Monday, April 25, 2011

सोलर कम्यूनिटी चार्जेबल यूनिट

सारे देश का बिजली का बुरा हाल है. बढे शहरों और राज्य की राजधानीयों में तो बिजली अभी मिल पाती है. पर छोटे शहरों में बिजली कटौती का बुरा हाल है. यहां 6 से 7 घंटे की कटौती आम बात है. पर गांवों और कस्बों का तो और बुरा हाल है. पूरे-पूरे दिन बिजली गायब रहती है. जेसे जेसे गर्मी बढेगी बिजली की आँख मिचोली बढती जायेगी. अब एसे में यहां के लोग क्या करे?


जो धनवान है उन्होने डिजल जनरेटर का इंतिजाम कर लिया है. पर गरीब आदमी क्या करे. रात के अधंरे को कैसे दूर करे कैसे उसके बच्चे रात में पढाई करे. उसके पास रोशनी के लिये लालटेन या फिर सरसों के तेल का दिया या मिट्‌टी के तेल का लैंप होता है. यह रोशनी देने वाले उपकरण कितने मंहगे साबित हो रहे है उसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है.

एक लालटेन की रोशनी एक 5 वाट के सीएफल लेम्प से भी कम होती है. एक लालटेन एक लीटर में 30 घंटे के करीब चलती है. अगर हम मिट्‌टी के तेल की कीमत 15 रुपये लीटर भी मानकर चले तो 150 वाट-घंटे (करीब 10 दिनों तक 3 से 4 घंटे की रोशनी ) के बराबर विद्युत उर्जा रोशनी देगी इस तरह उन्हे 1 यूनिट बिजली की कीमत 35 से 50 रूपये हुई. मोमबत्ती की कीमत तो और होश उडा देगी. इतनी मंहगी कीमत इस देश के सबसे गरीब आदमी को देनी पड रही है.

इसका समाधान खोजने के लिये पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट खंगालता रहा. मुझे अफ्रिका के एक NGO की मिसाल मिली उन्होने बेकार हो चुके मोबाइलों की बेटरीयों से LED चार्जेबल लेंप और टार्च बनाये और उन्हे स्कूल के बच्चों को दिया जिसे वो स्कूल में चार्जकर अपने घरों को ले जाते. प्रयास छोटा जरूर था पर उसकी हेमियत किसी से कम नहीं है. हम भी एसे स्कूल और पंचायत भवन में जो अभी बिजली से अछूते है या फिर जिन्हे बिजली के दर्शन कभी कभी होते है उन जगहों पर सोलर आधारित कमयूनिटी चार्जेबल यूनिट लगा सकते है और गांवों वालों को सस्ती LED चार्जेबल लेंप उपलब्ध करा सकते हे. जो केरोसिन और सरसों के लेंप का अच्छा विकल्प बन सके.

भला हो चाइना का की उसने इस देश में सस्ती LED टार्च से बजार को भर दिया। अब गांव-गांव में यह रोशनी का नया विकल्प बनती जा रही है. कम्यूनिटी चार्जेबल यूनिट की सुविधा होने से यह और भी लोकप्रिय हो सकती है. अब जरूरी हो गया है. की हर घर से लालटेन और तेल लेंप जेसी अदक्ष उपकरणों से इन गरीबों को निजात मिले. एक 75 वाट की कम्यूनिटी चार्जेबल यूनिट जिसकी लागत करीब 8 हजार रूपये की होगी जो आसानी से हर दिन 20 से 30 LED टार्च/ लेंप को चार्ज कर पायेगी एक बार चार्ज होने पर ये यूनिटें आसानी से 3 से 4 दिन तक काम करेगी इस तरह ये आसानी से 50 से 60 यूनिटों की चार्जिंग के लिये काफी होगी. इस तरह देखा जाये तो एक टार्च पर इसका एक बार का अतिरिक्त भार 100 रूपये से भी कम आयेगा. उसके बाद यह सालों साल तक फ्री चार्जिंग की सुविधा दे सकता है. इसे पचांयत आसानी से लगवाकर एक साल के अदंर ही अपनी लागत वसूल कर पायेगी, और सबसे बढी बात मिट्टी के तेल की आँख फोडू रोशनी से भी इन्हे मुक्ति मिलेगी.

