Sunday, April 28, 2013

गूगल आपके बारे में आपकी मां से भी ज्यादा जानता है।



इंटरनेट पर आपकी निजता में इस तरह के कई सेंध लग रहे हैं। आप इंटरनेट पर क्या कर रहे हैं, यह तो पता लगा ही लिया जाता है, आप कहां हैं- यह भी पकड़ में आ रहा है। और तो और, आपके मन को भी पढ़ने की कोशिश की जा रही है। जाहिर है कि मसला केवल अपने निजीताके पब्लिक होने के खतरे का ही नहीं हैं। खतरा तब और भी ज्यादा है जब आपके इस निजी का मतलब वो लोग अपनी मर्जी से निकालें जिनकी निगाहों से सब गुजर रहा है। आप लाख सोचते रहें कि आपके फेसबुक और ट्विटर अकाउंट आपकी असीमित दुनिया हैं जो आपको अपने लिए स्पेस व आजादी का अहसास देती है, लेकिन यह सारी आजादी वहीं तक सीमित है, जब तक कोई उसपर अपनी कुदृष्टि न डाल दे।
खुल्लम-खुल्ला जासूसी
इंटरनेट की यह दुनिया अपरंपार है और इस पर लगी निगाहें भी न जानें कितनी हैं। इंटरनेट पर आपका हर कदम आपके खाते में हिसाब की तरह दर्ज हो रहा है। आपको इस हिसाब के बारे में कुछ पता नहीं, लेकिन आपका हिसाब कइयों को पता है। जाहिर है, निजता की यही लूट इंटरनेट जगत में इन दिनों उथल-पुथल मचाए हुए है। खास तौर पर इंटरनेट जगत के सबसे बड़े खोजी जासूस गूगल की नई प्राइवेसी नीतियों की वजह से भी हो रही हैं।
अगर आपकी ईमेल को दफ्तर का कोई साथी, पड़ोसी और यहाँ तक कि आपके घर का कोई सदस्य भी आपकी पीठ पीछे पढ़ रहा हो तो यह साइबर क्राइम माना जाएगा। पुलिस और सीबीआई को भी अगर किसी का टेलीफोन टेप करना है तो उसे केंद्र या राज्य सरकार की इजाजत लेनी पड़ती है। लेकिन यहाँ गूगल हमारी निजी जानकारियों पर नजर रखने और उन्हें सहेजने के लिए आज़ाद है। वजह है उसकी प्राइवेसी पॉलिसी, जिसे हम जीमेल और दूसरी गूगल सेवाओं के सदस्य बनते समय आम तौर पर बिना पढ़े ही मंजूर कर लेते हैं। कानूनी तौर पर गूगल सुरक्षित है लेकिन नैतिक तौर पर?ताज्जुब होता है न.
कुछ महीनों से जीमेल, ब्लॉगर वगैरह के यूज़र्स को ऐसी विंडोज दिखाई जा रही थीं, जिनमें उनका टेलीफोन नंबर मांगा जा रहा था। बहुतों ने दे भी दिया, हालाँकि उसी पेज पर छोटा सा लिंक इसे अनदेखा करते हुए आगे बढ़ने का भी था जो ज्यादातर लोगों की नजर में नहीं आया। शायद आपको अंदाजा लगा हो कि जानकारी कितनी स्पेसीफिक है।

आपको भी फर्क पड़ेगा


जिन लोगों का कामकाज, दायरा और इंटरनेट सर्फिंग बहुत सीमित है, उन्हें शायद बहुत फर्क़ न पड़े। अगर आप एक आदर्श इंसान हैं, जिसने कभी कोई गलत काम नहीं किया और जिसका सब कुछ ठीकठाक है, उसे भी अपनी सूचनाओं के लीक हो जाने की शायद ज्यादा चिंता न हो। लेकिन दुनिया में सब लोग आदर्श नहीं हैं। सबके पास छिपाने को कुछ न कुछ है।

