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Friday, June 26, 2020

. स्वाभिमान को अपने रंग़ से नही, अपने हुनर और अक्ल से जोडो


काले और सांवले जब खुद यह मान लेते है की गोरा रंग सुदंरता, सभ्यता और अक्ल का प्रतीक है तो फिर कोइ ओर क्या करे. काली लडकी को गोरा पति चाहिये और और काले लडके  को गोरी पत्नी. अगर एसा ना हो, तो लाखों करोडो रूपये का गोरे बनाने के पागलपन कारोबार एसे ही नही चलता. मजेदार बात तो यह है की आज तक कोइ इन क्रीमों से गोरा नही हुआ है. फिर भी लगाये जा रहे है.
आपको क्या लगता है की गोरे पन का यह लफडा अंग्रेजों के भारत आने के बाद शुरू हुआ? अगर आप एसा सोच रहे है तो भारी गलती कर रहे है. इस गोरे पन की खाज हमारी संस्कृति मे तब से है जब से इस संस्कृति का उदय हुआ. तब से ही काले और सांवले देत्य , असुर और राक्षस नजर आते रहे है. और गोरे देवता. अब आप बोलोगे की राम और कृषण तो सांवले थे. यह सही है की वो सांवले थे पर राम और कृषण जेसे सांवले को भी हमने भगवान तब माना जब उन्होने सांवले और कालों का वध किया. कहने को तो वो सांवले थे पर उन्होने काम गोरों के लिये ही किया. आप किसी से भी पूछ लो वो सब राक्षस या देत्य और असुर को  काला ही बतायेगे.
इसी तरह इस देश मे यह मान लिया गया है की सारी अक्ल और सभ्यता अंग्रेजी पढे लिखे गोरे छोकरे छोकरीयों मे ही है. कुछ दिन पहले एक खबर  पढी था की हिन्दी किसी को प्रधान मंत्री तो बना सकती है पर इजीनियर, डाक्टर और आइ ए एस नही बना सकती. यह एसी सोच है जिसे हम चाहे तो बदल सकते है. पर याद रहे यह किसी सरकार के बस मे नही है की वो एसी सोच को बदल सके. यह तो आपके अपने समाज की इच्छा शक्ति से ही संभव हो सकता है.
आज हम ग्लोबल है, तो अपनी सोच को भी ग्लोबल करे. अक्ल का इस्तेमाल करे और देखे की सभ्यता और शिक्षा का ना रंग से कोइ वास्ता है और ना ही अंग्रेजी से. जो आपको रंग के कारण  नापसंद करता हो  उसे अनदेखा कर आगे बढे, इस बात की हीन ग्रंथी अपने दिमाग मे ना पाले. यह सही है की अधिंकाश भारतीय गोरे रंग को अहमियत देते है, पर आप इस बात को ज्यादा तब्बजो ना देते हुये आगे बढे. आज लाखो करोडों लोग हैं जो काले है या सांवले होते हुये भी हर फील्ड में इतिहास रच रहे है , इस दुनिया को नई दिशा दे रहे है, बेहतरीन नेता साबित हो रहे है. एसे लोगों से सीख सकते हो तो सीखों.
स्मार्ट बनिये, फेशनेबल बनिये, उसके लिये आपको गोरे होने की कतई जरूरत नही है. एक बात अच्छी तरह समझ लो की कोइ भी पहले अपनी नजरों मे नीचे गिरता है फिर किसी ओर की निगाह मे नीचा होता है. स्वाभिमान को अपने रंग़ से नही, अपने हुनर और अक्ल से जोडो और आगे बढों या फिर गोरे पन की क्रीम मलते रहो.

-दुर्वेश

Wednesday, June 29, 2016

मंथन ...गुलाम बनना तुम्हारी अपनी फितरत है इश्वर की मर्जी नही

प्राकृतिक नियम सब के लिये बराबर है फिर चाहे वो पापी हो, धार्मिक हो, या अधर्मी, चोर हो या साहूकार, बालात्कारी हो, सच्चा हो या झूठा, हिंसक हो या अहिंसक, ब्राहम्ण हो या शूद्र, हिन्दू हो या मुस्लिम.
सब पर समान भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के नियम लागू होते है. सब एक ही हवा मे सांस लेते है एक ही सूर्य की रोशनी को ग्रहण करते है. प्राकृति इसमे कोइ फरक नही करती है. बाढ, भूकंप हो या सुनामी जेसे प्राकृतिक प्रकोप उसके लिये सब इंसान बराबर है. उनका इससे बचना और ना बचना पूरी तरह प्राकृतिक नियम के हिसाब से होगा. विज्ञान ने इन नियमों को समझकर जो प्रगति की है वो किसी से छुपी नही है.
गुलाम बनाना एक सोची समझी समाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे पुरातन काल से इस्तेमाल किया जा रहा है.  फिर वो चाहे शरारिक गुलामी हो या मानसिक गुलामी हो. इन नियमों का इस्तेमाल कर अधिसंख्यों को गुलाम बनाया जाता है. जिससे वो उन की मेहनत के बल ताकतवर बन सके और राज कर सके.
डर, लालच, अहंकार और ताकत के बल पर पर किसी को हराया जाता है,  उसे नीचा दिखाया जाता है, और गुलाम बनाया जाता है। गुलाम की औलाद गुलाम मानसिकता की हो जाती है, अशिक्षा और धर्म इसका हथियार है।   इन नियमों को समझकर कोइ भी अपनी और अपनों की प्रगति कर सकता है. दूसरों को गुलाम बना सकता है. गुट बना सकता है, उसका संचालन कर सकता है. इसीलिये जब इन नियमों को समझकर उस शक्ति को प्राप्त करने का यत्न करता है तो उस क्षेत्र मे पहले से मोजूद ताकते घबरा जाती है.
सत्ता और ताकत के इस खेल मे कोन सच्चा हमदर्द है और कोन नही उसे गुलाम  मानसिकता मे रह कर समझना आसान नही होता है. क्योंकी उस समय हम किसी ओर की नजरिये से देख रहे होते है. वो गलत बोले तो गलत वो अगर सही बोले तो सही. उस पर भी लोग मानसिक गुलामी के इतने आदी हो जाते है की वो इसे अपनी नियती ही समझ लेते है. एसे मे जो उन्हे इससे मुक्त करना चाहता है, गुलामी के दल दल से निकालना चाहता है वो उन्हे ही अपना दुश्मन समझ बैठते है. उन्हे पता भी नही होता की कोन उनका सच्चा हमदर्द है और कोन उन्हे मात्र अपने मतलब के लिये इस्तेमाल करना चाहता है.
जिन 85% को जगाने की बात हो रही है अगर वो सच मे जाग गये तो यह एक महा विस्फोट से कम नही होगा. जिसे ताकतवर सत्ताधीश कभी नही होने देंगे. साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल करते हुये उसे दबाने और खत्म करने की भरसक कोशिश करते है। अगर जरूरत पडी तो एसे विद्रोही नेता को या तो लोग खत्म कर देगे या फिर अपने मे शामिल कर लेगे. इस तरह एसा आंदोलन अपने आप खत्म हो जायेगा. कभी जाति , कभी धर्म , कभी अपने , कभी पराये, तो कभी रष्ट्र द्रोही तो कभी रष्ट्र वोरोधी का नाम देकर अधिसंख्यों को खुश और गुमराह करने का काम चलता रहता है.
कुछ दिन पहले गरीबी का विज्ञान पढ रहा था. उसमे एक मजेदार बात कही गई की अमीर अगर अपनी संपत्ती का थोडा सा भाग दान पुण्य करता रहे और उसके भांड उसे बढा चढाकर लोगों को बताते रहे तो एसे अमीर के विरूध गरीब कभी विद्रोह नही करेगा. बल्की  उसे अपना नेता मानकर उनकी पूजा करेगा उनकी हर बात मानेगा. यह एसा ही नियम है जिसे हर समझदार अमीर और ताकतवर आदमी पालन करता आ रहा है. जरूरत पढने पर एसे अमीरों के लिये गरीब मर मिटेगा पर उसका बुरा नही होने देगा. क्योंकी एसे अमीर की इमेज एक दानी और धार्मिक की होती है.
गुलामों को कभी एक जुट ना होंने दो. उन्हे जात पांत धर्म रंग लिंग के नाम पर बांट कर रखो. इस नुस्खे को इस्तेमाल कर अंग्रेजों के 200 साल तक राज किया और इसी का इस्तेमाल कर राजनैतिक पार्टीयां आज भी इस देश में अपना उल्लू सीधा कर रही है.
ये लोग काल्पनिक संकट दिखाकर उन्हे समय समय पर अपने छुपे हुये उद्देशय के लिये इस्तेमाल करते रहते है. जरूरत पडी तो संकट पैदा कर दिया. वो मात्र उन्हे अपने उद्देशय के लिये इस्तेमाल करने के लिये उनकी भावनाओं को इस कदर भडकाते है वो मर मिटने को तैयार हो जाते है. आग भडका कर सही समय पर वंहा से किस तरह खिसकना है वो यह अच्छी तरह जानते है 
एसे ही बहुत से लिखित और अलिखित नियम है जिसे अपनाकर सत्ताधीश ताकतवर बनते है. मजे दार बात यह है की शोषक और शोषित मे गहरा रिशता है, हम एक ही समय मे शोषक और शोषित होते है। हम केसी का शोषण कर रहे होते है और कोई हमारा शोषण कर रहा होता है। शोषण का सीधा मतलब  मेहनत का सही मूल्य ना देना।  डर , हिंसा, अशिक्षा, इसके हथियार है। भावनात्मक शोषण भी  एक तरीका है जिसके द्वारा लोग आसानी से किसी का शोषण कर देते है और सामनेवाले को पता ही नाही चलता , नेता भावनात्मक अपील कर अपना उल्लू सीधा करता है। हर शोषक शोषित का इसी तरह से शोषण करता है. यह  आपको हर गल्ली महोल्लों मे भी दिखाई देगा. . 
लालच, सत्ता का खेल मे आनेकता को घृणा की हद तक भडकाया जाता है. वो इसे हर कीमत पर बनाये रखना चाहते  है. उसके लिये मानवता का खून होता है तो होने दो. मानवता लज्जित होती है तो होने दो हर किसी को अपना धर्म और जाति, संकट मे नजर आती है. देखा नही किस तरह हर दंगे मे भीड लूट, हत्या और बालात्कार का नंगा नाच करती है. सार्वजनिक संपत्ती को बरबाद करती है.
बाजारवाद के इस युग में जब सब कुछ बिकाउ है. जो पहले से ताकतवर है वो और ताकतवर होते जा रहे है. मुक्ती भले ही बलिदान मांगती है. जो इसके लिये तैयार हो गया उसे भी ये लोग केसे अपने मतलब के लिये इस्तेमाल करना है अच्छी तरह जानते है. हम मे से 85% अपने दिमाग का इस्तेमाल इनके हिसाब से घटनाओं का विशलेषण करने मे लगाते है. असल मे हमे विश्वास ही नही होता की हमारी कोइ स्वतंत्र सोच भी हो सकती है. अगर कोइ स्वतंत्र सोच पैदा करता भी है तो एसे लोगों को वो राष्ट्र द्रोही, नकस्लवादी और आंतक वादी घोषित कर देते है सत्ता उन्हे “Enemy of State” घोषित कर देती है.
 इसे इश्वर की मर्जी कभी न समझे. इश्वर का इस सबसे कोइ लेना देना नही है. गुट बनाना हमारी नियती है. क्योंकी पुरातन काल से ही यह समझ आ गया की गुट मे रहना अकेले रहने से ज्यादा सुरक्षित और आसान है. स्वतंत्र सोच जेसा कुछ नही है. जिंदा रहने का पूरा खेल गुट बनाने का है. गुट होगा तो कोइ नेता होगा. और बाकी उसके रास्ते पर चलने वाले होंगे. उन्हे आप उस नेता का गुलाम कह सकते है. पहले मुझे यह समझ नही आता था की केसे हजारों लाखों लोग की भीड ये लोग जुटा लेते है. पर अब समझ आ रहा है.  गुट बनाना हमारे DNA मे है , हो सकता आप सब को भी यह सब समझ आ रहा होगा.
जिसे आप सरकार कहते है दुनिया का सबसे ताकतवर शोषक है। अब भारत का उदाहरण देता हू। आपको जानकार अचरज होगा की हम सब माध्यम वर्गीय लोग साल के 6 महिने सरकार के लिए बेगार करते है। आपकी बेगार से ये आलीशान  महल मे रहते है। ताकत का भोंडा प्रदरशन और दिखावा करते है । इसमे कुछ कम पड़ जाये तो लाखो करोड़ों का कर्ज जनता की भलाई के नाम पर लिया जाता है। दुनिया भर की सरकारे पूजीपतियों का सरक्षण करती है। जो नेता आपके वोटो से जीता है , वो जीतने के बाद आपको अपने आस पास भी फटकने नही देगा। बस दिखावा जरूर करेगा की आप ही उसके माइबाप हो पर मौका मिलते ही ....इसे ही लोकतन्त्र कहते है। 
आप सब ने देखा और सुना होगा की केसे कोई दस बीस साल मे जो फट्वेहाल था लाखो करोड़ों का मालिक बन गया। और एक दिन शादी ब्याह के नाम पर अपनी दौलत का बेहद  बेशर्म प्रदर्शन करता है। सरकार उसके लिए रेड कारपेट बिछाती है , पूरे देश का मीडिया उसे कवर करता है। कोई नही पूछता की इतनी दौलत केसे उसकी हो गई। 
आप की मर्जी की आप किन गुटों को अपना समझते है और किसे पराया. जब कोइ सिरफिरा आपकी भावनाओं को भडका रहा हो तो अपनी चेतना का इस्तेमाल करते हुये निर्णय करे. किसी को भी अपना नेता तो बना सकते है पर उसे अपना भगवान बनाने की भूल कभी ना करे. उसके अंधभक्त ना बने.
एक बात अच्छी तरह समझ ले जो आप दूसरों के साथ करते है, आज नही तो कल वो सब आप के साथ भी होगा. आज आप किसी को काट रहे है कल इसी तरह कोइ आपको काटेगा. आज आपको मोका मिला तो आपने लूटा ...कल उसे मोका मिलेगा तो वो आप को लूटेगा. यह सिलसिला चलता रहेगा जब तक की आप यह समझ नई जाते  की आप इस जगत मे लूटने और लुटने  के लिये नही आये है उस दिन आप खुद इशवाररीय हो जायेगे तब आप आसानी से इस बात को भी समझ जायेगे की गुलाम बनना तुम्हारी अपनी फितरत है इश्वर की मर्जी नही. 
देश और धर्म की परिकल्पना ही शोषण पर आधारित है, देश बनाना और देश चलाना दोनों ही शोषण के उदाहरण है। पता नही मानव कब एक दूसरे को दुशमन समझना बंद करेगे। जब तक इन दोनों का वजूद है तब तक शोषण होता रहेगा। 


