Tuesday, October 2, 2012

अरविंद जी क्या आपको लगता है की आप ने राजनितिक पार्टी बनाने का एलान कर गलत किया


अरविंद जी क्या आपको लगता है की आप ने राजनितिक पार्टी बनाने का एलान कर गलत किया अगर नही तो फिर चिंता और अफसोस क्यों ......  हो सकता आप सबसे अच्छा विकल्प ना दे पायें पर एसा भी नही होगा की आप सबसे खराब विकल्प दे बेठें वेसे भी जब आप पार्टी बनाने की कोशिश करेगे तभी आप इस देश की रजनितिक पार्टी की असली परेशानियों से  रुबरू हो पायेगे. 
आज देश को राजनितिक विकल्प की सख्त जरूरत है यह सच है कि अन्ना साथ  होते तो अच्छा था. पर उनके साथ ना होने का, आपके अपने निर्णय से पलटने का बहाना ना बन जाये.
वेसे अगर धर्म संकट की इतनी चिंता है तो आपको भी हम जेसे देशवासियों की तरह आराम से घर बैठ कर हर नेता और राजनेता को गाली देते हुये सोचना चाहिये था की बहुत बडा नेक काम कर लिया.
चंद घंटों के लिये रास्ता जाम कर देना , एक दिन के लिये देश बंद करवा देना या फिर जंतर मंतर पर भीड  जमा कर लेने से कही बहुत बडा काम है इस देश को सही राजनितिक विकल्प उपल्ब्ध कराना. आपको पता चलेगा की जो लोग आपके साथ भीड थे... वोट देते समय वो किसी और के है.
जब आपके कार्यकर्ता हर छोटे बडे काम के लिये आपके सामने पेसे के लिये हाथ फेलाकर खडे हो जायेगे या फिर आपका नाम लेकर जबरदस्ती चंदा उगाही करेगे. केसे आप अपनी पार्टी मे गुंडे और मवालियों को जुडने से रोक पायेगे. आपको जब पार्टी चलाने के लिये रूपये की जरूरत होगी और जो आपको यह साधन उपल्ब्ध कराय्रेगा वो आप से कुछ उम्मीद करेगा.

 देश देखना चाहता है की इन सब का विकल्प केसे निकालते है.   

Monday, October 1, 2012

बुराइ ताकतवर है क्योंकी वो अकसर एकजुट होती है


 बुराइ ताकतवर है क्योंकी वो अकसर एकजुट होती है. और अच्छाइ कमजोर क्योंकी वो अकसर बिखरी हुई होती है . वेसे भी जो खुद आसानी से बिखर जाता हो वो केसे लोगो को एकजुट कर पायेगा . हमारी इसी कमजोरी ने FDI के लिये रास्ता साफ किया . FDI के विरोधी उसके चंद समर्थकों से कही ज्यादा थे...पर वो हार गये. 51% हिस्सेदारी का लोग मतलब ही नही समझ पाये
अब इस देश मे असली कटपुतली सरकारों के दर्शन होंगे. आगे स्थति और भंयकर होने वाली है. आगे आने वाला समय अब गुलाम सरकारों का है. यह देश 65 सालों से गरीबी मिटाओ का नारा देता रहा....अब नारा होगा गरीब मिटाओ...
ओह क्या इसके लिये उन्हे किसी नारे की भी जरूरत होगी
...FDI का दुनिया भर मे यही कुचक्र है.

Sunday, September 16, 2012

'व्यक्तिवाद' का गोबर

दबंग जब चालाकी, मक्कारी, चापलूसी के गुण में गिनने लगे. जब किसी की प्रतिष्ठा इस बात से हो की उसका बैंक् बेंलेस क्या है...और वो किस गाडी मे सफर करता है. जब इस बात को अनदेखा कर दिया जाने लगे की कमाइ के साधन पवित्र और कानूनी है या फिर कुछ ओर. जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो समाज और देश को बरबादी से कोन रोक पायेगा..


पढा लिखा होने का मतलब जरूरी नही की आप देश और समाज के कानून के साथ हो समाज के लिये हो. आज ज्यादा पढा लिखा होने का मतलब चालाकी, मक्कारी, चापलूसी को अपने लिये इस्तेमाल करने कला को जानना है.. जो सीख गया वो तर गया और जो नही सीख सका वो लाइन मे सबसे पीछे खडा दिखाइ दे रहा है. अगर आप पैसा फेंकने को तैयार है तो कानून के जानकार आपको बतायेगे की केसे अपने फायदे के लिये उसका इस्तेमाल किया जा सकता है.


हम भले ही किसी जमाने मे समाजिक थे पर अब समय का पहिया उल्टा चल पडा है. जिस संस्कृति ने ‘हम’ का पाठ पढाया आज वो मै ...मै कर रही है.

समाज तेजी से अपने मूल्य बदल रहा है, सादगी कब हमारी कमजोरी बन गई हमे पता ही नही चला. राजनिती भी सफेद से गरूये रंग मे ढ्लने लगी. इन बदलते मूल्यों मे शब्द भी अपनी परिभाषा बदल रहे है. अन्ना जेसे लोग गंदगी से भरे तालाब मे लहर तो पैदा कर देते है पर गंदगी की सफाइ?.....

हमे समय ने इस हद तक सुविधा भोगी बना दिया है कि अपनी सुविधा के लिये हम कुछ भी कर गुजरते है. हमने हम की परिभाषा को इतना समित कर लिया है के पडोसी भी हमे दुश्मन नजर आता है. जब तक हमारी सुविधा बरकारार है हम कोइ चिंता नही.

जब धर्म

हाल ही में कुरान शरीफ और पेंगबंर के अपमान जनक विडियों पर दुनिया भर मे हो रही प्रक्रिया पर....


