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Tuesday, February 27, 2018

हे वैज्ञानिक सोचवाले इंसानों आप सभी को होली की शुभकामनायें


विज्ञान का विद्यार्थी होने के  नाते मेरा विज्ञान का पक्षधर होना स्वाभाविक होना चाहिये, एसे मे जब अंधविश्वास पर वार करते हुये लेख पढने को मिले तो मुझे अच्छा लगना चाहिये, पर मे क्या करू मुझे दूसरे अनदेखे पहलू पर नजर डालने की बुरी आदत जो है, लीक से हटकर सोचने की आदत है. इधर विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मेरे साथी मुझ से यह उम्मीद करते है की माफिया, पूजीपतियों  और राजनेताओं की सांठ्गांठ को नजर अंदाज करते हुये हर अच्छी बुरी वैज्ञानिक सोच का मै समर्थन करू. यह भी भुला दू की आज विज्ञान हमे किस दिशा मे ले जा रहा है.
इन दिनों मेरे आस पास विज्ञान और तकनीक के नाम पर जो हो रहा है उसे देखकर चिंतित और व्यथित हू  और अपने को असहाय महसूस कर रहा हू. गलत का विरोध भी करू तो केसे ?  विरोध करने के लिये और अपनी बात कहने के लिये उन्ही के पास जाना होगा जिनका विरोध करना है, यही मेरी मजबूरी है.  इस हद तक की निर्भरता इसी विज्ञान की ही तो देन है.
अगर आज मुझे अपनी बात आप तक पहुचानी है तो करोडो का चेनल चाहिये.... एसा एक नही सेकडो चेनल चाहिये, क्योंकी मे जिनके बारे मे कहना चाहता हू उनके पास मुझे गलत साबित करने के प्रचार साधन आपार है. इतना असाहाय तो मेरे पूर्वजों ने भी पहले कभी महसूस नही किया होगा. यह सच है की वो कम ज्ञानी थे, अंधविश्वासी भी थे. शायद हमारी तरह गलत और सही की पहचान नही कर पाते थे. उन्हे नही पता था की पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर काटती है. पर उनकी अपनी एक जीवनशेली थी जिसे अपना कर वो हजारो सालो से पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाये रखते हुये इंसानी जीवन को जीवत बनाये रखा. पर आज क्या ?
आज हम हद दर्जे तक मतलबी और लालची हो गये है हमारी कथनी और करनी मे फर्क बढ गया है.  हमारी जिंदगी इतनी आराम तलब और मतलब परस्त हो गई है की हमने अपने आनेवाले  संकट से आंखे मूद ली है. इस विज्ञान ने इंसान मे मोजूद जानवर की हसरत को हजारो गुना बढा दिया है. आज हम वही बोलते और सोचते है जो हमारी हसरतो को पूरा करने मे मदद करे...किसी भी कीमत पर.
लालच को हमने कोरपोरेट का रूप दे दिया है. जो बस कमजोर को अपनी मालकियत समझता है प्राकृति संसाधनो का बेहिसाब दोहन इसी लालच की देन है. यही लालच धर्म और विज्ञान को अपने मतलब के लिये एक दूसरे को खून का प्यासा बना देता है. लाखो मार दिये जाते है और दोष धर्म का. हो सकता है,  दोष धर्म का ही हो,  पर हथियार किसके है ...वो तो विज्ञान की ही देन  है ना ?  वरना मात्र नाखून और पंजो से आप इतनो का मार पाते ?   
प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक विज्ञान और उसके द्वारा किया गया तकनिकी विकास का असर बहुत सिमित क्षेत्र मे होता था. ये वो समय था जब सभ्यताये प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुये अपनी परंपराओं और समाजिक संरचना को हजारों सालो तक बनाये रही, और  वंही कुछ समाज अन्य सभ्य समझे जाने वाले समाजों की तुलना मे  अपने को  आदिम, जंगली बनाये रहे.  उस समय वो एसा कर भी पाये क्योंकी विज्ञान उतना उन्नत नही था.  