Tuesday, May 31, 2016

सांवली या गोरी

दैनिक जागरण 1 जून 2016 मे प्रकाशित ‘सांवली लडकीयों की गुहार’ लेख ने जो लिखा है वो अर्ध-सत्य है. पूरा सच तो यह है की काले और सांवले जब खुद यह मान लेते है की गोरा रंग सुदंरता, सभ्यता और अक्ल का प्रतीक है तो फिर कोइ ओर क्या करे. काली लडकी को गोरा पति चाहिये और और काले लडके  को गोरी पत्नी. अगर एसा ना हो, तो लाखों करोडो रूपये का गोरे बनाने के पागलपन कारोबार एसे ही नही चलता. मजेदार बात तो यह है की आज तक कोइ इन क्रीमों से गोरा नही हुआ है. फिर भी लगाये जा रहे है.
आपको क्या लगता है की गोरे पन का यह लफडा अंग्रेजों के भारत आने के बाद शुरू हुआ? अगर आप एसा सोच रहे है तो भारी गलती कर रहे है. इस गोरे पन की खाज हमारी संस्कृति मे तब से है जब से इस संस्कृति का उदय हुआ. तब से ही काले और सांवले देत्य , असुर और राक्षस नजर आते रहे है. और गोरे देवता. अब आप बोलोगे की राम और कृषण तो सांवले थे. यह सही है की वो सांवले थे पर राम और कृषण जेसे सांवले को भी हमने भगवान तब माना जब उन्होने सांवले और कालों का वध किया. कहने को तो वो सांवले थे पर उन्होने काम गोरों के लिये ही किया. आप किसी से भी पूछ लो वो सब राक्षस या देत्य और असुर को  काला ही बतायेगे.
इसी तरह इस देश मे यह मान लिया गया है की सारी अक्ल और सभ्यता अंग्रेजी पढे लिखे छोकरे छोकरीयों मे ही है. कुछ दिन पहले एक खबर  पढी था की हिन्दी किसी को प्रधान मंत्री तो बना सकती है पर इजीनियर, डाक्टर और आइ ए एस नही बना सकती. यह एसी सोच है जिसे हम चाहे तो बदल सकते है. पर याद रहे यह किसी सरकार के बस मे नही है की वो एसी सोच को बदल सके. यह तो आपकी अपनी इच्छा शक्ति से ही संभव हो सकता है.
आज हम ग्लोबल है, तो अपनी सोच को भी ग्लोबल करे. अक्ल का इस्तेमाल करे और देखे की सभ्यता और शिक्षा का ना रंग से कोइ वास्ता है और ना ही अंग्रेजी से. जो आपको रंग के कारण  नापसंद करता हो  उसे अनदेखा कर आगे बढे, इस बात की हीन ग्रंथी अपने दिमाग मे ना पाले. यह सही है की अधिंकाश भारतीय गोरे रंग को अहमियत देते है, पर आप इस बात को ज्यादा तब्बजो ना देते हुये आगे बढे. आज लाखो करोडों लोग हैं जो काले है या सांवले होते हुये भी हर फील्ड में इतिहास रच रहे है , इस दुनिया को नई दिशा दे रहे है, बेहतरीन नेता साबित हो रहे है. एसे लोगों से सीख सकते हो तो सीखों.
आज कल तो गोरे भी अपनी गोरी चमडी से परेशान है अगर एसा नही है हो तो उन्हे सूर्य स्नान करते हुये अपनी त्वाचा को टेन करने की जरूरत नही होती. अब तो विज्ञान भी सांवली और काली त्वाचा के  फायदे गिना रहा है तो हम फिर से अपने को बेवकूफ क्यों साबित करने पर तुले हुये है.

स्मार्ट बनिये, फेशनेबल बनिये, उसके लिये आपको गोरे होने की कतई जरूरत नही है. एक बात अच्छी तरह समह लो की कोइ भी पहले अपनी नजरों मे नीचे गिरता है फिर किसी ओर की निगाह मे नीचा होता है. स्वाभिमान को अपने रंग़ से नही, अपने हुनर और अक्ल से जोडो और आगे बढों या फिर गोरे पन की क्रीम मलते रहो.