Monday, April 18, 2011

एसे हल की खोज मे, जो देश को भ्रष्टाचार के केंसर से निजात दिला सके ...2

भ्रष्टाचार के केंसर से निजात हल



1. इसकी पहल भ्रष्टाचार की गंगा की गंगोत्री से करनी होगी. ऐसा राजनितिक पार्टीयों को स्वालंबी बनाने से हो सकता है उनके पास आय का कोई ऐसा स्रोत हो जिस से पार्टी के खर्चे को वे उठा सके तो कम से कम इसके लिये उन्हे गलत लोगों के साथ चलने की मजबूरी तो खत्म हो जायेगी. ऐसा प्रवाधान हो की हम आयकर का कुछ हिस्सा सीधे मनचाही पार्टियों को दे सके. राजनैतिक पार्टीया भी अपनी आय और खर्च का हिसाब दें.

2. जन प्रतिनिधी को उसे के काम की कोई तनखाह नहीं मिलती है, जब तक कि वो पार्षद या विधायक नहीं बन जाता. और ना ही हम खुले दिल से दान देते है. अकसर जो हम देते है वो काम का कमीशन होता है. जिसे पहले ही कानून ने गलत घोषित किया हुआ है. क्या ही अच्छा हो की हर पूर्ण कालिक जन प्रतिनिधी को उसकी पार्टी से भुगतान मिले साथ ही वो अपने काम की रेट लिस्ट सार्वजनिक करे. और उससे मिले पेसे को वो आमदनी में दिखा कर उस पर सर्विस टेक्स और इनकमटेक्स दे. हम क्यों नही मान लेते की जब एक वकील अपनी गलत और सही काम की फीस ले सकता है तो नेता या जनप्रतिनिधी क्योँ नहीं!

3. UPSC, PSC, CDS, की तरह कोई आयोग जन प्रतिनिधी और नेता या जन सेवा का कार्य करना चाह्ते हो उनके लिये हो, इसे पास करना पडे या कम से कम लाइसेंस जेसा कुछ हो. यह लाइसेंस कुछ मानदंडो के आधार पर ही दिया जाय और इसे निरस्त करने का अधिकार भी इस आयोग को हो. और चुनाव में खडे होने के लिये उसके पास यह लाइसेंस होना अनिवार्य हो.

4. लोकतंत्र में चुनाव संख्या बल के आधार पर होता है. राजा और रंक लोकतंत्र की नजर में समान बन गये उनके वोटींग का वेटेज एक सा कर दिया जो सुनने में बड़ा लुभावना था पर उस का असर जो हुआ वो बडा ही खतरनाक हुआ. जिसे देश की समस्याओँ से कोई लेना देना नही था ना ही जिसे कूटनितिक समझ थी वो देश का नेतृत्व चुनने लगा. जिस देश की अधिकांश जना संख्या अनपढ, गंवार, गरीब और भुखमरी की श्रेणी में आती थी देश के प्रतिनिधी चुनने लगी. इन्हे आसानी से धर्म जाति रंग बोली के आधार पर बेवकूफ बनाया जा सकता था. इस लोकतंत्र ने सभी को एक समान वोटिंग राइट दिये है. सभी की वोट की कीमत एक समान है. क्यों नहीं हम कुछ मानदंड के आधार पर इन का कीमत बनाते. क्यों एक अनपढ और पढेलिखे के वोटिंग की कीमत एक समान हो. अब तक सब कुछ संख्या बल के आधार पर ही तय होता रहा की कोन चुनकर जायेगा. उसका नतीजा हमारे सामने है. अब इसे बदलने का समय आ गया है.

