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Sunday, March 8, 2015

गर्मा गर्म पानी ....यानी चाय की एसी की तैसी

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पीलिया होने क बाद मुझे चाय और काफी को छोडना पडा क्योंकी उनके पीते ही उबकाइ करने का मन होता था. हमारे घरों मे चाय और काफी अनिवार्य स्वागत पेय है. किसी भी अतिथी का स्वागत आजकल अब इसी से करते है. एसी हालत मे मेरा इसे पीने से मना करना मेजबान को परेशानी में डाल देता और फिर वो ठंडा, सोडा या कोला पीने की पेशकस करने लगते. इसलिये सोची समझी रणनिती का तहत मेने उनसे इसके विकल्प में गर्म पानी मांगना शुरू कर दिया, वेसे भी उन्हे चाय और काफी बनाने के गर्म पानी करना ही होता है. इस तरह में गर्म चाय की जगह गर्म पानी पीने वाला बन गया.
मेने लोगों को पानी मे नीबूं या फिर ग्रीन चाय मिलाकर पीते देखा है, पर मेने चाय की तरह सिर्फ गर्म सादा पानी ही पिया. जब जितनी बार मन ने चाहा उतनी बार पिया, बिना इस डर से की इससे मुझे कोइ नुकसान होगा. इस बात का जरूर ध्यान रखता कि इससे कंही मे अपने होंठ और जीभ ना जला बेंठू. उसकी वजह से मुझे इसे चाय की तरह ही धीरे धीरे पीना पडता. शुरू शुरू मे बेस्वाद लगा पर कुछ दिनों मे ही मुझे उसमें स्वाद आने लगा. अपने ही स्लाइवा का स्वाद जो कभी हल्का मीठा तो कभी कडवा तो कभी खट्टा सा या कभी कभी नमकीन. इसे मेने पहले कभी महसूस नही किया था. महसूस होता भी केसे नोर्मल पानी को एक ही सांस में जो गटक जाता था. वेसे भी स्वाद, अच्छा या बुरा नही होता, यह सब हमारे दिमाग मे है, देखा जाये तो शराब से बुरा स्वाद भी कुछ हो सकता है! पर इसके स्वाद के बारे मे उसके किसी पीनेवाले से पूछों और फिर उसकी आंखों की चमक देखो.
मेरा तो इतना कहना है की आप भी इसे चाय के विकल्प के तोर पर शुरू किजिये और फिर कुछ दिनों मे ही इसका असर देखिये. शुरू-शुरू मे हो सकता है की आपको इसके पीने से एसीडीटी होने लगे या फिर गला सूखा-सूखा सा लगे. अगर एसा हो तो बस आपको पानी की मात्रा को ओर बढाना  है कुछ दिन मे एसीडीटी का एहसास खत्म हो जायेगा.
एक महिने बाद अगर आपको लगे की  चाय इससे बेहतर है तो कोइ बात नही आप फिर से चाय शुरू कर देना. पर मुझे विश्वास है की मेरी तरह आप भी इसके चमत्कारी असर को अनदेखा नही कर पायेंगे.
हमारी बहुत सारी बिमारीयों और शारारिक परेशानीयों की वजह कम पानी पीना है. एक नोर्मल व्यक्ति को अपने शरीर के वजन का 0.06 से 0.08  गुना पानी एक दिन मे पीना चाहिये. यानी की अगर आपका वजन 80 किलो है तो कम से कम 4.5 लीटर पानी आपको पीना चाहिये.  
अगर हम लगातार कम पानी पीते रहे तो कुछ समय बाद शरीर कम पानी को ही अपनी नियती मान लेता है और हमारा शरीर अंगों के महत्व के हिसाब से पानी की राशनिंग तय कर देता है. कम महत्वपूर्ण अंग जेसे स्किन, डाइजिस्टिव ट्रेक, पैनक्रिया, किडनी, हड्डियों के जोड और मांसपेशियां के लिये जबरदस्त राशनिंग और दिमाग और ह्रदय जेसे महत्वपूर्ण अंग मतलब कोइ राशनिंग नही.  
कभी आपने महसूस किया है प्यास से गला सूख रहा है और आप एक-एक बूंद पानी के लिये तरस रहे है. उसके बावजूद आपको भरपूर पसीना आ रहा होता है. जिस समय आप एक-एक बूंद के लिये तरस रहे होते है आपका शरीर पानी को पसीने की शक्ल मे बरबाद कर रहा होता है. असल मे तब वो आपके तापमान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा होता है. जो आपकी जान बचाने के लिये उस समय ज्यादा जरूरी है.
