Monday, November 17, 2008

मेरा इश्वर



दोस्तों यह कोइ धर्मगुरू का प्रवचन नही है, ना ही यह किसी धर्म की स्थापना मे लिखा गया है. यह तो आप जेसे की एक शख्स के दिमाग की कुलबुलाहट है जो यंहा व्यक्त की है.  मकसद सिर्फ इतना भर की हम जान सके की हमारे होने कि वजह क्या है. इंसान होने का मतलब क्या है. इंसान के रूप में हमारी क्या जिम्मेदारी है. हमारी क्या सीमायें है क्या हम सच में इश्वर रूप है क्या सच मैं उसने हमे अपनी सब ताकतों से नवाजा है. अगर यह सच है तो उसने ऐसा क्यों किया ?
सबसे पहले हम यह जान ले की, इस सृष्टी में सब कुछ चेतन है, अचेतन कुछ भी नहीं. जो हमे अचेतन नजर आता है वह सिर्फ इसलिये की हम उसकी चेतना को समझ या पकड नही पा रहे, स्थूल नजर आने वाली हर वस्तु सूक्ष्म या अणु स्तर पर यह हमारे शरीर मे मोजूद अणुओं जितनी ही चेतन है.  यह अपने अदंर असिमित संभवानओं को समाये असिमित बुध्दीमान है, असीम क्षमता की स्वामी, यह सर्व व्यापी है हर जगह हर काल मैं है, वो अनंत काल में थी और अनंत काल तक रहेगी, इसका ना कोई आदी है ना अंत
ज्ञान असीम है और सर्व व्यापी है, वो सबके लिये उपल्ब्ध है अब यह ज्ञान लेने वाले के उपर है की वो क्या लेना चाहता है कैसे लेना चाहता है. उसे पूरी आजादी है की उसका क्या मतलब निकालता है और उसे कैसे उपयोग करता है,. पर साथ ही उससे होने वाले अच्छे बुरे परिणाम से भी वो बच नहीं पायेगा.. वो ही नहीं उसका असर उन पर भी हो सकता है, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होगा. शायद इसी डर से गुरु से अपने शिष्य को ज्ञान देने के पहले पात्र और कुपात्र के बारे में सोचने के लिये कहा गया.
अच्छा, बुरा, पाप, पुण्य, सापेक्ष है. किसी के लिये जो पाप है वो दूसरे के लिये पुण्य हो सकता है, कोइ घटना किसी के लिये अच्छी तो वही घटना किसी ओर के लिये बुरी हो सकती है. धर्म और धार्मिक आचरण काल और स्थान के साथ बदलते रहते है.
हमारी प्रगति का मुख्य कारण हमारी याददाश्त और तर्क बुद्धी  है. हम ईंसानों में इन दोनों का भरपूर उपयोग किया. हम इंसान को छोडकर बाकी जीव आपनी सिमित याददाश्त और तर्क बुद्धी के साथ वो अपने चारों और के माहोल के साथ सामंजस्य बैठाकर किसी तरह जीते रहे और जब माहोल बदला तो उनका जीना दूभर हो गया. पर हम इंसान इस से अलग साबित हुये हमने अपने तर्क बुद्धी से असीम संभावनाओं को पहचाना और उसका विकास किया. विज्ञान, खोज और आविष्कार सब तर्क बुद्धी का ही तो कमाल है. हम में से कुछ ने सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों में जीना सीखा है. हमने हर बदली हुई परिस्थ्ति में जीना सीखा. हमने जाना की ब्रहमांड और जीवन कुछ भौतिक और प्राकृतिक नियमों से चलते है. जिसे  हम बदल नही सकते पर उसे समझ कर उसका मन चाहा उपयोग जरूर कर सकते है.
एक इंसान के रूप मे हमे पूरी आजादी है की हम जो चाहे वो नियम बनाये और जब चाहे उन्हे तोड दें. इंसान के रूप में कैसे जिदंगी जीना चाहते है और उसके नियम क्या होगे, हम समाज में रहना चाहते है या अकेले ... क्या पाप होगा और क्या पुण्य होगा क्या धर्म होगा और क्या अधर्म, किस धर्म को माने किस का विरोध करे..क्या खाना है क्या पीना है किस के साथ प्यार करना है किस से नफरत. हमारे अदंर सृजन की और विनाश करने की असीम ताकत है. हमे कभी भी कुछ भी करने की पूरी आजादी दी. इसीलिये शायद ज्ञानी घबरा गये और उन्होने धर्म की स्थापना कर दी और धर्म से बाहर सोचने  औरसमझने की सख्त मनाही.