जब धर्म

धर्म ना होकर

एक भीड का जमावाडा बन जाये

जब डर के साये में

उसको याद करने की आदत बन जाये

किसी को नीचा दिखाना ही

खुद के उपर उठने का आसान तरीका नजर आये

जब खुद का सच ,

सच

और दूसरों का सच

झूठ नजर आये

जब अपने बेगुनाह

और दूसरे गुनाह्गार नजर आये

जब इंसानियत बचाने की नाम पर

इंसानों को ही खत्म किया जाये

जब ताकत और् रूतबे का नशा

उसको भी भुला दे

जिसके नाम पर उसे हासिल किया

तो कुछ एसा ही होता है

कोइ सिर फिरा कुछ कह देता

और बहुत सारे लोगों के सिर

फिर जाते है

Tuesday, September 11, 2012

हिंदी पखवाडा



हिंदी पखवाडा चल रहा है, अगले दिन 14 सिंतंबर को हिंदी दिवस मनाया जायेगा ... सोचा की हम भी कुछ लिखे और आप सब तक अपनी बात पहुंचायें.
अब देखो...आज हिंदी को कितना भी बुरा भला कह दे, है तो हमारी अपनी भाषा. यह हमारे देश में आज भी सबसे ज्यादा बोली और समझी जाती है.  पर  आज यह गरीबों, कमजोरों और पिछडों की भाषा बनकर रह गई है. 
बुरा लगा क्या सुनकर !
ज्ञानियों की माने तो किसी भी भाषा की ताकत उसका ज्ञान होता है. जरूरी नहीं की वो उनका अपना हो. पर ये जरूरी है की वो सब उनकी अपनी भाषा में हो जिसे उसके लोग पढ सके और समझ सके.... 
इधर हमारे विश्व विद्यालय लोगों को डिग्रीया बांटते रहे. बिना इस बात की चिंता किये की जो ज्ञान वो विदेशी भाषा में उपलब्ध करा रहे है वो उनकी अपनी भाषा में भी उपलब्ध करा सकते थे. इसे किसी भी तरह असंभव काम नहीं कहा जा सकता..बस हमारे अदंर इच्छा शक्ति नहीं थी. अगर एक प्रोफेसर अपने विषय को अपनी भाषा में ना समझा सके तो लानत है एसी  प्रोफेसरी पर. 
सच तो यह है कि पढने वाले को नोकरी के लिये डिग्री चाहिये थी और पढाने वालों को अपनी तन्खाह से मतलब था. अब अगर ऐसा है तो फिर हिंदी हो या कोई ओर भाषा  ,,, क्या फर्क पडता है. क्योंकी ये दोनों काम तो हो ही रहे है.
अब असली और पते की बात ....
आज भाषा पेट से जुडी है. अंग्रेजी हम भारतीयों की जरूरत है क्योंकी यह हमे रोटी दे रही है. कल अगर जर्मन या फिर चाइनिस वो काम करेगी तो हम वो सीख लेगे... आज हम गलोबल युग में है. जो बेहतर होगा वो ही टिकेगा...जिसके पास ताकत होगी वही रहेगा...बाकी सब इतिहास की गर्त में होगा....इसलिये जागो और ओछी भाषाई राजनिती से उपर उठ कर सोचो.
भला हो बजारवाद का, कि जिसके कारण दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनीया अपना माल बेचने के लिये हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का सहारा ले रही है.

आइडिया..:-) 
इस देश को अपनी भाषा चाहिये. एक एसी भाषा जो कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक और गुजरात से लेकर नागालेंड तक सबकी अपनी हो. इसके लिये क्यों ना हम उस भाषा की बात करे जो ना हिंदी है ना इगलिश ना उर्दू है ना मराठी और ना ही वो तमिल है. एक जन सामान्य की भाषा, उसमे सभी भाषाओं के प्रचलित शब्द हों जिससे किसी को यह शिकायत ना रहे कि उसे अनदेखा कर दिया. 
एक बात ओर पूरे भारत मे लिखने की एक ही लिपी का इस्तेमाल हो. अगर मानक लिपी मे अन्य भाषा का कोई विशेष स्वर वाला अक्षर ना हो तो उसे उसमे जोडा जा सकता है. इस मानकीकरण  से पूरे भारत मे एक जेसा लिखा जा सकेगा. अभी तो तमिल नाडू में तमिल में तो केरल में मलियाली मे तो बंगाल में बँगला, आन्ध्रा में तेलगू मे लिखा होता है.   अगर किसी एक लिपी का इस्तेमाल हो, तो कम से कम उसे हर भारतीय पढ तो सकता है. अभी तो हाल यह है की दूसरे राज्यों के लोग बसों पर लिखी जगह का नाम तक नहीं पढ पाते. 
एक लिपी होने से दूसरे राज्यों की भाषा को सीख़ना भी  आसान हो जायेगा. जब अंग्रेजी  खुले दिल से दूसरे भाषा से शब्दों को आयात कर अपने को दिनों दिन विकिसित करती जा रही है तो फिर हम अपनी भाषा के साथ एसा क्यों नही कर सकते.
अगर आपको लगता है की हिंदी को इस देश की प्रथम भाषा होनी चाहिये तो राजनिती से उपर उठकर पहले कम से कम इतना भर कर ले की देवनागरी लिपी को सभी जगह लिखने के लिये इस्तेमाल करे. अगर जरूरी हो तो इसमे नये अक्षर जोडे जा सकते है. अरे...इसे ही तो भाषा का विकास कहते है. या उसे भी हम राजनीती में उलझा देना चाहते है,

हमें बाते कम और काम ज्यादा करना है. नहीं तो हम और आप हिंदी और अंग्रेजी करते रह जायेगे....और कोई  हमारे वतन में ही हमे अजनबी बना देगा.   
जो लाखों करोडों किताबे और इंटर नेट पर ज्ञान है उस सबका अनुवाद हिंदी मे करना है. जिस दिन एसा कर पायेगे ...हिंदी इस देश की क्या वो विश्व भाषा बन जायेगी. अगर सच में आप 150 करोड़ हो तो उसे काम से साबित करो.  कुछ लोग इस काम मे लगे हुये है...आप चाहो तो आप भी उनके साथ मिल जाओ...वरना शोर ना मचाओ. ना ही राज नेता की तरह बाते करो. जेसे अपुन आज कर रहा है...
 काम करो... . अगर आप भाषाई राजनिती से उपर नही उठोगे तो नीचे जाओगे...अरे नीचे जाओगे क्या ...आपकी दुआ से नीचे जा रहे है.
वेसे हम बेशर्म लोग है जी. कितना भी बुरा भला कहा लो हम वो काम नहीं करेगे जो दिल कहता है, हम वो काम करेगे जो हमसे डंडे की चोट पर कराया जाता है. या फिर पैसा फेंक कर हमसे कोई भी काम करा लो....यार कुछ तो बोलो...भगवान भला करे आपका 

Tuesday, June 12, 2012

Germany sets new solar power record

Germany sets new solar power record, institute says...by Erik Kirschbaum
11 June 2012
BERLIN, May 26 (Reuters) - German solar power plants produced a world record 22 gigawatts of electricity per hour—equal to 20 nuclear power stations at full capacity—through the midday hours on Friday and Saturday, the head of a renewable energy think tank said.
The German government decided to abandon nuclear power after the Fukushima nuclear disaster last year, closing eight plants immediately and shutting down the remaining nine by 2022. They will be replaced by renewable energy sources such as wind, solar and bio-mass.



Tuesday, June 5, 2012

आगे रास्ता जाम है...रोहतांगपास


रोहतांगपास के नाम पर टेक्सी वाले ने हमे मडी पर लाकर खडा कर दिया है.जब कहा की आगे रोहतांग पास तक लेके क्यों नही जा रहे हो तो बोला की साहब आगे रास्ता जाम है. आप भी देखो कोइ आगे नही जा रहा है सब यही तक लेके आते है.
चारों तरफ नजर दौडता हू... जहां तक नजर जाती है लोगों का हूजूम...  मेला लगा है खाने पीने के स्टाल है.  अपनी मस्ती मे डूबे लोग. खुली धूप ठ्डी हवा ... मै भी ब्रेड आमलेट का आडर देकर कुर्सी पर पसर जाता हू. बेटा कब का भीड मे गायब हो गया है. अब वो इतना बडा हो गया है की उसके खोने का डर नही है. मालूम है थोडी देर मे मस्ती कर के खुद ही हमे डूडता हुआ वापस आ जायेग. हां बीबी थोडी परेशान है....उसके लिये अभी भी वो बच्चा है.
ब्रेड की पहली बाइट लेते ही मेरी नजर दो तीन लोगों पर पडी हाथों मे पोस्टर पकडे हुये...ओह YHAI  द्वारा आयोजित पर्यावरण जागरूकता अभियान मे लगे वोलेंटीयर. देखकर अच्छा लगा. उनके मोजूदगी का असर साफ है. ना तो यहां वहां बिख्ररे पोलिथीन के टुकडे है और ना ही गंदगी, हर दुकानदार का अपना अपना ड्स्ट्बिन. काश एसी जागरूकता हम सभी सार्वजनिक जगहों पर दिखाते.