सभ्यताये आती- जाती रही पर हजारों सालो से मानव जाति अपना वजूद बनाये रही, प्रथम विश्व युद्ध के  बाद यह सब तेजी से बदला गया. जिस तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है वो अब किसी से छुपा नही है, विज्ञान और तकनीकी की मदद से इसकी अंधाधुंध उपयोग सभी सीमाये पार कर रहा है.
यह सच है की अंधविश्वास ने मानवजाति का नुकसान किया  है. पर क्या कभी इसका किसी ने हिसाब लगाया की विज्ञान और तकनीकी ने मानव जाति का कितना नुकसान किया है. इसलिये अंधविश्वास पर वार करने से पहले हमे यह देखना होगा की जिस  विज्ञान की उगंली पकडकर हम चलना चाहते है वो हमे किस दिशा मे ले जा रहा है. यह तब, और भी जरूरी हो जाता है जब व्यवस्था भ्रष्ट हो  और वो लालची मतलबी एह्सान फरामोस राजनेताओं और धर्म के ठेकेदारों और पूजीपतियो की लिये काम कर रही हो.
अंधविश्वास और गलत पंरपराये मात्र उनको  प्रभावित करते थी जो उन्हे मानते है, पर  विज्ञान उनको भी प्रभावित कर रहा है जिसका उससे दूर दूर तक कोइ लेना देना नही है. पृथ्वी का जीवन इससे पहले इतने संकट मे कभी नही था. हर गुजरते दिन के साथ कोइ ना कोइ प्रजाति विलुप्त होती जा रही है. आज हम मे से कोइ भी पक्के र्तौर पर यह नही कह सकता की अगले 50 साल मानव जाति भी बनी रहेगी या नही.
एल्बर्ट आंस्टीन को आज अगर विज्ञान के लिये याद किया जा रहा है तो उन्हे परमाणुबम के लिये और उससे हुई लाखों हत्याओं के लिये भी याद किया जाये ...  जो उनके रहते नागासाकी और हिरोशिमा मे हुई .... कितना असाहाय महसूस किया होगा एल्बर्ट आंस्टीन ने ...या किया भी होगा या नही...कोन जानता है....इतिहास तो जीतने वाले लिखते है. 
आज विश्व की 20% आबादी का पृथ्वी के 80% संसाधनों पर कब्जा है. ये बेहद ताकतवर है. यही  लोग विज्ञान और तकनीक का सहारा लेकर बाकी 80% आबादी को डर और मजबूरी के साये मे जीने को मजबूर कर दिया है. यही वो लोग है जिनका असिमित लालच जंगल , पहाड को बरबाद कर दे रहा है.  आखिर प्राक़ृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हमे किस ओर ले जा रहा है?
कल ही ल्यूसी रोबोट का विडियो देखा ...उसमे वो बोल रही है की “ अगर आप मेरे साथ सही सलूक करोगे तो मै भी आपके साथ सही सलूक करूगी” ? हो सकता है की यह किसी का मजाकिया विडियो हो? पर यह मात्र धमकी नही है. आर्टी फीशियल इंटेलीजेंस से युक्त ये रोबोट समय के साथ और बेहतर होते जायेगे और वो समय दूर नही जब हम पूरी तरह इन पर निर्भर होंगे इसके नतीजे कितने विनाशकारी हो सकते है यह तो भविष्य की बात है पर आज जो  कुछ  अफगानिस्तान, इराक मे हुआ उसे क्या आप नजर अंदाज कर पायेगे, किस तरह रिमोट मे बैठे कुछ लोग विज्ञान की देन ड्रोन और एसे ही कितने हथियारों से सब कुछ तबाह करने पर तुले हुये है ... और जो विरोध मे है वो बस आंतकवादी  करार दिये जा रहे है.  मै यह नही कह रहा हू की आप फिर से आदिम बन  जाओ और अंधविशवास का दामन थाम लो. पर इसका मतलब यह भी नही की विज्ञान और तकनीक का अंध भक्त हो जाया जाये.
हमे धर्म और विज्ञान से परे जाकर जीवन को देखना और समझना है. जीवन को सरल बनाना है. आज विश्व की आबादी 770 करोड़  से भी ज्यादा है और अगले 10 वर्षों मे वो 900 करोड़ का आकडा पर कर जायेगी. 