जो दिन का अच्छा खासा हिस्सा इंटरनेट पर खर्च करते हैं, सोशियल नेटवर्किंग से लेकर ईमेल तक जिनके लिए सिटी ट्रांसपोर्ट से कहीं ज्यादा अहम हैं, जिनके कारोबार में इंटरनेट सर्च की भूमिका है या जो गूगल के एंड्रोइड अएपरेटिंग सिस्टम से युक्त स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं, उन्हें इससे खासा फर्क़ पड़ सकता है। वही क्यों, गूगल टॉक, चैट, जीमेल, यू-ट्यूब, गूगल प्लस, मैप्स और ऐसी ही ढेरों दूसरी सेवाओं पर लॉगिन करने वाले बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी के पास खोने के लिए एक अदद प्राइवेसी है। अएनलाइन संदेश लेने-देने वाले प्रेमियों से लेकर अपनी बीमारियों के बारे में विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करने वालों और गूगल कैलेंडर के जरिए अपने शिड्यूल्स का हिसाब-किताब रखने वालों से लेकर ब्लॉगों में टिप्पणियाँ करने वालों तक के पास चिंतित होने की कई वजहें हैं।

आपकी आपत्तिजनक बेनामी टिप्पणी का सोर्स भले ही ब्लॉग चलाने वाले को पता न चले लेकिन याद रखिए, गूगल को पता है। आपकी बीमारी के बारे में भले ही घरवालों तक को पता न हो, मगर.. गूगल सब कुछ जानता है। आपको अचानक कितना आर्थिक लाभ हुआ जिसे आपने बड़े जतन से सेपरेट अकाउंट में रखा हुआ है, यह तथ्य भले ही आपके घरवाले न जानें लेकिन बहुत संभव है कि गूगल उसे जानता हो। शायद आपने अपने किसी ईमेल संदेश में किसी से इसका जिक्र किया हो। आपने किसी बड़े लेनदेन पर टैक्स बचा लिया है या फिर जाने-अनजाने में किसी गलत इंसान से संपर्क कर बैठे हैं या फिर क्रेडिट कार्ड डिफॉल्ट करके किसी दूसरे शहर में आ बैठे हैं तो कम से कम गूगल से दूर रहिए। अगर आपके पास एंड्रोइड बेस्ड फोन है तो फिर टेलीफोन कॉल्स का ब्यौरा भी जोड़ लीजिए। आपने किसे, कब, कितनी देर तक फोन किया, आपके फोन का ब्रांड, टेलीफोन सर्विस वगैरह सबकी जानकारी गूगल तक पहुंचेगी।

आपकी वह जानकारी संयोग या कुयोग से कब किसी गलत हाथ में पड़ जाए, कौन जाने? बहुत से लोग हैं जिनकी दिलचस्पी ऐसी जानकारी में होगी। मार्केटिंग करने वाले, प्रतिद्वंद्वी कारोबारी समूह और यहाँ तक कि अपराधी भी। सरकार को तो संदेहास्पद जानकारी मुहैया कराना ईमेल कंपनियों की की कानूनी बाध्यता है ही। और चलिए य्ो सूचनाएं अगर किसी और के पास न भी पहुँचें तो क्या गूगल को आपका जुड़ा निजी डेटा अपने पास सहेजकर रखने का हक है? वह भी बरसों बरस? कौन जाने कुछ साल बाद वह इस जानकारी का किसी और ढंग से इस्तेमाल करने का फैसला कर ले, जिसका आज हमें अनुमान भी नहीं है?

अगर आप सोचते हैं कि आप इस अएप्शन को सक्रिय ही नहीं करेंगे तो यह संभव नहीं है। इस ब्रह्मास्त्र में बचाव का विकल्प यूज़र को नहीं दिया जा रहा। अगर आप गूगल की किसी भी सेवा का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आपको इसे मानना ही होगा। अगर नहीं मानना चाहते तो बस एक ही विकल्प है और वह है गूगल से पूरी तरह अलग हो जाना।