Monday, April 16, 2012

भ्रामक विज्ञापन


टेलीविजन सहित तमाम संचार माध्यमों का मूल काम समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों को उजागर करना होता है,  जिस से भोली-भाली जनता इन सब के चक्कर में ना पड़ें और  जनता की मेहनत की कमाई को इन लूटेरों द्वारा लूटे जाने से बचाया जा सके.
झूठे वादे और भ्रम फ़ैलाने वाले विज्ञापन के कार्यक्रमों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए सरकार ने कई नियम बनाए  है पर इसके बावजूद इनका सही समय पर प्रयोग ना किये जाने के कारण इसका असर ना काफी हो जाता है.
ढेरों भ्रामक विज्ञापन इन दिनों प्रचार माध्यम खासकर टीवी पर  प्रसारित हो रहे हैं. उनमें से कंही "निर्मल बाबा का दरबार" लग रहा है तो कंही कोइ फिल्मी सितारों के साथ संधी-सुधा तेल बेच रहा है या फिर शनिदेव का प्रकोप या यंत्र तंत्र के विज्ञापन. ये लोगो को जिंदगी को रातों रात बदलने का दावा कर, अपना माल बेच रहे है और आम जनाता को हर रोज लाखों करोडों का चूना लगा रहे है. अपने प्लांटेड लोगों को खड़ा कर ये लोग सवाल पूछ्वाते हैं या फिर अपनी और अपने उत्पाद की तारीफ करवाते है,  बार-बार एसे दृश्य दिखाये जाने से  आम जन इस झूठ मे फंस कर अपनी कमाइ लुटवाते है.
मेरा आग्रह उन सभी न्यूज चेनलों से है ..की अगर उन्हे लगता है की निर्मल बाबा जेसे लोग आम जनता को लूट रहे है तो वो एसे सभी लोगों को उजागर भले ही ना करे पर उनके विज्ञापनों पर पूरी तरह से रोक लगाये.
इस आसान कमाइ को छोडना इन चैनलों के लिये आसान नही होगा इसलिये इसके साथ ही  विज्ञापनों पर नजर रखने के लिये एसी गौर सरकारी संस्था हो जो इन विज्ञापनों में किये गये गलत दावों पर नजर रख सके और समय समय पर लोगों को इसके बारे मे बताती रहे और उनके विरूध कानूनी कार्यवाही करने मे मदद करे.
हमे सरकार से कोइ खास उम्मीद नही है ...वेसे भी हमारी न्याय की देवी की आंखो पर तो पट्टी बंधी है. उसे ना कुछ दिखाइ देता है ना सुनाइ देता है. वो तो उस बंदर के समान मूक  है और अब चालाक भी  जो मोका मिलने पर दोनों बिल्लीयों को लूट लेता है.......

Sunday, April 15, 2012

निर्मल बाबा ही क्यों!....

इन दिनों टिवी पर निर्मल बाबा प्रकरण छाया हुआ है. पहले मिडिया ने उन्हे अधात्मिक गुरू बनाया और अब उन्हे जालसाज, धोखेबाज, धंधेबाज, और ना जाने किस किस विभूतियों से नवाजा जा रहा है. मेने भी इनकी बातें टीवी पर बहुत बार सुनी है. अपने भक्तों को जिस तरह की राय मशविरा देते थे उससे मेरा मंनोरंजन होता था. मै यह जानने की भरपूर कोशिश करता की इस व्यक्ति मे एसा क्या है की हजारों लोग दो से पांच हजार रूपये देकर उसके समागम मे जाना चाहते है.


कभी मुझे उस आम दुखी आदमी पर तरस आता जो उनके दरबार मे हाथ जोडे खडा है और कभी मुझे मिडिया पर गुस्सा आता की क्या अब उसके पास दिखाने को एसे लोग ही बचे है. पर जब से मिडिया अब बाबा की लेने पर तुली है तो मुझे बाबा पर तरस आ रहा है. और् मिडिया पर गुस्सा क्योंकी इतना सब कुछ हो जाने जाने के बाद मिडिया पर किसी ने उगली नही उठाइ यह वही मिडिया है जिस ने इस बाबा को हीरो बनाया अब वही उसकी बुराइ कर रहा है.

बाबा जो कुछ् भी करता था ताल ठोककर सब के सामने करता था और जो करता था उसका टेली कास्ट करता था. एसा उसने एक दिन नही दो दिन नही ......मुझे नही मालुम कितने दिन से यह सब चल रहा था...अब एसा क्या हो गया की बाबा रातोंरात मिडिया का विलेन बन गया....मुझे तो लगता की कोइ है जो मिडिया और बाबा के उपर है...शायद उसकी बाबा से खटपट हो गई और् उसके इशारे से अब बाबा का बेंड बजा रहा है. एसे हजारो है जो इस देश मे धर्म और कर्म कांडो के नाम पर उल्लू सीधा कर रहे है. जो लोग आज निर्मल बाबा के पीछे लगे है क्या उन्हे वो हजारो नजर नही आ रहे...या फिर ये सब भी बहती गंगा मे हाथ धो रहे है. जहां तक निर्मल बाबा का सवाल है उसे मे एसे धूध वाले की तरह देख रहा हू जो दूध मे पानी मिलाता है उनका क्या जो दूध के नाम पर जहर बेच रहे है...और आये दिन धर्म और कर्म केर नाम पर हजारो का खून बहाने से भी नही चूकते.

जहां तक .निर्मल बाबा का सवाल है उसके समागम मे जाने के लिये लोगों ने पैसा दिया था....मुझे अब तक एक भी एसा नही मिला जिसने कहा हो की उससे जबर जस्ती पैसा ले लिया है. या फिर पैसा लेकर उसे समागम मे शामिल नही होने दिया. पैसा समागम मे जाने की फीस थी .....अपना दुख जाहिर करने की फीस थी....वही फीस जो एक डाक्टर वसूल करता है. और जिस फीस के ना मिलने पर इस देश मे नर्सिंग होम बिमार को मरने के लिये छोड देते है.

