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Tuesday, July 1, 2025

AI के साथ मंथन : लोकतंत्र सिर्फ एक सभ्य तानाशाही है

 

AI (artificial intelligence )के साथ मंथन 

लोकतंत्र का काला सच  

लोकतंत्र सिर्फ एक सभ्य तानाशाही है 


क्या वोट डालना सच में आजादी का काम है या बस एक दिखावटी आजादी है जो असल में आपकी चुपचाप गुलामी को इजाजत देती है। असल मे जिस सिस्टम को हम इंसानी सभ्यता की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानते हैं वो असल में सिर्फ आज्ञाकारिता है लेकिन अच्छे दिखावे के साथ। इस बात को समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ना पड़ेगा


दशकों से लोकतंत्र पर जो भरोसा था वह अब भ्रम में बदल गया है। जो लोग, वोट की ताकत से दुनिया बदलने का विश्वास रखते थे, उन्होंने अब सोचना शुरू दिया है कि क्या आम लोग सच में समझदारी से राजनीतिक फैसले ले सकते हैं। केसे कोई नेता झूठे चुनावी वादों के भ्रम और धुरवीकरन के सहारे जनता को भ्रमित कर जीत पर जीत हासिल कर सकता हैं । सालों साल सत्ता पर काबिज रह सकता है। दुनिया को खत्म होने की हद तक ले जा सकता है।


यह टूटन गहरी है, लेकिन नई नहीं थी, लगभग 2000 साल पहले प्लेटो ने इसे आते हुए देख लिया था जब उनके गुरु सुकरात को एक लोकतांत्रिक सभा ने मौत की सजा दी तो प्लेटो को न्याय नहीं दिखा उन्हें बहुसंख्यक शासन का खतरा दिखा।


उनका निष्कर्ष डरावना था की लोकतंत्र अत्याचार को खत्म नहीं करता बस वह उसे छुपा देता है आज की मनोविज्ञान की रिसर्च प्लेटो की चेतावनियों को और भी गहरा बना देती है 1950 के दशक में मनोवैज्ञानिक सोलमन ऐश ने दिखाया कि लोग अपने साफ नजरिए को भी छोड़ देते हैं अगर एक पूरा ग्रुप उनसे असहमत हो 75% लोगों ने साफ गलती को सही मान लिया सिर्फ इसलिए ताकि वे अकेले ना पड़े जाए।


अगर हम खुद पर इतना भरोसा नहीं कर सकते तो हम लाखों अनजान लोगों से कैसे उम्मीद करें कि वे अच्छे नेता चुनेंगे पर बात यहीं नहीं रुकती, वैज्ञानिकों ने जब राजनीतिक समर्थकों को उन्हें उनके पसंदीदा नेता की गलतियां दिखाई गई,  तो दिमाग का सोचने वाला हिस्सा शांत रहा लेकिन भावनाओं से जुड़ा हिस्सा तेजी से सक्रिय हो गया उनका दिमाग ना सिर्फ सच्चाई को नकार रहा था बल्कि खुद को इसके लिए इनाम भी दे रहा था लोकतंत्र इन मानसिक कमजोरियों की वजह से ही फलता फूलता है। 


लोकतंत्र की असली चतुराई  इस बात में नहीं है कि वह सत्ता कैसे बांटता है बल्कि इसमें है कि वह असली सत्ता को कैसे छुपाता है खुले तानाशाहों की तुलना में जहां पुलिस सेंसरशिप और हिंसा होती है लोकतंत्र नरम लगता है इंसानी लगता है न्यायपूर्ण लगता है और यही वह धोखा है जिसे प्लेटो ने सबसे बड़ा खतरा बताया था। 


सबसे असरदार नियंत्रण वही होता है जो महसूस ही नहीं होता वो लगता है जैसे यह आपकी अपनी पसंद हो आधुनिक लोकतंत्र गुस्से और असहमति को कुछ रस्मी कामों में बदल देता है जेसे अहिंसक विरोध प्रदर्शन, चुनाव याचिकाएं, यह सब आपको भावनात्मक राहत देते हैं लेकिन सिस्टम नहीं बदलते। 


आपको लगता है, कि आपकी आवाज सुनी गई, आपको लगता है कि आप शामिल हैं। लेकिन असली ढांचा जैसा का तैसा रहता है, आपको लगता है कि आप सिस्टम से लड़ रहे हैं जब आप किसी नेता को वोट से हटा देते हैं लेकिन हकीकत में आप उसी सिस्टम को और मजबूत कर रहे होते हैं जो आपके विकल्पों को सीमित करता है। प्लेटो ने चेताया था अगर आप राजनीति में हिस्सा नहीं लेते तो आप ऐसे लोगों द्वारा शासित होते हैं जो आपसे कम समझदार हैं। 


लेकिन लोकतंत्र एक कदम आगे चला गया वो आपको यकीन दिलाता है कि आप ही ने उन कमजोर नेताओं को चुना था कि यह सब, आपकी अपनी पसंद थी और आपकी पसंद का नेता या पार्टी गलत केसे हो सकती है, यह भ्रम नशे जैसा है, लोकतंत्र मन को बहलाता है यह वादा करता है कि आप शासन करेंगे, मिलकर फैसले लेंगे समझदारी से चर्चा करेंगे लेकिन इंसानी दिमाग इतनी जटिलता के लिए बना ही नहीं है। 


हमें चाहिए सादगी, यकीन और भावनात्मक साफगोई और यहीं से लोकतंत्र खुद को खोने लगता है। प्लेटो ने इस क्रम को पहले ही देख लिया था लोकतंत्र बहुत ज्यादा विकल्प देता है बहुत ज्यादा जानकारी बहुत सारे फैसले इससे दिमाग उलझ जाता है और जब इंसान उलझन में होता है तो उसे सच्चाई नहीं साफ-साफ जवाब चाहिए होते हैं।  यहीं से मैदान में आता है,  जननेता- एक ऐसा व्यक्ति, जो सब कुछ आसान बना देता है जो आपको बता देता है कि दोष किसका है। जो कहता है आप मत सोचिए,  मैं सोचूंगा। 


न्यूरो साइंस भी यही कहता है जब हमारा दिमाग ज्यादा जानकारी और अनिश्चितता से भर जाता है तो सोचने समझने की शक्ति धीमी पड़ जाती है तब भावनाएं हावी हो जाती हैं हम सोचने की जगह बस प्रतिक्रिया देने लगते हैं और जो भी हमें इस मानसिक थकावट से राहत देता है वे उस ओर खींच जाते हैं। 


वेनेजुएला इसका ताजा उदाहरण है ह्यूगो चावेज ने सत्ता, तख्ता पलट से नहीं ली उसे बहुमत से चुना गया था। उसने लोगों से वादा किया कि वह सारी जटिलताओं का हल निकालेगा उसने भावनात्मक राहत दी, और जब तक जनता को समझ आया कि उन्होंने क्या खो दिया है।  तब तक वह मानसिक रूप से इतना जुड़ चुके थे कि पीछे लौटना लगभग नामुमकिन हो गया। दुनिया भर में यही पैटर्न दोहराया जा रहा है लोकतंत्र को कोई बंदूक की नोक पर खत्म नहीं कर रहा है लोग खुद उसे वोट से खत्म कर रहे हैं। 


यह ऐसे नेताओं को जन्म देता है जो चुनाव जीतने में माहिर हों , ना कि शासन चलाने में। चुनाव जीतने वाले गुण हैं आत्मविश्वास, आसान भाषा, भावनात्मक जुड़ाव लेकिन अच्छा शासक बनने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है वो है ,  गहराई , संतुलन और जटिल समझ, वो इन नेताओ मे अक्सर इनसे उलट होती है। 

 

प्लेटो ने इसे एक जहाज की कल्पना से समझाया था। सोचिए एक जहाज पर सवार लोग तय करें कि उसे कौन चलाएगा। असली नाविक जो सितारों और नक्शों की मदद से दिशा समझता है, पर  उसे खुद भी अपनी बात में थोड़ा संकोच होता है क्योंकि सच्चाई हमेशा सीधी नहीं होती।  वहीं एक चालाक तेजतर्रार शख्स कहता है, सब कुछ आसान होगा रास्ता भी आसान और शराब भी फ्री।


सोचिए लोग किसे चुनेंगे और वह जहाज कहां जाएगा!


