Wednesday, January 27, 2016

सपनों का भारत

कुछ लोग अंहकार मे और जब उनके पास शक्ति और रूतबा भी हो तो सामने वाले को कीडे मकोडा समझने की गलती कर बैठते है. रावण ने भी यही गलती की और उसका नतीजा हर साल उसके पुतले का दहन पूरे जोश और खरोश से करते है , पर हमने इससे सीखा कुछ भी नही. आज भी हम अपने और अपनों के नाम पर कुछ भी गलत सही कर गुजरते है. अगर सामने वाला हमे से कमजोर हुआ तो क्या कहने.
हम जितनी ताकत दोषियों के कारनामों का बखान करने मे बरबाद करते है. उससे कही ज्यादा जरूरी सही लोगों की पहचान कर उन्हे समाज में सही जगह दिलाने की हे. वो लोग जो रात दिन अपना काम इमानदारी से कर रहे है. जेसे हमारी सुरक्षा मे लगे जवान हो या खेत मे अन्न उगाते किसान या फिर चाहे रेलवे का अदना सा दिखने वाला लाइन मेंन ही क्यों ना हो....
इससे हम उन लोगो में यह भरोसा दिला सकेगे की जो वो कर रहे है सही है. सही का साथ, गलत को अपने आप खत्म करेगा. गुस्ताखी माफ, अभी तो हम बस गलत को ढूड रहे है और लग रहा है जेसे यह देश बस गलत लोगों का है. ध्यान रहे बुराइ अकसर एकजुट होती है क्योंकी लालच और डर की गोंद उन्हे आपस मे चिपकाये रखती है और अच्छाइ कमजोर क्योंकी वो अकसर बिखरी हुई होती है. अगर सच मे अपने सपनों का हिन्दुस्तान देखना चाहते है. तो अच्छाइ की बातें करे, अच्छा करे. उन लोगों को पहचाने जो अच्छ कर रहै और उनकी ताकत बने.
हम अखबारों और टीवी न्यूज और उसके चेनलों मे अपने सपनों का हिन्दुस्तान खोजते रहते है. हिन्दुस्तान उन चंद बदतमीज, अंहाकारी, ठग, लुटेरे चोर और उच्चको का नाम नही है जो रोज अखबार की न्यूज बनते है. यह उन करोडो मेहनत कश लोगो के दिल मे है जो रात दिन मेहनत कर रहा है. यह सच है की वो खबर नही बनता. बहुत कुछ सह लेता है क्योंकी अब भी उसे अपने ईमान पर भरोसा है. जो अब भी खून पसीने की कमाई पर जीते है और दुख दर्द मे एक दूसरे के साथ खडे होते है.
आज मिडिया ने आम लोगों को कंनफ्यूस कर दिया है जिस तरह वो अपरध और अपरधी का महिमा मंडन करते है उससे बहुत ही गलत संदेश उस आम आदमी के पास जा रहा है, बाकी  कसर चुनाव, राजनेता...और वोट पूरी कर दे रहा है आज का स्थति यह है की आपका अपना होता है तो नियम कुछ ओर अगर वो बेगाना है तो निजरिया कुछ. अपने से मेरा मतलब मै खुद, मेरा परिवार, मेरा गुट , मेरी जात, मेरी पार्टी, मेर देश, मेरा धर्म ...एसा कुछ भी जो मेरी पहचान का हिस्सा है मेरे वजूद का हिस्सा है, बेगाना यानी जो मेरा नही है और मेरे नही है.
अब तो उसे आम आदमी को भी लगने लगा है की वो कंही गलत तो नही है. शायद उसी का असर है की आजकल युवा किस्से कहानियों और कविताओं मे भारत की निराशाजनक छवी को ही लिख रहा है. इस सब को देखकर चिंता होती है. क्योंकी हम उस सिद्धांत की अनदेखी कर देते है की हमारे दिमाग मे जो चलेगा वही समाज मे चलेगा ...जेसा समाज के दिमाग मे चलेगा ...देर सबेर वेसा ही समाज बन भी जायेगा और फिर वेसा ही देश होगा. जितना ही हम गलत का महिमा मंडन करेगे उतनी ही बेचेनी समाज मे बढेगी.
आज जो भी हक की आवाज उठाता है तो यही चेनल दिखाते है की किस तरह उसे और उसकी आवाज को कुचल दिया. अच्छा होता अगर वो दिखाते की उसके बाबजूद उसे अब भी इस व्यवस्था पर भरोसा है और उसकी हिम्मत टूटी नही है. उससे पहले की आम अदमी इस झूठ को सच मान ले उससे पहले सही बात उस तक पहुचानी होगी और उसे बताना होगा के वो अकेला और कमजोर नही है और यह भी बताना होगा की यह देश अब भी उनका उतना ही है जितना पहले था. वरना यह देश कब अफगानिस्तान बन जायेगा हमे पता भी नही चलेगा.

No comments:

Post a Comment