जितने भी प्रोग्राम देखे उसमे बाबा ने दुख सुनकर उन्हे दिलासा दी और उम्मीद की एक किरण दिखाइ. और उनके द्वारा बताया उपाय....अगर एक मनोवैज्ञानिक की दृष्टी से देखोगे तो उसके उपाय मे आपको अर्थ दिखाइ देगा...वही अर्थ जो मंदिर मे दिया जलाने का होता है...या फिर अगरबत्ती या फिर घंटा बजाने का.. सवाल यह है कि फिर सिर्फ निर्मल बाबा ही क्यों?.....मुझी तो लगता है की पूरा मामला मुनाफे की हिदस्सेदारी का है.

पिछले एक हफ्ते से न्यूज चेनलों पर एक्सपर्ट बहस पर नजर है. उनमे अधिकतर का कहना है कि अगर बाबा ने ट्र्स्ट बनाया होता और दिखाता की इस पैसे से वो अस्पताल बनवा रहा है या फिर स्कूल कालेज चला रहा है तो उसका किया हुआ सब जायज हो जाता...पर बिचारे से एक गलती हो गई उसने पैसे को अपने या अपनों के नाम से धंधे मे लगा दिया ... बाबा अगर एक ट्रस्ट बनाकर यह सब कर देता तो  सब जायज हो जाता...पर क्या है की विपरीत काले .... वरना इस देश मे तथा कथित मदिंरो और आश्रम मे करोडों अरबों की नाजायज संपत्ति कहां केसे इस्तेमाल हो रही है उस पर इनकी कभी नजर नही गई.

मुझे मिडिया के लिये बाबा खडग सिंह की कहानी याद आ रही है...
हे मिडिया आप कुछ भी करो पर एसा कुछ ना करो की आम जनता का भरोसा आप पर से टूट जाये...
क्योंकी जो लोग बाबा के उपायों पर बहस कर रहे है..उन्हे मिडिया पर दिन रात चलने वाले उन विज्ञापनों पर भी नजर डालनी होगी ...जो लोगो को जिंदगी को रातों रात बदलने का दावा कर, अपना माल बेच रहे है और आम जनाता को हर रोज लाखों करोडों का चूना लगा रहे है मजेदार बात तो यह रही की मिडिया पर बाबा का कोर्ट मार्शल हो रहा है और उस पर भी मिडिया को करोडो के विज्ञापन मिल रहे है...और यही तथा कथित मिडिया बिना यह देखे या जाने की इन विज्ञापनों मे आम जनता को क्या परोसा जा रहा है बेधडक दिखाया जा रहा है...इन प्रोग्रामों का एंकर हर दो मिनिट बाद बढी बेशर्मी से ब्रेक पर जाने की जबर्दस्ती इजाजत मांगता है जिससे वो इन भोडे विज्ञापनों को हमे दिखाकर लाखों कमा सके .... अगर एसा है तो बाबा ही क्यों!



Wednesday, March 28, 2012

गीत गाएं गौरैया का

Meeting Project objectives differently



Blind people work together and make parts of Boilers at Trichy for IOCL’s Paradip Refinery project …..… An experience sharing.

21st December 2011 has etched an unforgettable memory in my mind. I was at Tiruchirapalli on a mission to expedite supplies of Boilers at BHEL’s works for Power plant of IOCL’s ongoing Paradip Refinery Project. BHEL has outsourced non-pressure parts of these boilers to certain vendors nearby Trichy. ‘ORBIT’ is among such outsourced vendors, who is making Pins & Clamps of these boilers for our project. We decided to visit ORBIT also for review and expediting balance supplies.

When we reached ORBIT works, we were greeted by their President Mr. P.R. Pandi, who himself is a blind person. To my utter surprise, the whole ORBIT workshop is run by blind persons. Though I was aware of certain special schools and institutions for blind persons but never heard about any manufacturing industry run completely by such persons. What I saw next inside the workshop is quite difficult to believe.

I had never witnessed such well coordinated and coherent working by blind persons. People were segregating the raw material, feeding the raw material on cutting, shearing and punching machines with the help of their fellow blind friends, collecting the final products and bagging them after quality checks. The whole manufacturing process was efficiently done and finished product was meeting the quality standards. I was lost in deep admiration seeing their untiring efforts for making vital parts for my project and emotionally touched. Their interpersonal understanding and collective effort was exemplary and far better as compared to normal workers engaged in other industrial units. Below photos depict it completely but silently…

People were working with no ego and communication was being made not with vital sensory organs like eyes, but with their hearts. I was thrilled and compelled to think that dedicated and sincere working by these special people is a great example towards values of humanity which defies all laws of Project management. Calm and peace prevail here in their coordinated rhythm of working against any feeling of industrial acrimony.

What came next was even more surprising. A physically handicapped welder was doing welding on the job and was assisted by a blind helper. We saw his blind helper almost running and going to store room next door to fetch the electrodes quickly. When enquired how he could do such job with much ease, my fellow companion from BHEL, Mr. Jai Ram told me that every worker working here is fully conversant with the layout of workshop and does the job with calculated steps – concepts of time and motion study, well grasped by them by heart. I was overwhelmed by their indomitable spirit, everlasting zeal and working in perfect harmony.

At the end, ORBIT president Mr. Pandi requested me ‘Sir, if you come across any blind person, please direct him to me, we will make him our team member here’. I controlled my emotions, advised them to maintain timelines and quickly moved out with mixed feelings, thinking and admiring effort and passion of ORBIT in this endeavour and with firm conviction that Paradip Refinery Project will soon be a realised dream.

Arvind Kumar
Chief Project Manager-PDRP
Indian Oil Corporation Ltd.
PS:I would like to thank IOCL Management & BHEL team for giving me an opportunity to have such wonderful experience with a noble cause during project expediting at BHEL,Trichy.

Efficiency

Tuesday, January 17, 2012

2D पिक्चर को केसे 3D में देखे

3D टीवी की आजकल बहुत चर्चा है. इन पर 3D मूवीस को देखने का मजा ही कुछ और है.  जेसे सब कुछ अपने पास हो रहा है, सामने से आती गोली लगता है जेसे सीने से पार हो जायेगी. हीरोइन के लहराते बाल गालों को जेसे छू लेगें.


यह कमाल केसे हो पाता है! हमे विज्ञान मे बताया गया की अपनी दो आंखों के कारण अपने आस पास की दुनिया को हम त्रियामी देखते है और इसी वजह से दूरी का सही आकलन भी कर पाते है. पिक्चर पोस्ट्कार्ड, टीवी या फिर मूवी में दृशय फ्लेट दिखाई देता, उनमे गहराई का अहसाहस नहीं होता. क्योंकी वो दो आयामी है. इस कमी को पूरा करने के लिये फोटोग्राफी की अलग तकनीक विकसित की गई. एसे केमेरे बनाये गये जो हमारी दोनों आंखो के द्वारा देखे जाने वाले दृश्य को अलग अलग कैद करते है और फिर उसे देखने के लिये मंहगा त्रियामी टीवी, इसे विशेष चश्में से देखने पर हमे उस पर दिखाइ देता दृशय त्रियामी दिखाइ देता है. यह एक एसा चश्मा है जिससे दांई आँख और बाई आँख अपने-अपने दृश्यों को ही देख सके और फिर हमारा मस्तिक उन दोनों दृशयों को एक साथ मिलाकर त्रियामी दुनिया बनाता है. सिनेमा ने भी त्रियामी फिल्मे पर्दे पर दिखाने कि नई तकनीक विकसित की जिसे पोलेराइड चशमे पहन कर देखा जा सकता है. हमे बताया गया की त्रियामी आभास हमारी दोनों आंखों से अलग अलग कोणों से बनने वाले ड्र्श्य की वजह से होता है. पर यह सच, पूरा सच नहीं है. आगे इस बारे में कुछ और लिखू.