हम ब्रेन सर्जरी पर वोट नहीं करते, पुल कैसे बने इस पर वोट नहीं करते, वहां हम विशेषज्ञों की बात मानते हैं लेकिन राजनीति में आत्मविश्वास ज्ञान और विशेषज्ञता से जीत जाता है क्यों?


क्योंकि असली विशेषज्ञ कभी पक्के शब्दों में बात नहीं करते वह कहते हैं, यह निर्भर करता है, वह हर चीज को कई पहलुओं से देखते हैं लेकिन हमारा दिमाग इस अस्पष्टता को पसंद नहीं करता।  हम सीधा स्पष्ट जवाब चाहते हैं, और इसी वजह से हम असली नाविक को नजरअंदाज करके उस जहाज को डुबोने वालों को चुन लेते हैं। 


यह कोई सिस्टम की गलती नहीं है यही सिस्टम है। 


अब यह और भी चालाक हो चुका है प्लेटो ने कभी डिजिटल युग की कल्पना नहीं की थी लेकिन उनकी गुफा की कथा जहां लोग अंधेरे में दीवार पर पड़ती परछाइयों को सच्चाई समझते हैं आज की सच्चाई से बिल्कुल मेल खाती है,  आज भी हम परछाइयां ही देख रहे हैं फर्क बस इतना है कि अब यह परछाइयां आपके लिए बनाई गई हैं आपका सोशल मीडिया फीड, जो सिर्फ जानकारी नहीं दे रहा वो आपकी सोच को गढ़ रहा है। 


एल्गोरििदम सीख रहे हैं कि आप किससे डरते हैं, आप क्या चाहते हैं, आपकी कमजोरियां क्या हैं और फिर वह आपको वही दिखाते हैं जो आप देखना चाहते हैं। इसका नतीजा हर इंसान के लिए एक अलग सच्चाई,  पक्के यकीन के साथ बनी झूठी दुनिया। आपको लगता है कि आप पहले से ज्यादा जागरूक हैं जबकि असल में आप पहले से ज्यादा चालाकी से कंट्रोल किए जा रहे हैं। अब AI  चालित सूचना तंत्र , लोगों के मनोविज्ञान को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीख चुकी है। 


जो लोग चिंतित थे उन्हें डरावनी बातें दिखाई जाती है,  जो गर्व से भरे थे उन्हें तारीफें दी,  जो अकेले थे, उन्हें किसी ग्रुप का हिस्सा महसूस कराया गया। यह कोई आम प्रचार नहीं था यह बहुत ही निजी स्तर पर किया गया मानसिक नियंत्रण होता है और यह बखूबी काम कर रहा है।


नतीजा, ऐसा राजनीतिक बंटवारा जो पीढ़ियों से नहीं देखा गया था हर पक्ष को लगता है कि वही समझदार है, वही सही है, और दूसरा पक्ष पागल है,  गुमराह है,  लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों पक्ष एक जैसे तथ्य भी नहीं देख रहे।  वे दो अलग-अलग दुनियाओं में जी रहे हैं और सबसे डरावनी बात आप अब भी सोचते हैं कि आप इस सबसे अलग हैं। 


अब फैक्ट चेकिंग लोगों की सोच नहीं बदलती और बहसें प्रायोजित होती हैं। जब आप किसी के बनाए गए निजी नजरिए को चुनौती देते हैं। तो उनका दिमाग खुद ब खुद रक्षा करने लगता है साइकोलॉजिस्ट इसे बैक फायर इफेक्ट कहते हैं। जितना ज्यादा आप किसी को सही बातें दिखाते हैं पर अगर वो उसकी मोजूदा सोच से मेल नहीं खाती , तो वह अपनी पुरानी सोच में और गहराई से जड़ पकड़ लेता है।  


प्लेटो ने भी यह बात पहले ही समझ ली थी उन्होंने कहा था वे उससे नफरत करेंगे जो उन्हें सच्चाई बताएगा आज के लोकतंत्र में सच्चाई को बैन नहीं किया जाता उसे दबा दिया जाता है, शोर, ध्यान , भटकाने वाली चीजें और सोशल मीडिया की असहजता के नीचे उसे आसानी से दबा दिया जाता है। कोई अप्रिय सच बोलिए और देखिए आपकी पहुंच कैसे धीरे-धीरे गायब हो जाती है। 


वजह सरकार नहीं रोकती एल्गोरिद्म रोक देता है अब जरा वाइमर रिपब्लिक को देखिए वहां लोकतंत्र था चुनाव होते थे बोलने की आजादी थी अखबार खुले थे लेकिन जैसे ही संकट आया वहां के लोगों ने लोकतंत्र नहीं बचाया तानाशाही को चुना। 


क्यों? 


उन्होंने अत्याचार को पसंद नहीं किया था,  बल्कि आजादी बहुत भारी लगने लगी थी जब जीवन में अराजकता आ जाती है तो इंसानी दिमाग साफ-साफ आदेश ढूंढता है आसान जवाब चाहता है कोई आवाज जो कहे मैं संभाल लूंगा।

 

हिटलर ने सत्ता छीनी नहीं थी उसे चुना गया था क्योंकि उसने लोगों को जटिलता से भावनात्मक राहत दी यह कोई बीती हुई कहानी नहीं है यह एक आईना है।  जैसे रोम में हुआ था,  जब गणराज्य कमजोर हुआ,  नेताओं ने यह सीखा कि भीड़ को लुभाना तमाशा दिखाना सच्चे शासन से ज्यादा असरदार होता है इसलिए खेल कानूनों की जगह लेने लगे। 


जूलियस सीजर ने लोकतंत्र को तबाह नहीं किया उसने बस लोगों को वहीं दिया जो वह मांग रहे थे और उसी ने उस सिस्टम को मार डाला जिसने वह सब मुमकिन बनाया था आज के पॉपुलिस्ट नेता भी वही स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं हर चीज का वादा करो किसी ना किसी पर  दोष डालो,  तमाशा पेश करो और धीरे-धीरे सत्ता का शिकंजा कसते जाओ। 


हर राजनीतिक सिस्टम कुछ मिथकों पर चलता है फर्क सिर्फ इतना है कि वह मिथक जानबूझकर स्थिरता के लिए गढ़े गए हैं या बिना सोचे समझे हमारे अंदर भरे गए हैं ताकि हम कभी सवाल ना पूछे। 


लोकतंत्र के भी कुछ बहुत ताकतवर मिथक हैं जेसे हर एक आवाज बराबर मायने रखती है, चुनाव से भविष्य तय होता है, नेता जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन जब यह विश्वास हकीकत से टकराते हैं तो दिमाग में कॉग्निटिव डिसोनेंस यानी मानसिक तनाव पैदा होता है।  लोग इन मिथकों को छोड़ते नहीं वह किसी पर दोष मड़ना शुरू कर देते हैं।  जेसे गलती पार्टी की है, गलती मीडिया की है। सिस्टम टूटा नहीं है हमें बस इसे और अच्छे से करना होगा और यही चक्र चलता रहता है।