उसके बाबवजूद अगर आपने कोइ जहरीली चीज खा ली तो तुरंत कई लीटर पानी उबकाई की शक्ल मे भी बाहर आ सकता है, यह सब पानी उसने कंहा से पाया.  सिम्पल, इसे उसने शरीर के दूसरे अंगो से जबरदस्ती हासिल किया. इसे ही राशनिंग कहते है. कब किस अंग को कितना पानी देना है इसका निर्णय लगातार हमारा शरीर लेता रहता है. इसलिये आप इतना पानी पीते रहे की हर समय शरीर में इतना पानी बना रहे की उसे राशनिंग की कम से कम जरूरत पडे. क्योंकी राशनिंग का सबसे पहला असर किडनी फिल्टर पर होता है. हो सकता है पानी की कमी के कारण आपकी पूरी पेशाब ही ना बने. जिसके कारण आपके शरीर का टाक्सिन जो पेशाब के रास्ते आसानी से निकल सकते थे, उनके पूरी तरह ना निकलने के कारण वो बिमारी का कारण बन जाये. 
दुर्गंध युक्त पीली, कथ्थई पेशाब शरीर मे पानी की कमी का संकेत हो सकता है. पानी की लगातार कमी  हमारे कुछ अंगों पर बहुत बुरा असर डालती है. अब पेनक्रिया को ही ले ले इसका हमारे हमारे भोजन के पाचन मे और शरीर में शुगर नियंत्रण मे सबसे बडा हाथ है. अगर हम लगातार कम पानी पीती रहे तो कुछ समय बाद पेनक्रिया कमजोर हो जायेगा. जिसके कारण पहले हमारा पाचन प्रभावित होगा और उसके बाद शुगर नियंत्रण प्रणाली कमजोर हो जायेगी और नतीजा डायबटीज, एसीडीटी और ना जाने क्या क्या.
हमारे खून का PH 7.35 से 7.45 के बीच रहना चाहिये अगर यह 7.35 से कम हो जाता है तो खून अम्लिय (acidic) माना जाता है और अगर यह 7.45 से उपर हो जाता है खून क्षारीय (alkaline) माना जाता है और दोनों ही स्थति मे इसके हमारे शरीर पर गंभीर प्रभाव होते है इसलिये हमारी क़िडनी लगातार इसको नियंत्रित करती रहती है और अतिर्रिक्त अमल्ता या क्षार को पेशाब के द्वारा निकालती रहती है. पर इसके लिये उसे भरपूर मात्रा मे पानी चाहिये होता है.
अगर पानी की कमी बनी रहे तो अमल्ता को नियंत्रित करने के लिये हड्डी मे से कल्सियम लेना शुरू कर देती है और नतीजा ओस्टो प्रोसिस की पूरी संभावना बन जाती है. इसी तरह ब्ललड प्रेशर के कंट्रोल मे भी पाने का बडा महत्व है.   
पानी खाली पेट आसानी से पच जाता है यानी की आंतो द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है. इसके लिये उसे ज्यादा से ज्यादा 20 से 40 मिनिट का समय लगता है शायद इसीलिये हमारे बुजर्गों ने सुबह की शुरूआत भरपूर पानी पीकर करने की सलाह से दी. जिससे रातभर में हुई पानी की कमी को शरीर आसानी से पूरा कर सके.   
भोजन के दौरान या उसके तुरंत बाद पिया गया पानी किये गये भोजन का हिस्सा बन जाता है और वो उस भोजन के साथ ही पचेगा और पाचन को धीमा कर देता है. इसलिये अकसर भोजन के साथ लिया गया पानी पाचन पर अतिरिक्त बोझ साबित होता है और पाचन को कमजोर बनाता है. इसलिये इसे उस समय विष के समान माना गया. 
अच्छा हो की आप पानी को भोजन से आधा घंटा पहले भरपूर मात्रा में पी लें जिससे भोजन शुरू करने से पहले ही वो पानी आसानी से पच जाये. इसी तरह खाने के 1 घंटे के बाद आप भरपूर मात्रा मे पानी पी सकते है. इससे आपका पाचन दुरस्त बना रहेगा. इसके अतिरिक्त जब भी इच्छा हो गर्मा गर्म पानी पीते रहे.
गर्म पानी शरीर की मेटाबोलिक रेट बढा देता है और नतीजा आप बेहतर अनुभव करते है. मेरा अपना अनुभव यह है की गर्म पानी आपके वजन को घटाने मे भी मदद करता है. मेने बिना कीसी अतिरिक्त जिद्दो-जहद के आसानी से 6-7 किलो वजन कम कर लिया है. अब मे पहले से ज्यादा फिट हू स्वस्थ हू.