एक छोटा सा प्रयोग कीजिये. अपनी कोई भी एक आँख बंद कर अपने चारों ओर देखिये क्या अतंर महसूस हुआ ....कुछ खास नहीं ना! सभी कुछ अपनी जगह पर, वही गहराइ का अहसाहस् ...कुछ भी बदलाव नजर नहीं आया ना. फिर क्या कारण है की हमे पोस्ट कार्ड, टीवी, या मूवी के दृशय हमे फ्लेट दिखाई देते है? और एक आंख से देखाइ देने वाली दुनिया अभी भी हमे त्रियामी दिखाई दे रही है.

जब भी हम किसी दृशय को देखते है तो हमे त्रियामी अहसाहस दोनों आंखों के द्वारा अलग अलग कोणों से आंखों की रेटीना पर बनने वाली तस्वीर के कारण होता है. पर इसके साथ ही बचपन से ले कर अब तक हमने दृश्यों के बारे में अपनी जो समझ विकसित की है उसका उपयोग भी दिमाग दूरी के आकलन मे करता है. जेसे हमे मालूम है की नीला आसमान सबसे पीछे होता है पहाड उसके आगे. अगर एक के पीछे दूसरी वस्तु छुप रही है तो छुपने वाली वस्तु की दूरी पहले वाली से ज्यादा होगी. कुछ वस्तुओं के साइज का अंदाजा हमे पहले से ही होता है और हम उस आभासी साइज से उसकी दूरी का अंदाज लगा लेते है. यह हमारे अंतरर्मन में इस तरह बसा हुआ है की एक आँख बंद होने पर भी हमे कुछ खास अंतर दिखाई नहीं देता.

इसका अहसाहस मुझे हिमालय में कई बार हुआ, जब ट्रेक करते हुये बर्फ से ढ्की पहाड़ की चोटी सामने के पहाड़ से छुपी होने कारण लगता था जेसे बहुत करीब है पर जेसे ही हम उस पहाड पर चढ्ते है तो वो हमे फिर से वो दूर दिखाई देती ....क्यों? क्योंकी तब उस बर्फ की चोटी और हमारे बीच और भी बहुत से पहाड दिखाई देने लगते.

अच्छा एक ओर छोटा सा प्रयोग कीजिये. पेपर को रोल कर एक छोटा सा छेद बनाकर उसमे से 10 फिट से ज्यादा दूर वाली सामने की किसी भी वस्तु को कुछ इस तरह देखिये की बस वो ही दिखाई दे...उसके आस पास की और कोई भी चीज आपको दिखाई ना दे....क्या अब आप उसकी दूरी का सही अंदाज लगा पा रहे है...ओह आप बोलेगे की आप एक आँख से देख रहे है ...ओके अब ऐसा ही दोनों आंखो से किजिये. शर्त बस एक है की उसके आस पास की और कोई चीज आप को दिखाई ना दे. क्यों जी!! दूरी का अंदाज लगाने मे कठनाई हो रही है ना! ...उम्मीद है अब आप मेरी बात से सहमत हो गये होंगे की दो आंखो वाला त्रियामी सिद्धांत आपकी कोई खास मदद नहीं कर पा रहा है. उस पर अब अगर कोई रंगो का समायोजन बिगाड दे तो हम बुरी तरह धोखा खा जायेगे. इसी तरह अगर वास्तविक वस्तु का ठीक वेसा ही छोटा या बड़ा माडल हमारे सामने हो तो भी हम उसकी दूरी के आकलन में बुरी तरह धोखा खा जायेगे.

असल मे दो आंखो से बनी त्रियामी दुनिया का उपयोग 10 से 12 फिट की दूरी तक ही हमारा दिमाग ठीक तरह से कर पाता है. इस तरह दूरी का सही आकलन हमे चीजों को पकडने या फिर उसे  लांघने और कूदने मे मदद करता है. उसके बाद जो कुछ भी त्रियामी दिखाई देता है वो अकसर हमारा अनुभव भर होता है.

अब एक बार फिर उसी सवाल पर की हमे सिनेमा का दृशय फ्लेट क्यों दिखाइ देता है. इसका जबाब देने से पहले एक ओर प्रयोग. इस बार सिनेमा देखने जाये तो अपनी सीट का चयन इस तरह कीजिये की आपकी आंख द्वारा पर्दे पर दांये से बांये बनने वाला कोण 90 डिग्री से ज्यादा का हो. और आपकी आंख का लेवल करीब-करीब पर्दे के बीच के लेवल पर हो.  मूवी के स्टंट सीन शुरू होते ही आप अपनी एक आंख बंद कर लीजिये और दूसरी आंख से अपनी उंगलियों की झिरी का इस्तेमाल करते हुये पर्दे पर मूवी को इस तरह देखिये की सिर्फ पर्दा पर चल रही मूवी ही दिखाई दे, बाकी कुछ नही. थोडी देर मूवी को इसी तरह देखिये. क्यों मजा आया ना.... हुआ ना 3D मूवी का अहसाहस. इस काम को आसान करने के लिये आप 2.5x पावर का बाइनोकुलर का इस्तेमाल भी कर सकते है, बस उसके एक लेंस पर कवर लगा रहे. जिससे एक आंख ही दृशय को देख सके.

यह कमाल केसे हुआ? जब आपने उंगलियों की झिरी का इस्तेमाल करते हुये पर्दे पर मूवी को देखा तो पर्दे और आपके बीच की दूरी का आभास आपके दिमाग को नही रहा. और वो आसानी से दृश्य मे खो गया और आपको त्रियामी अहसाहस होने लगा. खासकर स्टंट वाले दृश्य मे यह अहसाहस ज्यादा होता है.

अगर किसी फोटो को उसी तरह देखे जिस तरह उस फोटोग्राफॅर ने फोटो लेते समय उसे देखा होगा तो हम भी उस पिक्चर की सुदंरता और गहराइ का अहसाहस उसी तरह होगा जेसा उस फोटोग्राफर को हुआ होगा. उसके लिये महत्वपूर्ण है कि जिस कोण से केमरे मे उसे देखा गया फोटो को देखते हुये उसी कोण को बनाने का प्रयास किया जाये और उसे एक ही आंख से देखा जाये. और हम सिर्फ फोटो को ही देखे.

Monday, January 9, 2012

one massive container ship pollution >= 50 million cars pollution


It is reported that in one year, a single large container ship can emit cancer and asthma-causing pollutants equivalent to that of 50 million cars. The low grade bunker fuel used by the worlds 90,000 cargo ships contains up to 2,000 times the amount of sulfur compared to diesel fuel used in automobiles. The recent boom in the global trade of manufactured goods has also resulted in a new breed of super sized container ship which consume fuel not by the gallons, but by tons per hour, and shipping now accounts for 90% of global trade by volume.