Wednesday, January 27, 2016

सपनों का भारत

कुछ लोग अंहकार मे और जब उनके पास शक्ति और रूतबा भी हो तो सामने वाले को कीडे मकोडा समझने की गलती कर बैठते है. रावण ने भी यही गलती की और उसका नतीजा हर साल उसके पुतले का दहन पूरे जोश और खरोश से करते है , पर हमने इससे सीखा कुछ भी नही. आज भी हम अपने और अपनों के नाम पर कुछ भी गलत कर गुजरते है. अगर सामने वाला हमे से कमजोर हुआ तो क्या कहने.
हम जितनी ताकत दोषियों के कारनामों का बखान करने मे बरबाद करते है. उससे कही ज्यादा जरूरी, सही लोगों की पहचान कर उन्हे समाज में सही जगह दिलाने की हे. वो लोग जो रात दिन अपना काम इमानदारी से कर रहे है. फिर वो चाहे , हमारी सुरक्षा मे लगे जवान हो या खेत मे अन्न उगाते किसान या फिर  रेलवे का अदना सा दिखने वाला लाइन मेंन ही क्यों ना हो....
इससे हम उन लोगो में यह भरोसा दिला सकेगे की जो वो कर रहे है सही है. सही का साथ, गलत को को कमजोर करेगा. गुस्ताखी माफ, अभी तो हम बस गलत को ढूड रहे है और लग रहा है जेसे यह देश बस गलत लोगों का है. ध्यान रहे बुराइ अकसर एकजुट होती है क्योंकी लालच और डर की गोंद उन्हे आपस मे चिपकाये रखती है और अच्छाइ कमजोर क्योंकी वो अकसर बिखरी हुई होती है. अगर सच मे अपने सपनों का हिन्दुस्तान देखना चाहते है. तो अच्छाइ की बातें करे, अच्छा करे. उन लोगों को पहचाने जो अच्छ कर रहै और उनकी ताकत बने.
हम अखबारों और टीवी न्यूज और उसके चेनलों मे अपने सपनों का हिन्दुस्तान खोजते रहते है. हिन्दुस्तान उन चंद बदतमीज, अंहाकारी, ठग, लुटेरे चोर और उच्चको का नाम नही है जो रोज अखबार की न्यूज बनते है. यह देश उन करोडो मेहनत कश लोगो का है, जो रात दिन मेहनत कर रहा है. यह सच है की वो खबर नही बनता. बहुत कुछ सह लेता है क्योंकी अब भी उसे अपने ईमान पर भरोसा है. वे  अब भी खून पसीने की कमाई पर जीते है और दुख दर्द मे एक दूसरे के साथ खडे होते है.
आज मिडिया ने आम लोगों को कंनफ्यूस कर दिया है जिस तरह वो अपरध और अपरधी का महिमा मंडन करते है, उसकके बारे मे रात दिन चर्चा करते है,  उससे बहुत ही गलत संदेश उस आम आदमी के पास जा रहा है, बाकी  कसर चुनाव, राजनेता...और वोट पूरी कर दे रहा है।
आपका अपना होता है तो नियम कुछ ओर अगर वो बेगाना है तो निजरिया कुछ ओर. अपने से मेरा मतलब मै खुद, मेरा परिवार, मेरा गुट , मेरी जात, मेरी पार्टी, मेर देश, मेरा धर्म ...एसा कुछ भी जो मेरी पहचान का हिस्सा है मेरे वजूद का हिस्सा है, बेगाना यानी जो मेरा नही है या जिनहे मे अपना नाही समझता।
अब तो आम आदमी को भी लगने लगा है की वो कंही गलत तो नही है. उसी का असर है की आजकल युवा किस्से कहानियों और कविताओं मे भारत की निराशाजनक छवी को ही लिख रहा है. इस सब को देखकर चिंता होती है. क्योंकी हम उस सिद्धांत की अनदेखी कर देते है की हमारे दिमाग मे जो चलेगा वही समाज मे चलेगा ...जेसा समाज के दिमाग मे चलेगा ...देर सबेर वेसा ही समाज बन भी जायेगा और फिर वेसा ही देश होगा. जितना ही हम गलत का महिमा मंडन करेगे उतनी ही बेचेनी समाज मे बढेगी.
आज जो भी हक की आवाज उठाता है तो यही चेनल दिखाते है की किस तरह उसे और उसकी आवाज को कुचल दिया. अच्छा होता अगर वो दिखाते की उसके बाबजूद उसे अब भी इस व्यवस्था पर भरोसा है और उसकी हिम्मत टूटी नही है. उससे पहले की आम अदमी इस झूठ को सच मान ले उससे पहले सही बात उस तक पहुचानी होगी और उसे बताना होगा के वो अकेला और कमजोर नही है और यह भी बताना होगा की यह देश अब भी उनका उतना ही है जितना पहले था. वरना यह देश कब अफगानिस्तान बन जायेगा हमे पता भी नही चलेगा.
दुर्वेश😟

Thursday, May 23, 2013

बहुत फर्क पडता है!

फेस-बुक पर अन्ना आंदोलन के समय बहुत सी प्रतिक्रियायें सुनने को मिलती थी उसमे से एक बहुत ही लोकप्रिय प्रतिक्रिया थी


“kisi ko kisi ke certificate se farak nahinpadta,sabko apna apna kam emandari se karna chahiye…!!!”

सुनने मे वाक्य बहुत अच्छा लगता है और एक नजर से देखने मे कोइ बुराइ भी नजर नही आती. हम सब इमानदार लोग अकसर इसी को मानते हुये अपना काम इमानदारी से करते रह्ते है, कई बार सोचे समझे बगेर की हम किस के लिये काम कर रहे है और क्यों कर रहे है. एक टेक्सी चालक किसी चोर और ह्त्यारे को जाने अनजाने इमान्दारी से अपने गंतव्य तक पहुचा देता है. अगर उसे मालुम हो की जिसे ले जा रहा है वो चोर है या डाकू तो भी क्या हम उससे व्यव्सायिक इमानदारी की उम्मीद करे. अगर यह जानते हुये की उसकी टेक्सी मे जो है बैठा है वो चोर है, बइमान है, या ह्त्यारा है उसके बाबजूद भी अगर कथित इमानदारी के तहत उसे उसके गंतव्य तक पहुचा देता है तो आप क्या कहेगे. इसी तरह अगर किसी होटल मे आने वाल व्यक्ति कोन है उससे होटल वाले को अगर कोइ मतलब ना हो और वो इमानदारी से उसकी सेवा करता रहे क्योंकी वो उसका बिल चुका सकता है. अगर आप को इस सब मे कोइ खराबी नजर नही आ रही है तो सभंल जाइये क्योंकी हमारी इसी व्यव्सायिक इमानदारी का या फिर भोलेपन का या अनजाने पन का लाभ कुछ लोग उठाकर हमारा ही वजूद खतरे मे डाल रहे है.

किसी भी आंतकवादी के हमले मे या फिर किसी भ्रष्ट की अकूत कमाइ मे हमारे जेसे इमानदारों की एक लम्बी कडी होती है. हम अपना काम शायद इस उम्मीद मे इमान्दारी से करते रहते है की उस बईमान की सजा खुदा देगा. या फिर बईमान को सजा देना का काम तो सरकार का है पुलिस का है...हम क्यों परवाह करें!

हथियार बनाने वाली फेक्टॅरी मे अगर कोइ काम इमानदारी से करता है और इसी के बनाये हथियार कोइ उसके विरूध इस्तेमाल कर देता है! एसे लोग लाखों मे है और हर गली महोल्ले मे है जो हमारे भोलेपन का , अनजानेपन का फायदा उठाना चाहते है.

समय तेजी से बदल गया है. अब सिर्फ हमारे खुद के इमानदार होने से ही काम नही चलेगा. हमे इस बत की भी तसल्ली  करनी होगी की जिस के लिये हम काम कर रहे है वो भी हमारी इमानदारी की कसोटी पर खरा उतरे. यह जानने की पूरी कोशिश करे की जिसके लिये हम काम कर रहे है उसका मकसद क्या है यह जानना अब हमारे जेसे इमान्दारों की सुरक्षा के लिये जरूरी है. नही तो मुबंई जेसे हादसे कभी भी और कंही भी होते रहेगें.

क्या हम किसी को सिर्फ इसलिये माफ कर सकते है की उसने अपना काम इमानदारी से किया था, अगर हां तो जब आपका अपाना कोइ हताहत होता है तब आप उन सब के खून के प्यासे क्यों हो जाते है जिनका उस घटना से कोइ सीधा सबंध ना हो.

आप यह बात अच्छी तरह समझ ले की कोइ भी आतंकवादी या भ्रष्टाचारी हमारे जेसे इमानदार की ही तलाश मे रहता है. एसा इमानदार जो उससे बिना कोइ सवाल किये बस उसका काम कर दे. और जब चाहे अपनी ओछी हरकत से उन्हे कभी भी अपने मकसद के लिये जब चाए भडका सके

Sunday, September 16, 2012

'व्यक्तिवाद' का गोबर

दबंग जब चालाकी, मक्कारी, चापलूसी के गुण में गिनने लगे. जब किसी की प्रतिष्ठा इस बात से हो की उसका बैंक् बेंलेस क्या है...और वो किस गाडी मे सफर करता है. जब इस बात को अनदेखा कर दिया जाने लगे की कमाइ के साधन पवित्र और कानूनी है या फिर कुछ ओर. जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो समाज और देश को बरबादी से कोन रोक पायेगा..


पढा लिखा होने का मतलब जरूरी नही की आप देश और समाज के कानून के साथ हो समाज के लिये हो. आज ज्यादा पढा लिखा होने का मतलब चालाकी, मक्कारी, चापलूसी को अपने लिये इस्तेमाल करने कला को जानना है.. जो सीख गया वो तर गया और जो नही सीख सका वो लाइन मे सबसे पीछे खडा दिखाइ दे रहा है. अगर आप पैसा फेंकने को तैयार है तो कानून के जानकार आपको बतायेगे की केसे अपने फायदे के लिये उसका इस्तेमाल किया जा सकता है.


हम भले ही किसी जमाने मे समाजिक थे पर अब समय का पहिया उल्टा चल पडा है. जिस संस्कृति ने ‘हम’ का पाठ पढाया आज वो मै ...मै कर रही है.

समाज तेजी से अपने मूल्य बदल रहा है, सादगी कब हमारी कमजोरी बन गई हमे पता ही नही चला. राजनिती भी सफेद से गरूये रंग मे ढ्लने लगी. इन बदलते मूल्यों मे शब्द भी अपनी परिभाषा बदल रहे है. अन्ना जेसे लोग गंदगी से भरे तालाब मे लहर तो पैदा कर देते है पर गंदगी की सफाइ?.....

हमे समय ने इस हद तक सुविधा भोगी बना दिया है कि अपनी सुविधा के लिये हम कुछ भी कर गुजरते है. हमने हम की परिभाषा को इतना समित कर लिया है के पडोसी भी हमे दुश्मन नजर आता है. जब तक हमारी सुविधा बरकारार है हम कोइ चिंता नही.