ध्यान रहे, प्यास लगना एक तुलनात्मक अहसास है, जरूरी नही की वो सही समय पर आपको चेतावनी सिगनल दें, इसलिये आप प्यास लगने का इंतिजार ना करे. अकसर जब हम किसी महत्व्पूर्ण कार्य मे लगे होते है तो हमे भूख और प्यास का पता भी नही चलता. पर इसका यह मतलब तो नही की हमारे शरीर को पानी और खाने की जरूरत ही नही है.
तो फिर क्यों ना भरपूर पानी पिया जाये. पानी धीरे धीरे स्वाद लेते हुये उसे आदर देते हुये पिया जाये. एक बात ओर समझ लीजिये चाय या काफी सादे पानी का विकल्प  नही है. सच तो यह है की चाय और काफी के रूप मे जो टाक्सिन लिया है उस टाक्सिन को निकालने मे ही शरीर को उस से दुगना पानी व्यय करन होगा.
आजकल जूस के नाम पर बजार में ना जाने क्या मिल रहा है. पेप्सी और कोला के नुकसान के बारे मे गूगल करो और खुद जान जाओ.  इसलिये इसे भी सादे पानी का विकल्प मानने की भूल ना करें.
अगर आपको नीचे दी गई लिस्ट मे से किसी एक से भी परेशान है,
·           मोटापा   
·           जोडो मे दर्द
·           हर समय थकान बनी रहना
·           सुबह उठने का मन नही करता है शरीर थका थका सा लगता है   
·           मांस पेसियों मे एंठन रहना
·           त्वाचा रूखी सूखी है
·           सिर मे रूसी
·           डायबटीज
·           क़िडनी इंफेक्शन  
·           जुकाम
·           सिर दर्द रहना  
·           पेट खराब रहना
·           एसीडीटी
·           अकसर कब्ज
·           हाथ पैर ठंडे रहना
·           पाइल्स
·           ब्ल्ड प्रेशर
तो अपने डाक्टर से इस बारे मे बात किजिये और पानी से इसके सबंध के बारे मे पूछिये.
इस बात पर जरूर बहस हो सकती है की पीने के पानी का तापमान क्या हो. कुछ लोग नोर्मल तापमान के पानी को पीने की सलाह देंगे तो कुछ ठंडा पानी पीने का, तो कुछ मेरे जेसे लोग गर्म पानी की. पर कोई भी पानी के महत्व को नजर अदांज नही कर सकता है.
लोग कहते है गर्मी में और गर्म पानी?...कोइ पागल ही एसा सोचेगा.
अजीब लोग है, गर्मी मे गर्म चाय पी सकते है पर गर्म पानी पीने को कहो तो! ..... भगवान ही एसी सोच वालों का भला कर सकता है. वेसे भी डाक्टरलोग पानी उबालकर पीने की सलाह देते है जिससे कि उसके अदंर मोजूद बेक्टिरिया और वायरस खत्म हो सके. अतंर सिर्फ इतना है की लोग उसके बाद उसे फ्रिज मे ठंडा करने के लिये रख देते है. जबकी मेरी सलाह है की उसे चाय की तरह गर्मा गर्म पिया जाये, कम से कम चाय की जगह तो इसे पिया ही जा सकता है.
मेने लोगों को दिन भर में 1 लीटर से भी कम पानी पीते हुये देखा है. उन्हे पता ही नही होता की उनके शारारिक कष्टों की वजह कम पानी पीना है और वो डाक्टरो के यंहा किसी रामबाड दवाइ की उम्मीद मे लाइन लगाये बेठें है.
अति महत्वपूर्ण : आप सुबह की शुरूआत चार से पांच गिलास ( 1 से 1.25 लीटर ) पानी पीने से करे. अगर इसके पीने से आपको चक्कर आने लगे, या हाथ पेरों मे सूजन आने लगे, या नाक से पानी बहने लगे  तो इसे आगे नही करना है और इस बारे मे अपने डाक्टर से बात करे क्योंकी यह कुछ खास बिमारी के लक्षण हो सकते है जेसे हाथ पेरों मे सूजन क़िडनी के ठीक से काम नही करने के कारण हो सकती है. इसी तरह नाक से पानी आना फेफडों की प्राब्लम के कारण हो सकता है और चक्कर आना न्यूरोलोजिकल परेशानी के कारण हो सकता है. 
उम्मीद है की एक महिने तक हर रोज 8 से 10 कप गर्म पानी जरूर पियेंगे. लेख लंबा हो गया है और आप मेरे फंडे से पूरी तरह पक गये है. इसलिये पानी के महातम पर आगे चर्चा किसी ओर दिन, पानी कब, केसे और कितना पीना चाहिये उसके बारे में आयुर्वेद मे विस्तार से समझाया गया है पर उस पर भी चर्चा अगले ब्लाग में.

