Friday, May 22, 2015

रवीवारिय संस्करणों में योग


टेलीविजन और अखबारों के रवीवारिय संस्करणों में योग, व्ययाम और क्या खाये और क्या ना खाये इस पर लेखों की भरमार होती है. हर लेख पहले आपको डराता है फिर बताता है की अगर आप ने उसके बताये तरीके पर अमल किया तो आप सुंदर और शक्तिशाली शरीर  के मालिक होंगे. अगर उनके बताये रास्ते को नही अपनाया तो आपका बेडा गर्क तय है.
  अगर बैठना खतरनाक है तो दौडना भी खतरनाक हो सकता है.  अगर आप एसा नही मानते तो किसी दिन 8 घंटे दौड  कर देखिये या फिर उनकी शक्ले देखिये जो सारा दिन दौडते रहते है. बात खुद बा खुद समझ आ जायेगी. मुझे नही लगता की दौडने वाले लोगों की जिंदंगी बैठने वालों से बेहतर है. समस्या यह है की हम कुछ कामों में अति कर देते है फिर वो चाहे टिवी देखना हो, सोना हो, खाना हो, या फिर कुर्सी पर बैठे बैठे सारा दिन गुजार देना हो. अति बेमकसद बैकार है, मकसद के लिये की गई अति आपके लिये मकसद हासिल करने की कुजीं है.

सत्य तो यह है कि हमारे हर काम के पीछे डर छुपा होता है. फिर चाहे वो भागना हो, खडे रहना हो, या फिर बैठना हो ओर जो डर गया,  समझो मर गया. 
इसलिये जिंदगी में जो भी करिये आनंद से करिये, दिल से करिये. फिर चाहे वो सोना हो , रोना हो, हंसना हो, जागना हो, बैठना हो, खडा रहना हो या दौडना ... उसके बाद हार्ट अटेक से मर भी गये तो कोइ अफसोस नही....बल्की लोग तो एसी दुआ करते है की जब भी उपर वाला उठाये तो एक झटके मे उठाये. 

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