In international waters ship emissions remains one of the least regulated parts of our global transportation system. The fuel used in ships is waste oil, basically what is left over after the crude oil refining process. It is the same as asphalt and is so thick that when cold it can be walked upon . It's the cheapest and most polluting fuel available and the world's 90,000 ships chew through an astonishing 7.29 million barrels of it each day, or more than 84% of all exported oil production from Saudi Arabia, the worlds largest oil exporter.

Shipping is by far the biggest transport polluter in the world. There are 760 million cars in the world today emitting approx 78,599 tons of Sulphur Oxides (SOx) annually. The world's 90,000 vessels burn approx 370 million tons of fuel per year emitting 20 million tons of Sulphur Oxides. That equates to 260 times more Sulphur Oxides being emitted by ships than the worlds entire car fleet. One large ship alone can generate approx 5,200 tonnes of sulphur oxide pollution in a year, meaning that 15 of the largest ships now emit as much SOx as the worlds 760 million cars. Airborne pollution from these giant diesel engines has been linked to sickness in coastal residents near busy shipping lanes. Up to 60,000 premature deaths a year worldwide are said to be as a result of particulate matter emissions from ocean-going ship engines.

Friday, January 6, 2012

गुम हो चली भोपाल और नवाबों की पहचान

नवाब और तांगा वर्षो से भोपाल की पहचान रहे है। लेकिन ये दोनों चीजें इस शहर से धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं। नवाब तो रहे नहीं, शहर की सड़कों पर तांगा भी अब इक्का दुक्का ही दिखते है।एक दौर था जब भोपाल में आवागमन का एक मात्र साधन तांगे हुआ करते थे। इसे तो लोग नवाबों की सवारी मानते थे। हो भी क्यों न इनकी चमक-दमक कुछ इस तरह की होती थी कि इस पर सवारी करने वाला अपने आप को नवाब ही समझ बैठता था। तांगे भी कई किस्मों के होते थे। कुछ तांगे बग्घी जैसे होते थे, उनकी सजावट हर किसी का मन मोह लेती थी तो कुछ आम तांगे भी होते थे। इनमें सवारी करने वाले लोग एक दूसरे से पीठ मिलाकर बैठते थे। भोपाल के तांगों की पूरे देश में चर्चा रही है। फिल्म नया दौर में तो दिलीप साहब ने भोपाल के पास की एक घाटी में तांगा दौड़ाया था।आज परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं। तांगों की जगह अब आटो और बसों ने ले लिया है। जो तांगा बचे है उनमें सवारियां नहीं बल्कि सामान ढोया जाता है। तांगे की सवारी का शौक रखने वाले लोगों का दिल अब तांगों की हालत को देख कर बैठ जाता है। घोड़ों की खुराक के लिए हर रोज कम से कम सौ रुपये की जरूरत होती है। जब से मिनी बस और आटो का प्रचलन शुरू हुआ है तब से लोगों का तांगों से मोहभंग हो गया। इसकी वजह यह है कि तांगे की सवारी थोड़ी महंगी है और वक्त भी ज्यादा लगता है। ऐसे में तांगा चलाना उनके लिए मुश्किल हो गया है। इसलिए वे सवारी ढोने के बजाए माल ढोना ज्यादा पसंद करते है।भोपाल से गुम हो रहे तांगों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग को भोपाल कार्निवाल के दौरान इस मामले में जन जागरण लाने के लिए तांगा राइडिंग का आयोजन करना पड़ा। तमाम कोशिशों के बावजूद केवल सात तांगों का ही इंतजाम हो पाया।यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में नवाबों के किस्सों की तरह तांगों की कहानियां भी अगली पीढ़ी सुनेगी।