लालची और मतलबी लोगो से शासित 900 करोड़ लोग जो अपने ही बनाये विज्ञान और तकनीक के दानव से डरे और सहमे हुये होंगे ..... जिसे हम प्रगति कहते है क्या सच मे यह प्रगति है ...और यह केसी प्रगति, किसकी प्रगति ? इस सब से इंसानियत ने क्या पाया ?
आज विकास के नाम पर हमने लंगोठ पहने मूल निवासी को जींस पहना दी है हाथ मे मोबाइल थमा दिया है देखने को टीवी भी लगा दिया है ...क्या यह सब करके उस सीधे सादे इंसान को अपनी तरह  लालची और मतलबी नही बना दिया. अब हम चाहते है की हम उसके जंगल और पहाड ले ले और वो उफ तक ना करे
मै आदतन ट्रेकर हू ....अब  भी ट्रेकिंग के दौरान मुझे जंगल और पहाड मे एसे लोग मिल जाते है जिनके पास भले ही खाने को एक रोटी हो पर उसमे से भी  वो आधी रोटी मुझे देना चाहता है ...अपनी खटिया मुझे सोने को देता है और खुद  नीचे जमीन पर सो जाने की जिद्द करता है ...उस समय  सच मै अपनी इतनी बढी वैज्ञानिक सोच और तकनीक होने के बावजूद खुद को बहुत छोटा महसूस करता हू ...आज वो संकट मे है और मे बस वाट्सएप पर यह लिख पा रहा हू . उसका साथ दूंगा तो आप सब मुझे आंतक वादी और माओवादी घोषित करने मे कतई परहेज नही करोगे ... हो सकता कुछ लोग इस लेख को पढकर एसा सोच भी रहे हो
क्या ही अच्छा होता अगर विज्ञान इस धरती पर  रह रहे इंसानों को समझा पाता की इस पृथ्वी पर उसके जीने के लिये जरूरत से ज्यादा है. काश विज्ञान हम सब को विश्व ग्राम का अहसाहस दिला पाता. हमे समझा पाता की राष्ट्र , धर्म, रंग  और जाति मे बटा वो प्राकृति की एक मात्र एसी अनूठी रचना है जो चाहे तो जानवर से खुद इश्वर बन सकता है.
अफसोस विज्ञान एसा नही कर पाया उस पर  राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार पहले भी हावी थे और अब तो हद ही हो गई है. आज वो एसे विचार पागल पन की हद तक जनूनी होकर इसी विज्ञान की मदद से फेल रहे है. कुछ लोगों ने पृथ्वी के संसाधनों पर बेशर्मी की हद तक कब्जा कर लिया है और बाकीयों को राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार से आपस मे लडाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है. 
सब को मौत की सच्चाई मालूम है सब को मालूम है की वो कितना ही अमर होने का जतन कर ले, मौत से वो बच नही पायेगा. जो पैदा हुआ है उसे मरना ही होगा. हमारी पागल पन की हद देखो की वो हमे दिखाई नही दे रहा है. 
आज विज्ञान बंदर के हाथों उस्तरा ही तो है ...ना भई ना उस्तरा नही..क्योंकी उससे तो वो खुद अपना ही नुकसान कर सकता था. उसके हाथ मे विज्ञान एक एसे रिमोट की तरह है जो किसी भी एटम बम को फोड सकता है .... जो अब फूटा की तब.
एटम बमों का भोडा प्रदर्शन शान से हो रहा है, जितना बढा बम उतना ही वैज्ञानिक और तकनीकी उन्नत देश.  हमने इतिहास  से ना सीखने की कसम खा रखी है.  आज हमने रक्षा के नाम पर इतने हथियार जमा कर लिये है जो इस पृथ्वी को सेकडो बार तबाह कर सकती है. फिर भी चेन नही
 हमे और घातक हथियार चाहिये. और एसे लोगों को आप विज्ञान देने की बात कर रहे हो.  मेरे हिसाब से अंधविश्वास पर काम करने से पहले हमे अपने लालच और डर पर काम करना चाहिये, और इस बात का जबाब हमे अपने अंदर खोजना चाहिये की लालच ज्यादा खतरनाक है या अंधविश्वास.
कहने को अब भी बहुत कुछ है पर लेख लंबा हो रहा है ...इसे पढते रह जाओगे तो होली कब मनाओगे. .. इस लिये आगे की बात किसी ओर दिन 

