vii.      zero waste , कचरे का सही निस्पादनपानी रिसाकिल 
                                                        viii.      disaster प्रबंधन की उचित व्यवस्था 
14.         खर्चे और आमदनी का सही संतुलन. जिससे शहर की व्यव्स्थाये आत्म निर्भर और लोन रहित हो. व्यवस्था को बनाये रखने के लिये लगातार लोन का जरूरत ना रहे.
15.                स्वास्थ्य और शिक्षा उच्च दर्जे की हो और सबके लिये आसानी से उपलब्ध हो ।
16.                शहरी संसाधनोंस्रोतों और बुनियादी संरचनाओं का सक्षम ढंग से विकास 
17.                आंदोलनउत्सव शहर की व्यवस्थाओं को जाम ना करे  
18.                बिजली सप्लाई 24 घंटे सुचारू हो। 
19.                सभी के लिये पीने के पानी की व्यवस्था 
20.                सार्वजनिक जगहों पर कूड़ा न दिखे। 
21.                गु़ड गवर्नेंस होविशेषकर ई-गवर्नेंस औऱ लोगों को ज्यादा से ज्यादा शामिल करना।
22.                महिलाओंबच्चें और बुजुर्गों की सुरक्षा हो।
23.                शहर की अपनी एक सांस्कृतिक पहचान हो 
आप लोगों के सहयोग से इसे 100 तक ले जाया जा सकता है पर इस लेख के लिये अभी फिलहाल इतने ही काफी है
 उपर जो कुछ बताया गया है उसमे से अधिकांश काम उस शहर शहर  मे रहने वाले नागरिकों को करना होता है या उसके द्वारा चुनी गई नगर पालिका परिषद उस कार्य को अंजाम देती है, पर वो एसा नही कर रहे है क्योंकी शहरवासी टेक्स देने मे आना कानी करते है, जो भी टेक्स के नाम पर नगर पालिकाये पेसा इकठ्ठा करती है उसका एक बढा हिस्सा लूट की भेट हो जाता है. जो थोडा बहुत अच्छा काम ये नगर पालिकाये करती भी है तो उसे उसी शहर के वासी उसका सत्यानाश करने के कोइ कोर कसर नही छोडते. अतिक्रमण की कोइ सीमा नही. दुकानदारों ने शहर के फुट पाथ हजम कर लिये, सडकों पर आवारा गाय, सुअर, और कुत्ते, गड्डे, ठेले. पार्कों को हजम करती गंदगी का ढेर और झुग्गीयां. बिना सोचे शहर की प्लानिंग, जिसे जिधर आया जेसे मन चाहा इमारत बना ली. एसे ही बस गया शहर. जिन्हे जंगल राज की आदत हो गई हो उन्हे हम स्मार्ट शहर देना चाहते है.
 एसे मे किसी शहर को स्मार्ट केसे बनाया जाये. मुझे लोग समझाते है की जिस तरह दिल्ली आगरा यमुना एक्सप्रेस हाइवे बन गया,  माल साफ सुथरे और चमक दमक के साथ शहर मे अपनी आभा बिखेर रहे है. जिस तरह इसी देश मे हवाइ अड्डों का काया कल्प हो रहा है उसी तरह शहर का भी काया कल्प हो जायेगा. एक नजर से देखें तो बात मे दम नजर आती है सच भी है यह सब भी इसी देश मे हो रहा है पांच सितारा होटल भी इसी देश मे है. नोयेडा मे गगन चूमती इमारतें साफ सुथरी चोडी सडकें. सब कुछ सपना सा लगता हैना. जब नोयेडा एसा चमक दमक वाला हो सकता है तो देश के बाकी शहर क्यों नही.   
जब उन्हे उसका गणित समझाने लगता हू और उन्हे बताता हू की इस देश के कुछ चंद शहर ही एसे है जिस पर पैसा बे हिसाब बरस रहा है, उसमे दिल्ली और उसके पास बसा नोयडा, फरीदाबाद, और गुडगांव का इलाका भी है. वेसे सच मानों मे यह भी स्मार्ट शहर नही हो सकते पर उन्हे आसानी से स्मार्ट शहर मे बदला जा सकता है. 