यह लेख एक सलाह मात्र है. आपके लिये आपके डाक्टर की सलाह सर्वोपरी है.

Saturday, March 7, 2015

सार्वजनिक - यानी मन चाहा, गेजिम्मेदार उपयोग

हमारे यंहा सार्वजनिक का मतलब उसे बेशर्मी की हद तक इस्तेमाल करने का अधिकार और उसके रखरखाव का ठेका किसी ओर का ( यानी भगवान भरोसे). पानी के स्रोत चाहे वो नदी या तालाब का हो या भूमीगत हो सार्वजनिक होता है. इसलिये जिसे जेसा मौका मिला उसने उसका मनमर्जी से इस्तेमाल किया. उसको प्रदूषित करने मे हमने कोइ कसर नही छोडी. हमने बेशर्मी की हद तक उसे बरबाद किया है. 

Image result for clean water courseबुरा हो इन बिजली चलित पम्पों का जिन से हमने भूमीगत जल स्रोतों का बेहिसाब बेदर्दी से दोहन किया और एश की हद तक उसे बरबाद होने दिया. बुरा हो इन आधुनिक कमोडों का जो एक व्यक्ति के मल-मूत्र को बहाने के लिये कम से कम दिन भर में 30 से 40 लीटर पानी बरबाद करता है.  यह सच है की इन आधुनिक कमोडों के कारण अब हम घर मे ही मल मूत्र विसर्जित करने के बाबजूद घर को बदबू रहित रख सकते है. पर उसकी कीमत में हम किसी नदी तलाब या भूमीगत जल को जहर मे बदल रहै होते है. अपना मल मूत्र नदीयों तालाबों और भूमीगत जल स्रोतों मे मिलाकर जो फ्री था उसे जहर बना दे रहे होते है. सफाइ का एसा पागलपन की हर शहर हर दिन टनों साबुन नदीयों और तालाबों में बहा रहा है. साफ गोरी काया के लिये एसा का एसा पागल दिवानापन मिसाल हम इंसानों मे ही मिलेगी.
जब तक हमसे असली कीमत वसूल ना की जाये उसके महत्व का हम अंदाज नही लगा पाते. यह गलत फहमी  है की प्रकृति ने हमे हवा पानी और रोशनी मुफ्त दे दी है. इसका पता तो तब चलता है जब वो हमारे पास ना हो. क्या रेगीस्तान मे पानी उसने मुफ्त दिया है?
अब बेक्टीरिया वाइरस का एसा भय की हम दिनभर हाथों को धोते रहते है. इस डर से की अगर बिना धोये कुछ खाया या पिया तो हमारा अंत.  दिन भर TV यही सब दिखाता रहता है और हम यह सब देखकर साबुन एंटी सेप्टिक लोशन इस्तेमाल कर रहे है. हम भूल गये की हमारे स्वास्थ का राज हमारा अपना इम्यून सिस्टम है ना की साबुन और एंटीसेप्टिक लोशन और दवाइयां.
हम यह भी भूल गये की हमारे आसपास दिखाइ देने वाले पेड पौधे और प्राणी जगत के होने की वजह दिखाइ ना देने वाला एक भरापूरा जीता जागता माइक्रो जीव- बेक्टीरिया, फंगस, वाइरस से भरा संसार है जो हर समय ह्म सब को चारों ओर से घेरे हुये है यह हमारे अदंर है हमारे बाहर है उसमे से कुछ हमारे दोस्त है और कुछ दुशमन. हमारा  इम्यून सिस्टम इन्हे पहचानता और रात दिन इन पर निगाह रखता है जो हमारे दोस्त है उन्हे फलने फूलने देता है और जो दुश्मन है उन्हे शरीर से मार भगाता है.
Image result for clean water courseमाना की हमारा इम्यून सिस्टम जब किसी कारण से overburden हो जाता है तो हमे दवाइयों से मदद मिलती है, पर अगर इस मदद के हर समय मोहताज रहने लगे और अपने इम्यून सिस्टम पर भरोसा ना रहे, तो यह गंभीरतम मामला हो जाता है. बाजारवाद तो यही चाहता है की हमे अपने पर भरोसा ना रहे. हमारा डर इस बजार को फलने फूलने मे मदद जो करता है.