शुभ होली
                                                                                                                                     सादर
       दुर्वेश      

Wednesday, May 25, 2011

सुपर केपेसिटर





परंपरागत तेज और शक्तिशाली पर उर्जा भंडरण में कमजोर केपेसीटर अब अपनी काया पलट कर सुपर अल्टरा केपेसीटर बनकर उर्जा भंडारण की अपनी क्षमता को दोनों-दिन बढाते जा  रहे है. यह जल्द ही कारों और इलेक्ट्रानिक उपकरणों में लगने वाली लेड एसिड या लिथियम आयन बैटरी की जगह ले रहे है. हाइब्रिड कारों के लिये यह आदर्श  साबित हो रहे है क्योंकी हाइबिर्ड कारों में बैटरी के साथ प्रयोग करने से ब्रेक और ऐक्सेलरैशन के समय बर्स्ट पावर की जरूरत को ये आसानी से पूरा कर सकते है. जनरेटिव ब्रेकिंग में यह आसानी से उर्जा को सोख लेते है और ऐक्सेलरैशन के समय यह आसानी से ड्राइव मोटर को उर्जा देते है. इसके साथ ही इनकी  जीवनकाल किसी भी कार की जिदंगी से लम्बा होता है 


जरा सोचिए, किसी बैटरी को चार्ज करने में घंटों की जगह कुछ सेकंड्स लगें तो जिंदगी कितनी आसान हो सकती है। वैज्ञानिकों ने इस सोच को हकीकत में बदल दिया है। परंपरागत बैटरी को चार्ज करने में घंटों का वक्त लगता है। ऐसे में आप रात भर बैटरी चार्ज करना भूल जाते हैं तो गड़बड़ होती है। अब उन्होंने परंपरागत तरीके के मुकाबले सौ गुना तेजी से बैटरी चार्ज करने का तरीका ढूंढ निकाला है। इस तकनीक से मोबाइल फोन, लैपटॉप, आईपॉड, डिजिटल कैमरा और दूसरे गैजिट्स का इस्तेमाल तो बेहद आसान होगा ही, इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड कारों के इस्तेमाल में क्रांति आ जाएगी। मोबाइल फोन की बैटरी को तो महज 10 सेकंड में चार्ज करना मुमकिन होगा। अब इलेक्ट्रिक कार की बैटरी को चार्ज करने में चंद मिनटों का वक्त लगेगा, आज कल इतना समय तो किसी कार में पेट्रोल भरवाने में लगता है। यह सब सुपर या अल्ट्रा केपेसिटर  के आविष्कार से सभंव हो गया है.