उधर असली सत्ता धीरे-धीरे हाथ से फिसल चुकी होती है चुने हुए नेता सिर्फ संस्कृति और पहचान की बहसों में उलझे रहते हैं जबकि असली फैसले अनचुने संस्थानों द्वारा लिए जाते हैं जैसे सेंट्रल बैंक, रेगुलेटरी एजेंसियां जेसे RBI, IT, और अंतरराष्ट्रीय संगठन जेसे IMF,WHO,WTO ।


यही है लोकतंत्र का पैराडॉक्स जो राजनीति दिखती है वह और ज्यादा शोर मचाती है और ज्यादा बंटी हुई होती है जबकि असली  शासन चुपचाप दूर कहीं पीछे चलता रहता है। जहां आपकी कोई पहुंच नहीं और आप फिर भी वोट डालते रहते हैं ना कि इसीलिए कि इससे कुछ बदलता है बल्कि इसीलिए कि आपको लगता है शायद इस बार कुछ बदलेगा।


यही इस सिस्टम की चालाकी है वह आपको यकीन दिलाता है कि आपकी गुलामी ही आपकी आजादी है कि आज्ञा पालन ही आत्मनिर्णय है कि इस बार कहानी कुछ अलग होगी प्लेटो पूरी तरह सही नहीं थे लेकिन वह पूरी तरह गलत भी नहीं थे। 


लोकतंत्र से तानाशाही की ओर गिरना जरूरी नहीं है, वह रास्ता हमेशा खुला रहता है लोकतंत्र मे मानसिक अपील नकारा नहीं जा सकती लेकिन जैसा कि प्लेटो ने चेतावनी दी थी।  इसकी कमजोरियां सिर्फ सिद्धांत नहीं है वह इंसानी स्वभाव में छुपी होती हैं अगर हम यह कड़वी सच्चाई मान भी लें कि लोकतंत्र आजादी के नाम पर एक सूक्ष्म नियंत्रण का जरिया बन गया है तो एक बड़ा सवाल सामने आता है फिर विकल्प क्या है।

 

प्लेटो ने दर्शन शास्त्री राजा का विचार रखा था ऐसे नेता जिन्हें लोकप्रियता के लिए नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता और चरित्र के लिए चुना जाए लेकिन इस आदर्श के साथ भी मुश्किलें हैं कौन तय करेगा कि कौन बुद्धिमान है कैसे सुनिश्चित करें कि सत्ता उन्हें भ्रष्ट ना कर दे कैसे रोके कि वह आम लोगों की जिंदगी से कट ना जाए,  प्लेटो खुद इन सवालों को समझते थे उनका दर्शन एक राजनीतिक योजना नहीं था बल्कि एक दर्पण था जो हमें दिखाता है कि हम सत्ता और शासन के साथ कैसा संबंध रखते हैं उनका उद्देश्य यह था कि हम खुद से पूछें कैसे इंसान हमें बनना होगा। 


ताकि कोई भी सिस्टम हमारे भले के लिए काम कर सके तो अब जब हम यह असहज सच्चाई जान गए हैं कि लोकतंत्र असल में हमें मानसिक आराम देता है ना कि असली शक्ति।


तो हम क्या करें?


प्लेटो का जवाब था राजनीति से भागो नहीं बल्कि जागो। गुफा की कथा में वह दार्शनिक जो परछाइयों से बाहर निकलकर सच्चाई की रोशनी देखता है वह वहीं नहीं रुकता वह लौटता है गुफा में,  दोबारा जाता है सिस्टम की सेवा के लिए नहीं बल्कि इस जिम्मेदारी के साथ कि जो सच्चाई उसने देखी है उसे दूसरों तक पहुंचाए भले ही लोग उसका विरोध करें उसका मजाक उड़ाएं या हमला करें फिर भी वह कोशिश करता है यही हमारी भी जिम्मेदारी है। 

 

हम एक अधूरे सिस्टम का हिस्सा बने लेकिन खुली आंखों से,  बंद आंखों से नहीं।  हमें वोट देना है,  बोलना है,  कदम उठाना है,  लेकिन इस समझ के साथ कि हमारे व्यवहार को कैसे आकार दिया जाता है। 


हमें अब लोकतंत्र से वह उम्मीदें छोड़नी होंगी, जो कभी उसमें थी ही नहीं-  कि यह सबसे न्यायपूर्ण होगा कि यह हमेशा समझदार नेताओं को चुनेगा या कि हर वोट  बुद्धिमानी से डाले जाते हैं इस सच को जानना है तो, विधान सभा और लोक सभा के जन प्रतिनिधियों पर नजर डालिये जिसे जनता ने लाखो वोटो से जिताकर भेजा है , इनमे से अधिकाँश या तो क्रिमिनल बैकग्राउंड से है या फिर एकमात्र गुण अपने आकाओ की जी हुजूरी है. 543 की लोकसभा में मात्र 40 -50 ही सारग्रभित बहस करते नजर आते है , बाकी का क्या ?


राजनीतक संगठन खुद कितने लोकतांत्रिक और पारदर्शी है। उन्होंने जीतने के लिए जो पैसा खर्च किया, उसका हिसाब कभी उन्होंने उस जनता को दिया? अगर नहीं तो फिर कैसा और किस लोकतंत्र की बात कर रहे है। आज देश में लोकतंत्र को चलाने के लिए शराब-माफिया , भू-माफिया, मेडिकल माफिया, टेक्सचोर पूजीपति, कमीशनएजेंट और ठेकेदारों बड़ी भूमिका है, राजनैतिक दलों को ये भरपूर मदद करते है और उससे मनचाहा लाभ लेते है, आम जनता तो भीड़ है और नेता भीड़ से खेलना जानता है


लोकतंत्र को हमें वैसा देखना सीखना होगा जैसा वह वास्तव में है एक ऐसा ढांचा जो सामूहिक मनोविज्ञान को संभालने के लिए बना है ना कि उससे ऊपर उठने के लिए। लोकतंत्र जनता की चेतना को ऊपर पर नहीं उठाते बल्कि उसकी भावना को भड़काते है। भावनात्मक भाषण कैसे आपके फैसले पर हावी हो जाते हैं। तब आप जान जाते हैं कि आपकी राजनीतिक सोच कहीं ना कहीं कबीलाई पहचान से बन रही है।


जब आप देख लेते हैं कि विरोध को भी कैसे सिस्टम चुपचाप निगल लेता है तो आप सोच सकते हैं,  कि असली बदलाव की रणनीति क्या हो सकती है।  आप अब भी वोट डाल सकते हैं आवाज उठा सकते हैं, हिस्सा बन सकते हैं।  लेकिन इस भ्रम के बिना कि सिर्फ यही सब कुछ बदल देगा। 


यह विमुख होने की बात नहीं है यह परिपक्वता की बात है जैसे, लोकतंत्र भी अपने नागरिकों की मानसिकता का आईना है अगर यह सच है तो हमें एक और कड़वी सच्चाई का सामना करना होगा हमारा राजनीतिक तंत्र इसलिए टूटा हुआ नहीं है क्योंकि लोग बुरे हैं बल्कि इसलिए क्योंकि यह हमारे मानसिक सीमाओं की असहजता से बचने की प्रवृत्ति और सच की जगह आसान जवाब पसंद करने की आदत को दिखाता है। 


हम जागरूक दिखना  चाहते हैं बिना गहराई से सीखे, हम आजादी चाहते हैं बिना जिम्मेदारी उठाए हम नैतिक स्पष्टता चाहते हैं। 