भोपाल श्हर

भोपाल हरे-भरे जंगलों और पहांडों से घिरा भोपाल शहर खूबसूरत शहरों में से एक है। यहां की बंडी झील, ताजूल मस्जिद, भारत भवन, पर्दा, नामर्दा, जर्दा, बतौलबाजी और तांगा इसकी पहचान है। यहां की शाम और भोपाली उर्दू जुबान, इसकी खूबसूरत शाम और शांत वातावरण.....पर अब तेजी से बदल रहा हे
जिस झील के किनारे सैकंडों पर्यटकों और प्रेमी बैठकर इसकी खूबसूरत फिंजा को देखते थे वहीं आज यह बिरान सी लगने लगी है। ऐसे ही भोपाल की उर्दू, फारसी और अरबी जुबान भी अपनी विशेष पहचान रखती है। लेकिन अब वह भी भगवान भरोसे हो गई है। एक समय था, जब यहां वॉल्टर और फ्लोरा सारकस नाम की शायर रहा करते थे। असद भोपाली और कैफे भोपाली फिल्मी गीतकारों की हैसियत से भोपाल नगरी की पहचान थी…
तिरपन बरस पहले का भोपाल राजा भोज की नगरी थी। कहा जाता है कि तब यह भोपाल न होकर भोजपाल हुआ करता था और इस भोपाल शहर को उस समय के नवाबों ने संजोया और संवारा। तब भोपाल राजधानी भी नहीं था। तिरपन बरस पहले जब नये मध्यप्रदेश की स्थापना हुई और राजधानी के लिये भोपाल को चुन लिया गया। राजधानी बनने के साथ भोपाल दो हिस्सो में बंट गया। अब शहर एक और नाम दो थे। पुराना भोपाल और नया भोपाल। इन बावन सालों में पुराना भोपाल तो जस का तस रहा किन्तु नया भोपाल की सूरत साल-दर-साल बदलती गयी। पुराना भोपाल अपनी यादों के साथ आज भी जी रहा है। यादों के इस भोपाल में तांगे और बग्घी अब थोड़े से बच गये हैं और बाकियों को धुंआ उड़ाते आटोरिक्शा न लील लिया है। भोपाल की पहचान जरी-बटुआ उद्योग अब गुमनामी के साये में हैं। पुराने भोपाल की ताजुल मस्जिद में सजदा करते हजारों लोग, नफासत के साथ बतियाते लोग और वही पुरानी तंग गलियां, पानी के लिए नलों के सामने आपस में सुबह किलकिल और सांझ को साथ बैठ एक-दूसरे का सुख-दुख बांटती औरतें ही पुराने भोपाल की पहचान रह गई हैं। भोपाल का यह वही हिस्सा है जहां कभी कारखाने से निकली जहरीली गैस ने हजारों जिंदगियों को नींद में ही इस दुनिया से रूखसत कर दिया था। भोपाल की पहचान एक समय एशिया के सबसे बड़े ताजुल मस्जिद से थी तो ढाई सीढ़ियों की एशिया की सबसे छोटी मस्जिद भी भोपाल में है। मिंटो हाल, नया विधानसभा भवन, नेशनल लॉ यूर्निवसिटी, साइंस सेंटर और राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भी इस शहर की पहचान हैं। इस शहर की शान कलाओं का घर भारत भवन है। इस शहर की पहचान कामरेड शाकिर अली खां और बरकतउल्लाह भोपाली से हे तो इसी भोपाल ने देश को शंकरदयाल शर्मा जेसे विशाल व्यक्तित्व का राष्ट्रपति भी दिया। एशिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली से है तो दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से इस शहर को एक नयी पहचान दी। अपने शेर-ए-शायरी के लिए पहचाने जाने वाले जनाब बशीर बद्र भी तो भोपाल से ही हैं। मंजर भोपाली, जावेद अख्तर के नाम के साथ भोपाल की पहचान जुड़ी है तो कमाल अमरोही और जगदीप भी इसी भोपाल से वास्ता रखते हैं तो लोक एवं आदिवासी कलाकारों को भोपाल के रास्ते नाम मिला। भोपाल ताल इस शहर की प्यास बुझाता है तो सैलानियों के लिए स्वर्ग जैसा है और इसी बड़े ताल से लगा हुआ है छोटा ताल। छोटा ताल नहीं कहलाता बल्कि तालाब कहलाता है और यह पुराने भोपाल के हिस्से में आता है। पुराने भोपाल की पहचान इतवारा, मंगलवारा, बुधवारा जैसे मोहल्ले से है तो नया भोपाल नम्बरों का शहर है। १२५०, १४६४, ७४ बंगले, सेकंड स्टॉप, दो नं, पांच नं, सवा छह, छह, साढ़े छै, सात, दस, ग्यारह और बारह नम्बरों में भोपाल बसा हुआ है। यह माना जाता है कि पुराने भोपाल के मोहल्ले के नाम उनके साप्ताहिक बाजारो के कारण पड़ा होगा तो नये भोपाल की पहचान वहां नये बने मकानों की संख्या से आशय रहा होगा। राज्यपाल निवास, मुख्यमंत्री निवास, विधानसभा भवन, मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय नये भोपाल के हिस्से में हैं। पर्दा, जर्दा और मर्दा के लिये मशहूर भोपाल का उल्लेख केवल उसके राजधानी होने के कारण नहीं होता हे बल्कि इसके और भी कारण हैं। यह शहर देश के चुनिंदा महंगे शहरों में शामिल है। इन बावन सालों में बहुत सारी चीजें बदली। निजाम बदलते गए, व्यवस्था बदलती गई। किसी ने इस शहर को सुव्यवस्थित करने का प्लान बनाया तो कोई पेरिस की शक्ल देने में जुट गया। बात बनी नहीं और बेजा कब्जा वाले पसरते गए राजधानी होने का सुख भोपाल ने खूब भोगा तो दुख भी इस भोपाल ने झेले हैं। झाबुआ से बस्तर तक की राजधानी कहलाने का सुख भोगने वाले भोपाल को बीसवीं सदी के समाप्त होते-होते जोर का झटका लगा। इस राजधानी के मुकाबले एक और राजधानी बन गयी वह छत्तीसगढ़ की थी। मध्यप्रदेश विभाजित हो गया और अपने ही जन्मदिन एक नवम्बर को विभाजन की पीड़ा भोगनी पड़ी।

Thursday, January 5, 2012

Solar Politics


It's possible to supply all the heating and electrical needs of an average household with the wise use of sunlight at a cost competitive with fossil fuel and nuclear power.

Why than is solar energy not more popular?

• Government has never adequately subsidized the development and use of solar energy.

• No social recognition for solar energy user. Even though they are helping in reducing carbon foot print.

• Poor home design which heat more in summer and less in winter

• The simplicity of solar application has not yet captured the imagination of the consumer.

• We are creatures of habit controlled by a fossil fuel empire.

The use of solar energy offers a safe, environmentally less destructive technology that can usher in a new era of post-industrial development. Little attention has been paid by current generations of scientist, politicians and planers to develop a society that operates in a framework of environmental and social stability. In the mad rush to plunder the earth of it's dwindling supply of non renewable resources, the planners of today's industrial world have forgotten the needs of future generations.

The energy we receive from the sun is our birthright like the air we breath or the water we drink. Dependence on non renewable energy concentrates such as fossil fuels is no longer necessary. The exploitation of resources and people for economic growth is no longer necessary. The absurdities of our current high energy era can only be corrected if the gentle politics of change are implemented to bring about a post industrial renaissance. Imagine a social order motivated by love, courage and curiosity rather than hate, fear and greed. . "A journey of a thousand miles begins with the first step." If you feel strongly about taking that first step there is something you can do. Unite together to promote the necessary research and development in the area of renewable resources. Tax oil more and tax home owners using solar less. Encourage small local businesses that are capable of sustaining a practical economy.

companies involved in non renewal resources extraction like oil and coal could not survive without the cooperative efforts of specialist needed to find, extract, refine, defend and deliver. I have no argument with the people who produce it. These producers are only doing their job in an unrestrained capitalist society. Our government is also encouraging the extraction of oil and coal in the name of sustaining economic growth.

What would your reaction be to a 100% Oil Tax hike? At first one may seem outraged for such a tax as it downright violates the laws of capitalism and free enterprise. RIGHT? Yet a brave stand on an oil tax is what we need to create new jobs and develop alternative, renewable, energy resources. To make a smooth transition from our energy dependent oil based economy into an energy independent "solar age" we'll need more than sunshine. We'll need an informed public and an honest government concerned about a sustainable future.

The households and commercial business that provide the solar electricity can receive credit point and at the end of the month, the authorities can determine how much they used and how much it produced through solar and other renewal sources accordingly then can get tax rebates



What countries would you suppose would be the world champions in installing and producing electricity from the sun with solar or wind energy? with its hi-tech prowess and seemingly endless sunshine, Israel should by rights be the world champion in solar electricity. It isn’t, in fact, the honor of top producer of energy from the sun belongs not to Israel, believe it or not, it goes to Germany.

That seems unlikely solar in Germany is so high considering Germany has an average of 1,738 hours of sunlight a year, working out to an average of just 4.8 hours each day. Compare that to Spain, with its average of 2,910 hours a year (8.0 a day) or Israel’s 3,468 hours a year, coming to an average of a whopping 9.5 hours a day. Despite its being solar-challenged, Germany produces some 12 percent of the electricity it uses annually from solar.

Why country like India with its longersunshine hours, can’t outdo or even match the electricity generated by solar of Germany or Japan, Italy, France, Spain or any of the countries that utilize their sunshine more effectively is clearly a matter of proper implementation of policy. Politics were a major factor in the decision making.

Every little bit of electricity produced by these systems has a positive impact on the environment, “every little bit” helps; more electrical power produced by solar means less burning of fossil fuels. There are a number of technologies available to turn solar power into viable energy. sunlight reaching the Earth’s surface is plentiful almost 6,000 times more than average power consumed by humans.

At one point in history, the whale oil industry was lobbying the government and predicting the collapse of economics if they didn’t subsidize the increasing cost of purchasing oil from the dead carcasses of mammals, then someone invented kerosene and the need for whale oil dropped off a cliff, thereby making the greedy argument of protectionism obsolete forever. Yet here is some genius, making the same argument again. world has always overcome with new techniques, new advances, new ways of doing business and I fully believe we’re going to do it again.