साफ सफाइ का अपना महत्व है पर इसे पूरे प्रपेक्ष मे देखना चाहिये क्योंकी हमारे घर के साफ होने का कोइ मतलब नही रह जाता अगर हमारा पास पडोस गंदगी का अबांर हो, हमारी करनी से नदी तलाब बरबाद हो रहे हों. 

Sunday, November 10, 2013

ICE- in case of emergency (...?.....)



उत्तरा खंड के वासी और और वंहा गये प्रयटक और तीर्थ यात्री गंभीर त्रासदी से गुजर रहे है. यह एक प्राकृतिक आपदा थी जिसने यह भीषण तबाही मचाइ. पर एसा पहले भी हुआ है और आगे भी होता रहेगा. क्योंकी एसा बहुत कुछ है जिस पर अब भी हमारा कोइ बस नही है. कुछ लोग इसके लिये बेतरतीव विकास और इंसानी लालच को दोष दे रहे तो कुछ लोग ग्रह-नक्षत्रों को.
यह भी सच है की अगर हमने कुछ एतिहियाती कदम उठाये होते तो इसकी गंभीरता को कम किया जा सकता था. हर बार की तरह हमारी सेनाओं ने एक बार फिर अपने को साबित किया की वो शांति के समय भी किस तरह अपने फर्ज को निभाने मे सबसे आगे खडी होती है.  वो शायद एसा इसलिये कर सकी क्योंकी वो इसके लिये प्रशिक्षित थी.
इसके साथ ही बहुत सारे NGO और देश भर मे मोजूद बहुत सारी स्थानिय संस्थाओं ने इसमे बढचढ कर मदद की. पर इसमे आपसी सामंजस्य का अभाव हम सब ने महसूस किया.
यह सच है की जिन पर यह गुजरी उसे शब्दों मे व्यक्त नही किया जा सकता पर एसे समय मे लोगों की थोडी सी मदद और हिम्मत फिर से अपने पेरों पर खडा मे एक अहम भूमिका अदा करते है. इसलिये यह समय उन्हे पहचानने का  भी है जो इस कष्ट के समय आपके साथ कंधे से कंधा मिलाये खडे है. जिन्होने समय पर हस सभंव मदद की. हम उन्हे पहचाने और उन्हे और मजबूत बनाने के लिये हर जरूरी कदम उठाये और उन्हे भी पहचानने जो इस त्रासदी की अनेक वजहों मे से एक थे.
इस त्रासदी से कुछ प्रमुख सबक जो मेरी समझ मे आये वो इस तरह है:

1.   खतरनाक और नाजुक स्थलों को पूरे देश मे चिन्हित करना और उन्हे खतरे के अनुसार ग्रेडिंग़ करना और उसकी सूचना सार्वजनिक करना और उससे जुडे खतरों के बारे मे आम नागरिकों को जागरुक करना.
2.   आपदा कंही भी और किसी भी रूप मे आ सकती है फिर वो चाहे भूकंप हो, दंगे हो, महा मारी हो, बाढ हो, सुनामी हो या फिर न्यूकिलियर रेडियेशन, ट्रेन एक्सीडेंट या फिर आंतकवादी हमला. हर नागरिक यह सुनिशिचित करे की उसे केसे इससे निबटने के लिये सहयोग करना है क्योंकी आप इस मुगालते मे ना रहे कि एसा आप के साथ नही हो सकता .
3.   आपदा प्रबंधन जरूरी नागरिक ट्रेनिंग का हिस्सा हो. इसे हम स्कूल शिक्षा मे शामिल कर बच्चों के लिये अनिवार्य कर सकते है. NCC को स्कूलों और कालेजों मे अनिवार्य किया जाये. कब तक शिक्षा को हम किताबी ज्ञान तक सिमित रखेगें.
4.   अति खतरनाक जगहों पर रहने वाले आम नागरीकों को जरूरी ट्रेनिंग देना. और यह सुनिश्चित करना की जो लोग अति खतरनाक जगहों पर पर जाना चाहते है उन्हे इसके लिये जरूरी ट्रेनिंग मिली हो.
5.   एसी व्यवस्था हो जिससे एसी जगहों पर लोगों का सही संख्या और लिस्ट का पता लग सके.
6.   शांति के समय moke drill  जिसमे आम नागरिक इसका हिस्सा हो , समय समय पर आयोजित की जानी चाहिये. जो हमारी तैयारी को सुनिश्चित करेगी. अब तक यह सिर्फ सेनाओं के लिये ही आयोजित की जाती है. या फिर कभी कभी फायर बिर्गेड इसको करती नजर आती है.
7.   सभी अपने मोबाइल मे उस जगह से संबधित आकस्मिक नम्बर जरूर स्टोर करे
8.   ICE(in case of emergency) के नाम से एसा नम्बर स्टोर करे जिसे अगर आप किसी मुसीबत मे फंस गये हो तो मददकर्ता आपके मोबाइल से उस पता कर उस नम्बर पर मेसेज दे सके. एसे समय मे बेहद किमती समय अकसर सही नम्बर पता करने मे नष्ट हो जाता है.