लोकतंत्र हमें एक एहसास देता है जैसे हम सब कुछ नियंत्रित कर रहे हो यह हमें यह भरोसा दिलाता है कि हमारे फैसले समझदारी से भरे हैं हमारे नेता जवाबदेह हैं और हमारी आवाज में ताकत है यह हमें नियंत्रण का मंच देता है जबकि असली फैसले वहां लिए जाते हैं जहां हमारी नजर नहीं पहुंचती इस सच्चाई को समझना मायूसी नहीं है बल्कि यही असली आजादी की शुरुआत है जब आप लोकतंत्र से ज्यादा की उम्मीद करना छोड़ देते हैं तभी आप इसका सही इस्तेमाल करना सीखते हैं। 


आप इसे समझदारी से नेविगेट कर सकते हैं आप पहचान सकते हैं कब आपको भ्रमित किया जा रहा है।  आप सवाल उठा सकते हैं जब जटिल बातों को जानबूझकर आसान दिखाया जा रहा हो आप बोल सकते हैं भले ही आपकी बात से कुछ ना बदले क्योंकि जागरूक होकर बोली गई बात का मूल्य सिर्फ असर में नहीं , आत्मा में होता है। 


आज वही ताकतें जिन्होंने जर्मनी के बीमार गणराज्य को तोड़ा, वेनेजुएला की लोकतांत्रिक संस्थाओं को गिराया और दुनिया के कई देशों में आजादी को मिटाया वही ताकतें आज आपके देश में भी सक्रिय हैं आपकी सोच को एल्गोरिद्म ढाल रहे हैं भावनात्मक थकान आपके विवेक को  कमजोर कर रही है।  करिश्माई नेता उभर रहे हैं जो आपको राहत दे रहे हैं,  पर सच छिपा कर ।


लोग इन सबको हां कह रहे हैं, नफरत से नहीं थकावट से , वे थक गए हैं,  सोचने से थक गए हैं,  चुनाव करने से थक गए हैं,  जिम्मेदारी उठाने से,  और यही वह पल है जिससे प्लेटो डरते थे। 


सवाल यह नहीं है कि क्या लोकतंत्र एक सभ्य तानाशाही बन रहा है सवाल यह है कि क्या आप अब भी सोए रहेंगे या जागेंगे यह लड़ाई निराशा और उम्मीद के बीच नहीं है।  यह चुनाव है बेहोशी और जागरूकता के बीच।  2000 साल पहले प्लेटो ने देखा था कैसे एथेंस के लोग सोक्रेटीज की आवाज दबा देते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि वह  उन्हें असहज कर देता था। 


उन्होंने देखा कि जब लोग सच्चाई से ज्यादा दिलासा चाहते हैं तो तानाशाही टालना मुश्किल हो जाती है। गुफा आज भी है अब वह डिजिटल बन गई है और उसमें दिखने वाली परछाइयां अब ऐसे एल्गोरिदम बना रहे हैं जो आपकी पसंद के हिसाब से आपको सच का भ्रम दिखाते हैं। लेकिन काम अब भी वही है पीछे मुड़ो इन झूठी तस्वीरों पर सवाल उठाओ उस रोशनी की तरफ बढ़ो चाहे वो चुभती हो, क्योंकि परछाइयां सुंदर हैं पर वह असली नहीं है और सिर्फ सच्चाई ही आजाद कर सकती है।  प्लेटो की सीख यह नहीं थी कि राजनीति से भागो बल्कि यह थी राजनीति में दिमाग खोलकर  प्रवेश करो। 


जिस लोकतंत्र पर सवाल ना उठाया जाए वह बचाने लायक नहीं और जो नागरिक खुद पर सवाल ना उठाए वह सच में आजाद नहीं, क्योंकिआजादी कभी आराम नहीं देती वह हमेशा यह मांग करती है कि हम वह भी देखें जिसे देखने से डरते हैं और फिर कुछ करें यह चुनाव अब भी तुम्हारा है। 


 

दुर्वेश 


Thursday, March 21, 2024

मंथन : बाबा बाजार

 

कल अश्टावक्र गीता के बारे में यू-ट्यूब लेक्चर सुना. बोलने वाले ने उसे भगवद गीता से अच्छा बताया. मुझे भी लगा की सच मे उसकी बात मे दम है. बिना लाग लपेट के उसके व्यख्यान मे जीवन के कुछ सिद्धांतों की चर्चा थी. उसने बताया की इसमे कृष्ण का मायावी जाल नही है. एक तरह से सच्च भी है, किसे अपने लिये, दया, ममता, करूणा खराब लग सकती है. कोन अपने लिये क्रोध, हत्या, लालच, डर चाहेगा. उनके व्यख्यान मे हर दूसरे वाक्य पर बजती तालियां.

हाथ जोडे हजारों श्रधालुओं को अपने प्रवचन से मोहित करता उसका रोबदार चेहरा. उसकी अपनी ही विद्यता पर मोहित  मुस्कराती आंखे.   साफ लगता था इस समय वो किसी  भी तरह अपने को किसी भगवान से कम नही समझ रहा. उसकी सुरक्षा और सेवा मे तेनात सेकडों लोग. उचे सिंहासन पर बैठा वो सब भक्तो के लिए सारे संसारिक सुख का प्रतीक बना हुआ था.

हजारों भक्त जो उसका प्रवचन सुन रहे थे उन भक्तों के लिये इश्वरीय ज्ञान और उसकी कृपा का मतलब क्या है. उनके लिये इश्वरीय कृपा का मतलब शरारीक, मानसिक, और भावनात्मक सुख की प्रकाष्ठा है. उसकी कृपा से वो घटनाओं का अपनी मर्जी से नियंत्रण कर सके. उसकी कृपा से वो अपना और दूसरों का भविष्य और भूत जान सके. एसी असिमित ताकत जिस से वो अपनी और अपने हिसाब से दूसरों की नियती तय कर सके.

वो कर सके जो उनके आस पास का जन मानस ना कर सकता हो. हजारों करोडों लोग उनके नाम की माला जपे. हाथ जोडे उनकी दया पर निर्भर. वो जब तक चाहे इस संसार मे जीवित रहकर सारे सुख भोग सके. मुझे नही लगता एसे लोगों को कोइ भी गीता मदद कर पायेगी. भक्तों का तो पता नही पर प्रवचन देने वाले और उसके विशेष कृपा पात्रों के वारे न्यारे हो रहे है.

आज धर्म का मतलब रितीरिवाज और पहनावे को मान लिया गया है लोग उसके प्रतीक चिन्हों को पकडे हुये है. सच तो यह है की कुछ लोगों के लिये यह बहुत ही फायदेमंद धंधा है, फिर चाहे वो कोई  भी धर्म हो. सभी धर्म का जन्म इंसानियत को बनाये रखने के लिये हुआ था पर .इतिहास गवाह है की इसने ही सबसे ज्यादा इंसानियत को नुकसान पहुचाया है.

अगर आप सरल ह्र्दय है. आप इंसान को इंसान समझते है. लालच और डर को काबू मे रख पा रहे है तो फिर आप धर्म के रास्ते पर है. इससे कोइ फर्क नही पडता की आप किस धर्म को मानना चाहते है. हां अगर आप को उससे राजनितिक फायदा उठाना है तो फिर यह जरूरी हो जाता है की आप रितीरिवाज और पहनावे और धार्मिक चोंचलों पर ध्यान दे और उसका दिखावा भी करे. शक्ति प्रदर्शन करे दूसरे को नीचा देखाये. लोगों की भावनाओं को भडकाये और उनके जजबातों से खेले. उन्हे बताये की धर्म खतरे मे है .

सरल धब्दों मे तो किसी को बबकूफ ही बनाया जा सकता है....अगर सागर मे से मोती को चुनना है तो उसमे डूबना ही होगा. इतना कष्ट तो उठाना ही पडेगा. एक बात ओर जब तक दूसरो का धर्म को नही समझोगे तब तक तुम्हे अपना धर्म भी समझ नही आयेगा. यह तो यात्रा है ..सरल और कठिन की फिक्र छोडकर जितना जल्दी यात्रा  शुरू करोगे अच्छा रहेगा.   

