Sunday, February 21, 2016

मंथन है

मंथन है, सच और झूठ के महासागर का.
रस्सी है,  जिज्ञासा उसकी.
 एक सिरे पर हैउसके विश्वास और श्रद्धा
दूसरी तरफ है ज्ञान और विज्ञान.
मथनी है चिंतन, 
मथना है महासागर को
निकल सके अमृत. जो है सच और झूठ
से परे परमसत्य
अमृत ना भी मिले. पर मिलेगा
नये विचारों के अनमोल रत्नों से भरे 
जाने अनजाने दोस्त
साथ ही मिलेगा जहर, जो बनेगा 
अंधश्रद्धा , डर और लालच के झकझोरने से
पी जायेगे वो जहर , हम सब शिव बनकर

No comments:

Post a Comment