उसके बाद उनकी बोलती बंद हो जाती है. क्योंकी  उसके लिये शहर के हर नागरीक को लखपती होना होगा जिसेसे वो कम से कम लाख रूपये साल के टेक्स के रूप मे अपने शहर नगर पालिका को दे सके. उसके वाबजूद उसे अपनी आदतों मे भी बेहिसाब परिवर्तन करते हुये वेसा ही सहयोग देना होगा जेसा वो माल मे घूमते हुये देता है यानी की नो अतिक्रमण, नो यंहा वंहा गंदगी, नो यंहा वंहा थूक-थाक, हंगास-मुतास. एसा कर सके तो स्मार्ट नागरीक बनने की तरफ यह आपका पहला कदम होगा.  
स्मार्ट शहर में स्मार्ट नागरिक होना जरूरी है. बिमार सोच के नागरिकों के साथ आप स्मार्ट सिटी नही बना सकते. स्मार्ट सिटी बनाने से पहले आप को स्मार्ट नागरिक बनाना होगा उसके लिये किसी खर्चे की जरूरत नही है बस सोच मे परिवर्तन भर लाना है. इसका मतलब है की आप को झाडू हाथ मे लेकर फोटो भर नही खिचानी है, उसका इस्तेमाल करते हुये अपने आस पास की सफाइ भी करनी है. वो भी एक बार नही बार बार करनी है. अरे जब आप अपने घरों की सफाइ रोज करते हो, रोज नहाते हो तो जिस जगह को साफ करने के लिये गोद लिया है उसे रोज साफ क्यों नही कर सकते हो. अगर शहर वाकई आपका है तो उसे किसी ओर के भरोसे केसे छोड सकते हो. मुझे मालुम है की आप पूरे शहर की जिम्मेदारी नही ले सकते. पर जिस जगह है उस जगह की नजिम्मेदारी तो लें. सिर्फ टेक्स भर देने से और वोट डाल देने भर से ही आप स्मार्ट नागरीक नही बन जाते.
जब शहर एसे नागरिकों से भरा हुआ हो जो अनपढ हैगरीब हैगंवार हैडरे हुये है , बिमार हैलालची है . जो लूट संस्कृति के आगे सिर झुकाता होऔर मोका पडने  पर दूसरे को लूटने से ना चूकते हो एसे नागरीकों से स्मार्ट शहर नही बसाया जा सकता. एसे लोगों को स्मार्ट शहर का सपना दिखाकर अपना उल्लू जरूर सीधा किया जा सकता है. ओछी और सस्ती राजनिती को उन्हे आसान शिकार बनाया जा सकता है.  
हमारे संविधान मे नागरिक की जो परिभाषा दी गई है वो सही मे एक स्मार्ट नागरिक की परिभाषा ही है , वो एक एसा नागरिक है जो :
1.           पढा लिखा है ओर अपने अधिकारों और अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक है. और अधिकार से पहले कर्तव्य को महत्व देता हो. 
2.                    बातें कम और काम ज्यादा करता हो.
3.                    एक दूसरे की मदद करता हो
4.             यह मानता हो की समाज के बिना उसका आसतित्व नही है. जो समाज को बहेतर बनाने के लिये समर्पित हो 
5.                    समाजिक कार्यों मे बढचढ कर हिस्सा लेता हो 
6.                    सह नागरीकों को आदर और सम्मान करता हो
7.                    शहर से प्यार करता हो उसे अपना मानता हो
8.                 अपने आस पास हो रही गलत बातों को ना सिर्फ विरोध करता होउसे सही करने के लिये उचित कदम भी उठाता हो
9.                    जिसका  लूट संस्कृति मे विशवास ना हो.
10.                अनुशासनप्रिय
एसा नही है की शहरों मे स्मार्ट नागरिक नही होते है, पर उनकी  संख्या बहुत ही कम है. जेसे जेसे इनकी संख्या बडेगी शहर खुद बा खुद स्मार्ट होता जायेगा. जिन देशों के शहरों को देखकर यह विचार हमारे अदंर आया है  प्रथन विश्व युद्ध से पहले उन शहरों की हालत हमारे बुरे से बुरे शहरों से भी बदतर थी. उसके बावजूद उसे प्रथम और द्वतिय विश्व युद्ध ने बुरी तरह बरबाद कर दिया था. फिर एसा क्या हुआ की 50 वर्षों से भी कम समय मे वो अपने शहर को स्मार्ट शहर मे बदल सके और हमारे शहर गंवार और बदहाल होते चले गये. इसे समझने के लिये प्रथन विश्व युद्ध और द्वतिय विश्व युद्ध के दौरान पैदा हुई स्थतियों को समझना होगा. क्योंकी इन दो युद्धों से पैदा हुई परिस्थतियों ने उसके पूरे समाज को स्मार्ट नागरीकों मे बदल दिया. 
