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Sunday, June 5, 2022

विश्व पर्यावरण दिवस 2022


 



हर वर्ष की तरह इस बार भी विश्व पर्यावरण पर सरकारे और पर्यावरणविद चिंता जाहीर करेगे और घड़ियाली आँसू बहाएगे , कुछ  पेड़ लगाते मुस्कराते चेहरों के साथ फोटो शेयर करेगे, फिर अपनी दुनिया मे लोटकर वही करने लगेगे जिसे ना करने का प्रण उन्होने इस दिन लिया होगा।  

गूगल से पता लगा की  विश्व मे हम इन्सानो की आबादी 750 करोड़ पार कर गई है......जय हो , अगर सब इसी तरह चलता रहा तो अगले कुछ दशक मे हम शायद 1000  करोड़ के मार्क को पार कर जाएगे ( शायद इसलिए कहा क्योंकी इसकी भी पूरी संभावना है की हम मात्र 200-से 300 करोड़ ही रह जाये).

ज्ञात इतिहास मे इतनी आबादी पहले कभी नही थी। जन्म दर  घटने के बाबाजूद आबादी बढ़ती जा रही है। हर गुजरते वर्ष के साथ आबादी का नया किर्तीमान। यह अप्रत्याशित बढ़ौती म्रत्युदर मे आई कमी के कारण है।

7500 मिलियन की इंसान की आबादी से लदा यह ग्रह बहुत तेजी से बदल रहा है, इस बदलाव में हम इंसानो का बहुत बडा हाथ है. जंगल के कटने से और प्राकृतिक स्रोतो का अत्यधिक दोहन, शहरों का कंकरीट जंगल, जल के प्रकरितिक स्रोतो की बरबादी.  हमारा ग्रह अब पहले जेसा नहीं रहा हम इन्सानों ने इसे बदल दिया है. 

पर क्या सिर्फ हम! 

हम ही नहीं ब्रह्मांड की और भी बहुत सी ताकते इस ग्रह को बदलती रहती है, सच तो यह है की हम इसे बदले या ना बदले इसे तो समय के साथ बदलना ही था, पर हम इन्सानो ने बदलाव बहुत तेजी से किया जो बदलाव हजारो सालो मे नही हुआ विज्ञान और टेक्नोलोजी की मदद से कुछ सदियो मे हो गया. इसलिये अब अगर हमे जीना है, तो हमे भी उतनी तेजी से बदलना होगा. 


जंगल खत्म हो रहे है यह भी सच है की हमने अपने रहने के लिये और खाने के लिये इन्हे बुरी तरह बरबाद किया...अगर हम यह नहीं करते तो क्या करते...7500 मिलियन लोगो को खाने और रहने के लिये यह सब शायद जरूरी था. पर  यह पूरा सच नही है आज भी हमारे जिंदा रहने के लिए प्रयाप्त है पर लालच और अहंकार की कोई सीमा नही है। सच तो यह ही की मात्र 10% ने  बाकी 90% का जीवन अपने लालच के कारण नरक बनाया हुआ है। इन 90% के लिए टेक्नोलेजी और विज्ञान एक अभिशाप बनाकर सामने लाने वाले  यही 10% है। 

भौतिकवाद और बजरवाद के मेल से हम जिस रास्ते पर जा रहे है उसमे चंद कुछ पेड़ लगाने से समस्या हल नही होगी, क्योंकी आज का अर्थ-तंत्र अधिकाधिक खपत पर टीका हुआ है। आज किसी देश की संपन्नता का माप ही यह है की उसके नागरीक कितनी आरामदायक वस्तुओं का इस्तेमाल करते है। 

हर गुजरते दिन के साथ यह खपत बढ़ती ही जाएगी, चाहे उसके लिए हम इन्सानो को एक और विश्व युद्ध  का समना  ही क्यो ना करना पड़े।  

इसलिए अब समय है की हम पेड़ लगाने से आगे की बात करे। कचरा निपटान की बात करे, कचरे को रिसायकिल करने की बात करे। उन्हे सम्मान देने की बात करे जो न्यूनतम खपत की जीवन शैली अपनाना चाहते है। क्न्योकी अगर 90% लोगो ने भी उन 10% लोगो की तरह जीवन जीने का मन  बना लिया तो ........?   