सवाल है कि हमे इश्वर की जरूरत क्यों है!
आदम अंधेरी सर्द रात. वो ठंड से ठिठुरता हुआ सीलन भरी बदबूदार गुफा में अकेला, तन्हा बैठा है. डर से उसका बुरा हाल, रात के अंधेरे साये मे कही से भी उस पर हमला होने का डर. कभी कडती बिजली तो कभी शेर की दिल दहला देने वाली दहाड. रह-रह कर मच्छर काट रहे है. कई दिनों से खाने को कुछ नहीं मिला. भूखा-प्यासा डर से कांपता रात  यूही खुली आंखो से गुजार देता है.....तो कभी सुबह की सुनहरी धूप की गरमाहट भरपूर भोजन, चिङियों की चहचहाहट, चारों तरफ फेले रंग-बिरंगे फूल, रंग-बिरंगी तितलीयों.....खनकती आवाज पर पीछे मुडकर आंखें फाड़े देखता, अब ना उसे प्यास ना भूख...डर भी ना जाने कहां चला गया.... शायद इसी तरह की छोटी छोटी घटनाओं से उसे ईश्वर के होने का अहसाहस हुआ होगा.
हमे उसने एसे विकिसित दिमाग से नावाजा जो सोच सकता है विशलेषण कर सकता है, तर्क कर सकता है, और याद रख सकता है. यही सब हमे एक जानवर से अलग करता है. हमने जेसे ही आग का इस्तेमाल करना और खेती करना सीखा हमारी जिंदगी बदल गई. इन खोजों ने हमे रोज खाने के लिये भटकने से बचा लिया. हम घुमंतु खाना बदोश से अब विकिसित सभ्यता के साथ गांव और शहर बनाने लगे. इतना सब होने के बाबजूद जन्म, मृत्यु, बिमार होना, और प्राकृतिक विपदाये जेसे भूकंप, बाढ, सूखा, महामारी एसे अन सुलझे रहस्य थे जिन्हे वो नहीं सुलझा पाया. और इन सब का जबाब उसे ईश्वर में दिखाइ देने लगा.
इश्वर के कई रूपों में व्याख्या होने लगी जिसमे से दो रूप ज्यादा प्रचलित हुये. एक निराकार सर्व व्यापी रूप और दूसरा साकार  जिसमे उसे एक राजा या नेता के रूप में देखा गया. उसकी व्यव्स्था राजतांत्रिक व्यवस्था से मिलती जुलती मानी गई यानी कि एक राजा और उसके नीचे उसके कई विभाग और हर विभाग का एक मंत्री सलाहकार जो उसके हुक्म को तामिल करते है कुछ ऐसी ही व्यव्स्था इश्वर की भी मानी ली गई.
समाज और शहर जेसे जेसे जटिल होते गये उनकी व्यवस्था को चलाने के लिये ईश्वर के नाम की जरूरत पडने लगी. ईश्वर अंधो का हाथी हो गया. अंधे को हाथी का जो अंग पकड में आया वो उसकी वेसे ही कल्पना करने लगा. अपने अपने ईश्वर के अपने अपने धर्म बने जिसे अपना कर वो उस तक जा पाने का दावा करने लगे ...उसके साथ ही पाप और पुण्य का जन्म हुआ. पुण्य वो जो उसे ईश्वर के पास लाता था और पाप वो जो उसे ईश्वर से दूर करता था. राजानिति ने धर्म का दामन थामा उसके बाद दोनों एक दूसरे के पूरक बन गये. धर्म के नाम पर अब लोग मरने मारने के लिये तैयार थे. धर्म के नाम पर जितना खून बहा शायद और किसी वजह से नहीं बहा.
इंसान मूलत: समाजिक प्राणी है उसका अकेले जीना सभंव नही है. उसे चाहे या अनचाहे समाज की जरूरत होती है. हम अपने संस्कारों और समाज और इश्वर के डर से वही करते है जो उस समय  के हिसाब से ठीक होता है. धर्म और राज निती एक अच्छे समाज को बनाने मे जब तक सायहक है तब तक तो सब अच्छा है जब एसा नही होता तो असली मुसीबत की शुरूआत होती है. हमने नये समाज बनाये, नगर बसाये, नित नई खोज और आविष्कार किये और बहुत सारा सृजन किया. उसके साथ ही हमारे पास इतनी विनाश की ताकत आ गई की हम पृथ्वी पर मोजूद जीवन को कई बार समाप्त कर सकते है.



