Monday, October 19, 2015

आपका RO आपको मुबारक

हे जिम्मेदार नागरिक,
मै जिम्मेदार नागरिक नही हू इसलिये इस मेल को जेसे का तेसा फार्वड ना कर कुछ लिखने की गुजारिश कर रहा हू. जनाब हम हजारों सालो से नदी तलाब का पानी पी रहे थे, इन नदी नालों को जिस तेजी  से आपने प्रदूषित किये है  वो तारीफे काबिल है. आपने अपने लिये तो RO की मांग कर दी. इन मे रह रहे जल जीव, इन पर पल रहे जीव उनका क्या...उनके लिये RO कंहा से लाओगे, अगर आपके लिये वो पानी जहर है तो उनके लिये भी जहर हुआ ना , या आप समझ बैठे है की इस संसार की  आप सर्वश्रेष्ठ रचना है और सिर्फ आपको जीने का अधिकार है पर आप भी उनके बिना अकेले कब तक !
आपकी शाही आदते नदी नालो को प्रदूषित करने का सबसे बडा कारण है पर जब बोतल बंद पानी मिल रहा है तो आपको  क्या चिंता है. आप लोग अपना मल मूत्र घर से बाहर बहाने के लिये सेकडो लीटर पानी बरबाद कर देते है, बिना ये सोचे की यही मल मूत्र नदी नालो को भी प्रदूषित कर रहा है. सेकडो टन साबुन रोज इस हसरत मे नदी नालो मे बहा देते है की उससे आप गोरे और सुदंर दिखाई देंगे.  कंही पर भी हग देगे ... मूत देगे...कचरा फेला देगे. प्लास्टिक की उडती पन्नीयां. नदी नालों को जाम करती ये पन्नीया उसका दोष भी आपको इन्ही पन्नीयों मे दिखाई दे रहा है इसलिये आप को अब कागज की थेलिया चाहिये. जिससे आपकी शाही आदते वेसी ही बनी रहे...क्योंकी आप तो इशवर की  बेहतरीन रचना है आपकी आदते या सोच खराब केसे हो सकती है
अभी हाल ही मे गणेश विसर्जन का नाजारा देखा एक छोटा सा तालाब और हजारों की भीड अपने अपने गणेश मूर्ति के साथ विसर्जन के लिये तैयार, लाख बताया , समझाया की POP की मूर्ति का इस्तेमाल नही करना है पर लोगों का क्या वो इसबार भी POP की सेकडो बढी-बढी मूर्तियों लेकर विसर्जन के लिये हाजिर थे. धार्मिक मामला था कोइ कुछ बोल भी नही सकता ओर तो ओर उनके हाथ मे पोलीथीन की छोटी बढी पूजा मे इस्तेमाल की हुई सामग्री से भरी. हजारों थेलिया थी उसे पोलीथीन समेत तालाब के फेंक दिया. कम से कम पोलीथीन तालाब मे फेंकने से बच सकते थे. पर एसा नही हुआ. एसा करने वाले पढे लिखे समझदार लोग थे जो गणेश विसर्जन बेंड बाजो के साथ कर रहे थे.  सच मानो ये वही सब लोग थे जो घरों मे RO का पानी पीते है. यही भीड अगर उस दिन तालाब साफ करने के लिये इकठ्ठी हुई होती तो नजारा कुछ ओर ही होता. बंदा नतमस्तक हो जाता, पर एसा हो ना सका.
प्रशासन नदारद था , वेसे अगर वो होता तो क्या कर लेता. यही लोग उसके विरोध मे उतर आते. क्या किसी को ये सब दिखाइ नही दे रहा था, सब को दिखाइ दे रहा था. पर बोले कोन,  टोके कोन,  समझाये कोन. नासमझ को समझाया जा सकता है, समझदार का क्या किया जाये. एक समय था जब इसी बदबूदार गंदे तालाब का  पानी  साफ हुआ करता था, पशु-पक्षी पानी पीते थे. तालाब जीवन था. अब वो मर रहा है. पर उन्हे क्या चिंता है. अगले गणेश उतस्व मे इससे ज्यादा गंदगी तालाब के हवाले कर देगे. उनके घरों मे तो RO है ना.  वेसे भी जिन लोगों ने गणेश की मूर्ति के  साइज को अपना शक्ति प्रदर्शन बना दिया हो. आस्था साइज से जुड गई हो भीड मूर्ति के साइज के हिसाब से जय जय कार करती हो , उनसे इस सब की उम्मीद केसे की जा सकती है.
अब ये दूसरा शगूफा,  असल कारण पर वार ना कर, सस्ते और मंहगे का रोना लेकर RO की बात कर रहे है. RO तकनीक आपको रामवाण नजर आ रही है, जो बोतल से सस्ता पानी देगी. क्या फर्क पडता है अगर RO तकनीक...50% से 60% पानी बरबाद कर देती हो. पीने वाले को वो साफ पानी दे रही है ना .