हम इंसानों ने जिंदा रहने की जिद्दो जहद में बहुत कुछ सीखा है और लगातार हम हर दिन कुछ ना कुछ नया सीख रहे है...नये उर्जा स्रोत पता करने, नया खाना...,हम में से कुछ लोग सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों मे अपने को जीने लायक बनाया। 

वो समय दूर नहीं जब हम घास को खाने लायक बना देगें. सीधे मिट्टी से हमारी फेक्ट्रीयां  पेड़ पोधों की तरह खाना बाना सकेगीं. वेसे भी हम मे से बहुत से लोग कीड़े-मकोड़े, साँप , कुत्ते-बिल्ली और ना जाने क्या क्या खा जाते है। इस दिशा मे अब और भी ज्यादा गंभीर होने  की जरूरत है । 

मिलावट खोरों से सावधान होने की जरूरत है जिस तरह से वो आज  यूरिया वाला दूध, खाने पीने की चीजो मे भरपूर रसायनों का प्रयोग कर रहे है वो हम सब के लिये अब चिंता का विषय होना चाहिए. इसे रोकने के लिए गंभीर कदम भी हमे ही उठाने होगे। 

हमे भी अब बदलती प्रस्थतियों के अनुसार अपने को ढालना होगा...यानी बढ़ते तापमान का सामना एसी चलाकर नही, उसकी जगह अपनी सहन शक्ति बढ़ाकर करना होगा, जल संकट,  सही ऊर्जा उपयोग।  

हम ही क्या जानवर भी अपने को बदलने में लगे हुये है ...अगर वो अपने को नही बदलेगे तो इतिहास बन जायेगे ...देखा नहीं आपने गाय भी अब हमारे द्वारा छोडा गया सडा गला खाना  सीख रही है, हो सकता है वो जल्द ही  प्लास्टिक को भी पचाने लगे. जंगली जानवर शहर की ओर भाग रहे ...अब अगर शेर को जीना है तो उसे हमारे साथ रहना सीखना होगा, वेसे ही जेसे कुत्तों ने हमारे साथ जीना सीखा. ...अरे आप तो बुरा मान गये.

अब हम सिर्फ शेर के लिये तो जंगल बचाने से रहे...अगर शेर को जिंदा रहना है तो उसे  भी बदलना होगा. अगर वो हमारी दया पर रहा तो जल्द ही इतिहास बन जाएगा, हमारे डार्विन बाबा ने तो यही बताया था । 

सब कुछ बहुत तेजी से घट रहा है. जो विकास हजारों सालों मे नही हो सका वो हमने कुछ दशकों मे कर दिया. इसलिये आम अदमी दुविधा मे है. समय के साथ यह दुविधा बढ़ती ही जायेगी. 

समय के चक्र को उल्टा घुमाना अभी तो असंभव है. इसलिये हमें अपने को बदलते समय के साथ खुद को बदलते रहना होगा अब चाहे वो बदलना जीवन मूल्यों का ही क्यों ना हो!

बाजारवाद और विज्ञान के मेल ने इंसानियत को ऐसे मुकाम पर ला दिया है की कुछ  ताकतवर अगर  लालची इंसानियत की दिशा और दशा तय कर रहे है। वो अर्ध सत्य का अपने लालच के  लिये खुलकर प्रयोग कर रहे है. वो अपने स्वार्थ के लिए  धार्मिक उन्माद, नस्ल वाद का खुलकर प्रयोग करते है इस सच को समझकर इसका सामना करना है और सोशल मीडिया के प्रदूषण से अपने मन को बचाए रखना है।  विशेषकर सोशल मीडिया पर मोजूद अधकचरे ज्ञान और अर्धस्त्य को गंभीरता से पहले परखे.