जेसे जेसे ओर सुझाव मुझे मिलते जायेगे मे उसे इस पोस्ट में उसे शामिल करता जाउग़ा.

Sunday, November 27, 2011

रिटेल मे FDI.. आपका स्वागत है जी

पिछले 2 दिन से टीवी और मिडिया मे पुर जोर से रिटेल क्षेत्र को प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के लिए खोलने का विरोध हो रहा है. यह विरोध सिद्धांतिक कम और सियासी ज्यादा है. क्योंकी हम सब सुविधा पसंद और आराम तलब लोग हो गये है. अब हमे वातानुकुलित माल की आदत सी हो गई है,  टीवी देखते हुये और बरगर पीजा खाते हुये बडी हो रही  युवा पीढी के लिये वो अब स्टेटस सिम्बोल है. जिस किसी की हेसियत उसमे खरीददारी करने की है वो वही करना चाहता है. और जो नही कर सकते है वो आइसक्रीम खाते हुये विंडो शापिंग का मजा लेते हुये उसमे एक दिन दिल खोलकर खरीद दारी करने का सपना  देखता है.


रिटेल क्षेत्र को विदेशी निवेशक कुछ वेसा ही बनाने में मदद करेगा जेसा आज कल के सुपर माल है. इन सुविधाओं की कीमत वो खरीददारों से ही वसूल करेगा. अगर ऐसा होगा तो उनके सामानों के दाम आज स्थापित छोटे दुकानदारों से ज्यादा होंगे. इसके बाबजूद कुछ लोगा गुंणवत्ता और सुविधा और स्टेटस के लिये वहाँ से ही खरीद दारी करना चाहेगे. आज उपभोक्ता का एक बडा समूह सुविधा और गुण्वत्ता और स्टेटस के लिये कोई भी कीमत देने को तैयार है. उसे जो यह दे देगा वो उसे अपने सिर आंखों पर बैठायेगा. इसलिये यह बजार अभी फिलहाल उन्ही के लिये है.

जो लोग छाती पीट कर रोने का नाटक कर रहे है वो नींद से जागे. और समय के साथ चले. वेसे भी 125 करोड़ की आबादी वाला ये देश बहुत बड़ा बाजार है. यहाँ हर किसी के लिये जगह है. पर टिकेगा वही जो उपभोक्ता के माप दंडो पर खरा उतरेगा. उपभोक्ता अब बदबूदार कीचड और धूल भरी सडकों, गायों और सुअरों की बीच खरीद दारी नहीं करना चाहता. वो अब अपनी मर्जी से और अपनी पसंद से माल खरीदना चाहता है क्या आप इसमे कोई मदद कर सकते है ...अगर नहीं ...!! तो जो करने को आ रहा है उसे आने दे.

हमने लाखों करोडों का काला धन विदेशों मे जमा करने मे शर्म नही की. उनकी संस्कृति को अपनाने मे कोई कसर नही छोडी. तो अब यह घडीयाली आंसू किस लिये. ?