अल्टरा केपेसिटर दिखने में एक साधारण केपेसिटर जेसा ही है जो सब एटामिक गुण का इस्तेमाल कर इलेक्ट्रोन का भंडारण करता है. वहीं बैटरी रासायनिक प्रकिर्या का इस्तेमाल करती है. अल्टरा केपेसिटर सेल 2 से 3 वोल्ट के होते है पर इन्हे बैटरी की तरह सीरीज में लगाकर इनका वोल्ट बढाया जा सकता है. इसके कारण सुपर केपेसिटर में एसी खुबियां है जो सधारणत: बैटरी में नहीं होती है

1.       यह उर्जा के भंडारण  रासायनिक की जगह इलेक्ट्रोस्टेटिक रूप में करते है इसलिये इन्हे सिध्दांत: कितनी ही बार चर्ज और डिस्चार्ज किया जा सकता है.

2.       इनकी उर्जा भडारण और विसर्जन दक्षता बहुत अच्छी होती है. यह तुरंत चार्ज और डिस्चार्ज किये  जा सकते है. जितने भी अल्टरा केपेसिटर है वो सब अपनी पूरी उर्जा 2 सेकंड से कम समय में चार्ज और डिस्चार्ज कर सकते है

3.       इनमे आंतरिक अवरोध ना के बराबर होता है इसके कारण यह उर्जा को ना के बराबर बरबाद  करते है. और इनकी दक्षता 97 से 98% तक होती है

4.       यह बैटरी की तरह लीक नहीं करते या खराब नहीं होते क्योंकी चार्ज और डिस्चार्ज के समय इनमे कोई रासायनिक बदलाव नहीं होता

5.       बैटरी 2 से 3 वर्षों ही चलती है वही इन सुपर चार्ज केपेसिटर बैटरी का जीवन काल बहुत ज्यादा है. 





1745 में पहला इलेक्ट्रोस्टेटिक केपेसिटर लेडन जार के नाम से जाना गया जो इलेक्ट्रोस्टेटिक उर्जा को जमा कर सकता था. उसका सिद्धांत आसान था कि दो मेटल प्लेट के बीच इंसुलेटर लगाने के बाद जब इन प्लेटों को विद्युत सर्किट से जोडा जाता है तो उन पर इलेक्ट्रीकल चार्ज के रूप में उर्जा जमा हो जाती है. इस उर्जा को बाद में इस्तेमाल किया जा सकता था. उसके बाद रासायनिक बैटरी का उर्जा भंडारण के लिये इस्तेमाल होने लगा क्योंकी  रासायनिक बैटरी की तुलना में केपेसिटर की उर्जा भंडारण क्षमता नगण्य थी. 200 वर्षों से ज्यादा समय तक रासायनिक बैटरी विद्युत उर्जा संग्रह का काम करती रही.

देखा जाये तो केपेसिटर की विद्युत उर्जा संग्रह करने की क्षमता तीन मुख्य कारणों से निर्धारित होती है. 1. मेटल इलेक्ट्रोडप्लेट का क्षेत्रफल 2. इलेक्ट्रोड प्लेट के बीच की दूरी और 3. उसके बीच लगे इंसूलेटिंग पदार्थ का डाईइलेक्ट्रिक का मान. इसकी विकास  प्रक्रिया में  मेटल प्लेट कि मोटाइ, इनके बीच की दूरी और इनमें लगने वाला इंसूलेटर के डाईइलेक्ट्रिक मान में लगातार सुधार होता गया इलेक्ट्रोड प्लेट और डाईइलेक्ट्रि पदार्थ पतले से पतले होते गये और इनकी उर्जा संग्रहण क्षमता में लगातार सुधार होता रहा.   ‘