हम इश्वर को कब याद करते है!
आम आदमी को रोजमर्रा की परेशानियों का हल उसे इश्वर मे दिखाई देता है. उसके लिये तो वही इश्वर बन जाता है जो उसे मुसीबत से बचा सके जो समय पर काम आ सके. वो जब बिमार होता है तो उसे इश्वर याद आता है जब मुसीबत में होता है तो उसे इश्वर याद आता है. जब खुश होता है तो भी उसके हाथ उसकी इबादत में उठ जाते है. वो तो बस यह चाहता है की कोई उसे गुनाहों से बचाये और उस पर गुनाह होने से रोके. उसे कोई प्यार करेने वाला हो और कोई हो जिसे वो प्यार कर सके. यह सब उसे जिस से भी मिला जाये वही उसके लिये इश्वर बन जाता है.
कुछ एसे लोग भी होते है जो राज करना चाहते है खुद इश्वर बनना चाह्ते है, वो चाह्ते है उसके हर अच्छे और बुरे हुक्म का अक्षरश: पालन हो. जिसके साथ चाहे उसके साथ वो जेसा चाहे कर सके. उनमे से कुछ को हम जाने अनजाने अपना सरताज बना लेते है और कुछ जबरदस्ती हमारे उपर हुक्म चलाने लगते है. इनमे से कोइ हमे गुंडा नजर आता है तो किसी मे हमे अपना नेता नजर आता है. किसी को हम आंतकवादी के नाम से जानते है तो किसी को स्वतंत्रता सेनानी. इन्ही के बडे रूप को हम देवता या दानव और उनका सरदार ....इश्वर ,कुछ एसी ही हमारी कल्पना है उस इश्वर के बारे मे जिसे हम रोज अगरबत्ती लगाकर और नारीयल चढाकर हाथ जोडे और आंखे मुदे प्राथना करते है एक एसे चमत्कार के लिये जो हमे मन चाहा दिला दे. हमे रातोंरात हमारे पापों को भुलाकर हमे  सर्वश्रेष्ठ बना दे.

हमारे होने का मकसद
इस ब्रहमांड में लाखों करोडों आकाश गंगाये है और हर आकाशगंगा में अरबों तारे है और उसमे से एक तारा सूर्य है और उसका एक ग्रह पृथ्वी जिस हम रह्ते है. पृथ्वी को कुछ किलोमीटर उपर से देखें तो हम नजर आना बंद हो जाते है, कुछ हजार किलोमीटर उपर से देखे तो हमारे शहर दिखना बंद हो जाते है. अब आप समझ सकते है की इस ब्रहमांड की तुलना में हमारी हेसियत क्या है. हम भले ही अपने को कुछ भी समझे पर ब्रहमांड में हमारी हेसियत नगण्य है.
इस सृष्टी के चलने के कुछ नियम है और वो नियम सब पर लागू होते है. विज्ञान उन नियम को समझ कर उसका उपयोग करने की कोशिश करता है. सृष्टी के चलने के नियम इश्वर ने बनाये है पर इश्वर भी इन नियमों में रहकर ही काम करता है. सवाल इस बात का नहीं है की वो नये नियम बना सकता है या नहीं या फिर वो अपने बनाये नियम तोड सकता है या नहीं सवाल यह है की वो ऐसा क्यों करेगा और कितनी बार करेगा. यह सच है की जो नियम बना सकता है वो नियम बदल भी सकता है या उसे तोड भी सकता है. पर अगर वो ऐसा करता है तो फिर उसमे और हम मैं कोइ अतंर ही नहीं रहा.
हम मानते है की वो परम ज्ञानी है, और उसने जो कुछ भी बनाया उसका कोइ ना कोइ मकसद है. कुछ भी बे-वजह नहीं है. इस विशाल सृष्टी में हमारी औकात बहुत तुच्छ है. और जिस पृथ्वी के हम वासी है वो दूसरे सितारे से दिखाइ भी नहीं देती. अब यह बताओ की हम में ऐसा क्या है की वो हमारे लिये अपने ही बनाये नियम को तोडता रहे. असल में हम समझ बेठे है की हम इंसान इश्वर की सबसे बेहतर और अनूठी (अच्छी) रचना है. और वो हमे हर हाल में और हर कीमत पर बनाये रखेगा.
पर क्या आप विश्वास करोगे की यही शरीर अरबों जीवाणुओं का घर है. हमारे शरीर मे मोजूद हर एक सेल के मुकाबले 10 जीवाणु. हम उनके लिये उत्तम भोजन और घर है. वेज्ञानिक कहते है की हमारे शरीर मे मोजूद दोस्त जीवणु अगर ना हो तो हम भोजन पचा नही सकते. क्या पता हमारे जीने का मकसद इन अरबों जीवाणु के लिये घर और भोजन है. हमारे शरीर मे इन जीवाणुओं की पूरी एक दुनिया मोजूद है क्या पता वो हमारी भावनाओं और सोच को भी नियंत्रित करते हो.

लेख अधूरा है.....वो अधूरा ही रहेगा जब तक हमे उपर दिये बुनियादी सवालों के सही जबाब ना मिल जाये. इसलिये चिंतन जारी रहेगा...और देखा गया ना सब सिर के उपर से ....चलो अब बहुत हुआ... आप चाहो तो इस चिंतन का हिस्सा बन सकते हो..... क्या पता इसी बहाने वो तुम्हे भी दर्शन दे दे जिसकी चाह दिल मे बसी है.





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