Monday, December 12, 2011

भ्रष्टाचार के नाले में

मेरा देश इंडिया दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र
इसका नागरिक होने का अविवादित लाभ यह कि
यहां आप पूरी तरह स्वतंत्र है कि
सच-झूट, सार्थक-निरर्थक, मीठा-कड़ुआ
आप जो चाहे कर लें
भ्रष्टाचार के नाले में
जब चाहें, जितना चाहें नहा ले
पर इसी देश ने अपने नागरिकों को
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी दी
इसी का लाभ लेते हुए
मैं कुछ कहने जा रहा हूं
ओछी राजनिती का गंदा राज खोलने जा रहा हू
क्षमा करें यदि आप ‘ऑफेंडेड’ या आहत हों
पर क्या गलत कर रहा हूं?
‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ नामक अधिकार
का ही तो प्रयोग कर रहा हूं,
इसलिये राज की बात ध्यान से सुने कि
प्रधानमंत्री देश का असरदार सरदार होता है
पूरे देश के राजकाज को
करीने से चलाने के लिए जिम्मेदार होता है
अगर वह बेईमान लोगों को साथ लेकर चल रहा हो
उनको जो जी में आए उसे करने की छूट देता हो
उनके क्रियाकलापों की समीक्षा करने से कतराता हो
तो उसे पाक साफ नहीं कहा जा सकता है
क्योंकी कोई भी ईमानदार व्यक्ति
बेईमान लोगों की शर्तों पर
राजकाज चलाने को तैयार नहीं हो सकता
भ्रष्टाचार बढ़ता जाए
लोग ‘त्राहि माम’ कहने लगें
फिर भी प्रधानमंत्री ‘गठबंधन धर्म’
जैसे भ्रामक शब्द
बोलकर अपने दायित्व से बचता रहे
और निहायत बचकानी हरकत करते हुये
स्वच्छ छवि वाली स्वपोषित स्वघोषित घोषणा कराता रहे
कभी-कभी तो मुझे लगता है
कि वो महात्मा गांधी के
‘तीन बंदरों’ का अनुयायी हैं
इसलिये भ्रष्टाचार के बारे में वो
न देखता है, न सुनता और न कुछ बोलता हैं
शायद चुप्पी लगा आँख मूंद सोच लिया उन्होने की
समय के साथ, सब शांत हो जाएगा
जनता कि है यादाश्त कमजोर, सब वो भूल जयेगी
पर उन्हे नही मालूम की जनता को
खाने को मिले या न मिले
पास में पहनने-ओड़ने को कुछ रहे या न रहे,
खुले आसमान के नीचे पडे रात गुजारनी
फिर भी वो दाग़ी को छोडते नहीं ये बात है पुरानी

Wednesday, November 23, 2011

अलार्म बजते ही सुबह नींद से कैसे उठे

रात को सोने से पहले आपने सुबह उठने के लिये अलार्म लगाया और गहरी नींद में सो गये. सुबह अलार्म बज उठा... मन और शरीर अभी भी सुबह की मीठी नींद का मजे ले रहा है और यह अलार्म!...हाथ अपने आप बजते अलार्म को बंद कर देते है. आप का उनींदा मन सोच रहा है..उफ्फ क्या मुसीबत है ये अलार्म ....क्या मीठी नींद है... क्या अभी ऊठना जरूरी है?..क्या हो जायेगा अगर 5 मिनिट और आराम कर लू!..अभी तो समय है ...मेने बेकार में इतनी सुबह अलार्म लगा दिया...औ...र. फिर से गहरी नींद...


1 घंटे बाद......हे भगवान ..आज फिर लेट...आप बिस्तर से उछल पडते है और देर से उठने के लिये अपने आप को कोसने लगते है. पेट पर बढती चर्बी, एक्सरर्साइज ना करने का गुस्सा. गुस्सा आ रहा है की क्यों अलार्म के बजते ही बिस्तर से नही उठे. शायद आज बिना नाश्ते के जाना होगा स्टाफ बस तो अब मिलने से रही...टेक्सी से जाना होगा और आफिस में बोस की घूरती आंखों का सामना...उफ्फ क्या जिंदगी है!!....

हर रोज ऐसा ही होता है रोज अलार्म लगाओ...उसके बजने पर ना उठो और फिर देर से उठने के लिये खुद को कोसने लगो. ऐसा क्यों होता है...सुबह अलार्म बजते ही मन ना उठने के बहाने क्यों खोजने लगता है. जेसे वो मन आपका नहीं किसी और का हो!.

आप में अनुशासन की कमी नहीं है, आप में इच्छा शक्ति भी भरपूर है. पर सुबह की मीठी नींद में जेसे अनुशासन धरा का धरा रह जाता है और इच्छाशक्ति हवा हो जाती है. रात जिस उम्मीद के साथ अलार्म लगाते है ...सुबह की मीठी नींद सब उम्मीदों पर पानी फेर देती है. जब तक कोई मुसीबत ना आ जाये तब तक सुबह उठने का मन ही नहीं करता.

ऐसा हम सब के साथ होता है ...मेरे साथ भी यही सब होता था ...पर अब नहीं होता. अब जब में सुबह उठता हू तो कोई आवाज मेरे मन में नहीं उठती. मुझे उठने के लिये चेतन मन की कोई जरूरत नहीं है इसलिये ना कोई चेतन को सवाल ना उससे किसी जबाब का इतिंजार. कोई सवाल-जबाब नहीं. अलार्म बजा और स्वत: ही उठने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है वेसे हि जेसे पेव्लोग का कुत्ता अलार्म बजते ही खाने के लिये तैयार हो जाता था.

अब अलार्म बजते ही मेरी आंखे धीरे से खुलती है ..हाथ की उगलिया अलार्म बंद करती है और फिर गहरी सांस लेकर फेफडो में हवा भरता हू...एक भरपूर अगडाई लेता हुआ बिस्तर से उठता हू, दो गिलास पानी पीकर बाथरूम की तरफ बढ जाता हू. सब कुछ जेसे अपने आप होता है जेसे में कोई रोबोट हू. ना कुछ सोचने की जरूरत ना ज्यादा कुछ समझने और समझाने की जरूरत.

बाथरूम में ब्रश करते हुये नींद पूरी तरह भाग चुकी होती है. सुबह की ताजी हवा मे सांस लेते हुए नये दिन का स्वागत करने के लिये मन और शरीर तैयार है...यह सब कैसे संभव हो गया इसे समझने के लिये हमे अपने मन को समझना होगा.

आप ने नोटिस किया कि रात को जब आप अलार्म सेट करते हो और सुबह जब उठने की कोशिश करते हो उन दोनों समय में हमारे दिमाग की सजगता एक सी नहीं होती. रात को दिमाग अलार्म लगाते हुये जितना सजग था, सुबह अलार्म बजते समय उतना ही उनींदा, सुस्त, अक्षम. सुबह उठने का निर्णय आप इस उनींदा, सुस्त, अक्षम चेतन मन से कराने की कोशिश करते हो जो बहुत कुछ उस समय अवचेतन मन के बस में है.

हमे लगता है की हमे और कडे अनुशासन और ज्यादा इच्छा शक्ति की जरूरत है इसलिये हम उतने ही जोरादार तरीके से अपने को कोसने लगते है. पर सुबह नींद मे तो हम अवचेतन मन के बस में है और अवचेतन मन अनुशासन नहीं समझता वो तो आदत का गुलाम है. शरीर को ज्यादा से ज्यादा आराम देने लिये प्रतिबद्ध. उस समय चेतन मन तो उनींदा, सुस्त, अक्षम है, वो कैसे कोई ठीक निर्णय कर सकता है. इच्छा शक्ति और अनुशासन चेतन मन समझता है. अवचेतन पर इसका कोई असर नहीं होता है.

आपको अनुशासन और इच्छा शक्ति की जरूरत तब ज्यादा होती है जब आप पूरे होश में हो. आप सुबह के उनींदा, सुस्त, अक्षम चेतन मन से अनुशासन की उम्मीद कैसे कर सकते है. हम कई बार अलार्म बजते ही उठ जाते है पर उसकी वजह डर या चिंता होती है. शायद यही वजह है की अगर सुबह ट्रेन पकडनी होतो अलार्म बजते ही आप बिस्तर से उछल पडते है. अब अगर सुबह उठने का काम भी डर के साथ करना चाहते हो तो आपकी मर्जी. पर जो काम एक आदत को बनाने से हो सकता है उसके लिये डर को वजह बनाना कहां की अक्लमंदी है.

इसके लिये आप को आदत बनानी होगी बेसे ही जेसे आप ने कार चलाना सीखने के लिये बनाई, याद है पहली बार जब आप ने कार चलाना सीखी तो आप का पैर ब्रेक और एक्सीलेटर खोजता था और हाथ स्टेयरिग और साईड इंडीकेटर नोब के बीच उलझे हुये और आंखे ...फिर कुछ ही हफ्तों से जेसे जादू सा हो गया. सब कुछ जेसे अपने आप होने लगा था. सब स्वत: होने लगा. एसे ही आप को एक ओर नई आदत बनानी होगी....सुबह अलार्म बजते ही उठने की आदत.

कुछ दिन आप को अलार्म के बजते ही उठने की आदत बनानी है, पर यह काम आप को उनींदी सुबह में नहीं करना है. इसे तो पूरे होश और हवास में कुछ दिन दोहराना है. तब तक दोहराना है जब तक की वो आपकी आदत ना बन जाये. एक आदत जो सुबह का अलार्म बजते ही स्व्त: ही उठने की आदत. किसी अनुशासन और इच्छा शक्ति के बिना. बस एक आदत. इसके लिये आपको ड्रामे की रिहर्सल नीचे दिये स्क्रिपट के अनुसार कुछ दिन तक करनी होगी,

अपने बेडरूम में 10 मिनिट बाद का उठने का अलार्म सेट करो. और सोने के लिये जो भी तैयारी करनी हो उसे करो. जेसे अगर सोने के लिये नाईट ड्रेस पहनते हो तो उसे पहन लो. रात को सोने से पहले अगर ब्रश करते हो तो उसे कर लो. सोने से पहले अगर चशमा उतारते हो तो उसे उतार दो. कबंल ओढ्कर एसे लेटो जेसे सच में सो रहे हो. जेसे ही अलार्म बजे तो जागने का अभिनय करते हुये उसे बंद करो. अगडाई लेते हुये फेफडो में सांस भरो और उठ जाओ जा कर एक गिलास पानी पीओ ओर बाथरूम जाओ. यानी की वो सब करो जो सुबह उठते ही करना चाहते हो.

