Sunday, November 24, 2013

केरेक्टर या इमानदारी आदर या सम्मान पाने की गांरटी नही है


Image result for सत्यमै इस बात से सहमत नही हू की केरेक्टर या इमानदार होने से आपको सरकार/समाज से आदर या सम्मान मिल जायेगा. क्योंकी वो यह भी देखते है की आपकी इमानदारी किसके प्रति है आपके द्वरा बोला गया सत्य या अर्ध सत्य से उन्हे कोइ नुकसान तो नही होगा, उससे उन्हे कोइ दूरागामी खतरा तो नही!. 
नेता प्रिंट और मिडिया मे अपनी छवी को बनाये रखने और दूसरे की छ्वी को खराब करने का यह खेल झूठ और सच के सहारे चलाते रहते है. जनता सब जानते हुये भी बवकूफ बनती है 
जिन्होने सत्ता के खेल को करीब से देखा या भोगा है वो इस बात से कभी सहमत नही हो सकते की केरेक्टर या इमानदारी से सत्ता मिलती है या सत्ता से जुडा आदर मिलता है. क्योंकी सत्ता सिर्फ इमानदारी या केरक्टर से नही मिलती. इस बात को इस बार होने चुनाव मे एक बार फिर समझा जा सकेगा.
एसे हजारों लाखों उदाहरण है की सत्ता ने अच्छा केरेक्टर या इमानदार लोग की अवाज को दबाया है. अगर एसा नही होता तो उन्हे कभी जेल मे बंद नही किया जाता जो केरेक्टर या इमानदारी के धनी है. इस देश के 90% आबादी इमानदार और केरेक्टर की धनी है फिर भी वो दो जून रोटी की महोताज है. इस देश मे हुक्मरान उन्हे हिकारत की नजरों से देखते है और उनके वोट पाने के लिये कभी  BPL कार्ड बांटते है. तो कभी उन्हे घुन लगा अनाज बांटते नजर आते है. सत्य और इमानदारी को राजा हरीशचन्द्र की  तरह अपनी पत्नी से बेटे के कफन पर भी टेक्स वसूल करने पर मजबूर होना पडता है.
सच तो यह् है की आप चोर हो या डाकू...आप ने आकूत संप्पति गलत रास्ते की कमाइ है या सही रास्ते से पर अगर आप अपनी ब्रांडिंग जब तक एक इमानदार और संत की तरह कर सकते है तब तक सब ठीक होता है. यानी हाथी की दांत दिखाने के ओर खाने के ओर.
इस देश मे मरे हुये लोगों के बारे मे अच्छ-अच्छा बोलने की पंरपरा है. जिन लोगों का उदाहरण आपने दिया उनके बारे मे उनके विरोधियों की सुने तो तसवीर कुछ दूसरी ही नजर आयेगी. एक बात ओर जो रिषी मुनी सत्ता के साथ थे ग्रंथो में गुनगान उन्ही के हुये विरोधी तो दानव या राक्षस बना दिये गये.
हमे यह नही भूलना चाहिये की सत्य की लडाई में सत्ता ने गांधी जी को जेल का रास्ता दिखाया और भगत सिंह राजगुरू या सुखदेव जेसे क्रांतीकारियों को फांसी.. दूसरे महायुद्ध मे कंगाली की हालात मे पहुच चुके ब्रिटेन और बदलते राजनितिक समीकरण इस देश की आजादी का बहुत बढा कारण बने, देश को तीन भागों मे बांटकर यह आजादी हमे सोची समझी रणनिती के तहत थोपी गई थी जिसे कुछ लोगों ने अंग्रेजों का हृदय परिवर्तन कहा.
इतिहास मे सत्य की जगह अर्धसत्य का खुलकर इस्तेमाल हुआ. सतयुग हो , कलवुग हो या द्वापर , धर्म  सत्ता पर हावी था ...रिषी मुनियों से टकराने का मतलब शाप का डर, जिससे राजा भी भयभीत रहता था, तो आप बताइये डर बडा हुआ या सत्य.
सत्य और इमानदारी एश और आराम की जिदंगी जीने का मंत्र नही है. ना ही यह आदर और सम्मान पाने का. यह तो तपस्या है जो लोग आदर और सम्मान की परवाह किये बिना कुछ लोग करते रहते है क्योंकी यह उनका विशवास है की मानव जाति को अनंत काल तक बनाये रखने का यही एक सही रास्ता हो सकता है. इसी विश्वास के कारण वो हंसते हंसते जहर का प्याला पी लेते है, फांसी पर चढ जाते है या सूली पर लटक जाते है. इसलिये अगर आप सत्य और इमानदारी को आदर या सम्मान पाने का आसान रास्ता समझ बैठे है तो भगवान आपका भला करे!!.
राम हो या कृष्ण वो आग में तप कर कुंदन बने....मै नही मानता वो सब उन्होने आदर या सम्मान पाने के लिये किया होगा. वो सब आदर या सम्मान राजसत्ता के साथ मिलकर कंही आसानी से पा सकते थे....पर तब वो इश्वर तुल्य नही हो पाते.....आदर के साथ....दुर्वेश

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