दुर्वेश

Thursday, July 7, 2022

नमक ---एक स्वादिष्ट जहर

 हम लंबे समय से नमक उपयोग कर रहे हैं, अधिकांश  संस्कृतियों में इसे पवित्र माना जाता है। सिर्फ इसलिए कि इसका  उपयोग संस्कृतियों द्वारा लंबे समय से किया गया है या पवित्र है इसका मतलब, यह जरूरी नही की नमक महान पदार्थ  है। नमक हमारे लिए घातक जहरीला  नशा है या फिर पवित्र जीवन दायक पदार्थ इसे थोड़ा गहराई से समझते है ।

अब आप सोच कर देखे की हमने अनाज खाना कब शुरू किया और अपना भोजन कब से पकाने लगे?

ज्ञात मानव काल का 1% से भी कम समय जब हमने अपना भोजन पकाना शुरू किया. सच तो यह है की मानव इतिहास ने 99% काल पूरे ताजा पके हुये फल या फिर हुए कच्चे खाद्य पदार्थ खा कर गुजारा हैं, वास्तव में उन्हें खाने के लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं थी! प्रकृति से मौसम के अनुसार जब तक बहुतायत खाने को मिलता रहा तो, हमे उसे आवास में स्टोर या संरक्षित करने की भी आवश्यकता नही थी। हम उसे सीधे खाते रहे और जीवन चलाते रहे. वेसे ही जेसे बंदर और लंगूर करते है।

हम लगातार एसी जगहों की खोज मे रहते जंहा मौसम हमारे अनुकूल हो और प्रयाप्त भोजन इसलिये हम घुमंतु कहलाये. समय गुजरने के साथ आग मे हमारे पूर्वजों ने मांस और स्टार्च को पकाना सीखा। इन्सानो ने जब से अन्न उगाना और जानवरो को पालना सीखा तो  भोजन के लिये स्टार्च और मीट बेहतर विकल्प साबित हुआ, नमक के इस्तेमाल से ये ओर स्वादिष्ट भी हो गया.  

नमक सोडियम क्लोराइड या टेबल नमक का सामान्य नाम है इसे " जीवन का मसाला " कहा जाता है, जब हम नमक के गुणों, प्रभावों और संभावित लाभों को देखते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इसने हमारे इतिहास में इतनी बड़ी भूमिका क्यों निभाई। "समुद्री नमक" की कई किस्मों से लेकर "सेंधा नमक" तक सभी अलग-अलग चरित्र और रंग के नमक का उपयोग स्वाद को बड़ाने, अचार बनाने, या सुखाकर संरक्षित करने के लिए किया गया है!

आज हम अपने स्वास्थ्य में सुधार के लिए नमक का सेवन कम करने की आवश्यकता के बारे में बहुत कुछ सुनते हैं, विशेष रूप से "नमक के प्रति संवेदनशील" लोगों में उच्च रक्तचाप को कम करने के लिए। लेकिन जैसे-जैसे अधिक से अधिक लोग इस विचार को स्वीकार करना शुरू करते हैं कि बहुत अधिक नमक अस्वास्थ्यकर है, स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच भी यह धारणा बनी रहती है कि मानव शरीर को स्वास्थ्य के लिए कुछ दैनिक नमक की आवश्यकता होती है।यह विश्वास झूठा और खतरनाक है, इसे हम इस थोड़ा विस्तार से समझते है।

यद्यपि मानव शरीर को सूक्ष्म पोषक तत्व के रूप में सोडियम की आवश्यकता होती है, लेकिन इसमें सोडियम क्लोराइड की कोई आवश्यकता नहीं होती है। बिना नमक वाले कई पत्तेदार भोजन में प्राकृतिक रूप से पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है,

नमक एक पोषक तत्व नहीं है - यह एक ऐसा पदार्थ  है जो हमारा शरीर जितनी भी आवश्यकता होती है उसे हमारी पाचन क्रिया मे जब सोडियम बाइकार्बोनेट हाइड्रोक्लोरिक एसिड के अवशेषों के साथ प्रतिक्रिया करता है जिसके परिणामस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड गैस और नमक सोडियम क्लोराइड के रूप में स्वत: ही  बनता है। इसकी अधिक मात्रा ,शरीर मे जहर की तरह काम करती है! हमारे नमक की खपत का लगभग 200% सोडियम क्लोराइड निर्माताओं द्वारा हमारे टेबल तक पहुंचने से पहले ही हमारे प्रोसेसड फूड में मिला दिया जाता है।

एसी कई रसायन है जिनमें सोडियम भी होता है, जैसे सोडियम फ्लोरोएसेटेट (चूहे का जहर), सोडियम हाइड्रॉक्साइड (लाइ), और सोडियम हाइपोक्लोराइट (ब्लीच)। सौभाग्य से, हम अपने शरीर को आवश्यक सोडियम प्रदान करने के लिए इन जहरों के साथ अपने भोजन को छिड़कने की आदत नहीं रखते हैं। सोडियम क्लोराइड यानी नमक भी कुछ एसा ही है, दुर्भाग्य से, हम सोडियम क्लोराइड के साथ एक अपवाद बनाते हैं। पर यह भी शरीर के लिए विषैला होता है, लेकिन भोजन को संरक्षित करने के लिए सदियों से इस का प्रयोग होने के कारण हम इसके उपयोग के आदी हो गए हैं।

विभिन्न जैविक कार्यों को करने के लिए शरीर को सोडियम आयनों और क्लोराइड आयनों की निरंतर आपूर्ति की आवश्यकता होती है, इसलिए जलीय सोडियम क्लोराइड जिसमें दोनों प्रकार के आयन होते हैं, उस मांग को पूरा करने के लिए उपयुक्त लगता है। लेकिन एक समस्या है। शरीर में जैव रासायनिक कार्य और स्थान जिनके लिए सकारात्मक सोडियम आयनों की आवश्यकता होती है, उन कार्यों और स्थानों से अलग होते हैं जिनमें नकारात्मक क्लोराइड आयनों की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए, शरीर में मुक्त सोडियम आयनों के सबसे महत्वपूर्ण उपयोगों में से एक तंत्रिका तंत्र में होता है। नकारात्मक पोटेशियम आयनों के साथ सकारात्मक सोडियम आयनों की कोशिका झिल्ली के बीच आदान-प्रदान से क्रिया पूरे तंत्रिका तंत्र में विद्युत प्रवाह भेजती है। आहार में प्राप्त मुक्त सोडियम आयनों और अन्य आयनिक इलेक्ट्रोलाइट्स की पर्याप्त मात्रा के बिना, यह जैव रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं हो सकती है, और शरीर कार्य नहीं कर सकता है।

दुर्भाग्य से, जहां कहीं भी सोडियम आयन जलीय सोडियम क्लोराइड में जाते हैं, क्लोराइड आयन सही साथ चलने के लिए आकर्षित होते हैं। यदि आपके पास एक कप नमक का पानी है, तो आप पानी के केवल एक हिस्से को सोडियम आयनों या केवल क्लोराइड आयनों वाले हिस्से को नहीं डाल सकते हैं। आवेशित आयन कभी भी द्रव में आपस में नहीं टकराते हैं, लेकिन जलीय घोल में समान रूप से वितरित करके अपना विद्युत संतुलन बनाए रखते हैं। इस प्रकार, सोडियम क्लोराइड की जलीय अवस्था में धनात्मक और ऋणात्मक आयन उसी रासायनिक अनुपात में परस्पर जुड़े रहते हैं जैसे वे क्रिस्टलीकृत अवस्था में होते हैं।

खारे पानी में सोडियम क्लोराइड भी नमक के क्रिस्टल में सोडियम क्लोराइड के समान स्वाद बरकरार रखता है। केवल इलेक्ट्रोलिसिस जैसे औद्योगिक तरीके जलीय सोडियम क्लोराइड से क्लोराइड आयनों को बेअसर और हटा सकते हैं, जो खारे पानी (नमकीन) के माध्यम से विद्युत प्रवाह चलाने पर क्लोरीन गैस पैदा करता है।

शरीर द्वारा ग्रहण किया गया सभी सोडियम क्लोराइड या तो पहले से ही जलीय अवस्था में होता है या शरीर के तरल पदार्थों में जल्दी से जलीय अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन शरीर में जहां भी सोडियम आयनों की जरूरत होती है, जैसे कि तंत्रिका तंत्र में विपरीत रूप से चार्ज किए गए क्लोराइड आयनों से बचने के लिए शरीर कैसे प्रबंधन करेगा?