कभी आपने गोर किया की किस तरह हम लोग डिजास्टर के समय बदल जाते है. केसे उस समय हम अपने को भूल कर दूसरों की मदद करने लगते है. क्रासदीयों मे लाख बुराइ हो पर उसमे एक सबसे बडी बात है उस समय हम उसका सामना एकजुट होकर करते है. वही एक जुटता और जिम्मेदारी हमे स्मार्ट नागरीक बनता है. 
काश हम बिना किसी बढी क्रासदी के यह सब सीख पाये और सही अर्थों मे स्मार्ट नागरीक बन पायें. 

Thursday, November 12, 2015

GOD Exists

Image result for godदिपावली के शुभ अवसर पर आपको एवं आपके परिवार को शुभकामनायें .... " GOD Exists. " आपके इस लेख पर मै कुछ कहने की गुस्ताखी कर रहा हू...मतभेद या विचार भेद होने पर आपको इस दिवाली पर मुझे माफ करने की ताकत... वो आपको दे जो हम सब का कारक है....;-)
चलो पहले गोड या इश्वर की परिभाषा तय कर लें. एक आसान सी परिभाषा ... " वो जो हम सब का कारक है " हो सकती है पर इससे बात नही बनी ना, क्योंकी इसमे वो जादुई करिशमा नजर नही आ रहा है जो हम एक इश्वर मे देखना चाहते. इसलिये इसमे थोडा मसाला जोडते है, जेसे वो जो हमारे पाप और पुण्य़ का हिसाब रखता है और उसकी सजा और इनाम के तोर पर स्वर्ग और नर्क भेजता है. जिसकी नजरों से कुछ भी छुपा नही है. जो सब को देख रहा है,  चाहे वो किसी गहरी गुफा मे छुपा हो या फिर हजार दिवारों से घिरे कमरे मे छुपा हो, वो सब को देख रहा है, सब के किये का हिसाब रख रहा है. जो चर और अचर का मालिक है. जो किसी को भी रंक से बादशाह और बादशाह से रंक बना देता है. जो मेरे और तेरे मे फर्क करता हो.  वो जो मदिंरों और मस्जिदों मे मिलता है. जिसके दर्शन के लिये लोग लम्बी लम्बी लाइन लगाये खडे नजर आते है.  उसने ही पवित्र धर्म ग्रंथ लिखे है या लिखवाये है. जिसके नाम पर हम दूसरे का खून तक कर देने के बाद उफ तक नही करते. कम से कम मुझे तो बचपन से यही सब समझाया गया है. किसी ने उसे पिता समझा तो किसी ने मालिक तो किसी ने जज किसी को वो निर्मोही नजर आया.  
उसको समझने का दावा करने वाले लोग भी कुछ दूर तक ही अपनी अध्यात्मिक और वैज्ञानिक सोच को ले जा पाते है ....उसके आगे ..? जो अनंत है उसका अंत आप केसे पा सकते है. इसलिये वो यह कहकर की मै ही इश्वर हू या मे ही इश्वर का बेटा हू या में उसका पेगम्बर हू ...या फिर हर कण मे इश्वर है और उसे देखने और पाने का आसान गुरूमंत्र मेरे पास है  एसा कहकर  वो इसे power game बना देते है और इस ताकत की कमान वो अपने पास रखते है.
आम जनता ..उसका क्या...
आम आदमी को रोजमर्रा की परेशानियों का हल इश्वर मे दिखाई देता है. उसे बस कोइ थोडी सी आस दिखा दे वो लाइन लगाये खडा नजर आता है. उसके लिये तो वही इश्वर बन जाता है जो उसे मुसीबत से बचा सके, समय पर काम आ सके. वो जब बिमार होता है तो उसे इश्वर याद आता है जब मुसीबत में होता है तो उसे इश्वर याद आता है. जब खुश होता है तो भी उसके हाथ उसकी इबादत में उठ जाते है. वो तो बस यह चाहता है की कोई उसे गुनाहों से बचाये और उस पर गुनाह होने से रोके. यह सब उसे जिस से भी मिला जाये वही उसके लिये इश्वर बन जाता है.