 
गूगल की बिजनेस
इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन के केविन बैंकस्टन ने कुछ दिनों पहले कहा था कि गूगल आपके बारे में आपकी मां से भी ज्यादा जानता है। गूगल की साठ से ज्यादा साइट हैं। इनमें से किसी भी साइट पर अगर आप अपने बारे में कोई भी जानकारी, फोटो वगैरह डालें तो नई नीतियों के अनुसार उस सारी जानकारी का इस्तेमाल गूगल समूह की सारी साइट अपने हिसाब से कर सकती हैं, अपने धंधे व मुनाफे के लिए कर सकती है। गूगल की हर किस्म की इन साठ साइटों के पास किसी व्यक्ति के बारे में कितनी जानकारी जमा हो जाती है, उसका अंदाजा बैंकस्टन के इस कथन से भी लगाया जा सकता है- गूगल चाहता है कि आप उसपर इतना भरोसा करें कि अपने दिमाग का मानो प्रिंटआउट ही उसे सौंप दें।
गूगल पर दबाव है अपने विज्ञापनों को ज्यादा असरदार और प्रोफिटेबल बनाए, जिसके लिए जरूरी है कि हर यूज़र को उसकी जरूरतों तथा पसंद-नापसंद के लिहाज से विज्ञापन दिखाए जाएँ ताकि वह उन्हें क्लिक करे और गूगल की आमदनी बढ़े। आपके बारे में जितना ज्यादा डेटा उसके पास होगा, उसकी विज्ञापन प्रणाली उतने ही बेहतर नतीजे देगी। दूसरा दबाव है अपनी सर्विसेज को और बेहतर बनाने का ताकि उससे जुड़ने वाले यूज़र्स की संख्या बढ़ती रहे। अब यह बात अलग है कि गूगल का ताजा फैसला उल्टा भी पड़ सकता है क्योंकि प्राइवेसी को अहमियत देने वाले बहुत से यूज़र गूगल से अलग होने का फैसला कर सकते हैं। माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक मौके का फायदा उठाने में जुट भी गए हैं। वे अपनी-अपनी सेवाओं को ज्यादा सुरक्षित बताते हुए प्रचार अभियान चला रहे हैं।
खुला है हर खत
प्राइवेसी का मसला वहा ज्यादा खड़ा होता है जहा आपकी वह बात बेपरदा हो जाती है जो आप मानकर चलते हैं कि केवल उसे पता है, जिसे आप बता रहे हैं। ईमेल भी उन्हीं में से एक है। अब वो निजी नही रहे. कोइ आशचर्य नही की किसी मित्र के साथ अपने धन संकट की बात की और आपके पास बेंको के एसएमएस या फोन आने लगे। इतना ही नहीं, आजकल प्रेम संबंधों में जासूसी के लिए ईमेल स्क्रीनिंग व हैकिंग का खासा इस्तेमाल किया जाने लगा है। लोगों को अपने इस ऑनलाइन प्राइवेट स्पेस को लेकर खतरा लगने लगा है।
जिन खोजा तिन पाइया
मैंने कुछ दिन पहले एक ट्विट किया जिसमें किसी राजनीतिक घटना पर मन को तकलीफ होने की बात कही थी। पलक झपकते मेरे पास दूर देशों से उन लोगों के जवाब आने लगे जिनसे मेरा दूर-दूर का कोई वास्ता न था, यह सुझाते हुए कि मैं सिरदर्द व कमरदर्द की तकलीफ कम करने के लिए क्या कर सकता हूं। यह कोई मजाक नहीं, इंटरनेट मार्केटिंग का सच है। ट्विटर व फेसबुक पर इस तरह की मार्केटिंग आसान है क्योंकि यहा आप जो लिख रहे हैं वो कोई भी ढूंढ सकता है।
सब दर्ज है सर्वर में
यह तो अब आम जानकारी है कि इस ऑनलाइन जगत में इंटरनेट कनेक्शन वाले हर कंप्यूटर का अपना एक अलग पता होता है जो उसकी विशिष्ट पहचान होती है। उस पते की मदद से उस कंप्यूटर को आसानी से खोजा जा सकता है। लेकिन यह तो बात हुई केवल कनेक्शन की। वेब तकनीक में लगातार हो रही उन्नति ने आपकी इस पहचान को इससे कहीं ज्यादा उजागर कर दिया है। आप कौन हैं, किस जगह से हैं, किस उम्र के हैं, क्या करते हैं, कितना कमाते हैं, क्या शौक रखते हैं, क्या पसंद करते हैं, क्या खाते हैं, कहा घूमते हैं, आपके दोस्त कौन हैं और आप किन से दोस्ती करना चाहते हैं- कुछ भी ऐसा नहीं जो आपके बारे में पता न हो।
मजे की बात यह है कि आपके बारे में यह सब आपके जाने बगैर पता चल जा रहा है। आप जीमेल पर लॉग इन होने के बाद गूगल पर कुछ भी सर्च करें तो उसे गूगल के सर्वर दर्ज कर लेंगे। गूगल के नेट ब्राउजर क्रोम पर तो यह भी आपके खाते में दर्ज हो जाएगा कि आप कौन-कौन सी साइट देख रहे हैं। इंटरनेट की दुनिया के अंतर्संबंध आपके बारे में सब कुछ उजागर कर देते हैं। बात स्क्रीनिंग से भी आगे बढ़ चुकी है।