शरीर अंतर्ग्रहण जलीय सोडियम क्लोराइड से क्लोराइड आयनों को कैसे बेअसर और हटा सकता है, जैसा कि इलेक्ट्रोलिसिस में होता है जो जहरीली क्लोरीन गैस भी छोड़ता है? शरीर यह नहीं कर सकता! और यह बताता है कि क्यों अंतर्ग्रहण सोडियम क्लोराइड पोषक तत्व के रूप में शरीर के लिए बेकार है।

प्राकृतिक भोजन के विपरीत, सोडियम क्लोराइड शरीर को कोई भी मुक्त सोडियम आयन प्रदान नहीं कर सकता है, चाहे वह पानी में कितना भी घुल जाए क्योंकि सोडियम आयन जलीय अवस्था में क्लोराइड आयनों से इलेक्ट्रोस्टैटिक रूप से जुड़े रहते हैं।  

अन्य सभी दवाओं की तरह, सोडियम क्लोराइड के उपयोग के प्रतिकूल प्रभाव चिकित्सा पुस्तकों में सूचीबद्ध हैं। शरीर द्वारा सोडियम क्लोराइड की अवधारण और उत्सर्जन गुर्दे और अन्य अंगों पर एक बड़ा दबाव डालता है, ऊतक को नुकसान पहुंचाता है और रक्तचाप बढ़ाता है क्योंकि शरीर नमक को पतला करने के लिए बाह्य ऊतक में पानी रखता है।

क्रोनिक दिल की विफलता अक्सर हृदय के बाएं वेंट्रिकल का परिणाम होता है जो सोडियम सेवन से रक्त प्लाज्मा की मात्रा में वृद्धि के कारण धमनियों में उच्च रक्तचाप के प्रतिरोध के खिलाफ मजबूर हो जाता है। यह संभावना है कि नमक का सेवन करने वाले युवा लोगों में धमनी लोच उच्च रक्तचाप को रोकने में मदद करती है क्योंकि उनकी धमनियां अतिरिक्त प्लाज्मा मात्रा की भरपाई के लिए फैल जाती हैं। हालांकि, उम्र के साथ धमनियां लोच खो देती हैं, नमक के सेवन से प्लाज्मा की मात्रा बढ़ने से रक्तचाप बढ़ जाता है। INTERSALT अध्ययन के अनुसार, ब्राजील की यानोमामी जनजाति नमक का सेवन नहीं करती है, और उनका रक्तचाप औसत केवल 95/61 mmHg है, जो उम्र के साथ नहीं बढ़ता है।

सोडियम क्लोराइड, जिसका उपयोग ठंडे देशो मे सड़कों से बर्फ को पिघलाने के लिए भी किया जाता है, अत्यधिक परेशान करने वाला और नाजुक मानव ऊतक के लिए जहरीला होता है जैसा कि आंख में या घाव में नमक मिलने पर देखा जाता है। यह बताता है कि शरीर नमक को पानी से पतला करके ऊतक को नुकसान से बचाने की कोशिश क्यों करता है।

यह समझना कि सोडियम क्लोराइड एक पोषक तत्व के बजाय एक दवा है या एक हानिरहित स्वाद बढ़ाने वाला और खाद्य परिरक्षक है, इस खतरनाक जहर को अस्वीकार करने के लिए जनता की जागरूकता बढ़ाने में एक समस्या पैदा करता है ।

जिस रासायनिक रूप में हम सोडियम और अन्य आवश्यक तत्वों का अंतर्ग्रहण करते हैं, वह उस तत्व की जैवउपलब्धता और स्वास्थ्य के निर्माण और रखरखाव के लिए महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, हमें सांस लेने के लिए अपने फेफड़ों में ऑक्सीजन लेने की जरूरत है, और पानी में ऑक्सीजन है, लेकिन अगर हम ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए अपने फेफड़ों को पानी से भरने का प्रयास करते हैं तो हम डूब जाएंगे।

इसी तरह, हमें स्वस्थ रहने के लिए अपने आहार में प्राकृतिक सोडियम और प्राकृतिक क्लोराइड को शामिल करने की आवश्यकता है, लेकिन अगर हम इन्हें सोडियम क्लोराइड की आपूर्ति करने का प्रयास करते हैं, तो हम केवल अपने शरीर को जहर देते हैं, जबकि उपयोग करने योग्य सोडियम और क्लोराइड की हमारी पोषण संबंधी आवश्यकता अधूरी रह जाती है। इन तत्वों की आपूर्ति के लिए प्राकृतिक, अनसाल्टेड खाद्य पदार्थ हमारे सर्वोत्तम स्रोत हैं।

 अंत में, कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है कि सोडियम क्लोराइड को खत्म करने से उसमें मिला हुआ आयोडीन भी निकल जाता है जो कि स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। सच तो यही है की जरूरी आयोडीन उन्हीं प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है, जैसे कि गहरे हरे पत्तेदार सब्जियां, जो सोडियम, कैल्शियम और अन्य तत्वों के प्राकृतिक स्रोतों की आपूर्ति करती हैं।

"विल्जलमार स्टीफ़नसन ने एस्किमो को बहुत स्वस्थ पाया, फिर भी इनमें से कोई भी व्यक्ति कभी भी नमक का उपयोग नहीं करता है। वास्तव में स्टीफेंसन हमें बताता है कि वे इसे बहुत नापसंद करते हैं। साइबेरियाई मूल निवासियों के पास नमक का कोई उपयोग नहीं है। अफ्रीका में अधिकांश नीग्रो इस "जीवन की अनिवार्यता" को सुने बिना ही जीते और मरते हैं। यूरोप में लंबे समय तक नमक इतना महंगा था कि केवल अमीर ही इसे इस्तेमाल कर सकते थे।

"बार्थोलोम्यू ने आंतरिक चीनी को स्वस्थ पाया और कहा कि वे नमक का उपयोग नहीं करते हैं। बेडौंस नमक के उपयोग को हास्यास्पद मानते हैं। नेपाल के उच्च भूमि वाले नमक को मना करते हैं, जैसा कि काम्सचटडेल्स करते हैं। मध्य अफ्रीका के लाखों मूल निवासियों ने कभी नमक का स्वाद नहीं चखा है। दक्षिण पश्चिम अफ्रीका के दारमास "किसी भी तरह से नमक कभी नहीं लेते।"

थोरो के जंगल में अपने जीवन के खाते में, वह नमक को "किराने का सबसे बड़ा" के रूप में संदर्भित करता है और हमें बताता है कि उसने इसका उपयोग बंद कर दिया और पाया कि उसके बाद कोई दुष्प्रभाव नहीं होने पर उसे कम प्यास लगी थी।

 

खनिजों के लिए नमक !! यह अक्सर लोगों को समुद्री नमक खाने के लिए मनाने के लिए किया जाने वाला आह्वान होता है। एक उच्च नमक/सोडियम आहार के ज्ञात खतरों के बावजूद, समुद्री नमक की सूक्ष्म खनिज सामग्री को इसे खाने के लिए वास्तव में एक अच्छे कारण के रूप में प्रेरित किया जाता है अन्यथा विषाक्त उत्तेजक। मुझे यह अजीब लगता है कि हम खनिजों की एक छोटी मात्रा प्राप्त करने के लिए एक ज्ञात जहर खाएंगे जब पूरी तरह से स्वस्थ खाद्य पदार्थों में वे खनिज होते हैं जिनकी हमें प्रचुर मात्रा में आवश्यकता होती है! कुछ और साग चबाएं खनिज सामग्री भोजन खाने का आनंद लें !!!