1930 में जब इलेक्ट्रोलाईट आधारित केपेसिटर का अविष्काकार हुआ तो इनकी उर्जा भंडारण क्षमता मे अभूतपूर्व वृध्दी हुई. इलेक्ट्रोलाईट केपेसिटर दिखने में इलेक्ट्रोस्टेटिक केपेसिटर जेसे ही होते है. इलेक्ट्रोस्टेटिक केपेसिटर में मेटल प्लेट के बीच माइका ,ग्लास या पेपर लगाया जाता है जिसे 0.3 mm  से अधिक पतला नहीं बनाया जा सका. वही  इलेक्ट्रोलाईट केपेसिटर ने इसा सीमा को तोडा क्योंकी इसमे एल्यूमिनियम फिल्म पर ही एल्यूमिना (Al2O3) की लेयर बनाइ गई. जो मात्र कुछ माइक्रोन की होती है. इससे केपेसिटर क्षमता को कई गुना बढा दिया पर फिर भी रासायनिक बैटरी की तुलना में इनकी संग्रहण क्षमता अभी भी बहुत कम थी.  पर हाल ही के वर्षों में नेनोटकनोलोजी को इस्तेमाल कर अल्ट्रा केपेसिटर का विकास किया गया जिसने इनकी  उर्जा भंडारण  क्षमता को हजार गुना बढा दिया.

आपने गरजते बादलों को देखा होगा यह पृकति के महा सुपर केपेसिटर है. इनकी शक्ति ने आपको भी अचंभित किया होगा इसमे बादल बहुत बढी प्लेटों का रोल निभाते है जिसकी बदौलत इनमे इअनी सारी उर्जा इकठ्ठीहो जाती है. अब केपेसिटर की उर्जा भंडारण क्षमता या तो बेहतर डाइइलेक्ट्रिक पदार्थ अपनाकर या फिर प्लेट का क्षेत्रफल बढाकर या फिर इनके बीच की दूरी को कम करके बढाई जा सकती थी. इनके विकासक्रम को भी इनकी चार्ज प्लेट की बीच की दूरी से समझा जा सकता है. पहले चार्ज प्लेट के बीच दूरी मिलीमीटर में होती जो इलेक्ट्रोलाईट केपेसिटर के कारण घटकर माइअक्रोन मे आ गई और अब सुपर केपेसिटर में यह नेनोमीटर में है,

सुपर केपेसिटर में भी सधारण केपेसिटर की तरह दो प्लेट के बीच डाइइलेक्ट्रिक पदार्थ होता है. पर प्लेट पोरस पदार्थ जेसे अक्टीवेटड  चार्कोल से बनी होती है. इसको समझने के लिये  हम विद्युत को पानी मान ले तो सधारण केपेसीटर पानी से भीगा एक कपडा है वही सुपर केपेसिटर पानी से भीगा स्पंज जो कपडे की तुलना में असाधरण रूप से ज्यादा पानी सोख सकता है. एक समय था जब 1 फेराड केपेसीटर का साइज एक कमरे से भी बढा होता था और उसे बनाने में लाखों रूपये खर्च होते थे पर आज नेट सर्च करने पर 4000 फेराड का केपेसीटर जो सोडा केन से भी छोटा है 250 डालर से भी कम में मिल सकता है.   इसके कारण अब आसानी से यह 4000 फेराड तक के बनाये जा रहे जो  कभी नेनो, पिको, माइक्रो, या मिली फेराड में होते थे.





पहला सुपर केपेसिटर 1950 में बनाया गया उसके बाद इसमे लगातार सुधार होता रहा नेनो टकनीक ने इसकी क्षमता को कई सौ गुना बढा दिया उर्जा घनत्व के मामले में अभी भी यह यह पंरपरागत बैटरी का मुकाबला नही कर सकते पर इनमें  खतरनाक रसायन नहीं होते और यह जल्दी खराब नही होते. इन्हे लाखों बार चार्ज और डिस्चार्ज किया जा सकता है.