धन्य है दानवीर जिम्मेदार नागरिक जनता अरे हमारी बात छोडिये,  20 रूपये देना आपकी शान मे इजाफा करता है वरना आपके जेसों के लिये टीवी पर वो एड नही आता जिस मे एक ही बोतल से दूसरे के पीने से उसे पहला वाला चांटा मारता है और कारण बताया जाता है की उससे संक्रमण फेलता है ...वाह री लाजिक .. चुम्मा से संक्रमण नही फेलता पर बोतल से फेल जाता है...वाह जी वाह क्या बात है.

Wednesday, September 9, 2015

हिंदी पखवाडा

हिंदी पखवाडा चल रहा है, भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन का उदघाटन माननीय मोदी जी के हाथ द्वारा होना है. भोपाल शहर उनके मुस्कराते चहरे वाले पोस्टर से पट गया है.  कुछ दिन इस सम्मेलन की समाचारों मे चर्चा रहेगी उसके बाद
...उसके बाद क्या ?
Image result for hindi उसके बाद उसे भुलाकर लोग अपनी रोजमर्रा की जिदंगी अंग्रेजी से आसान बनाने लग जायेगे. आजादी के बाद से हम एसा ही तो कर रहे है, क्योंकी हिन्दी का महिमामण्डन करने वाले सिर्फ दिखावा कर रहे हैं, उन्होने हिन्दी को अंग्रेजी के बाद दोयम दर्जे का स्थान दिया गया है. 68 साल बाद भी सिर्फ हिन्दी के ज्ञान से कोई आई.ए.एस., आई.पी.एस., न्यायाधीश, या राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों से अभियंता, चिकित्सक या प्रबंधक नहीं बन सकता. देश में शासन-प्रशासन, न्यायालय व पेशेवर सेवाओं में ऊंचे पदों पर अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वाले ही बैठ सकते हैं. हिन्दी या स्थानीय भाषा में अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले निचले पदों पर ही अपनी सेवाएं दे सकते हैं. यह कितने शर्म की बात है. अंग्रेजों के समय की गुलामी की व्यवस्था अब भी कायम है. अंग्रेजी जानने वाले स्थानीय भाषा बोलने वालों पर राज कर रहे हैं. अब शासक वर्ग की चमड़ी का रंग बदल गया है. वह देखने में अपने देश-वासियों जैसा दिखता है किंतु सोच में अभी भी अंग्रेज़ ही है.
संविधान में तो कल्पना की गई थी कि आजादी के 15 वर्षों के अंदर हम अंग्रेजी से छुटकारा पा जाएंगे. किंतु स्थिति उल्टी हो गई. जिन विद्यालयों में हिन्दी में ही पढ़ाई होती रही अब वंहा भी अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. 
हमारी गुलाम मानसिकता ने हमको अंग्रेजी के चंगुल से मुक्त नहीं होने दिया. दुनिया के ज्यादातर देश अपनी स्थानीय भाषा में ही शिक्षा देते हैं. जो लोग यह मानते हैं कि खासकर तकनीकी विषय जैसे अभियांत्रिकी या चिकित्सा की पढ़ाई हिन्दी या अन्य किसी भारतीय भाषा में नहीं हो सकती है, उन्हें सोचना चाहिए कि रूस, चीन या जापान कैसे उच्च शिक्षा अपनी भाषाओं में ही देते हैं और किसी भी मायने में अमरीका, इंग्लैण्ड या यूरोप के किसी देश से कम नहीं हैं, बल्कि कुछ मामलों में उनसे आगे ही हैं.
यदि कोई वाक़ई में हिन्दी प्रेम प्रदर्शित करना चाहता है तो देश में शिक्षा का माध्यम हिन्दी व अन्य स्थानीय भाषाओं को बनाने की बात करनी चाहिए. हिन्दी का इस्तेमाल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं होना चाहिए.