सभी प्रकार के समुद्री और सेंधा नमक में पाए जाने वाले अकार्बनिक खनिज कभी जीवित नहीं थे, वे कार्बन के बिना आते हैं और कोशिकाओं में जीवन नहीं ला सकते हैं। शरीर इन धातुओं को विषाक्त पदार्थों की तरह व्यवहार करता है जिन्हें जीवन शक्ति और सेलुलर स्वास्थ्य की कीमत पर समाप्त किया जाना चाहिए। सहसंयोजक बंध एक साथ कसकर बंधे होते हैं और इस प्रकार उन्हें आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता है, इस कारण वे जोड़ों और ऊतकों में जमा हो सकते हैं यदि उन्हें समाप्त नहीं किया जाता है।

प्रकृति में मौजूद अकार्बनिक खनिज मिट्टी और पानी में पाए जाते हैं, दूसरी ओर कार्बनिक खनिज पौधों और जानवरों में पाए जाते हैं। केवल पौधे (बैक्ट्रिया की मदद से) अकार्बनिक खनिजों को कार्बनिक खनिजों में बदल सकते हैं। चूंकि अकार्बनिक खनिज अनुपयोगी होते हैं और हानिकारक जंतुओं को अपने जैविक खनिज प्राप्त करने के लिए पौधों या पौधे खाने वाले जंतुओं को खाना चाहिए।

इसका एक उदाहरण आर्सेनिक है। रासायनिक, धातु या अकार्बनिक अवस्था में आर्सेनिक एक घातक जहर हो सकता है, हालांकि, जब ताजा अजवाइन और शतावरी में कार्बनिक रूप में पाया जाता है तो यह स्वास्थ्यवर्धक होता है।

रॉक मिनरल्स वास्तव में पौधों के लिए स्वास्थ्यप्रद हैं, जो कि स्वास्थ्यप्रद पौधों और उनके फलों के बढ़ने और निर्माण में है! मैं रॉक डस्ट के उपयोग को प्रोत्साहित करूंगा और इस तरह एक महान खनिज समृद्ध उद्यान के लिए एक विकल्प के रूप में इसे इस्तेमाल करूगा !


दुर्वेश

मंथन- सच की आवाज बनिए

 कुछ दिन पहले वाहटस एप पर एक मेसेज मिला ...की सच को चीखने की जरूरत नही होती, सच सनातन है, सच की जीत होती है इत्यादी-इत्यादी...  सच क्या है यह केसे समझ मे आयेगा, क्योंकी यह जरूरी नहीं की आप का सच  किसी दूसरे का भी सच हो. यह तो किसी घटना को देखने का अपना  अपना नजरिया है. अब जंहागीपुरी के दंगे को ही देखो.  सबका अपना अपना सच होगा. अब आप ही बताइये आप के हिसाब से क्या सच है ?

जनाब जो चीख चीख कर बोलेगा उसे ही तो सुना जाएगा। अगर आप अपने  सच को आवाज नहीं दोगे तो, दूसरा जो चीख चीख कर बोल रहा है और उसे साबित करने के लिए उसके पास संख्याबल है, तो दुनिया उसे हे सच मानेगी, इसे ही लोकतंत्र कहते है .

एक और उदाहरण, बैंक से उधार लें सत्ता के करीबी एक ग़रीब ने एयर पोर्ट ख़रीदा और फ़िर महान सरकार ने उस गरीब का बैंक कर्ज  को माफ़ करा दिया। ! अब आप करते रहिए सच और झूठ का पोस्टमार्टम।


करोना को ही लिजिये। करोना का सच क्या है। मेरा सच यह है की एक साधारण से जुकाम को करोना का नाम दे दिया। हर होने वाले मौत को करोना मौत बताने का इंतिज़ाम किया और डर दिखाकर, धमकाकर पूरे देश का लोक डाउन करा डाला..?

कुछ लोगो का यही सच है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतने चुतियापे के बाद वो कैसे सरकार में बने रहते। यानी इस बारे मे मेरा सच सब लोगो का सच नहीं है। उनका सच बो है जो मीडिया और सरकार ने  बताया।

अब तो लोग मुझे भी सुनाने लगे हैं की सारा विश्व जिस की चपेट  में था वो तुम्हें दिखाई नहीं देता क्या। हज़ारो मौत तुम्हें दिखी नहीं। तुम्हारे अपने मरते तो तुम्हें पता चलता ...एसा ही और ना जाने क्या-क्या सुनने को मिला। अब उन्हे केसे बताउ की … उन्हे वो नहीं दिख रहा जो मुझे दिखाई दे रहा है। 


जो लीग लाशों को उठा रहे थे, मरीजो की दिन रात सेवा कर रहे थे , जो दिन रात एम्बूलेस की सेवा दे रहे थे,  मेरीजो को ले जाते हुये उनकी सेवा करते कराते हुये वो उनके सबसे नजदीक होते थे , उन्हे छू रहे थे उन्हे सहारा दे रहे थे , उन्हे तो कब का इसका शिकार होकर स्वर्ग सिधार जाना चाहिये था।  अरे! उनके अपनों  ने  भी उन्हे छूने तक से परहेज कर लिया था, तब भी ये लोग उनकी सेवा कर रहे थे। कोई मुझे बताएगा की एसे लोग जो  दिन रात मरीजो की सेवा करा रहे थे उनमे से कितनों की मौत हुई ...क्योकी जिस तरह से इस बीमारी का डर दिखाया गया था उस हिसाब से उनमे से किसी को भी नही बचना चाहिए था।

 

सच तो यह है की कुछ लोगो के लिए यह मौका है, पैसा कमाने का, सत्ता हासिल करने का. एसे दरिंदो से अगर बचना है और अपने वजूद को बचाना है तो अपनी आवाज बुलंद करिए  .. सच और झूठ का फैसला आने वाले कल पर छोड़िए.  

सत्ता को हासील करने और उसे बनाए रहने के लिए वो एसी एसी क्र्रूरतम हिंसा को कर गुजरते है जिसे हम और आप सोच भी नही सकते,  पर वो हमसे अहिंसक विरोध की चाह रखते है।  और उसे भी हमे नही करने देना चाहते। वो अहिंसक  विरोध को भी पुलिस और सेना के उपयोग से दबा देना चाहते है।  


दुर्वेश


Sunday, June 5, 2022

विश्व पर्यावरण दिवस 2022


 



हर वर्ष की तरह इस बार भी विश्व पर्यावरण पर सरकारे और पर्यावरणविद चिंता जाहीर करेगे और घड़ियाली आँसू बहाएगे , कुछ  पेड़ लगाते मुस्कराते चेहरों के साथ फोटो शेयर करेगे, फिर अपनी दुनिया मे लोटकर वही करने लगेगे जिसे ना करने का प्रण उन्होने इस दिन लिया होगा।  

गूगल से पता लगा की  विश्व मे हम इन्सानो की आबादी 750 करोड़ पार कर गई है......जय हो , अगर सब इसी तरह चलता रहा तो अगले कुछ दशक मे हम शायद 1000  करोड़ के मार्क को पार कर जाएगे ( शायद इसलिए कहा क्योंकी इसकी भी पूरी संभावना है की हम मात्र 200-से 300 करोड़ ही रह जाये).