हमारी विजय पताका की हम इस सृष्टी का सबसे बेहतर माल है का पूरा खेल याददाश्त और तर्कबुद्धी का है. इसमे से किसी एक को गायब कर दो तो मामला खत्म. इस ब्रहमांड में लाखों करोडों आकाश गंगाये है और हर आकाशगंगा में अरबों तारे है और उसमे से एक तारा सूर्य है और उसका एक ग्रह पृथ्वी जिस पर हम रह्ते है. पृथ्वी को कुछ सौ किलोमीटर उपर से देखें तो हम नजर आना बंद हो जाते है, कुछ हजार किलोमीटर उपर से देखे तो हमारे शहर दिखना बंद हो जाते है. अब आप समझ सकते है की इस ब्रहमांड की तुलना में हमारी हेसियत क्या है.
हम इसानों ने याददाश्त और तर्क बुद्धी का भरपूर उपयोग किया.  हम इंसान को छोडकर बाकी जीव अपनी सिमित याददाश्त और बुद्धी के साथ अपने चारों और के माहोल के साथ सामंजस्य बैठाकर जीते रहे और जब माहोल बदला तो उनका जीना दूभर हो गया. पर हम इंसान इस से अलग साबित हुये हमने अपने तर्क बुद्धी की असीम संभावनाओं को पहचाना और उसका विकास किया. विज्ञान, खोज और आविष्कार सब तर्क बुद्धी का ही तो कमाल है. हम में से कुछ ने सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों में जीना सीखा है.  हमने हर बदली हुई परिस्थति में जीना सीखा. यंहा तक की हमने चांद पर भी अपनी उपस्थति दर्ज करा दी.
हमारे पास विकिसित दिमाग है जो सोच सकता है याद रख सकता है और विशलेषण कर सकता है, तर्क कर सकता है. यही सब हमे एक जानवर से अलग करता है. हमने जेसे ही आग का इस्तेमाल करना और खेती करना सीखा हमारी जिंदगी बदल गई.  इन खोजों ने हमे रोज खाने के लिये भटकने से बचा लिया. हमारी जिंदगी बदल गई हम घुमंतु खाना बदोश से अब विकिसित सभ्यता के साथ गांव और शहर बनाने लगे. इतना सब होने के बाबजूद जन्म, मृत्यु, बिमार होना, और प्राकृतिक विपदाये जेसे भूकंप, बाढ, सूखा, महामारी  एसे अन सुलझे रहस्य थे जिसका जबाब हमारे पास नही था.
हमने जाना की ब्रहमांड और जीवन कुछ प्राकृतिक नियमों से चलते है. और वो नियम सब पर लागू होते है. जिसे हम बदल नही सकते पर उसे समझ कर उसका मन चाहा उपयोग जरूर कर सकते है. विज्ञान उन नियम को समझ कर उसका भरपूर उपयोग कर रहा है और नित नया सृजन कर रहा है. साथ ही उसके डर ने विनाश के हथियार बनाये और लालच ने बेहिसाब प्राकृतिक संसाधनों के दोहन किया. इस तरह वो अपने लिये नित नई मुसीबत खडी करता जा रहा है. असल में हम समझ बेठे है की हम इंसान इश्वर की सबसे बेहतर और अनूठी रचना है. और वो हमे हर हाल में और हर कीमत पर बनाये रखेगा. जो सच नही है.  मेरा मानना है उसने जो कुछ भी बनाया उसका कोइ ना कोइ मकसद है. कुछ भी बे-वजह नहीं है.  पर इस विशाल सृष्टी में हमारी औकात बहुत तुच्छ है. और जिस पृथ्वी के हम वासी है वो दूसरे सितारे से दिखाइ भी नहीं देती. अब यह बताओ की हम में ऐसा क्या है की वो हमारे लिये अपने ही बनाये नियम को तोडता रहे.