हम सब यह महसूस करते है की इस देश को अपनी भाषा चाहिये. एक एसी भाषा जो कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक और गुजरात से लेकर नागालेंड तक सबकी अपनी हो. इसलिये हिन्दी को बहुजन भाषा के रूप मे चुना गया. उस पर गेर हिन्दी भाषीयों और खुद हिन्दी भाषीयों ने अपने संक्रीण स्वार्थों के लिये राजनिती कर उसे सही अर्थों मे राष्ट्र भाषा नही बनने दिया.
दर्द बहुत है पर यह मौका दर्द दिखाने का नही, उसे खत्म करने के बारे मे कुछ कर गुजरने का है, मेरे दिमाग मे एक आइडिया है कृपया गोर फरमायें ..
क्यों ना हम उस भाषा की बात करे जो ना हिंदी है ना इगलिश ना उर्दू है ना मराठी और ना ही वो तमिल है. एक जन सामान्य की भाषा, उसमे सभी भाषाओं के प्रचलित शब्द हों जिससे किसी को यह शिकायत ना रहे कि उसे अनदेखा कर दिया. 
एक बात ओर पूरे भारत मे लिखने की एक ही लिपी का इस्तेमाल हो. अगर मानक लिपी मे अन्य भाषा का कोई विशेष स्वर वाला अक्षर ना हो तो उसे उसमे जोडा जा सकता है. इस मानकीकरण  से पूरे भारत मे एक जेसा लिखा जा सकेगा. अभी तो तमिल नाडू में तमिल में तो केरल में मलियाली मे तो बंगाल में बँगला, आन्ध्रा में तेलगू मे लिखा होता है.   अगर किसी एक लिपी का इस्तेमाल हो, तो कम से कम उसे हर भारतीय पढ तो सकता है. अभी तो हाल यह है की दूसरे राज्यों के लोग बसों पर लिखी जगह का नाम तक नहीं पढ पाते. 
एक लिपी होने से दूसरे राज्यों की भाषा को सीख़ना भी  आसान हो जायेगा. जब अंग्रेजी  खुले दिल से दूसरे भाषा से शब्दों को आयात कर अपने को दिनों दिन विकिसित करती जा रही है तो फिर हम अपनी भाषा के साथ एसा क्यों नही कर सकते.
अगर आपको लगता है की हिंदी को इस देश की प्रथम भाषा होनी चाहिये तो राजनिती से उपर उठकर पहले कम से कम इतना भर कर ले की देवनागरी लिपी को सभी जगह लिखने के लिये इस्तेमाल करे. अगर जरूरी हो तो इसमे नये अक्षर जोडे जा सकते है. अरे...इसे ही तो भाषा का विकास कहते है. या उसे भी हम राजनीती में उलझा देना चाहते है.
हमें बाते कम और काम ज्यादा करना है. नहीं तो हम और आप हिंदी और अंग्रेजी करते रह जायेगे....और कोई  हमारे वतन में ही हमे अजनबी बना देगा.   
जो लाखों करोडों किताबे और इंटर नेट पर ज्ञान है उस सबका अनुवाद हिंदी मे करना है. जिस दिन एसा कर पायेगे ...हिंदी इस देश की क्या वो विश्व भाषा बन जायेगी. अगर सच में आप 150 करोड़ हो तो उसे काम से साबित करो.  कुछ लोग इस काम मे लगे हुये है...आप चाहो तो आप भी उनके साथ मिल जाओ...वरना शोर ना मचाओ. ना ही राज नेता की तरह बाते करो. जेसे अपुन आज कर रहा है...
 काम करो... . अगर आप भाषाई राजनिती से उपर नही उठोगे तो नीचे जाओगे...अरे नीचे जाओगे क्या ...आपकी दुआ से नीचे जा रहे है.
वेसे हम बेशर्म लोग है जी. कितना भी बुरा भला कहा लो हम वो काम नहीं करेगे जो दिल कहता है, हम वो काम करेगे जो हमसे डंडे की चोट पर कराया जाता है. या फिर पैसा फेंक कर हमसे कोई भी काम करा लो....यार कुछ तो बोलो...भगवान भला करे आपका 