दो बानगी देखिए-
1. दो साल पहले एमआईटी के एक क्लासरूम प्रोजेक्ट में कार्टर जर्निगन और बेहराम मिस्त्री ने छात्रों के चार हजार फेसबुक प्रोफाइल का अध्ययन करके 78 फीसदी मामलों में यह सही-सही पता लगा लिया कि उक्त प्रोफाइल किसी समलैंगिक पुरुष का है।
2. स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अरविंद नारायण और टेक्सास यूनिवर्सिटी के विताली श्मातिकोव ने ट्विटर व फोटो शेयरिंग साइट फ्लिकर के कई अकाउंट की छानबीन करके तीस फीसदी मामलों में उनके धारकों की सही पहचान कर ली जबकि उनके पास उन अकाउंट की पहचान वाली कोई चीज, जैसे कि नाम या ईमेल आईडी वगैरह नहीं थे।
हम रास्ते चलते किसी अनजान को अपना पता और अपने बारे में सारी जानकारी नहीं दे देते लेकिन इंटरनेट व नेटवर्किग साइट्स पर तो हम सारी जानकारी अनजान लोगों के देखने या इस्तेमाल करने के लिए डाल देते हैं। हर चीज- हमने क्या खाया, कहा गए, कौन सी फिल्म देखी, कैसी लगी, वगैरह-वगैरह। कंप्यूटर वैज्ञानिक कहते हैं कि खुद को बया करने की यह फितरत आज के दौर में ऐसी हो गई है कि इस सारी जानकारी को इकट्ठा करके व्यक्ति के बारे में सारी जानकारी आसानी से हासिल की जा सकती है। इस तकनीक ने व्यक्ति की पहचान के पारंपरिक पैमानों को बेकार बना दिया है। अमेरिका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ताओं ने कुछ समय पहले कहा था कि वे 1989 से 2003 के बीच अमेरिका में पैदा हुए लोगों में से 8.5 फीसदी यानी पचास लाख लोगों के नौ अंकों के सामाजिक सुरक्षा नंबर को बिलकुल सही अनुमान लगा सकते हैं। कल्पना कीजिए कि अमेरिका में लोगों की पहचान का यह सबसे बड़ा जरिया है, जिसे हासिल करने के लिए फर्जी लोग हर मुमकिन कोशिश करते रहते हैं।