जल्द ही हमे समझ आ गया की एक से दो भले...और दो से तीन...हमे समूह मे रहने के फायदे नजर आने लगे. समाज जेसे जेसे जटिल होता गया  उनकी व्यवस्था को चलाने के लिये नियम कायदे और कानून की जरूरत पडने लगी. समूह बनाये रखने और उसे बढाने के लिये अनुशासन, नियम और कायदे चाहिये. शायद इसी सब वजह से धर्म का उदय हुआ होगा. और धर्म ने ईश्वर को जन्म दिया.  इसीलिये हर समूह का अपना  अपना इश्वर और धर्म बना. इस तरह ईश्वर  अंधो का हाथी हो गया. अंधे को हाथी का जो अंग पकड में आया वो उसकी वेसे ही कल्पना करने लगा. अपने अपने ईश्वर के अपने अपने धर्म. जिसे अपना कर वो उस तक जा पाने का दावा करने लगे. उसके साथ ही पाप और पुण्य का जन्म हुआ. पुण्य वो जो उसे समाज के रितीरिवाजों के अनुसार चलने को बाध्य करे. और पाप वो कर्म जो उन रिती रिवाजों के विरूध जाता हो. धर्म के ठेकेदारों ने इसे ईश्वर की इच्छा से जोड दिया और उनके वाक्य इश्वरीय वाक्य बन गये और उनका हुक्म इश्वरीय हुक्म. इस तरह वो राज व्यवस्था का सहयोगी बना.
राजानिति ने धर्म का दामन थामा उसके बाद दोनों एक दूसरे के पूरक बन गये. धर्म के नाम पर अब लोग मरने मारने के लिये तैयार थे. धर्म के नाम पर जितना खून बहा शायद और किसी वजह से नहीं बहा. सच यह है कि कुछ लोग राज करना चाहते है खुद इश्वर बनना चाह्ते है, वो चाह्ते है उसके हर अच्छे और बुरे हुक्म का अक्षरश: पालन हो. जिसेके साथ चाहे वो जेसा चाहे कर सके. समय के साथ, नये समाज बने, नगर बसे, नित नई खोज और आविष्कार हुये और बहुत सारा सृजन हुआ. उसके साथ ही हमारे पास इतनी विनाश की ताकत आ गई की हम पृथ्वी पर मोजूद जीवन को कई बार समाप्त कर सकते है....
इश्वर के कई रूपों में व्याख्या  होने लगी जिसमे से दो रूप ज्यादा प्रचलित हुये. एक निराकार सर्व व्यापी रूप और दूसरा जिसमे उसे एक राजा के रूप में देखा गया. दोनों ही रूपों मे वो आम आदमी की पहुंच से दूर माना गया. उस तक पहुंचने के लिये विशेष पूजा और पूजारी की जरूरत बनाइ गई.
अकसर लोग मदिंर मस्जिद मे इबादत इसलिये करते है की वो उन्हे उसके नियम से परे जाकर उसकी मदद कर दे  उसके लिये नियम बदल दे. सच भी है कि जो नियम बना सकता है वो नियम बदल भी सकता है या उसे तोड भी सकता है. सवाल इस बात का नहीं है की वो नये नियम बना सकता है या नहीं या फिर वो अपने बनाये नियम तोड सकता है या नहीं सवाल यह है की वो ऐसा क्यों करेगा और कितनी बार करेगा.
पाप क्या है और पुण्य़ क्या है...क्या हम किसी भी एक घटना और व्यवाहर का पाप और पुण्य़  तय कर सकते है. जो हर परिपेक्क्ष  में हर कोण से हर काल मे वो एक जेसी ही परिभाषित हो! अगर एसा नही तो फिर पाप और पुण्य़ पर इतना जोर क्यों. अगर पाप और पुण्य़ समाज, काल और स्थान तय करता है तो इसे उस समाज, काल और स्थान तक ही सिमित क्यों नही रखा जाय. कम से कम इससे इश्वर के नाम पर होने वाले बेहिसाब खून खराबे को रोका जा सकता है.  
अच्छ-बुरा, स्वर्ग-नर्क, प्यार-नफरत, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्, सुखदुख, रात दिन, दोस्त दुश्मन सब सापेक्ष है और एक के बिना दूसरे का आस्तित्व नहीं है.  क्या duality के बिना दुनिया बनी रह सकती है या नही. अगर नही तो तो GOD के रोल हमारी रोजमर्रा की जिदंगी के क्या है...और उसको जानने और ना जानने से क्या फर्क पडता है?