5. विधान सभा और लोक सभा में सरकारा बनाने के लिये 50% से ज्यादा मत होना अनिवार्य है. जिसके कारण वैचारिक रूप से विरोधी दल सत्ता में आने के लिये अनुचित समझोते करते है. और सरकार गिरने का भया सत्ता धारी पार्टी पर हर समय लटकता रहता है अधिकांश समय वो ब्लेक मेल की हद तक एक दूसरे का शोष्ण करते है. क्यों नहीं राष्ट्रिय पार्टीयों की संख्या के आधार पर इस प्रतिशतको बदला जाये. अगर 10 राषट्रीय दल है तो प्रतिशत 10 के आसपास हो ना की 50. इसका मतलब यह हुआ की जिस पार्टी का मत प्रतिशत सबसे अधिक हो और अगर साथ ही वो निर्धारित मत प्रतिशत भी हासिल कर ले तो उसे सीधे सरकार बनाने का मोका दिया जाये. उसके बाद अगर वो चाहे तो दूसरे दल का सहयोग ले सकता है. कम से कम उसे मजबूरन गट बंधन बनाने की मजबूरी तो नहीं रहेगी. सरकार गिराने के लिये 2/3 का बहुमत सही है इससे सत्ता धारी पार्टी को स्थायित्व मिलेगा.

6. हम किस लिये 546 की संख्या के साथ पार्लियामेंट चलाना चाहते है. क्यों हम अपने राज्योँ में 250 से 400 तक विधायक चुनकर विधानसभा में भेजते है जब की हमे मालूम है की अधिकांश को इन सब से कुछ लेना देना ही नहीं है. हम यह क्यों नही समझते की निर्णय एक छोटे ग्रुप में करना ज्यादा आसान और कारगर होगा. इतनी बढी संख्या के वाबजूद हमारी पार्लियामेंट और विधानसभा के निर्णय जन विरोधी और देश हित के विरूध होते है. अधिकांश समय वो जिस तरह अधिवेशन का समय बरबाद करते है उसे देख कर आम आदमी का सिर भी शर्म से झुक जाता है.

7. मिडिया के रोल को अब अनदेखा नहीं किया जा सकता जिस तरह वो लोकतंत्र में सक्रिय भूमिका निभाते हुये मुद्दो पर राष्ट्र व्यापी बहस कराने में मदद की है. जब हमारे सांसद और विधायक सोते रहते है उन्हे जगाने का काम भी ये करता है. इनकी मदद लेते हुये किसी भी राष्ट्रिय महत्व में मुद्दे पर निर्णय लेते समय इनका उपयोग किया जा सकता है.

8. अब हालत ये है कि सभी पार्टीयों में दागी उम्मीदवारोँ की भरमार है. गभींर अपराधों के आरोपी चुनाव में खडे होते है. वो जेल में रहते हुये चुनाव पर्चे दाखिल करते है और विजय हासिल भी करते है. अकसर देखा गया है राजनितिक प्रतिद्व्दिंता के चलते झूठे आरोप लगाकर सत्ता पर काबिज अपना उल्लू सीधा करते है. इसलिये जब तक न्याय अपना निर्णय ना दे उन्हे दोष मुक्त मानकर चुनाव लडने दिया जाये. पर जब तक वो दोष मुक्त ना हो जाये उन्हे कोई पोस्ट ना दी जाये. और अगर वो दोषी पायेजाते है तो उनका चुनाव निरस्त माना जाये. इस तरह के केस फास्ट कोर्ट के जरिये निपटाये जाये.

9. पिछले 100 सालों में बने कानूनों की समिक्षा की जाये. और जनता पर इसके बोझ को कम किया जाये.