सर्वज्ञ है गूगल

जानें कि गूगल क्या-क्या जानता है आपके बारे में:
1. अपने सर्च इंजन के जरिये आप क्या खोज रहे हैं?
2. आप किन वेब पन्नों पर जाते हैं?
3. आप किन ब्लॉग्स को पढ़ते हैं?
4. गूगल एडसेंस या चेकआउट के जरिये आपकी वित्ताय स्थिति।
5. आपकी वेबसाइट या ब्लॉग की लोकप्रियता।
6. जीमेल का इस्तेमाल करने वालों के मामले में वे किसे और क्या ईमेल कर रहे हैं?
7. आपके पूरे कंप्यूटर में क्या-क्या है, अगर आप गूगल डेस्कटॉप का इस्तेमाल कर रहे हैं?
8. जो गूगल डॉक या स्प्रेडशीट का इस्तेमाल करते हैं, उनके मामले में उनके रिसर्च पेपर, बिल या आगामी ब्लॉग पोस्ट तक।
9. गूगल कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं तो आपका पूरा कार्यक्रम।
10. आपका सोशल नेटवर्क और रुचिया।
11. गूगल लैटिट्यूड व गूगल मैप इस्तेमाल करने वालों के मामले में यह कि वे या उनके दोस्त ठीक कहा पर हैं?
12. आप यू ट्यूब पर क्या देख रहे हैं?
13. गूगल बुक्स और स्कूल व यूनिवर्सिटी सर्च के जरिए आप क्या पढ़ रहे हैं?
14. अगर आप गूगल क्रोम का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इंटरनेट पर आपकी हर गतिविधि।
15. गूगल आनसर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपकी हर समस्या।
16. गूगल हेल्थ का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपका पूरा मेडिकल इतिहास।
17. गूगल मैप्स, एडसेंस व चेकआउट का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपके घर का पता।
18. गूगल मोबाइल या जीमेल के जरिये आपका मोबाइल नंबर।
19. गूगल टॉक का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपकी आवाज कैसी है?
20. फोटो एडिटर पिकासा का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह कि आप, आपके घर वाले और दोस्त कैसे दिखते हैं?
21. गूगल अलर्ट के जरिये यह कि आपके लिए क्या जरूरी है?
22. एडवर्ड्स पर कीवर्ड व खरीद के व्यवहार के जरिये यह कि आपका धंधा क्या है?
23. प्रोडक्ट्स सर्च व कैटालॉग सर्च के जरिये यह कि आपने क्या-क्या खरीदा है और क्या खरीदने वाले हैं?

  सवाल उठता है कि यूज़र क्या करे? गूगल की कई सेवाएँ इतनी अच्छी हैं कि उनसे पूरी तरह हाथ झाड़ लेना संभव नहीं है। लेकिन जिसे आप अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त समझते थे वह सरे-बाजार आपकी ही बोली लगाए दे रहा है! आखिर करें तो क्या करें? कहते हैं कि दुनिया में कोई चीज़ मुफ्त नहीं मिलती। सबकी कोई न कोई कीमत है। गूगल के मामले में वह कीमत है आपकी प्राइवेसी। फैसला आपको ही करना है कि क्या आप यह कीमत अदा करने के लिए तैयार हैं?

Saturday, April 20, 2013

इमानदारी का सर्टीफिकेट


होनहार और  इमानदार नेता जी कह रहे थे की किसी के किसी के सर्टीफिकेट से फरक नही पडता , सबको अपना अपना काम इमानदारी से करना चाहिये. मेरा मानो तो  बहुत फर्क पडता हैजब आंदोलन का केंद्र बिंदु व्यक्ति आधारित हो तो बहुत फर्क पडता है. इससे से भी फर्क पदता है की इमानदारी का सर्टीफिकेट आप किस से ले रहे है और इमानदार आप किस के प्रति है. एक बात ओर बुराइ ताकतवर है क्योंकी वो अकसर एकजुट होती है. और अच्छाइ कमजोर क्योंकी वो अकसर बिखरी हुई होती है . वेसे भी जो खुद आसानी से बिखर जाता हो वो केसे लोगो को एकजुट कर पायेगा . हमारी इसी कमजोरी ने FDI के लिये रास्ता साफ किया . FDI के विरोधी उसके चंद समर्थकों से कही ज्यादा थे...पर वो हार गये. 51% हिस्सेदारी का लोग मतलब ही नही समझ पाये अब इस देश मे असली कटपुतली सरकारों के दर्शन होंगे. आगे स्थति और भंयकर होने वाली है. आगे आने वाला समय अब गुलाम सरकारों का है. यह देश 65 सालों से गरीबी मिटाओ का नारा देता रहा....अब नारा होगा गरीब मिटाओ...ओह क्या इसके लिये उन्हे किसी नारे की भी जरूरत होगी...FDI का दुनिया भर मे यही कुचक्र है.