Tuesday, September 8, 2015

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Monday, September 7, 2015

खाद्य तेल का सच !


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स्वास्थ रहना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है. बहुराष्ट्रीय और देशी कंपनीयों का नैतिक दायित्व है की वो हमे स्वास्थ खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराये पर एसा नही हो रहा है. बहुराष्ट्रीय और उनका अनुसरण करने वाली बेकरी और रेस्टारेंट सारे मानको को ताक पर रखकर स्वादषिट जहर परोस रही है. एक एसा धीमा जहर जिसका असर तुरंत नही होता पर वो आज करोडो लोगों को डायबटीज, ह्रदय रोग, रक्त चाप, गठीया जैसी अनेको बिमारी का कारण बन उन्हे मौत के मूह मे धकेल रहा है. सरकारे खामोश है, डाकटर चुप है, हमारे सुपर स्टार खिलाडी और अभिनेता करोडों कमाने की लालच मे झूठा विज्ञापन कर लोगों को भ्रमित कर रहे है.   
आज से 50 साल पहले तो कोई रिफाइंड तेल के बारे में जानता नहीं था, ये पिछले 20-25 वर्षों से हमारे देश में आया है| कुछ विदेशी कंपनियों और भारतीय कंपनियाँ इस धंधे में लगी हुई हैं| इन्होने चक्कर चलाया और टेलीविजन के माध्यम से जमकर प्रचार किया लेकिन लोगों ने माना नहीं इनकी बात को, तब इन्होने डोक्टरों के माध्यम से कहलवाना शुरू किया| डोक्टरों ने अपने प्रेस्क्रिप्सन में रिफाइंड तेल लिखना शुरू किया कि तेल खाना तो सफोला का खाना या सनफ्लावर का खाना, ये नहीं कहते कि तेल, सरसों का खाओ या मूंगफली का खाओ, नारियल का खाओ? 
अब आप कहेंगे कि शुद्ध तेल में बास बहुत आती है और दूसरा कि शुद्ध तेल बहुत चिपचिपा होता है? तेल का चिपचिपापन उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक Fatty Acid है,  अगर चिपचिपापन निकाल दिया तो उसका Fatty Acid गायब, तेल में जो बास आ रही है वो उसका प्रोटीन कंटेंट है, शुद्ध तेल में प्रोटीन बहुत है, 4-5 तरह के प्रोटीन हैं सभी तेलों में, आप जैसे ही तेल की बास निकालेंगे उसका प्रोटीन वाला घटक गायब हो जाता है अब ये दोनों ही चीजें निकल गयी तो वो तेल कंहा रहा.
तेलों  का परिष्करण और रिफाइनिंग के दौरान उसे उच्च तापमान पर कई बार गर्म किया जाता है और घातक रसायनों का प्रयोग किया जो तेल मे ट्रांस फेट का निर्माण करते है यह लोग बीज से पूरा तेल निकालने के लिये पेट्रोलियम रसायन हेग्जेन का प्रयोग करते है. वेसे तो यह प्रक्रिया मे तेल से लग कर लिया जाता है पर इसकी थोडी सी भी बची हुई मात्रा हमारे स्वास्थ के लिये बेहद हानीकारक होती है एसे ही और भी बहुत से हानीकारक रसायन यह कंपनीया  इस्तेमाल करती है जिसकी कोइ जानकरी यह आम नागरीक को उपल्बध नही करती