Wednesday, April 13, 2011

थर्मोइलेक्ट्रीक जेनेरेटर


वैज्ञानिकों ने सी-बेक प्रभाव पर आधारित एक एसे नये मोडयूल को बनाया है जो low grade heat जेसे सोलर उर्जा या फिर बायोमास उर्जा को आसानी से विद्युत उर्जा मे बदल देता है. इसे उन्होने थर्मोइलेक्ट्रीक जेनेरेटर का नाम दिया है आगे पढने के लिये क्लिक करे

Monday, April 11, 2011

Tour to lohr germany

 I was in lohr  germany. it is not a Lahore of pak. ।n German say loer.  Frankfurt is on banks of riyan river and  lohr and wuzberg is on men river  …    I was too observative on this visit as it was my first visit to any European country.
We reached 4 hrs before the schedule departure at Mumbai air port so that immigrations and security check formalities can b completed in time. oh! yes we took 4 hrs at mumbai air port for security n imegration checks. and the lufthansa jet was full to its capacity. My god more then 2000 indians fly daily to germany  from mumbai alone unbelievable !. thousand n thousand fly every night to other countries... so no reason to feel elevated for being to abroad. ye sense air port par jatey hee khatam ho gaya tha. yes yaar when u see thousand standing in a line waiting for there turn, to apni aookaaat samajh aa jati hai.  Flight was in  time at 3 am, 8 -1/2 hrs of flying ke baad we could  touch frankfurt..at 8.00 am yes it includes jet lag too. Too cramped space in economy class. yes too tiring aor tab samajh aya why they serve wine and alcohol to the passengers on board.
We took  more than a hour to clear immigration formatlites, thanx to the hospitality of the host, his Mercedes benz was waiting for us. We were ready to travel 140 km by road….it took less then a hr to reach destination…yes too fast !..
They drive fast but adopt all safety norms. ok let me explain  the incidence I had at frankfurt. My host arranged pick up for my team that driver came with three piece suit. And before drive, he ensured that we all have seat belts fastened. Although the window glass were tinted n nobody could have noticed us ..even then he forced us to hav seat belt…and we could understand his point when he was driving at 200 km/hr on high way…yes too fast with any indian standard but I could see cars  overtaking him at that speed. So point of seat belt was valid. They drive fast but not a rash drive. They respect pedestrian and yes no encroachment on pathways. On many incidence I observed them stopping there cars so that we can cross road comfortably. And time sense is remarkable, u don’t have to remind them second time …if they have accepted a responsibility then it will done in time yes no second reminder in fact reminder is treated as insult.  let it b train bus or taxi..they r ON dot time.
We were at hotel park lohr at 10 am.