ज्ञात इतिहास मे इतनी आबादी पहले कभी नही थी। जन्म दर  घटने के बाबाजूद आबादी बढ़ती जा रही है। हर गुजरते वर्ष के साथ आबादी का नया किर्तीमान। यह अप्रत्याशित बढ़ौती म्रत्युदर मे आई कमी के कारण है।

7500 मिलियन की इंसान की आबादी से लदा यह ग्रह बहुत तेजी से बदल रहा है, इस बदलाव में हम इंसानो का बहुत बडा हाथ है. जंगल के कटने से और प्राकृतिक स्रोतो का अत्यधिक दोहन, शहरों का कंकरीट जंगल, जल के प्रकरितिक स्रोतो की बरबादी.  हमारा ग्रह अब पहले जेसा नहीं रहा हम इन्सानों ने इसे बदल दिया है. 

पर क्या सिर्फ हम! 

हम ही नहीं ब्रह्मांड की और भी बहुत सी ताकते इस ग्रह को बदलती रहती है, सच तो यह है की हम इसे बदले या ना बदले इसे तो समय के साथ बदलना ही था, पर हम इन्सानो ने बदलाव बहुत तेजी से किया जो बदलाव हजारो सालो मे नही हुआ विज्ञान और टेक्नोलोजी की मदद से कुछ सदियो मे हो गया. इसलिये अब अगर हमे जीना है, तो हमे भी उतनी तेजी से बदलना होगा. 


जंगल खत्म हो रहे है यह भी सच है की हमने अपने रहने के लिये और खाने के लिये इन्हे बुरी तरह बरबाद किया...अगर हम यह नहीं करते तो क्या करते...7500 मिलियन लोगो को खाने और रहने के लिये यह सब शायद जरूरी था. पर  यह पूरा सच नही है आज भी हमारे जिंदा रहने के लिए प्रयाप्त है पर लालच और अहंकार की कोई सीमा नही है। सच तो यह ही की मात्र 10% ने  बाकी 90% का जीवन अपने लालच के कारण नरक बनाया हुआ है। इन 90% के लिए टेक्नोलेजी और विज्ञान एक अभिशाप बनाकर सामने लाने वाले  यही 10% है। 

भौतिकवाद और बजरवाद के मेल से हम जिस रास्ते पर जा रहे है उसमे चंद कुछ पेड़ लगाने से समस्या हल नही होगी, क्योंकी आज का अर्थ-तंत्र अधिकाधिक खपत पर टीका हुआ है। आज किसी देश की संपन्नता का माप ही यह है की उसके नागरीक कितनी आरामदायक वस्तुओं का इस्तेमाल करते है। 

हर गुजरते दिन के साथ यह खपत बढ़ती ही जाएगी, चाहे उसके लिए हम इन्सानो को एक और विश्व युद्ध  का समना  ही क्यो ना करना पड़े।  

इसलिए अब समय है की हम पेड़ लगाने से आगे की बात करे। कचरा निपटान की बात करे, कचरे को रिसायकिल करने की बात करे। उन्हे सम्मान देने की बात करे जो न्यूनतम खपत की जीवन शैली अपनाना चाहते है। क्न्योकी अगर 90% लोगो ने भी उन 10% लोगो की तरह जीवन जीने का मन  बना लिया तो ........?   

हम इंसानों ने जिंदा रहने की जिद्दो जहद में बहुत कुछ सीखा है और लगातार हम हर दिन कुछ ना कुछ नया सीख रहे है...नये उर्जा स्रोत पता करने, नया खाना...,हम में से कुछ लोग सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों मे अपने को जीने लायक बनाया। 

वो समय दूर नहीं जब हम घास को खाने लायक बना देगें. सीधे मिट्टी से हमारी फेक्ट्रीयां  पेड़ पोधों की तरह खाना बाना सकेगीं. वेसे भी हम मे से बहुत से लोग कीड़े-मकोड़े, साँप , कुत्ते-बिल्ली और ना जाने क्या क्या खा जाते है। इस दिशा मे अब और भी ज्यादा गंभीर होने  की जरूरत है । 

मिलावट खोरों से सावधान होने की जरूरत है जिस तरह से वो आज  यूरिया वाला दूध, खाने पीने की चीजो मे भरपूर रसायनों का प्रयोग कर रहे है वो हम सब के लिये अब चिंता का विषय होना चाहिए. इसे रोकने के लिए गंभीर कदम भी हमे ही उठाने होगे। 

हमे भी अब बदलती प्रस्थतियों के अनुसार अपने को ढालना होगा...यानी बढ़ते तापमान का सामना एसी चलाकर नही, उसकी जगह अपनी सहन शक्ति बढ़ाकर करना होगा, जल संकट,  सही ऊर्जा उपयोग।  

हम ही क्या जानवर भी अपने को बदलने में लगे हुये है ...अगर वो अपने को नही बदलेगे तो इतिहास बन जायेगे ...देखा नहीं आपने गाय भी अब हमारे द्वारा छोडा गया सडा गला खाना  सीख रही है, हो सकता है वो जल्द ही  प्लास्टिक को भी पचाने लगे. जंगली जानवर शहर की ओर भाग रहे ...अब अगर शेर को जीना है तो उसे हमारे साथ रहना सीखना होगा, वेसे ही जेसे कुत्तों ने हमारे साथ जीना सीखा. ...अरे आप तो बुरा मान गये.

अब हम सिर्फ शेर के लिये तो जंगल बचाने से रहे...अगर शेर को जिंदा रहना है तो उसे  भी बदलना होगा. अगर वो हमारी दया पर रहा तो जल्द ही इतिहास बन जाएगा, हमारे डार्विन बाबा ने तो यही बताया था । 

सब कुछ बहुत तेजी से घट रहा है. जो विकास हजारों सालों मे नही हो सका वो हमने कुछ दशकों मे कर दिया. इसलिये आम अदमी दुविधा मे है. समय के साथ यह दुविधा बढ़ती ही जायेगी. 

समय के चक्र को उल्टा घुमाना अभी तो असंभव है. इसलिये हमें अपने को बदलते समय के साथ खुद को बदलते रहना होगा अब चाहे वो बदलना जीवन मूल्यों का ही क्यों ना हो!

बाजारवाद और विज्ञान के मेल ने इंसानियत को ऐसे मुकाम पर ला दिया है की कुछ  ताकतवर अगर  लालची इंसानियत की दिशा और दशा तय कर रहे है। वो अर्ध सत्य का अपने लालच के  लिये खुलकर प्रयोग कर रहे है. वो अपने स्वार्थ के लिए  धार्मिक उन्माद, नस्ल वाद का खुलकर प्रयोग करते है इस सच को समझकर इसका सामना करना है और सोशल मीडिया के प्रदूषण से अपने मन को बचाए रखना है।  विशेषकर सोशल मीडिया पर मोजूद अधकचरे ज्ञान और अर्धस्त्य को गंभीरता से पहले परखे.

सच तो यह है की हमे पता ही नही चला की कब हम टेक्नोलोजी के सहारे गुलाम बना दिये गए । एक उम्मीद अब भी बनी हुई है की हम इसके प्रति जागरूक  होंगे और इसका सामना करेगे. आने वाले दिन शुभ हो  इस लिए आज का दिन हम गंभीरता से इस पर मनन करे।  

   


दुर्वेश