सच तो यह है की हमे पता ही नही चला की कब हम टेक्नोलोजी के सहारे गुलाम बना दिये गए । एक उम्मीद अब भी बनी हुई है की हम इसके प्रति जागरूक  होंगे और इसका सामना करेगे. आने वाले दिन शुभ हो  इस लिए आज का दिन हम गंभीरता से इस पर मनन करे।  

   


दुर्वेश


Sunday, June 5, 2016

क्या प्रकृति मनुष्य की दासी है



प्रकृति का जिस तरह से हमने दोहन किया है उससे लगता है की प्रकृति मनुष्य की दासी है, जिसे वह विज्ञान व टकनॉलॉजी के दम पर चाहे जैसा रौंद सकता है, लूट सकता है और उसके साथ बलात्कार कर सकता है। इसी के साथ यह भी मान लिया गया कि आधुनिक सभ्यता द्वारा विकसित हर टकनॉलॉजी श्रेष्ठ तथा अपनाने लायक है और प्रगति की निशानी है। आधुनिक टकनॉलॉजी के प्रति अंधविश्वास की हद तक भक्ति इसमें दिखाई देती है। 
अगर एसा ना होता तो हमे अपने चारों ओर लाखों टन इ-कचरा दिखाई  देने लगता. हर साल लाखों करोडो मोबाइल और लेपटाप की बैटरियां को कचरे की तरह हम डस्टबिन मे एसे फेंक देते है जेसे वो कोइ कागज का टुकडा हो. उसमे मोजूद हानीकारक रसायनों के प्रति हमारी इस कदर की उदासीनता एक गंभीर अपराध क्यों नही मानी जा रही है. इसी तरह वाहनों का कबाड हो या घर मे इस्तेमाल फ्रिज और टीवी और वाशिंग मशीन, इनकी उम्र पूरी होने के बाद हम नई खरीद कर पुरानी को भूल जाते है. कभी सोचा की उस पुराने का क्या होता है. पुरानी नजरों से दूर होते ही जेसे  हमारी उसके प्रति जिम्मेदारी खत्म हो गई. और उसके बदले नये के साथ हम आराम से जो है. 
हमारी भूमी, जल और वायु खतरनाक तरीक से प्रदूषित हो गई उसके विनाशकारी नतीजे लगातार सामने आने के बावजूद आत्मघाती राह पर हम लगतार उसे आगे बढ़ रहा है तो उसके दो कारण हैं। एक तो इनको आगे आगे बढ़ाने में साम्राज्यवादी देशों, कंपनियों, नेताओं, अफसरों व तकनीकशाहों के नीहित स्वार्थ हैं। मानव समाज का हित और भविष्य इनके मुनाफों, कानूनी-गैरकानूनी कमाई और अहंकार के सामने बौने पड़ जाते हैं। 
जैसे भारत में ही परमाणु बिजली के नए महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के पीछे अमरीकी, फ्रांसीसी व रुसी कंपनियों के स्वार्थ हैं, हमारे नेताओं ने इन भस्मासुरों को आधुनिक भारत के मंदिरकी उपमा दी। मंदिरों के भगवान की तरह आधुनिक टकनॉलॉजी एवं विकास को प्रतिष्ठित कर दिया गया और विवेक या तर्क को छोड़कर उसकी पूजा होने लगी। टकनॉलॉजी की यह अंधभक्ति इतनी प्रबल रुप में पढ़े-लिखे बौद्धिक समुदाय में छाई है कि इस पर सवाल उठाने वालों को कई बार अवैज्ञानिक, दकियानूसी, पीछे देखू व प्रगति विरोधी करार दिया जाता है।
यह सही है की  हमें बिजली चाहिए, कोयला, प्राकृतिक गैस, डीजल, नेप्था, परमाणु उर्जा या बड़े बांध - किसी से भी बिजली बनाएं तो समस्याएं पैदा होती हैं और फिर उनका विरोध होने लगता है। यह बिल्कुल सही है। इसका जवाब दो हिस्सों में है। एक तो यह कि उर्जा के अन्य सुरक्षित वैकल्पिक स्त्रोतों का विकास करना है। और समय के मानदंड पर जो उर्जा तकनीके खरी  उतरी हो उन्हे बढावा देना है. अभी तक साम्राज्यवादी देशों को पूरी दुनिया से कोयला, तेल, गैस व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने तथा प्रदूषण एवं पर्यावरण-विनाश करने की सुविधा इतनी आसानी से मिलती रही कि वैकल्पिक उर्जा के विकास व अनुसंधान पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। 
हमारा देश भी उन्हीं की नकल कर कोयला, प्राकृतिक गैस, डीजल, नेप्था, परमाणु उर्जा या बड़े बांध से आगे नही सोच पाया। बहुत देर बाद हमने सौर उर्जा जेसे विकल्पों के प्रति थोडी गंभीरता दिखानी शुरू की है.  आज  भी हम मांग के अनरूप सोर उर्जा सेलों के बनाने के लिये आधारभूत उद्योग नही लगा पाये. यह तरक्की भी चीन से आयातित निम्न  दर्जे  के सेलों के सहारे पर टिकी हुई है.  इस तकनीक में जन भागेदारी अब भी सरकारी आंकडो क खेल बन रही है. 