अब इस क्रम को बार बार दोहराओ कम से कम एक दिन में तीन चार बार...कुछ दिनों तक करते रहो.. कुछ दिन में यह आपकी आदत बन जायेगी. इस पूरे ड्रामे को दिमाग में भी दोहरा सकते है पर मेरी राय है की कुछ दिन आप इसे करके देखे उसके बाद आप चाहे तो इसे दिमाग में दोहरा कर भी इसकी प्रेक्टिस कर सकते है.

बस आपको इतना ध्यान रखना है की इस ड्रामे को करते समय चेतन मन में उठने वाले सवालों पर ध्यान नहीं देना है. हो सकता है की आपका चेतन मन आपको बोले की क्या बेवकूफी कर रहे हो....याद रखो यही वो चेतन मन था जिसने पहली बार जब आपने कार चलाना सीखी थी तो कितना डराया था. तब आप ने इस की नहीं सुनी और आप ने अपनी इच्छा शक्ति का इस्तेमाल करते हुये वही किया जो आपके अंतरमन में था तो आज भी आप इसकी नही सुनों आपकी यह सुबह अलार्म बजते ही उठने का ड्रामा करने की आदत को अपनी इच्छा शक्ति का इस्तेमाल करते हुये इसे करो. और उसके जादू भरे परिणाम की प्रतिक्षा करो. विशवास करो आप को कार सीखने में लगे समय से बहुत कम समय इस आदत को सीखने मे लगेगा.

सोचो इस आदत को सीखते ही आपकी जिंदगी कितनी आसान हो जायेगी...कितने रुके हुये और उलझन भरे काम आसानी से आप अब कर पाओगे वो भी बिना किसी अतिरिक्त डर या चिंता के..

जितनी बार आप प्रेक्टिस करेगे वो उतने गहरे में आपके मन मे उतर जायेगा. अलार्म बजा...तो उठना है.... अलार्म बजा...तो उठना है. एक बार यह आपकी आदत बन गई तो फिर उसके बाद सब आसान ...फिर आपके मन में सुबह कोई सवाल जबाब नहीं होगा..अलार्म बजेगा और बिस्तर छोडने की प्रक्रिया स्वत: ही चालू हो जायेगी. यह आसान सा प्रयोग आपको आपके अव चेतन मन के काम करने के तरीके के बारे में आपकी समझ को बढायेगा.





Sunday, November 20, 2011

साइकिल..जरा याद इन्हे भी कर ले!

हमारे देश के मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्ग के युवा लोग साइकिल चलाने की सोच भी नहीं सकते, ये आधुनिकता के परिणाम ही है कि किशोर होते ही वे मोटर साइकिल और कार चलाना चाहते है और पैदल चलना या साइकिल चलाना अपनी शान के खिलाफ समझते है. जीवन मूल्यों मे यह बदलाव पिछले तीन दशक मे तेजी से हुआ है.

कुछ दशकों पहले फिल्मों में हीरो होरोईन साइकिल का प्रेम गजब का था. ये वो जमाना था जब साइकिल गली महोल्ले की शान होती थी. जब साइकिल खरीदी जाती थी तो उसकी खुशी में सबको मिठाई खिलाई जाती थी. बच्चे अपने पापा का शाम को दफ्तर से आने का बेसब्री से इंतिजार करते थे की कब पापा आयें और साइकिल चलाने को मिले. अगर उनके पास साइकिल होती तो वो शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में कोई झिझक महसूस नहीं करते थे. पिता खुश होकर अपने बच्चों को साईकिल इनाम में देते. स्कूल में जिस के पास साइकिल होती थी उसकी शान ही अलग होती.

जमाना बदल गया. साइकिल की जगह अब स्कूटी और मोटर साइकिल ने ले ली पिछले दो दशक में तो जेसे चार पहिया वाहनों की बाढ़ सी आ गयी है. ऐसे समय में साइकिल को अती गरीब की सवारी मान लिया गया है. इस गला काट जिंदगी में जब हमारे जीवन मूल्य तेजी से बदल रहे हो तो आपको मेरा साइकिल के बारे में बात करना अजीब लग रहा होगा. 

उन्नत देशों में साइकिल प्रेम बढता जा रहा है. कार चलाते चलाते और हवाई जहाज उडाते उडाते उन्हे अब इसकी अहमियत मालूम हो गई है. वेसे भी वहां के युवाओं और किशोरों में अब भी साइकिल प्रेम बाकी है. ये उनके यहां स्पोर्ट टीवी पर दिखाई जाने वाली प्रतियोगिता में उनके उत्साह को देखकर समझा जा सकता है. वहां की सरकारे साइकिल संस्कृति को बढावा दे रही है. व्यस्त मार्गों पर साइकिलों के लिए अलग से ट्रैक निर्माण तथा लोगों को साइकिल संस्कृति से जोड़ने के लिए पब्लिक और प्राइवेट वाहनों में साइकिलों को समुचित रूप से टांग सकने के लिए विशेष प्रकार के कैरियर लगवाना साइकिल के प्रति उनके समर्पण को दिखाता है. स्कूलों में साइकिल स्टंट के लिये विशेष साइकिल का प्रचलन और उसके लिये अलग से साइकिल ट्रेकस का निर्माण.

पश्चिम की बुराईयों को आसानी से हमने अपना लिया हमारे बुजुर्ग रात दिन उन बुराइयों क लेकर अपना सिर पीटते रह्ते है पर पता नहीं क्यों हम उनकी इस अच्छाई को क्यों नहीं अपना पाये. आज प्रदूषित महानगरीय जीवन शैली में साइकिल और भी प्रसांगिक हो गई है. अगर आपको लगता है कि साइकिल वहां सिर्फ गरीबों की सवारी है या इसे सिर्फ गांवों में चलाया जाता है तो आप गलत हैं । शायद आपको नहीं पता कि हालीवुड की सेलिब्रिटी मैडोना एक प्रसिद्ध साइकिल चालक हैं।

हमारे यहां तो सरकारी नियम और कानून सब साइकिल विरोधी है. यहां तक की ट्रेफिक हवलदार भी साइकिल सवार को पहले पकडता है. ट्रेफिक नियम साइकिल सवारों और पैदल चलने वालों के सबसे बाद में प्राथमिकता देते है. एसे में साइकिल केसे बनी रह पायेगी. धूल और कीचड से सनी गढों के बीच से गुजरती खस्ता हाल बरबाद सडकों से घिरे इन शहरों और कस्बों में साइकिलों के लिए अलग से ट्रैक एवं पार्किंग विकास एक मजाक सा लगता है.

यहां तक की सरकारी गेर सरकारी और अर्ध सरकारी संस्थानों में साइकिल पर आने वाले कर्मचारी को चार पहिया वाहन वाले से आने वाले कर्मचारी की तुलाना में बेहद कम कनवेंस एलाउंस मिलता है. जबकीइंधन बचाने और पर्यावरण बचानेके नाम पर उसे सबसे ज्यादा एलाउंस मिलना चाहिये. गेट पर खड़ा गेटकीपर भी साइकिल से आते कर्मचारी को हिकारत की नजरों से देखता है जेसे वो कोई कर्मचारी ना होकर चोर हो. पर कार को देखते ही तनकर स्लूट मारता है.

क्या आपने कभी सोचा है कि फैंसी जिम या उच्च प्रोफ़ाइल प्रशिक्षकों के बिना भी आप अपने आपको फिट रख सकते हैं । इसके लिये आपको सिर्फ कुछ देर साइकिल के पैडल घुमाने हैं । अगर चिकित्सकों की या शोधकर्ताओं की मानें तो फिट रहने के लिए साइकलिंग सबसे प्रभावी और कम लागत वाला नुस्खा है। साइकिल चलाना शरीर के लिए संपूर्ण व्यायाम है । साइकलिंग से रक्त का प्रवाह ठीक रहता है और यह आपके पैरों को सही आकार देता है । शहरी युवाओं में रीढ़ की हड्डी की समस्या बहुत ही आम है और साइकिल चलाने से आपकी रीढ़ की हड्डी को मजबूती मिलती है । अमेरिकी कॉलेज आफ स्पोर्टस मेडिसिन की पत्रिका में छपे शोध के अनुसार वो बच्चे जो साइकिल से स्कूल जाते हैं वो उन बच्चों की तुलना में ज्यादा सक्रिय होते हैं जो यातायात का कोई और साधन अपनाते हैं।


शहरों में एक सर्वे से पता चला की हमारे 70% से ज्यादा रोजमर्रा के काम 2 किलोँमीटर की परधी में हो जाते है. जो आसानी से साइकिल चलाकर हम पूरा कर सकते है. साईकिल एक जीरो फ्यूल वाली एक बेहद सबसे सस्ती सवारी जो आसानी किसी भी उबड खाबड सड़क पर निकल जाती है. क्या ही अच्छा हो की स्थानीय स्तर पर पार्षद अपने क्षेत्र में साइकिल और पैदल चलने वालों के लिये साफ और सुरक्षित पथ बनवायें. साइकिल प्रतियोगिता करा कर इसको किशोरों और यूवाओं में बढावा दे. पब्लिक वाहनों में एसी सुविधा हो जिससे उसमे साइकिल लादी जा सके जिससे गंतव्य पर पहुचने पर बाकी का सफर साइकिल से कर सके.

अब समय आ गया है कि हम साइकिल को पर्यावरण का दोस्त मानकर उसे सम्मान की दृष्टी से देखे और उसे चलाने वालों को पूरा सम्मान देते हुये उन्हे जाने की पहली प्राथमिकिता दे. हमारी सेहत का ख्याल रखने वाली हमारी सबसे अच्छी डाक्टर साबित हो सकती है. साइकिल चलाना अपने आप में एक विशेष अनुभूति होती है बशर्ते साइकिल चलाने वाले में इस विशेष अनुभूति का अनुभव करने की ललक हो

कुछ दिन हमने भी साइकिल चलाई थी और आफिस भी गये. पर इस दोरान जो झेला उसे फिर किसी दिन बयान करेगे. अभी तो फिलहाल बस इतना कह सकते है की इस देश के योजनाकारों और निंयताओं की नींद खुले और साइकिल जेसे छोटे छोटे पर अति महत्वपूर्ण पहलुओं पर उनकी नजरे इनायत हो. लाखों करोड रूपये पेट्रोल सब्सिडी पर फूंक देने वाली सरकार अब साइकिल पर भी ध्यान दे और साइकिल संस्कृति को बढावा देने के बारे मे गंभीरता से सोचे.   सब्सिडी के जाल मे उलझे इस देश को इससे थोडी तो राहत मिलेगी.