अब आगे आगे देखो होता है क्या । मीडिया उनका,  दुकान उनकी माल उनका वो बार बार अपने माल को सबसे अच्छा बाताएगे  और तुम्हारे बाप दादाओ  ने जो खाया पिया उसे बुरा बाताएगे।  बेहिसाब पैसा आपके हीरो को देगे जो उनके माल को आपके लिए सबसे  अच्छा बाताएगे और उसके बाद आप उसे किसी भी की मत पर  खरीदने को मजबूर हो जायेगे फिर उसके लिए उधार लेना पड़े तो क्या ?
तुम ऊअनके लिए मात्र बाजार हो जिसके मालिक वो है।

 ॥ बच्चा ॥ अबे सालों ...इसे ही तो गुलामी कहते है॥
....happy shopping

दुर्बेश

Sunday, November 20, 2011

साइकिल..जरा याद इन्हे भी कर ले!

हमारे देश के मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्ग के युवा लोग साइकिल चलाने की सोच भी नहीं सकते, ये आधुनिकता के परिणाम ही है कि किशोर होते ही वे मोटर साइकिल और कार चलाना चाहते है और पैदल चलना या साइकिल चलाना अपनी शान के खिलाफ समझते है. जीवन मूल्यों मे यह बदलाव पिछले तीन दशक मे तेजी से हुआ है.

कुछ दशकों पहले फिल्मों में हीरो होरोईन साइकिल का प्रेम गजब का था. ये वो जमाना था जब साइकिल गली महोल्ले की शान होती थी. जब साइकिल खरीदी जाती थी तो उसकी खुशी में सबको मिठाई खिलाई जाती थी. बच्चे अपने पापा का शाम को दफ्तर से आने का बेसब्री से इंतिजार करते थे की कब पापा आयें और साइकिल चलाने को मिले. अगर उनके पास साइकिल होती तो वो शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में कोई झिझक महसूस नहीं करते थे. पिता खुश होकर अपने बच्चों को साईकिल इनाम में देते. स्कूल में जिस के पास साइकिल होती थी उसकी शान ही अलग होती.

जमाना बदल गया. साइकिल की जगह अब स्कूटी और मोटर साइकिल ने ले ली पिछले दो दशक में तो जेसे चार पहिया वाहनों की बाढ़ सी आ गयी है. ऐसे समय में साइकिल को अती गरीब की सवारी मान लिया गया है. इस गला काट जिंदगी में जब हमारे जीवन मूल्य तेजी से बदल रहे हो तो आपको मेरा साइकिल के बारे में बात करना अजीब लग रहा होगा. 

उन्नत देशों में साइकिल प्रेम बढता जा रहा है. कार चलाते चलाते और हवाई जहाज उडाते उडाते उन्हे अब इसकी अहमियत मालूम हो गई है. वेसे भी वहां के युवाओं और किशोरों में अब भी साइकिल प्रेम बाकी है. ये उनके यहां स्पोर्ट टीवी पर दिखाई जाने वाली प्रतियोगिता में उनके उत्साह को देखकर समझा जा सकता है. वहां की सरकारे साइकिल संस्कृति को बढावा दे रही है. व्यस्त मार्गों पर साइकिलों के लिए अलग से ट्रैक निर्माण तथा लोगों को साइकिल संस्कृति से जोड़ने के लिए पब्लिक और प्राइवेट वाहनों में साइकिलों को समुचित रूप से टांग सकने के लिए विशेष प्रकार के कैरियर लगवाना साइकिल के प्रति उनके समर्पण को दिखाता है. स्कूलों में साइकिल स्टंट के लिये विशेष साइकिल का प्रचलन और उसके लिये अलग से साइकिल ट्रेकस का निर्माण.

पश्चिम की बुराईयों को आसानी से हमने अपना लिया हमारे बुजुर्ग रात दिन उन बुराइयों क लेकर अपना सिर पीटते रह्ते है पर पता नहीं क्यों हम उनकी इस अच्छाई को क्यों नहीं अपना पाये. आज प्रदूषित महानगरीय जीवन शैली में साइकिल और भी प्रसांगिक हो गई है. अगर आपको लगता है कि साइकिल वहां सिर्फ गरीबों की सवारी है या इसे सिर्फ गांवों में चलाया जाता है तो आप गलत हैं । शायद आपको नहीं पता कि हालीवुड की सेलिब्रिटी मैडोना एक प्रसिद्ध साइकिल चालक हैं।

हमारे यहां तो सरकारी नियम और कानून सब साइकिल विरोधी है. यहां तक की ट्रेफिक हवलदार भी साइकिल सवार को पहले पकडता है. ट्रेफिक नियम साइकिल सवारों और पैदल चलने वालों के सबसे बाद में प्राथमिकता देते है. एसे में साइकिल केसे बनी रह पायेगी. धूल और कीचड से सनी गढों के बीच से गुजरती खस्ता हाल बरबाद सडकों से घिरे इन शहरों और कस्बों में साइकिलों के लिए अलग से ट्रैक एवं पार्किंग विकास एक मजाक सा लगता है.