यदि बिजली पैदा करने में इतनी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, तो इसके अंधाधुंध उपयोग को भी नियंत्रित करना होगा। खास तौर पर बिजली व उर्जा के विलासितापूर्ण उपयोग व फिजूलखर्च पर बंदिशें लगानी पड़ेगी। इसके लिए आधुनिक जीवन शैली और भोगवाद को भी छोड़ने की तैयारी करनी होगी।
आधुनिक टकनॉलॉजी, आधुनिक जीवनशैली, उपभोक्ता संस्कृति, कार्पोरेट मुनाफे, वैश्विक गैर बराबरी, साम्राज्यवाद, पर्यावरण संकट - इन सबका आपस में गहरा संबंध है और ये मिलकर आधुनिक औद्योगिक सभ्यता को परिभाषित करते हैं
इनके विकल्पों पर आधारित एक नई सभ्यता के निर्माण से ही मानव और उसकी मानवता को बचाया जा सकता है तथा एक बेहतर व सुंदर दुनिया को गढ़ा जा सकता है। अभी तो फिलहाल पर्यावर्ण के नाम पर कुछ स्लोगन बनाना. लेख लिखना, और बहुत हुआ तो कुछ पोधों को रोप देना भर है. जेसे हम इस को मनाकर प्राकृति पर कोइ बहुत बढा अहसान कर रहे है. 


Saturday, March 7, 2015

सार्वजनिक - यानी मन चाहा, गेजिम्मेदार उपयोग

हमारे यंहा सार्वजनिक का मतलब उसे बेशर्मी की हद तक इस्तेमाल करने का अधिकार और उसके रखरखाव का ठेका किसी ओर का ( यानी भगवान भरोसे). पानी के स्रोत चाहे वो नदी या तालाब का हो या भूमीगत हो सार्वजनिक होता है. इसलिये जिसे जेसा मौका मिला उसने उसका मनमर्जी से इस्तेमाल किया. उसको प्रदूषित करने मे हमने कोइ कसर नही छोडी. हमने बेशर्मी की हद तक उसे बरबाद किया है. 