अल्टरा केपेसीटर मैसाचूसिट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (एमआईटी) के वैज्ञानिकों के दिमाग की उपज है। एमआईटी की इस टीम का कहना है कि यह बैटरी और केपेसिटर का मिला जुला रूप है. और इन्हे कितनी ही बार चार्ज किया जा सकता है. इनमे ओवर चार्जिंग का भी कोई खतरा नहीं है. बहुत ही कम विद्युत अवरोध  के कारण इनका चार्ज और डिस्चार्ज रेट बहुत ज्यादा हो सकता है इनकी cycle efficiency 95% तक हो सकती है. MIT  के वैज्ञानिकों ने जो विधि विकिसित की है उससे कार्बन नेनो ट्यूब अपने आप को वर्टीकली अलाइंड कर लेती है इससे सस्ता, दक्ष और दीर्ध जीवन काल वाला अल्ट्रा केपेसीटर बनाने में मदद मिलती है. इस विधि पर आधारित वो अब ऐसा सुपर अल्ट्रा केपेसिटर बना रहे है, जिसकी उर्जा भंडारन क्षमता 3000 WH /KG होगी. लेड एसिड बैटरी  की उर्जा भंडारन क्षमता 30 to 40 wh/kg  और आधुनिक लिथियम आयन बैटरी की 160 wh/kg होती है . पेट्रोल की करीब 12,000 wh/kg, जो 15%  कार्य क्षमता के साथ (टेंक से व्हील तक) उसका फायदा 1800 wh/kg ही मिलता है. अगर इसमे यह सफला होते है तो हम पेट्रोल और डिजल पर वाहनों की निर्भरता को काफी हद तक खत्म कर सकेगें.


टेक्सास की एक कंपनी का भी दावा है की उसने बेरियम टाइटेनेट (BaTiO3) पर आधारित सुपर बैटरी का निर्माण कर लिया है जिसकी पावर घनत्व 26 वाट/इंच3 से भी ज्यादा है जो साधारण लेड एसिड बैटरी का कम से कम दस गुना है. अगर यह सच है तो यह एक क्रांतकारी आविष्कार साबित होगा. ओटोमेटड असेमब्ली तकनीक और इनकी बढती मांग के कारण इनकी कीमत  दिनों दिन कम होती जा रही है. वो दिन दूर नहीं जब इनकी कीमत पंरपरागत बैटरी से कम होगी.

पर्यावरण अनुकूल विद्युत कारों और ट्रामों के इस्तेमाल में अभी तक सबसे बड़ी अड़चन बैटरी चार्ज होने में लगने वाला वक्त ही रहा है। अगर चंद मिनटों में बैटरी चार्ज हो जाये तो ट्रामों को चलाने के लिये ओवरहेड तारों की जरूरत नहीं होगी क्योंकी यह हर स्टाप पर अपने को तुरंत चार्ज कर पायेंगी. इलेक्ट्रिक कारें एक बार चार्ज करने के बाद मात्र 50 से 60 किलोमीटर तक का सफर तय कर पाती है. उसके बाद इन्हे कम से कम 8 घंटे तक चार्ज करना होता है. इन्हे चार्ज करने के लिये लगने वाला समय बैटरी से चलने वाली कारों और ट्रामों के उपयोग को सिमित कर देता है अब अगर बैटरी भी वाहन में पेट्रोल भरने में लगने वाले जितने समय में चार्ज हो जाये तो यह एक क्रांतकारी बदलाव ला सकता है.  शहरों में अधिकतर हम एक बार में  15 से 20 किलोमिटर ही वाहन चलाते है उसके बाद वो पार्क किये जाते है. सभी पार्किंग जगहों पर अगर चार्जिंग सुविधा देने लगें तो बैटरी के वज़न में भारी कमी ला सकते है. इलेक्ट्रिक  कार और स्कूटर की अधिकतम गति 40 से 50 kmph होती है जो इन बैटरी के आते ही यह पेट्रोल इंजन की तरह तेज रफ्तार हो पायेंगी




यह सच है की अभी भी पंरपरागत बैटरी उर्जा भंडारणके मामले में आज भी अल्टरा केपेसिटर से बेहतर है पर शक्ति के मामले में अल्टरा केपेसिटर का मुकाबला नही कर सकती. भविष्य में इनके मिले-जुले इस्तेमाल में हमारी कई उर्जा समस्याओं का समाधान छुपा है.