Saturday, November 12, 2011

मंथन ...तर्कसंगत या तर्कहीन होना


यह लेख चैट मित्रों के बीच हुई चर्चा का परिणाम है। दुनिया की वर्तमान स्थिति के लिए तर्कसंगत और तर्कहीन लोग एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं। इसलिए इसका उद्देश्य तर्कसंगत और अतार्किक दिमागों का पता लगाना और यह पता लगाना था कि बेहतर दुनिया बनाने के लिए उनका उपयोग कैसे किया जा सकता है। 
जो अतार्किक होते हैं और तर्क करने में असमर्थ होते हैं। वे आस्था, रीति-रिवाज और प्रथाओं से चलते हैं। वे अक्सर भय, लालच या इच्छा से निर्देशित होते हैं। जबकि तर्कसंगत वे लोग होते हैं जो सख्त तार्किक सोच का पालन करते हैं। वहां निर्णय और कार्य पूरी तरह से तथ्य और आंकड़ों पर आधारित होते हैं। नए तथ्य और डेटा सामने आते ही वे खुद को सही करने और अपडेट करने के लिए तैयार रहते हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सफलता तर्कसंगत सोच का परिणाम है।
तर्कसंगतता हमारे चेतन मन द्वारा निर्देशित होती है। क्योंकि यह हमारा चेतन मन ही है जो तार्किक और अतार्किक सोच के बीच अंतर कर सकता है। यह हमारा चेतन मन है जो विश्लेषण कर सकता है लेकिन चेतन मन के साथ समस्या यह है कि यह कार्रवाई में देरी करता है जो इमरजेंसी  की स्थिति के लिए उपयुक्त नहीं है। 
समय विलंब पर काबू पाने के लिए  प्रकृति ने हमें अवचेतन मन से सुसज्जित किया है जो निर्धारित संकेतों के आधार पर तुरंत प्रतिक्रिया करता है। जैसे ही हमारी 6 इंद्रियां सिग्नल प्राप्त करती हैं, इसकी तुलना हमारी मेमोरी में संरक्षित टेम्पलेट्स के सेट से की जाती है। यदि मेल होता है तो यह हमारे शरीर को कार्य करने के लिए सीधे निर्देश जारी करता है। बाद में उसी संकेत का विश्लेषण चेतन मन द्वारा भी किया जाता है और यदि चेतन मन भी पुष्टि करता है तो हम कार्रवाई जारी रखते हैं अन्यथा हम इसे रद्द कर देते हैं। उदाहरण के लिए, हम फुसफुसाहट की आवाज सुनते हैं...हमारा शरीर इसे सांप की फुसफुसाहट की आवाज समझकर तुरंत सतर्क हो जाता है। लेकिन बाद में हमारे चेतन मन ने देखा कि ध्वनि टीवी मॉनिटर से आ रही है और चिंता की कोई बात नहीं है और हम अपनी कार्रवाई रद्द कर देते हैं।

इसी तरह जब हम मूवी देखते हैं. हम हंसते हैं, रोते हैं और क्रोध तथा भय से भर जाते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि हम जो कुछ भी देख रहे हैं वह वास्तविक नहीं है। अवचेतन मन द्वारा उत्पन्न आवेग को ठीक करने में समय लगता है। तो कोई यह देख सकता है कि हमारा अवचेतन मन इसका तर्क नहीं कर सकता, केवल हमारी यादों मे पहले से म्प्जूद  टेम्पलेट से मेल करता  है और कार्य करता है। अधिकांश समय यह चेतन मन पर हावी होने का प्रयास करता है। कोई अवचेतन मन को तर्कहीन दिमाग के रूप में चिह्नित कर सकता है क्योंकि यह तर्क नहीं कर सकता। लेकिन यह तेज़ है. दोनों का मूल उद्देश्य दी गई स्थिति में सर्वोत्तम सेवा प्रदान करना है।
जब भी हम भय, क्रोध, चिंता जैसी भावनाओं के अधीन होते हैं, तो संभावना है कि हम अपने तर्कहीन दिमाग से निर्देशित होते हैं। लालच, इच्छा, शक्ति, वासना भी ऐसे क्षेत्र हैं जहां तर्कहीन दिमाग सबसे अधिक शासन करता है।
भय, क्रोध, चिंता की चरम सीमा के तहत व्यक्ति असामान्य रूप से पूरे समाज को खतरे में डाल सकता है। यहीं पर ईश्वर की अवधारणा आती है... रीति-रिवाजों, रीति-रिवाजों, प्रार्थनाओं, संकेतों और प्रतीकों के धर्म के साथ, ईश्वर जो पापियों और अविश्वासियों को दंडित करता है और उसकी स्तुति करता है। सच्चे अनुयायी....नर्क या स्वर्ग, इसलिए कुछ हद तक अतार्किकता को मजबूर कर नियंत्रण किया जाता है। हालाँकि अधिकांश युद्ध और नरसंहार हमारे अतार्किक व्यवहार का परिणाम हैं।

अब प्रश्न यह है कि क्या हम दोनों को स्पष्ट रूप से अलग कर सकते हैं!

नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि अतार्किकता और तर्कसंगतता दोनों ही हमारे व्यवहार में अनिवार्य रूप से मौजूद हैं। जब भी हम जीवन के लिए खतरनाक स्थिति में होते हैं, या यहां तक ​​कि लालच, इच्छा, शक्ति, वासना के अधीन होते हैं तो हमारा तर्कहीन दिमाग उस पर हावी हो जाता है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक जो वैज्ञानिक उपलब्धियों को तर्कसंगत मानते थे, वे धर्म और निजी मान्यताओं के मामले में तर्कहीन थे। दंगे और युद्ध यह सिद्ध करते हैं कि समाज और राष्ट्र भी अतार्किकता के आवेग में आचरण करते हैं। बाद में जब स्थिति नियंत्रण में आती है तो वे माफ़ी मांगते हैं और अपने कृत्य के लिए खेद महसूस करते हैं। इसलिए कोई भी तर्कसंगत दिमाग जब खतरे में आता है तो तर्कहीन व्यवहार करता है।
पिरामिड संरचना वाले समाज में शीर्ष पर बैठे बहुत कम लोग इस दुनिया की हर चीज़ को नियंत्रित करना चाहते हैं। और वे अतार्किकता और तर्कसंगतता का चयनात्मक ढंग से उपयोग करते हैं। वे एक ऐसी स्थिति बनाते हैं जहां तर्कसंगतता अतार्किकता के तहत संचालित हो। उनके द्वारा तर्कसंगत और अतार्किक सोच के चयनात्मक उपयोग ने खतरनाक परिणाम दिए हैं। जो सभ्यताएँ वहाँ परम्परागत ढंग से व्यवस्था चला रही थीं वे अचानक घातक उपकरणों से सुसज्जित हो गईं।
पिरामिड के शीर्ष पर बैठे कुछ लोगों ने दुनिया में सबसे अधिक तर्कहीन और अतार्किक व्यवहार उत्पन्न किया। यह दावा करते हुए कि आप शांति और प्रेम में विश्वास करते हैं, जबकि अलग-अलग लोगों पर हमला करते हैं या उन्हें मार डालते हैं, दावा करते हैं कि आप लोगों की मदद करना चाहते हैं, जबकि उन सभी चीजों का अपमान करते हैं जो उनके लिए पवित्र हैं।
समस्या यह है कि 10% से भी कम धार्मिक अनुयायी अपनी मान्यताओं पर कोई विचार, कारण या तर्कसंगतता लागू करते हैं, वे बस वैसा ही करते हैं और विश्वास करते हैं जैसा उन्हें बचपन से बताया या सिखाया जाता है। किसी व्यक्ति का विश्वास जितना अधिक कट्टर होता है, वह उतना ही कम तर्कसंगत और तार्किक होता है। इसलिए धार्मिक कट्टरपंथी उनके लिए डर का माहौल पैदा करने के सरल उपकरण हैं।
क्या यह डर कहता है कि एक महिला का एकमात्र सम्मानजनक उद्देश्य शादी करना और अधिक से अधिक बच्चे पैदा करना है? और नतीजा यह होता है कि लाखों बच्चे भूख और बीमारी से मर जाते हैं, सामाजिक प्रतिबंध थोपने की कोशिश की जा रही है? जो लोग अपेक्षित सामाजिक मानदंड से बाहर रहते हैं, उनका तिरस्कार किया जाता है, उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, यहां तक ​​कि बचने के लिए वे आत्महत्या भी कर लेते हैं। सभी को एक ही धर्म का अनुयायी बनाने की कोशिश मे  धर्मयुद्ध और  युद्ध।
यह सच है कि जीवन को नियंत्रण और अनुशासन की आवश्यकता है। अन्यथा इसकी अनियंत्रित स्थिति प्रणालियों को पंगु बना देगी, हम सामाजिक प्राणी हैं और जीवित रहने के लिए समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। तो स्वयं पर नियंत्रण और स्वयं का अनुशासन, हाँ। 
हाँ, अपने बच्चों को नियंत्रण और अनुशासन सिखाएँ। अगर  शहरी जीवन को नियंत्रित करना और प्रशासित करना कुछ हद तक हाँ है। लेकिन दुनिया को नियंत्रित करना? अन्य राष्ट्रों को नियंत्रित करना? प्रकृति पर नियंत्रण? दूसरे धर्म को नियंत्रित करना. अन्य लोगों के विचारों और विश्वासों और जीवनशैली और अधिकारों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं? नहीं, इसी चीज़ ने हमें हमारी अधिकांश समस्याओं में फँसाया है।
अत्यधिक वित्तीय असमानता वाली बहु संस्कृति और बहु ​​धर्म वाली विश्व सामाजिक संरचना में शीर्ष पर बैठे कुछ लोगों द्वारा मानव जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करना ठीक नहीं है। इसलिए जीवन हमेशा नियंत्रण के बारे में नहीं है। कभी-कभी यह बस उस दिशा में बहने के बारे में होता है जहां जीवन आपको ले जाता है। जीवन के सभी पहलुओं को नियंत्रित करने की आवश्यकता कट्टर धार्मिक उत्पीड़न, सामूहिक विनाश के हथियारों, युद्ध आदि को जन्म देने का हिस्सा है।
जब भी डर हमारे दिमाग पर हावी होता है तो वह हमेशा तर्कहीन व्यवहार करता है। यह कुछ तर्कसंगत दिमागों का डर है जिन्होंने सामूहिक विनाश के हथियारों का आविष्कार किया। कभी-कभी उत्पादों के विपणन के लिए भय का माहौल उत्पन्न हो जाता है, जब इसका उपयोग विपणन या राजनीतिक उपकरण के रूप में किया जाता है तो यह और अधिक घातक हो जाता है। हथियारों के लिए युद्ध हो या  करोना महामारी और टीके के लिए वायरल आतंक।  