Image result for clean water courseबुरा हो इन बिजली चलित पम्पों का जिन से हमने भूमीगत जल स्रोतों का बेहिसाब बेदर्दी से दोहन किया और एश की हद तक उसे बरबाद होने दिया. बुरा हो इन आधुनिक कमोडों का जो एक व्यक्ति के मल-मूत्र को बहाने के लिये कम से कम दिन भर में 30 से 40 लीटर पानी बरबाद करता है.  यह सच है की इन आधुनिक कमोडों के कारण अब हम घर मे ही मल मूत्र विसर्जित करने के बाबजूद घर को बदबू रहित रख सकते है. पर उसकी कीमत में हम किसी नदी तलाब या भूमीगत जल को जहर मे बदल रहै होते है. अपना मल मूत्र नदीयों तालाबों और भूमीगत जल स्रोतों मे मिलाकर जो फ्री था उसे जहर बना दे रहे होते है. सफाइ का एसा पागलपन की हर शहर हर दिन टनों साबुन नदीयों और तालाबों में बहा रहा है. साफ गोरी काया के लिये एसा का एसा पागल दिवानापन मिसाल हम इंसानों मे ही मिलेगी.
जब तक हमसे असली कीमत वसूल ना की जाये उसके महत्व का हम अंदाज नही लगा पाते. यह गलत फहमी  है की प्रकृति ने हमे हवा पानी और रोशनी मुफ्त दे दी है. इसका पता तो तब चलता है जब वो हमारे पास ना हो. क्या रेगीस्तान मे पानी उसने मुफ्त दिया है?
अब बेक्टीरिया वाइरस का एसा भय की हम दिनभर हाथों को धोते रहते है. इस डर से की अगर बिना धोये कुछ खाया या पिया तो हमारा अंत.  दिन भर TV यही सब दिखाता रहता है और हम यह सब देखकर साबुन एंटी सेप्टिक लोशन इस्तेमाल कर रहे है. हम भूल गये की हमारे स्वास्थ का राज हमारा अपना इम्यून सिस्टम है ना की साबुन और एंटीसेप्टिक लोशन और दवाइयां.
हम यह भी भूल गये की हमारे आसपास दिखाइ देने वाले पेड पौधे और प्राणी जगत के होने की वजह दिखाइ ना देने वाला एक भरापूरा जीता जागता माइक्रो जीव- बेक्टीरिया, फंगस, वाइरस से भरा संसार है जो हर समय ह्म सब को चारों ओर से घेरे हुये है यह हमारे अदंर है हमारे बाहर है उसमे से कुछ हमारे दोस्त है और कुछ दुशमन. हमारा  इम्यून सिस्टम इन्हे पहचानता और रात दिन इन पर निगाह रखता है जो हमारे दोस्त है उन्हे फलने फूलने देता है और जो दुश्मन है उन्हे शरीर से मार भगाता है.
Image result for clean water courseमाना की हमारा इम्यून सिस्टम जब किसी कारण से overburden हो जाता है तो हमे दवाइयों से मदद मिलती है, पर अगर इस मदद के हर समय मोहताज रहने लगे और अपने इम्यून सिस्टम पर भरोसा ना रहे, तो यह गंभीरतम मामला हो जाता है. बाजारवाद तो यही चाहता है की हमे अपने पर भरोसा ना रहे. हमारा डर इस बजार को फलने फूलने मे मदद जो करता है.

साफ सफाइ का अपना महत्व है पर इसे पूरे प्रपेक्ष मे देखना चाहिये क्योंकी हमारे घर के साफ होने का कोइ मतलब नही रह जाता अगर हमारा पास पडोस गंदगी का अबांर हो, हमारी करनी से नदी तलाब बरबाद हो रहे हों. 

Wednesday, June 4, 2014

आधुनिक पैकेजिंग एक नई मुसीबत जो बन सकती है पर्यावरण के लिये वरदान?