मूल सवाल हमारे होने कि वजह क्या है. इंसान होने का मतलब क्या है. इंसान के रूप में हमारी क्या जिम्मेदारी है. हमारी क्या सीमायें है क्या हम सच में इश्वर रूप है क्या सच मैं उसने हमे अपनी सब ताकतों से नवाजा है. अगर यह सच है तब हमे अब किस  इश्वर की जरूरत है! उपरोक्त सवालो को समझने के लिये हमे  ज्ञान और चेतना के सबंध को समझना होगा. चेतना सर्व व्यापी है और असीम ज्ञान का स्रोत है वो सबके लिये उपलब्ध है. चेतना का स्तर किसी में शून्य के करीब हो सकता है जिसे आप जड कह सकते है और किसी मे वो असिमित होकर इश्वरीय हो जाता है. डरऔर लालच चेतना के स्तर को नीचे ले जाता है वंही प्यार और भरोसा उसे नई उचाइ पर ले जाता है. यह आप पर निर्भर है की आप चेतना युक्त ज्ञान को किस स्तर पर ले जाना चाहते है. अब यह ज्ञान लेने वाले के उपर है की वो क्या लेना चाहता है कैसे लेना चाहता है. उसे पूरी आजादी है की वो उसका क्या मतलब निकालता है और उसे कैसे उपयोग करता है,. पर साथ ही उससे होने वाले अच्छे बुरे परिणाम से भी वो बच नहीं पायेगा.. वो ही नहीं उसका असर उन पर भी हो सकता है, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होगा. शायद इसी डर से गुरु को अपने शिष्य को ज्ञान देने के पहले पात्र और कुपात्र के बारे में सोचने के लिये कहा गया. 
हमारे होने का कारण हमे खुद खोजना होता है या फिर कोइ भी अकल मंद और ताकतवर हमारा इस्तेमाल अपने तरीके से कर सकता है. अच्छ हो की हम खुद अपने मकसद को खोजे. इससे भी ज्यादा जरूरी है की जिस समाज मे आप रह रहे है उसे जाने समझे और तय करे कि उसे क्या दिशा देनी है और फिर उस पर अमल करे. जिस तरह प्राकृति के नियम नास्तिक और आस्तिक मे फर्क नही करते उसी तरह हम भी ना करे. और समाज/ समूह के हित मे जो ठीक है उसे ही करे और उसे ही माने यही समर्पण भाव आपके पाप और पुण्य के निरधारण का कारण भी बने. तभी उस समूह/ समाज का भला हो सकता है. आज हम उस दौर से गुजर रहे है उसमे हमारे मूल्य हमारे निर्णयों से मेल नही खाते है. और हमारे अदंर डर और ग्लानी का भाव पैदा कर रहे है. जो हमारी चेतना की नीचे की ओर ले जाता है. इसलिये आप्ने मूल्यों और संस्कारों का पुन: निरिक्षण करे. आज के इस इंटरनेट युग  में ग्लोबल सोच पैदा करे. समाज,  देश,  और धर्म से उपर उठकर ग्लोब के बारे मे सोचे...इस पृथ्वी के बारे मे सोचे उसके पर्यावरण के बारे मे सोचे. जब भी एसा करेगे अपने आपको इश्वरीय गुण से भरपूर पायेगे.  
जो कुछ भी उपर लिखा है उसमे नया कुछ भी नही है. दिमाग है तो सोचेगा...सोचेगा तो करेगा...करेगा तो उसका परिणाम भी होगा पर परिणाम सबके लिये एक सा नही हो सकता वो सबके लिये अलग होगा...उसका मतलब भी सब अपने-अपने ढंग से निकालेंगे...एसे ही दिनुया बनती है बिगडती है और चलती है विनाश होती है और फिर बनती है
god     ko samajhane से पहले इस दुनिया को समझना जरूरी है. और दुनिया के इस बृहद रूप मे समझने के लिये divergence thinking develop kar enjoy the infinte...क्योंकी convergence thinking ...will lead to ekroop........ओर आप गये समाधी में....यानी अकर्म ...और अकर्म पर कर्म हमेशा हावी रहेगा और अकर्मियों का इस्तेमाल अपने लिये करेगा.
सर नीचे लीखी equation पर ध्यान दिया जाये...
कल्पना+विचार+विश्वास+तर्क+खयाल+राय=सिद्धांतभावमतउद्देश्य,धारणा,योजना , परिणाम,जानकारी, कर्म
.....देखा गया ना सब सिर के उपर से ....... चलो अब बहुत हुआ...
एक बार फिर HAPPY DIWALI.....

दुर्वेश