India is running out of coal. The power plants are running at less than 50% capacity. They are already importing huge amounts. There are power cuts all over. In some parts of the country there are mandated blackouts for more than half the day alternating every hour. That was the reason India signed the nuclear deal. Their back was against the wall. A sad story. Bad management of resources and corruption had led to this state of affairs. Of course there is disregard for environmentally friendly energy policy.

With all this we have plus side too…Now I can see good future through government policies, India was the first country in the world to set up a ministry of non-conventional energy resources, in early 1980s. In recent years India has been lagging behind other nations in the use of renewable energy (RE). The share of RE in the energy sector is less than 1% of India's total energy needs. Renewable energy in India comes under the purview of the Ministry of New and Renewable Energy.

Some large projects have been proposed, and a 35,000 km² area of the Thar Desert has been set aside for solar power projects, sufficient to generate 700 to 2,100 giga watts. Central Government has proposed to launch its Jawaharlal Nehru National Solar Mission under the National Action Plan on Climate Change with plans to generate 1,000 MW of power by 2013 and up to 20,000 MW grid-based solar power, 2,000 MW of off-grid solar power.

Tuesday, January 3, 2012

Blood Pressure (see Hypertension)

10 ways to fight against high blood pressure

1. Take more foods that contain potassium. Foods such as sweet potato, orange juice, potato, banana, kidney beans, peas, cantaloupe, dried plums and raisins can help lower high blood pressure. Specialists suggest adults should take 2-4 grams potassium.

2. Understand the salt amount in food. Senior people are more allergic to sodium and taking even a little excess amount can cause high blood pressure. Even if it’s normal people, the amount of salt shouldn’t exceed 6 grams a day.

3. Eat dark chocolate. (a good news) Dark chocolate contains flavanols. Taking a few pieces a day can improve the health of heart and blood pressure.

4. Vitamin supplement. I personally don’t prefer taking any dietary supplement that’s not natural. However, coenzyme Q10 can lower blood pressure. Consult your doctor before taking these vitamins.

5. Drink a little wine. A lot of researches already prove that drinking appropriate amount of wine can help lower blood pressure. Of course, drinking excessively is definitely not suggested. In average, a normal healthy person can drink a can of beer or 100ml of red wine per day.

6. Drink more tea. Drink 3 cups of tea a day then blood pressure can go down 7%. This may be caused by the chemical reaction produced by the tea leaves extracts.

7. Walk fast. Fast walking can help high blood pressure patients lower their pressure. The key is it has to be several times a week and last for more than 30 minutes. Once the patients adapt this cardio exercise they can increase the pace and distance a little bit.

8. Deep breaths. Qi Gong, Yoga, Tai Chi relieve pressures through deep breaths and meditation, which lower the level of renin and hence lower the blood pressure. Take deep breaths for 5 minutes every morning and evening. The key is to take a deep breath and breathe out slowly along with the stresses.

9. Decrease the workload. Working over 41 hours a week can cause the probability of high blood pressure increase 15%. Relieve the workload for the health. Make a healthy dinner or go to gym after work. These are helpful options.

10. Listen to music for relaxation. There is a research indicating that listening to relaxing music for 30 minutes along with deep breathes, blood pressure can go down for 3.2% after a week, and 4.4% after a month.

Hand Acupressure/Reflexology for high blood pressure



High blood pressure means the blood flow in our body doesn’t go well because of certain resistance, and cause the heart to pump harder and give higher pressure to keep the blood flowing. The causes of high blood pressure vary. Most of the time is caused by other health problems, but overweight and inappropriate diet can also be catalysts of high blood pressure.

High blood pressure can cause some self aware symptoms like headache, shoulder stiffness, tinnitus, palpitation etc. But the most scary one would be arteriosclerosis caused by high blood pressure. It’s because when blood pressure is high, the arteries of the whole body will have to share the extra pressure evenly, some blood vessels get weaker and may cause stroke or myocardial infarction (MI)

Treatment of high blood pressure is usually taking medicine to control the pressure. But we can’t ignore the side effects of these medicines. So acupuncture and acupressure on acupoints would probably be a more natural treatment. There are 3 acupoints on the back and the side of the hands. The first one is called “Yang Xi”, which locates on the inner side of the wrist under the root of thumb, where the concave area is. The second one is called “He Gu” on the back of the hand in between the thumb and the index finger, locates at about the length of the first segment of the thumb counting inward. The third one is called “Luo Ling Wu” on the back of the hand in between the knuckles of index finger and middle finger. Most high blood pressure patient can feel the little pulse at those acupoints, so it’s not too difficult to find them. (See diagrams)

Here is the guide to stimulate those acupoints using finger massaging or rubbing, if problem is serious, use a bunch of 10 toothpicks or pointy device to stimulate:

1. Maximum blood pressure > 160mm reading on the meter: stimulate the first one “Yang Xi”

2. Maximum blood pressure > 180mm reading on the meter: stimulate the second one “He Gu”

3. Maximum blood pressure > 200mm reading on the meter: stimulate the third one “Luo Ling Wu”



I talked about acupoints for treating high blood pressure. Now lets talk about reflexive area that you can massage to help control high blood pressure.

When you wake up in the morning and totally feel energetic about the busy work; in the next event you totally feel like a brand new person with a loud, confident voice and never feel tired; and then you think, “I feel really healthy and strong now.” If you’re really confident about it, you may really be the type that is young and healthy. However, another cause of this sudden “energetic” manner can be high blood pressure. Because a lot of high blood pressure patients or “potential” patients are quite energetic and even a little “hyper” with activities.

Many think that high blood pressure is a disease that mostly occurs in middle age group. Although it’s partly true, but many young people may have that as well, especially the genetic ones. Usually when we were young, the blood vessels are more soft and flexible that can take more impacts with change of blood pressure. But if we’re over confident with our health, that may become a problem. Because working over time, alcohol, smoking, stay up too late, too much salt intake….for a period of time – will easily cause high blood pressure.

May be we can start massaging our hands everyday to start adjusting our body condition. High blood pressure is not a quick thing to cure no matter in eastern or western medicine. So, patience and continuation of hand reflexology is a helpful thing to do.

The reflexive areas treating high blood pressure are mostly on the thumbs. The palm side and the back side of the thumbs belong to “head reflexive area”, “neck reflexive area” and “bronchus reflexive area”. (See diagram)



Clip on the thumbs from the side of them to stimulate the area, keep twisting and waving the wrists at the same time. That may help lower the blood pressure. Massage the thumb tips every day whenever possible such as on the way to work. If blood pressure is already quite high, taking breaths in mind with the same tempo of the massage will make it more effective.

If we meet a person who got sudden rise of blood pressure, ask him or her to sit down and rub the wrist tendon on the little finger side with the direction from arm to hand. This should help lower the blood pressure immediately. And since that may cause a little temporary low blood pressure, that’s why the patient need to sit down first.