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इलेक्टानिक सामान हो या मेकेनिकिल समान ग्राहक के पास पैकिंग के साथ दिया जाता है जिससे वो सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच सके. इन की पैकिंग में थर्मोकोल, पोलीथीन, रबर, लोहा, लकडी, प्लास्टिक इत्यादी का बहुतियात से इस्तेमाल होता है. इन में से अधिकांश को रिसायकिल किया जा सकता है, पर उसके लिये जरूरी है की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली सामग्री रिसायकिलकर्ता तक पहुंचाया जा सके.
पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली सामग्री उसके प्रकार के अनुसार आसानी से छांटी जा सकती हो तो इस बात की अच्छी संभावना है की वो रिसायकिलकर्ता तक आसानी से पहुच जायेगी, पर आजकल बहुत से सामानों की मिक्स पैकिंग होने लगी है,  जैसे टेट्रापैक डिब्बे में सीलबंद जूस या फिर सील बंद थेली में मिलने वाले चिप्स और नमकीन्. इन पैकों की खासियत है की इनमें मिक्स पैकिंग कुछ इस तरह होती है कि इसमें रखा खाद्य पदार्थ बिना किसी रासायनिक मिलावट के भी बहुत दिनों तक सुरक्षित रहता है. इनके उपर की गई आकर्षक प्रिटिंग ग्राहक को आसानी से अपनी ओर खींच लेती है.
इस तरह के पैक 5ml से लेकर  2000 ml के पैकों मे आसानी से दुकानों में उपलब्ध है. बजार मे इन पैकिंग को रिसायकल पैक की तरह बेचा जा रहा है. पर इन्हे बेचने और खरीदने वाले अधिकांश लोगों को नही मालुम की यह रिसायकल कैसे होगा और रिसायकल प्रक्रिया में उनका क्या रोल है. अब उदाहरण के लिये टेट्रापैक को लें ले, इन पैकों को बनाने मे पोलीथीन, एल्यूमिनियम और पैपर की पतली लेयर का इस्तेमाल होता है. इसकी बनावट कुछ इस तरह होती है की वो एक दूसरे को सहयोग देते हुये लम्बे समय तक बिना खराब हुये बने रह सकते है.  अब इन खाली पैकों को आजकल नदी, नालों, और तलाबों और यंहा वंहा बेने कूडे के ढेरों पर आसानी से देखा जा सकता है. अगर यह रिसायकिल हो सकते है तो इन जगहों पर यह क्या कर रहे है?
इस तरह के पैकों में इस्तेमाल हो रहे पोलीथीन, एल्यूमिनियम और पैपर की रिसायकिल प्रक्रिया अलग-अलग है पर इसके बारे में लोगों को कोइ जानकारी नही दी गई. दुकानदार भी इन्हे बेचकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है और ग्राहक भी इन्हे इस्तेमाल कर किसी कूडेदान मे फेंक कर सोचता है की उसने भी अपना काम पूरी जिम्मेदारी से कर दिया. इस नये पैक के सही निस्पादन के बारे मे ना जनता को जागरूक किया गया. जब तक माल बिकिता हो तो  ना उसे बनाने वाले को उसकी फिक्र है और ना ही बेचने वाले को उसकी फिक्र है.