यहां तक की सरकारी गेर सरकारी और अर्ध सरकारी संस्थानों में साइकिल पर आने वाले कर्मचारी को चार पहिया वाहन वाले से आने वाले कर्मचारी की तुलाना में बेहद कम कनवेंस एलाउंस मिलता है. जबकीइंधन बचाने और पर्यावरण बचानेके नाम पर उसे सबसे ज्यादा एलाउंस मिलना चाहिये. गेट पर खड़ा गेटकीपर भी साइकिल से आते कर्मचारी को हिकारत की नजरों से देखता है जेसे वो कोई कर्मचारी ना होकर चोर हो. पर कार को देखते ही तनकर स्लूट मारता है.

क्या आपने कभी सोचा है कि फैंसी जिम या उच्च प्रोफ़ाइल प्रशिक्षकों के बिना भी आप अपने आपको फिट रख सकते हैं । इसके लिये आपको सिर्फ कुछ देर साइकिल के पैडल घुमाने हैं । अगर चिकित्सकों की या शोधकर्ताओं की मानें तो फिट रहने के लिए साइकलिंग सबसे प्रभावी और कम लागत वाला नुस्खा है। साइकिल चलाना शरीर के लिए संपूर्ण व्यायाम है । साइकलिंग से रक्त का प्रवाह ठीक रहता है और यह आपके पैरों को सही आकार देता है । शहरी युवाओं में रीढ़ की हड्डी की समस्या बहुत ही आम है और साइकिल चलाने से आपकी रीढ़ की हड्डी को मजबूती मिलती है । अमेरिकी कॉलेज आफ स्पोर्टस मेडिसिन की पत्रिका में छपे शोध के अनुसार वो बच्चे जो साइकिल से स्कूल जाते हैं वो उन बच्चों की तुलना में ज्यादा सक्रिय होते हैं जो यातायात का कोई और साधन अपनाते हैं।


शहरों में एक सर्वे से पता चला की हमारे 70% से ज्यादा रोजमर्रा के काम 2 किलोँमीटर की परधी में हो जाते है. जो आसानी से साइकिल चलाकर हम पूरा कर सकते है. साईकिल एक जीरो फ्यूल वाली एक बेहद सबसे सस्ती सवारी जो आसानी किसी भी उबड खाबड सड़क पर निकल जाती है. क्या ही अच्छा हो की स्थानीय स्तर पर पार्षद अपने क्षेत्र में साइकिल और पैदल चलने वालों के लिये साफ और सुरक्षित पथ बनवायें. साइकिल प्रतियोगिता करा कर इसको किशोरों और यूवाओं में बढावा दे. पब्लिक वाहनों में एसी सुविधा हो जिससे उसमे साइकिल लादी जा सके जिससे गंतव्य पर पहुचने पर बाकी का सफर साइकिल से कर सके.

अब समय आ गया है कि हम साइकिल को पर्यावरण का दोस्त मानकर उसे सम्मान की दृष्टी से देखे और उसे चलाने वालों को पूरा सम्मान देते हुये उन्हे जाने की पहली प्राथमिकिता दे. हमारी सेहत का ख्याल रखने वाली हमारी सबसे अच्छी डाक्टर साबित हो सकती है. साइकिल चलाना अपने आप में एक विशेष अनुभूति होती है बशर्ते साइकिल चलाने वाले में इस विशेष अनुभूति का अनुभव करने की ललक हो

कुछ दिन हमने भी साइकिल चलाई थी और आफिस भी गये. पर इस दोरान जो झेला उसे फिर किसी दिन बयान करेगे. अभी तो फिलहाल बस इतना कह सकते है की इस देश के योजनाकारों और निंयताओं की नींद खुले और साइकिल जेसे छोटे छोटे पर अति महत्वपूर्ण पहलुओं पर उनकी नजरे इनायत हो. लाखों करोड रूपये पेट्रोल सब्सिडी पर फूंक देने वाली सरकार अब साइकिल पर भी ध्यान दे और साइकिल संस्कृति को बढावा देने के बारे मे गंभीरता से सोचे.   सब्सिडी के जाल मे उलझे इस देश को इससे थोडी तो राहत मिलेगी.