यह बढे दुर्भाग्य की बात है की तेल के सेल्फ लाइफ बढाने के लिये और उसे रंगहीन, गंध हीन बनाने के लिये तेल निर्माता बेशर्मी की हद तक खतरनाक रसायनों और प्रक्रियाओं का प्रयोग करते है. ऐसे रिफाइन तेल के खाने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, घुटने दुखना, कमर दुखना, हड्डियों में दर्द, ये तो छोटी बीमारियाँ हैं, सबसे खतरनाक बीमारी है, हृदयघात (Heart Attack), पैरालिसिस, ब्रेन का डैमेज हो जाना, आदि, आदि, जिन घरों मे रिफाइन तेल खाया जा रहा है वंहा ये सब बिमारियां अब ज्यादा हो रही है|
शुद्ध तेल से मिलता है HDL (High Density Lipoprotin), ये तेलों से ही आता है हमारे शरीर में, वैसे तो ये लीवर में बनता है लेकिन शुद्ध देशी तेल खाएं तो आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर ह्रदय रोगों की सम्भावना से आप दूर रहेंगे|
अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा है| मलेशिया नामक एक छोटा सा देश है हमारे पड़ोस में, वहां का एक तेल है जिसे पामोलिन तेल कहा जाता है, हम उसे पाम तेल के नाम से जानते हैं, वो एक-दो टन नहीं, लाखो-करोड़ों टन भारत आ रहा है और अन्य तेलों में मिलावट कर के भारत के बाजार में बेचा जा रहा है| 7-8वर्ष पहले भारत में ऐसा कानून था कि पाम तेल किसी दुसरे तेल में मिला के नहीं बेचा जा सकता था लेकिन GATTसमझौता और WTO के दबाव में अब कानून ऐसा है कि पाम तेल किसी भी तेल में मिला के बेचा जा सकता है|भारत के बाजार से आप किसी भी नाम का डब्बा बंद तेल ले आइये, रिफाइन तेल और डबल रिफाइन तेल के नाम से जो भी तेल बाजार में मिल रहा है उसमें पूरी संभावना है की उसमें पामोलिन तेल भी होगा| आपको बता दें पामोलिन तेल का इस्तेमाल ज्यादातर साबून बनाने मे होता था. पाम तेल के बारे में सारी दुनिया के रिसर्च बताते हैं कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस-फैट है और ट्रांस-फैट वो फैट हैं जो शरीर में कभी घुलता  नहीं हैं, किसी भी तापमान पर  नहीं और ट्रांस फैट जब शरीर में  नहीं घुलता है तो वो बढ़ता जाता है और यह  हृदयघात, ब्रेन हैमरेज का एक बढा कारण बनता है और आदमी पैरालिसिस का शिकार होता है|
आजकल फास्ट फूड के नाम पर समोसे, पकोडे, आलू चिप्स का चलन है. रेस्टारेंट मालिक इन्हे तेल को बार बार गर्म कर उसमे इन्हे सेंकते रहते है और एसा तेल तेल के नाम पर जहर बन जाता है जो हम समोसे और अन्य खाद्य के साथ उसे खाते रहते है. होना तो यह चाहिये की तेल को कभी भी गर्म का करना पडे. उसे कच्चा ही लिया जाये जेसे हम सब्जी कमे घी डालते है या फोर रोटी पर घी चुपड कर खाते है. पर आज तेल को तलने के लिये इस्तेमाल किया जाता है. इसके बावजूद की तला हुआ खाने पर मजबूर है.   तेल को कम से कम गर्म करे. तलने के लिये कभी अगर इसे इस्तेमाल करना भी पडे तो उसी तेल को दुबारा तलने के लिये इस्तेमाल कभी ना करे.  