अगर इस पर अभी ध्यान नही दिया तो तेजी से पोलीथीन को पीछे छोडते हुये यह हमारे लिये नम्बर एक मुसीबत बन जायेगें. यह सच है की इन्हे रिसायकल किया जा सकता है. पर इस रिसायकिल प्रक्रिया की एक महत्व्पूर्ण कडी खुद वो ग्राहक है जो इसे खरीदता है. क्योंकी उसे ही यह सुनिश्चित करना होगा की उसके इस्तेमाल करने के बाद खाली पैक रिसायकिल यूनिट तक सही सलामत पहुचे सके. अधिकतर दुकानदारों के पास डस्टबिन की सुविधा होती है जिसमें ग्राहक पीने या खाने के बाद खाली रैपर या डिब्बा उसमें फेंक देता है. इन डस्टबिन मे मिक्स कचरा होता है. जिसे बाद में किसी कचरे के ढेर पर खाली कर दिया जाता है और वो ढेर फिर कीसी बढे ढेर का हिस्सा बन जाता है. दुकानदार की दुकान साफ इसलिये ग्राहक भी खुश!
इस पूरी प्रक्रिया में रिसाकिलीकरण का क्या हुआ! यह कचरा सालों साल  एसे ही कूडे के ढेर पर पडा रहता है या फिर किसी नदी नाले पर तैरता रहता है, जानवरों के पेट मे जाता है, नालियों को चोक करता है. हो सकता है यह आज आप को मुसीबत ना दिखाइ दे रही हो पर कल का क्या. यह भले ही शहरी कचरे का मात्र 5% हो पर आगे चलकर हमारे लिये भारी मुसीबत साबित होगा. इस बात को आप लोग तो नही पर आपके शहर के सफाइ कर्मचारी और संवेदनशील नागरिक अच्छे तरह से समझ पा रहे है. सरकारी एजंसियों का पता नही वो कब जागेगी पर हमारे और आपके जागने का समय आ गया है. हमारे द्वारा उठाये गये छोटे छोटे कदम आने वाली भारी मुसीबत से छुटकारा पाने का आसान रास्ता बन सकते है. हम इसकी रिसायकिल प्रक्रिया को समझे और अपने बच्चों को समझाये क्योंकी वो इसके सबसे बढे उपयोगकर्ता है और आगे आने वाले समय मे वो ही इनके भुगतभोगी भी होंगे.
कुछ आसान से उपाय और यह मुसीबत हमारे लिये वरदान बन जायेगी. सबसे पहला कदम इन पैकिंग के प्रकार के अनुसार इन्हे अलग-अलग् कचरे के डिब्बे में डालने की आदत, अभी तक इसे प्लास्टिक या पपैअप्र के साथ मान लिया जाता था जबकी यह अपने आप मे अलग टाइप का कचरा है. इसे दूसरे कचरे के साथ मिक्स ना किया जाये. टेट्रापैक को कचरे के डिब्बे में डालने से पहले इनके कार्नर को सीधा कर इन्हे फ्लेट कर दिया तो ये ज्यादा जगह नही घेरते.
इसी तरह से थर्मोकोल का कचरा बहुत जगह घेरता है, पर यह आसानी से एसीटोन में घुल जाता है, इस तरह थर्मोकोल के बढे बढे टुकडों को आसानी से छोटे से क्यूब मे बदला जा सकता है. जिसे रिसायकिल यूनिट आप से खरीद सकती है.
अकसर बायोमास और प्लास्टिक, पोलीथीन और पैपर  को एक ही डिब्बे मे डाल दिया जाता है जो पूरी तरह गलत है, क्योंकी बाद मे इन्हे अलग करना लगभग असंभव हो जाता है. और अगर यह गंदे हो गये तो इन्हे साफ करने का खर्च अलग. इन्हे सही सलामत साफ सुथरी हालत में रिसायकिल यूनिट तक पहुचा दिया जाये तो इनसे पैपर, पोलीशीट, बोर्ड, बनाये जा सकते है. इसके लिये आप को रिसायकिल यूनिट इसके अच्छी खासी कीमत भी देती है.
इसके लिये अपने शहर मे चल रही रिसायकिल यूनिटों का पता करे. अगर आपके शहर मे रिसायकिल यूनिट नही है तो उसे स्थापित करायें. प्यार, सहयोग, जानकारी, और जुर्माना का उपयोग करते हुये लोगों को जागरूक करे. शुरूआत आप अपने घर से कर सकते है. पह्ले आप सुधरे फिर किसी दूसरे को सुधारने का जिम्मा लें. अगर रिसायकिल यूनिट आपके शहर मे नही हो तो मायूस ना हो इंटरनेट पर घरेलू स्तर पर रिसायकिल की जा सकने वाले ढेरों उपाय के विडियो मोजूद है. एक बार रद्दी पैपर वाले से भी बात करके देखे, मुझे पूरी उम्मीद है की वो इन्हे आप से अच्छी कीमत देकर खरीदेगा. आगर कीमता ना भी दे सका तो उसके चहरे पर अपके इस सहयोग के लिये मुस्कराहट तो होगी ही. 