प्रेम और भाईचारे का माहौल बनाने का प्रयास करें क्योंकि ऐसे माहौल में हमारा तर्कसंगत दिमाग सबसे अच्छा होता है।

Saturday, September 17, 2011

आर्तीज की मोन कविता

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हमसब एक मिनट का मौन रखें

ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में

और फिर एक मिनट का मौन उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोधमें

सताया गया, क़ैद कियागया

जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दीगईं

जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट कामौन

अफ़गानिस्तान के मज़लूमों और अमरीकी मज़लूमों के लिए

और अगर आप इज़ाजतदें तो

एक पूरे दिन कामौन

हज़ारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हेंउनके वतन पर दशकों से काबिज़

इस्त्राइलीफ़ौजों ने अमरीकी सरपरस्ती में मार डाला

छह महीने का मौन उन पन्द्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,

जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लम्बी घेराबन्दी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरूकरूँ

दो महीने का मौन दक्षिणअफ़्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने

अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया। नौ महीने कामौन

हिरोशिमा और नागासा की के मृतकों केलिए, जहाँ मौत बरसी

चमड़ी, ज़मीन, फ़ौलादऔर कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,

जहाँ बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदाहों।

एक साल का मौन विएतनाम के लाखोंमुर्दों के लिए...

कि विएतनाम किसी जंगका नहीं, एक मुल्क का नाम है...

एक सालका मौन कम्बोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो

एक गुप्त युद्ध का शिकार थे... और ज़रा धीरेबोलिए,

हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पताचले कि वे मर चुके हैं। दो महीने का मौन

कोलम्बिया के दीर्घ कालीन मृतकों के लिए जिनके नाम

उनकी लाशों की तरह जमा होतेरहे

फिर गुम हो गए और ज़बान से उतरगए।



इससे पहले कि मैं यह कविता शुरूकरूँ।

एक घंटे का मौन एल सल्वादोरके लिए

एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ केलिए

दो दिन का मौन ग्वातेमालावासिओं के लिए

जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में चैन की एकघड़ी नसीब नहीं हुई।

45 सेकेंड का मौनआकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,

और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों केलिए

जिनकी क़ब्रें समुन्दर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुम्बी इमारत भी न होगी।

उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंतचिकित्सा के रिकॉर्ड नहीं खोले जाएंगे।

उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं

दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम

एक सदी कामौन

यहीं इसी अमरीका महाद्वीप केकरोड़ों मूल बाशिन्दों के लिए

जिनकीज़मीनें और ज़िन्दगियाँ उनसे छीन ली गईं

पिक्चर पोस्ट्कार्ड से मनोरम खित्तोंमें...

जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंडक्रीक, फ़ालन टिम्बर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।

अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुम्बकीय काव्य-पंक्तियाँ भर हैं।

तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा ?

जबकि हम बेआवाज़ हैं

हमारे मुँहों से खींच ली गईहैं ज़बानें

हमारी आखें सी दी गईहैं

खामोशी का एक लम्हा

जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं

मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ

आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन

आपको ग़म है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रही रहजाएगी

इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहलेजैसी हर्गिज़ न रहे।

कम से कम वैसी जैसीयह अब तक चली आई है।



क्योंकि यहकविता 9/11 के बारे में नहीं है

यह 9/10 के बारे में है

यह 9/9 के बारे मेंहै

9/8 और 9/7 के बारे मेंहै

यह कविता 1492 के बारे मेंहै।

यह कविता उन चीज़ों के बारे मेंहै जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं।

औरअगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर :

यह सितम्बर 9, 1973 के चीले देश के बारे मेंहै,

यह सितम्बर 12, 1977 दक्षिण अफ़्रीकाऔर स्टीवेन बीको के बारे में है,

यह 13 सितम्बर 1971 और एटिका जेल, न्यू यॉर्क में बंद हमारे भाइयों के बारे मेंहै।

यह कविता सोमालिया, सितम्बर 14, 1992 के बारे में है।

यह कविता हरउस तारीख के बारे में है जो धुल-पुँछ रही है कर मिट जाया करती है।

यह कविता उन 110 कहानियो के बारे में है जो कभी कही नहींगईं, 110 कहानियाँ

इतिहास कीपाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई ज़िक्र नहीं पाया जाता,

जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यू यॉर्क टाइम्स औरन्यूज़वीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।

यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिएहै।

आपको फिर भी अपने मृतकों की यादमें एक लम्हे का मौन चाहिए ?

हम आपको देसकते हैं जीवन भर का खालीपन :

बिनानिशान की क़ब्रें

हमेशा के लिए खो चुकीभाषाएँ

जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों सेउखड़े हुए इतिहास

अनाम बच्चों के चेहरोंसे झांकती मुर्दा टकटकी

इस कविता कोशुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं

या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ

फिर भी आप चाहेंगे कि

हमारी ओर से कुछ और मौन।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन

तो रोक दो तेल के पम्प

बन्द कर दो इंजन और टेलिविज़न

डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज़

फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट

बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां

डिलीट कर दो सरे इंस्टेंट मैसेज

उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेलट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हामौन, तो टैको बैल की खिड़की पर ईंट मारो,

और वहां के मज़दूरोंका खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त करदो तमाम शराब की दुकानें,

सारे के सारेटाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्लेबॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन

तो रहो मौन ''सुपर बॉल'' इतवार के दिन

फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई के रोज़

डेटन की विराट 13-घंटे वाली सेल के दिन

या अगली दफ़े जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमाहों

और आपका अपराधबोध आपको सतानेलगे।

अगर आपको चाहिए एक लम्हामौन

तो अभी है वह लम्हा

इस कविता केशुरू होने से पहले। 

Friday, August 19, 2011

आरक्षण क्यों ?

(खुला पत्र)


जाति के नाम पर आपने हम 85% को तिरिस्कार की नजरों से देखा आज भी आप हमे अपने साथ लेकर नहीं चलना चाहते, आज भी आप की भाषा में हमारे लिये तिरस्कार दिखाई देता है. हमे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं खोते. आपके पास ताकत थी रूतबा था तो आपने पीढी दर पीढी डंडे के बल पर हमसे बेगार कराई. हमे सढा गला खाने पर मजबूर किया. ज्ञान से दूर रखा. हमारी परछाई भी अगर आप पर पड जाती तो आप को गंगा स्नान करना पडता था. हम भेड बकरियों से भी गये गुजरे थे. आज आप बराबरी के ज्ञान की दुहाई दे रहे है, पर आप ही ने तो हमे अब तक ज्ञान से दूर रखा था. अगर हमारे कानों में ज्ञान का एक शब्द भी पड जाता तो कान में पिघला सीसा डाल देने का प्रावधान भी आप ने बना रखा था.

भला हो लोकतंत्र का , की उस बनाने वालों ने हमे इंसान समझा और आप जेसे लोगों को समझाया की हम भी आपकी तरह ही जीते जागते इंसान है कोई खतरनाक वाइयरस बेक्टीरिया नहीं की जिसे छूते ही आप या आप का धर्म नष्ट हो जायेगा. हमे वोट देने का अधिकार मिला और नेताओं को हमारी ताकत का पता चला और उन्हे हमारी खेरीयत की चिंता होने लगी...भले ही चिंता दिखावटी हो!

हमारी हजारों वर्षों की लाचारी और गरीबी से हमे उबरने में कुछ तो समय लगेगा ना! हमारे पास आज भी आपके जितना ज्ञान भले ही ना हो, पर इतना ज्ञान तो है ही की जिस नोकरी के लिये आवेदन किया है वो हम कर सके. पहले आपने हमे जाति के नाम पर प्रगति से वंचित रखा था..आज आप ज्ञान की दुहाई देकर हमे वंचित करना चाहते है. आज आप पढाई में लाखों खर्च करते है, आपके बच्चे अच्छे से अच्छे अंग्रेजी स्कूलों और कालेजों में पढते है, सबसे बेहतरीन शिक्षकों द्वारा हर विषय पर अलग से ट्यूशन लेते है. अब हम इतना पैसा कहां से लाये और आप की बराबरी करे. फिर भी हम बस इतना कहना चाहते है कि बस कुछ समय और दीजिये. उसके बाद आप से ज्ञान में भी बराबरी कर लेगे.

दलितों में जो गरीब है उन्हे आरक्षण देने की बात कहने वाले पहले बताये कि गरीब किस को बोलोगे. सरकार सिर्फ बीपीएल धारी को गरीब मानती है. बीपीएल क्या होता है कुछ पता है? जिसको एक रोटी का आसरा तक नहीं उस नंगे भूखे डरे और सहमे अपने लिये रोटी का इंतिजाम कर सके वो ही बहुत है. उसके पास तो खाने तक के लाले है वो क्या पढेगा और आप के हिसाब से क्या ज्ञान हासिल कर पायेगा... इतनी मंहगी शिक्षा वो अपने बच्चों को कैसे दे पायेगा ? जिस शिक्षा के माप दंड आपने बनाये है उसे हमारा गरीब क्या आपका गरीब भी हासिल  नहीं कर सकता जब तक की उस पर आप की सीधे मेहरबानी ना हो जाये.