रिफाइंड तेल की जगह कच्ची घानी का निकला  मूंगफ़ली, सरसों, तिल, olive का तेल ही खाएँ ! 


अजीब दांसता है ये

रवीश जी,
 
तेहल्का डाट कोम पर आपके लेख ने  नव पत्रकारों को कनफूसिया दिया है. आप कुछ ज्यादा ही सेंटीमेंटल हो गये. जो आपने लिखा वो सिर्फ पत्रकारिता का ही सच नही है ...ये आज हर व्यवसाय की सच है. चंद कुछ लोग ही चमक पाते है बाकी के बस दिन काटते है. 
बहुत कम को बचपन से पता होता है की उसे क्या बनना है और उसमें भी कुछ के ही मां बाप और गुरुजन उसकी इस चाह्त को प्रतिभा मे बदल पाते है. अधिंकाश तो भेडचाल के मारे होते है. जिधर हवा चली उधर ही बह लिये क्योंकि उन्हे तो जरूरत है बस एक अदद नोकरी की जो उत्तम वेतन दिलवा सके. अब अगर वो बजारू पत्रकारिता से मिलता तो वही सही. वेसे भी 24×7 चलते न्यूज चेनलों से इससे ज्यादा की उम्मीद बेमानी है. और अखबार…खुदा खेर करे..आपने देखा नही ये सब खबरों से ज्यादा तो विज्ञापन बेचते है ( ओह सारी दिखाते है). 
अजीब दांसता है ये, कंहा शुरू कंहा खत्म, ये मंजिले है कोन सी ना तुम समझ सके ना हम…

Saturday, May 30, 2015

किसान आत्मह्त्या क्यों ना करे ?


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वर्ष 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था. आज यह 1450 रुपए प्रति क्विंटल है यानी बीते 45 वर्षों में इसमें करीब 19 गुना वृद्धि हुई है. समर्थन मूल्य का किसान की आमदनी के साथ सीधा रिश्ता है. इसकी तुलना दूसरे तबकों के वेतन में हुए इजाफे से करें. इन वर्षों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह 110 से 120 गुना, स्कूल शिक्षकों की 280 से 320 गुना और कॉलेज शिक्षकों की 150 से 170 गुना बढ़ी है. कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वालों की आमदनी 350 से 1000 गुना तक बढ़ गई है. यदि खर्चोँ की अोर नजर डालें तो इस दौरान स्कूल फीस और इलाज के खर्चों में 200 से 300 गुना और शहरों में मकान का किराया 350 गुना तक बढ़ गया है. पेट्रोल और डीजल 30 से 40 गुना बढ गये. सोने का मूल्य 200 गुना इजाफा हुआ.  
  किसानों को खाद्यान्नों की कम कीमत का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. इस साल भी गेहूं का समर्थन मूल्य 50 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है, जिससे खाद्यान्न की कीमतें नियंत्रित रहें. धान के मूल्य में भी इतना ही इजाफा किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 3.2 फीसदी ज्यादा है. इसी बीच केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की दूसरी किस्त भी मिल गई, जो पहले से 6 फीसदी ज्यादा है. उन्हें जल्दी ही सातवें वेतन आयोग के अनुरूप वेतन और भत्ते भी मिलने लगेंगे. इसमें सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी का वेतन भी 26 हजार रुपए महीने करने की मांग हो रही है.
आज भी किसान के पूरे परिवार की ओसत आय 3 से 4 हजार रूपये महिने से ज्यादा नही है. एसे मे भूख पेट सोना उसकी नियती बन जाती है. उपर से मोसम की मार से फसलों के बरबाद हो जाने पर उसे ना कोइ बीमा कंपनी राहत देती है ना कोइ सरकारी मदद.  
यदि 45 वर्षों में सबसे कम वेतन वृद्धि के आधार पर भी देखा जाए तो किसान के लिए गेहूं के मूल्य में कम से कम 100 गुना इजाफा होना चाहिए था. इसका मतलब यह कि प्रति क्विंटल गेहूं के लिए किसान को 7,600 रुपए मिलने चाहिए, लेकिन उसे केवल 1450 रुपए मिल रहे हैं. हम मानें या नहीं मानें, लेकिन यह उसका हक है. किसान का हक दिलाने से बजार मे खाने पीनी की चीजों के मूल्य मे बेहताशा वृद्धी हो सकती है जिसे कुछ समय के लिये सरकार सबसिडी देकर रोके और उसके बाद बाजार को ही उसका असली मूल्य तय करने दो. उसी तरह जिस तरह आपने पेट्रोल और डिजल को बाजार के भरोसे छोड दिया. मेरा मानना है कि सारा बोझ गरीब किसानों के ऊपर डालने की बजाय उसे फसलों की ज्यादा कीमत दें. फिर कृषि उत्पादों को सब्सिडी के दायरे में ले आएं जिससे आम उपभोक्ताओं को भी ज्यादा कीमत न देनी पड़े. जापान के अलावा कई अमीर देशों में ऐसा ही होता है.