ek baat to bhool hee gaya… toilet is too 
but clean but too costly one piss cost us 50 cent (almost 60 times India …many times its free in India u can piss at any corner) yes too costly yaar do u know in 150 cent u can get 200 ml wine.   India mai kabhi alcholol ko touch bhee nahi kiya ..aor idhar alcohol ke siva kuch nahi piya. Kya karte yaar yahaan water means soda water. They don’t serve water when’ver we askwed for water they asked us to go to wash basin…wash basin se drinking water ajeeb lagta hai … they serve bottled water at 3 euro per bottle too costly. Yes it was a good excuse to drink wine.
Non veg is cheap but non veg means pork n beef…raam raam. Kaisa desh hai ye. Whenever we eat we make sure by asking twice that its not beef or pork…
to my surprise germans were too friendly. Yes they had difficulty in english but they  manages. Yes yaar much  before the sun sets shopes closes. They close shop by 6 pm and sun in lohr sets at 9:30 pm which will increase to 10+ PM  by june 24th. After 6 pm all establishments and shops closes roads are deserted, except restaurants and petrol pumps and hospitals. Morning starts at 4 AM. Climate is too good in summers. ‘Gulabi thand’ . we had 2 sunny day 3 rainy days and rest cloudy not a bad combination. climate wise It’s the best time.
One more surprise, in these 7 days I hav not seen a single police wala. Even then such a high discipline. They says that police come only on call. Otherwise every civilian is police man. As I said there civic sense is remarkable..no horns on the road no loudspeakers no plastics no garbage. No bills n posters …it was too clean. to my wonder in seven days not a single horn. Hard to imagine a traffic without horns...yes i heard siren of ambulance only. and off course chruch bells.
 Lohr city has a traditional look. It’s a small town but has all amenities and and good shops and malls. Most of the places its self service, even the hotel we were staying had a staff of 2…ghoom gaya na head…yes dear only 2 one at reception and one at kitchen. Only two full time staff, other staff are called from service provider on demand.
Town is provided with few free parking areas where u can park your vehicle as long as u want no parking fees charged. Only drawback is that it is little far away.  Parking area in town is also marked where u can park but they r all paid parking area. N parking rate as high as 1 euro par hr. parking ticket is automatic m/c user punches parking time in a machine and machine delivers a ticket which is to b pasted on window of car. If car seen in parking beyond time punched on ticket it is heavily fined. That’s how this system works.  if vehicle is seen parked in non parking area again a heavy fine.
crime rate is jus nil in this town. But it may not be true for the other cities of germany.  Now coming to foods. Fruit  n veg are  too costly by Indian standard but for them its cheap…
To give idea lets have some comparision
Sl no
item
Germany
1 euro
Indian
Rs 57
1
Min labour wages
1200-1500 euro
Rs 3000/- to 4000/-
2
petrol
1.5 euro/litre
Rs 55 per litre
3
Mineral water
2 - 3euro/ litre
Rs 12-15 per litre
4
wine
6-7  euro/litre
No idea
5
Black level
22 euro
No idea
6
Local train ride
15 euro for 100 km
Rs 10-15(local) 40-50 for express train
7
Car price
3000euro (min)
Rs 200000(min)
8
Veg Lunch/ dinner
10-15 euro (non veg is cheaper)
Rs 100-200( non veg is expensive)
9
Xxx DVD’s
9 euro
Rs 20 (pirated DVD in grey market) original to milegi nahi…;-)
List can go on n on….but I stop.
Germany mai jawan ladkiyaan dekhane ko nahi milti jo bhee hai sab asian hai...and this is alraming thruth they r facing. yes thats true …young population is dangoursly low in germany. lohr has a population of 15 thousand where as similar  town of that capacity in india would have atleast 2 lacs.
We were in Frankfurt for a full day. huge sky scrappers…fashion, big malls and luxry cars…sex street jus near to Frankfurt station which delivers all sexy things one can imagine..i think its in almost all major European cities. This street is too tempting.
Other then this place rest is too clean. in frankfurt if u throw stone ...chances of hitting to the asian is more. good number of asian u can see there kai bar confusion hota thaa kee ham india ke kisi metro mai hai ya frankfurt mai most of the lower management and clerical jobs are taken by asians yes they are in IT too but in name if IT they are mostly engaged in data entry. i mean they r not descision maker. i had a interaction with lot many indian who were there for 4-5 yrs and truth was alraming. they miss india and the experience of these r that they dont get the respect they desrve. most of the asain are here to earn quick money so that they can have bright future in there home land.
We were to wuzberg one more city of germany. And we could see huge storage of wine underground…enuf wine for entire city for years together. Unbelievable. Once there was a time when salary to the staff was given in terms of wine bottle. Yes it was a currency once. 
Beside all the comfort we had,  if I get a chance to choose I will say no to germany. And reason is simple and straight i miss desi air. desi food, desi dost, desi moj maasti. do u knoe i had to hold piss for 4 hour and my bladder was about to burst before i could find a legal place (toilet). In my country i m free ...;) to piss in any direction, at any palce,..a real freedom . 
abhee apun mail stop karta hai u can take breath...abhee bhee koi sawal ho to pooooch saktee ho!
jai raam jee kee!