असल मामला यह है की दलित में जो लोग थोडा पढलिख  गये है और रोजी रोटी के मामले में थोडा आत्म निर्भर हो गये है, अब आपको उन से डर लगने लगा है क्योंकी वो अब आपके एकाधिकार वाले क्षेत्र में आप से बराबरी की हिम्म्त जो कर रहे है. अब आपकी सामंति मानसिकता को यह कैसे स्वीकार होगा की जो कल आप के रहमो करम पर था वो आज आप के बराबर बैठने की हिम्मत कर रहा है. इसलिये अब आप गरीबी कि दुहाई देते है क्योंकी आप को मालूम है की गरीब तो आप से प्रतिस्पर्धा करने रहा.

अगर 45% मार्क्स और उम्र में 5 साल की छुट का समीकरण समझना है तो आप को  यह भी समझना होगा की 15% स्वर्ण 85% प्रतिशत पदों पर केसे?. क्या आपको मालूम है की मानसिक गुलामी क्या होती है. यह उसी का असर है वरना एसे क्या सुरखाव के पर आपमे लगे हुये है की 15% स्वर्ण 85% प्रतिशत पदों पर काबिज है. इन 65 सालों में दलित वर्ग जग गया है और अनचाही गुलामी से मुक्ती चाह्ता है. इसलिये इसे सम्मानपूर्वक मुख्यधारा में शामिल किया जाये. जिससे आपका सम्मान भी बना रहे. वरना यह काम अब वो खुद भी कर लेगा. फिर कल यह ना कहना की हम 15% को बस 15% ही?

कोटे को सामान्य से भरने पर इस लिये रोक लगाई गई क्योंकी वहां पर भी आपने चाल चलनी शुरू कर दी थी. हमारे उम्मीदवार रहते हुये भी आपने यह दिखाकर की कोई कोटे का उम्मीदवार नहीं है उसे सामान्य से भरना शुरू कर दिया. वेसे आरक्षण सिर्फ सरकारी संस्थाओं में ही तो है, बाकी सारा कारोबार तो आपका है, निजी संस्थान, स्कूल कालेज आपके, व्यव्साय आपका, अब कुछ तो हमारे लिये भी छोडीये. या आप अब भी चाह्ते है की 85% आबादी आप के रहमो करम पर जिये...?

आज आरक्षण कुछ हद तक सरकारी कार्यालयों और संस्थानों में ही कारगर हो रहा है. पर इधर भी ठेके पर काम कराने की चलन जोर शोर पर है. आरक्षण का मजाक उडाती ठेकेदारी. सरकारी अनुदान पर चलने वाले निजी संस्थानों का हाल और भी बुरा, अपने लिये सस्ती दरों पर जमीन, और रियायतें लेने में सबसे आगे पर जब सवाल आरक्षण का हो तो बोलती बंद.

अगर आप खुद कि उन्नति से ज्यादा देश की उन्नति चाहते तो आप कैसे 85% प्रतिशत आबादी को सिर्फ इसलिये नंजरदांज कर सकते है कि वो आपके द्वारा बनाये गये मापदंडॉ पर खरी नहीं है. यह आपकी ना समझी ही तो है की आप इस ताकत को अभी तक नहीं समझ पा रहे. अगर आप इतने ही होनाहार है तो हर हाथ को काम और हर पेट को सुनिश्चित कर दो फिर देखो आरक्षण का मुद्दा अपने आप खत्म हो जायेगा. वरना यह काम अब इन 85% पर छोड दो.

आपकी सोच और समझदारी तो अब देश की आम जनता को वेसे ही समझ आ रही है ..केसे अपने निजी स्वार्थों के लिये  देश को बेचने से भी शर्म नहीं करते है. कोई बतायेगा की विदेशी बेंको में जमा लाखों करोडों रूपये किस के है?..ओह हां याद आया आरक्षण फिल्म पर रोक लगाने जेसा कुछ भी नही है. यह उसे सस्ती लोकप्रियता भर दिला रहा है. बजारवाद का एक नया रूप. चलो अच्छा ही है, इस बहाने इस फिल्म को लोग देखेगे...वरना फिल्म कब आती और चली जाती किसी को पता भी नही चलता...

Wednesday, August 17, 2011

राजनितिक व्यबस्था पर कुछ सुझाव

इस देश के नेतृत्व से बहुत सी राजनितिक भूलें हुई है...उनमे से 7 आपने पिछ्ले इमेल में भेजा था. हम आपके इमेल से सहमत है पर आपने जो समस्या उठाई उसका हल क्या है. यह पहले भी हुआ और आगे भी होगा. यह कुछ लोगो का गलत तरीके से इस देश में दाखिल होने का ही मामला नहीं है. यह तो समस्या का बस एक पहलू भर है.

लोकतंत्र का पूरा खेल पूंजी और जनमत पर टिका हुआ है. अगर पूंजी का इतिजाम सअही तरीम्के से हो सके तो बहुत सारे गलत काम अपने आप कम हो जायेगे. इस समस्या कुछ हद तक हल जनता को सीधे राजनैतिक पार्टीयों को चंदा देने से हो सकती है. जैसे ऐसा प्रवाधान हो की हम आयकर का कुछ हिस्सा सीधे मनचाही पार्टियों को दे सके. राजनैतिक पार्टीया भी अपनी आय और खर्च का हिसाब दें. जिस पार्टी को भी कालेधन के इस्तेमाल का दोषी पाया जाये उसके साथ कडी सज़ा का प्रवाधान हो.

जन प्रतिनिधी को उसे इस काम की कोई तनखाह तो मिलती नहीं है, जब तक कि वो पार्षद या विधायक नहीं बना जाता. और ना ही हम खुले दिल से दान देते है. अकसर जो हम देते है वो काम का कमीशन होता है. जिसे पहले ही कानून ने भर्ष्ट घोषित किया हुआ है. क्या ही अच्छा हो की हर नेता और जन प्रतिनिधी अपने काम की रेट लिस्ट सार्वजनिक करे. और उससे मिले पेसे को वो आमदनी में दिखा कर उस पर सर्विस टेक्स और इनकमटेक्स दे. हम क्यों नही मान लेते की जब एक वकील अपनी गलत और सही काम की फीस ले सकता है तो नेता या जनप्रतिनिधी क्योँ नहीं!

क्या ही अच्छा हो की UPSC, PSC, CDS, की तरह कोई कमिशन इनके लिये भी हो जो जन प्रतिनिधी और नेता या जन सेवा का कार्य करना चाह्ते हो उन्हे इसे पास करना पडे. या कम से कम लाइसेंस जेसा कुछ हो. यह लाइसेंस कुछ मानदंडो के आधार पर ही दिया जाय और इसे निरस्त करने का अधिकार भी इस बोडी को हो. और चुनाव में खडे होने के लिये उसके पास यह लाइसें होना अनिवार्य हो.

लोकतंत्र में चुनाव संख्या बल के आधार पर होता है. राजा और रंक लोकतंत्र की नजर में समान बन गये उनके वोटींग का वेटेज एक सा कर दिया जो सुनने में बड़ा लुभावना था पर उस का असर जो हुआ वो बडा ही खतरनाक हुआ. जिसे देश की समस्याओँ से कोई लेना देना नही था ना ही जिसे कूटनितिक समझ थी वो देश का नेतृत्व चुनने लगा. जिस देश की अधिकांश जना संख्या अनपढ, गंवार, गरीब और भुखमरी की श्रेणी में आती थी देश के प्रतिनिधी चुनने लगी. इन्हे आसानी से धर्म जाति रंग बोली के आधार पर बेवकूफ बनाया जा सकता था.

इस लोकतंत्र ने सभी को एक समान वोटिंग राइट दिये है. सभी की वोट की कीमत एक समान है. क्यों नहीं हम कुछ मानदंड के आधार पर इन का कीमत बनाते. क्यों एक अनपढ और पढेलिखे के वोटिंग की कीमत एक समान हो. अब तक सब कुछ संख्या बल के आधार पर ही तय होता रहा की कोन चुनकर जायेगा. अब इसे बदलने का समय आ गया.

हम किस लिये 546 की संख्या के साथ पार्लियामेंट चलाना चाहते है. क्यों हम अपने राज्योँ में 250 से 400 तक विधायक चुनकर विधानसभा में भेजते है जब की हमे मालूम है की अधिकांश को इन सब से कुछ लेना देना ही नहीं है. हम यह क्यों नही समझते की निर्णय एक छोटे ग्रुप में करना ज्यादा आसान और कारगर होगा. इतनी बढी संख्या के वाबजूद हमारी पार्लियामेंट और विधानसभा के निर्णय जन विरोधी और देश हित के विरूध होते है.

अब हालत ये है कि सभी पार्टीयों में दागी उम्मीदवारोँ की भरमार है.गभींर अपराधों के आरोपी चुनाव में खडे होते हो और जीत हासिल करते है. अपने राजनितिक आकाओं के बल पर देश के लिये अनजाने लोग इसलिये एमपी एमएलए या मंत्री बन जाते है क्योंकी वो किसी दमदार के पुत्र या पुत्री है. यही उनकी इकलोती क्वालिफिकेशन होती है. इसमे लगातार बढोती एक खतरनाक संकेत है.

सबसे बढी बात 1857 से लेकर 1947 तक जो भी कानून अंग्रेज देश में बना कर गये क्या उनकी समिक्षा नहीं होनी चाहिये. क्या पुलिस का रोल अब फिर से परिभाषित नहीं होना चाहिये. यह देश कोटा, लाइसेंस, रिजर्वेशन और सब्सीडी से उबर भी नही पाया और उसके उपर मल्टीनेशनल और FDI की तलवार लटका दी. पहले तो एक कम्पनी ने इस देश को 200 साल की गुलामी दी ....और अब!...... हम अब भी नहीं जागे तो भगवान ही मालिक है.