आसान और कम ब्याज पर ऋण की सुविधाएं बढ़ाने से भी किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते. किसान को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए. हम वर्षों से किसानों को बेहतर कमाई से वंचित करते रहे हैं. एक के बाद एक आने वाली सरकारें जानबूझकर किसानों को गरीब बने देखना चाहती हैं. 

दुर्वेश😟

Friday, May 22, 2015

मंथन ...रवीवारिय संस्करणों में योग





टेलीविजन और अखबारों के रवीवारिय संस्करणों में योग, व्ययाम और क्या खाये और क्या ना खाये इस पर लेखों की भरमार होती है. हर लेख पहले आपको डराता है फिर बताता है की अगर आप ने उसके बताये तरीके पर अमल किया तो आप सुंदर और शक्तिशाली शरीर  के मालिक होंगे. अगर उनके बताये रास्ते को नही अपनाया तो आपका बेडा गर्क तय है.
 अरे  भाई , अगर बैठना खतरनाक है तो दौडना भी खतरनाक हो सकता है.  अगर आप एसा नही मानते तो किसी दिन 8 घंटे दौड  कर देखिये या फिर उनकी शक्ले देखिये जो सारा दिन दौडते रहते है. बात खुद बा खुद समझ आ जायेगी. मुझे नही लगता की दौडने वाले लोगों की जिंदंगी बैठने वालों से बेहतर है. समस्या यह है की हम कुछ कामों में अति कर देते है फिर वो चाहे टिवी देखना हो, सोना हो, खाना हो, या फिर कुर्सी पर बैठे बैठे सारा दिन गुजार देना हो. अति बेमकसद बैकार है, मकसद के लिये की गई अति आपके लिये मकसद हासिल करने की कुजीं है.

सत्य तो यह है कि हमारे हर काम के पीछे डर छुपा होता है. फिर चाहे वो भागना हो, खडे रहना हो, या फिर बैठना हो ओर जो डर गया,  समझो मर गया. इसलिये जिंदगी में जो भी करिये आनंद से करिये, दिल से करिये. फिर चाहे वो सोना हो , रोना हो, हंसना हो, जागना हो, बैठना हो, खडा रहना हो या दौडना ... उसके बाद हार्ट अटेक से मर भी गये तो कोइ अफसोस नही....बल्की लोग तो एसी दुआ करते है की जब भी उपर वाला उठाये तो एक झटके मे उठाये. 

दुर्वेश😊