Tuesday, June 3, 2014

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस क्या अहमियत है इसकी?


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विश्व पर्यावरण दिवस, ऐसा दिवस जो दुनिया वालों को याद दिलाता है कि उन्हें इस धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखना है, उसे अधिक बिगड़ने से रोकना है, उसे इस रूप में बनाए रखना है कि आने वाली पीढ़ियां उसमें जी सकें । लेकिन यह दिवस अपने उद्येश्यों में सफल हो भी सकेगा इसमें मुझे शंका है । काश कि मेरी शंका निर्मूल सिद्ध हो! कुछ भी हो, मैं पर्यावरण के प्रति समर्पित विश्व नागरिकों की सफलता की कामना करता हूं । और यह भी कामना करता हूं कि भविष्य की अभी अजन्मी पीढ़ियों को पर्यावरण जनित कष्ट न भुगतने पड़ें।
अभी तक वैश्विक स्तर पर अनेकों दिवसघोषित हो चुके हैं, यथा इंटरनैशनल वाटर डे’ (22 मार्च), ‘इंटरनैशनल अर्थ डे’ (22 अप्रैल), वर्ल्ड नो टोबैको डे’ (31 मई), ‘इंटरनैशनल पाप्युलेशन डे’ (11 जुलाई), ‘वर्ल्ड पॉवर्टी इरैडिकेशन डे’ (17 दिसंबर), ‘इंटरनैशनल एंटीकरप्शन डे’ (9 दिसंबर), आदि । इन सभी दिवसों का मूल उद्येश्य विभिन्न छोटी-बड़ी समस्याओं के प्रति लोगों का ध्यान खींचना, उनके बीच जागरूकता फैलाना, समस्याओं के समाधान के प्रति उनके योगदान की मांग करना है, इत्यादि । परंतु यह साफ-साफ नहीं बताया जाता है कि लोग क्या करें और कैसे करें ।
पर्यावरण शब्द के अर्थ बहुत व्यापक हैं । सड़कों और खुले भूखंडों पर आम जनों के द्वारा फैंके जाने वाले प्लास्टिक थैलियों और कूडे तक ही यह सिमित नहीं है। शहरों में ही नहीं गांवों में भी कांक्रीट जंगलों के रूप में विकसित हो रहे रिहायशी इलाके पर्यावरण को प्रदूषित ही करते हैं। भूगर्भ जल का अमर्यादित दोहन, नदीयों में मिलते शहरी नाले जहर और गंदगी घोल रहे है । हमारे शहरों एवं गांवों में फैली गंदगी का कोई कारगर इंतजाम नहीं है । ध्वनि प्रदूषण भी यदाकदा चर्चा में आता रहता है। जलवायु परिवर्तन को अब इस युग की गंभीरतम समस्या के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसी तमाम समस्याओं के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश की जा रही है एक दिवस मनाकर । क्या जागरूकता की बात सतत चलने वाली प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए ? एक दिन विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये पर्यावरण दिवस मनाना क्या कुछ ऐसा ही नहीं जैसे हम किसी का जन्मदिन मनाते हैं, या कोई तीज-त्योहार ? एक दिन जोरशोर से मुद्दे की चर्चा करो और फिर 364 दिन के लिए उसे भूल जाओ ?
मात्र जागरूकता से क्या होगा ? यह तो बतायें कि किसी को (1) वैयक्तिगत एवं (2) सामुदायिक स्तर पर करना क्या है ? समस्या से लोगों को परिचित कराने के बाद आप उसका समाधान भी सुझायें! कुछ दिन पहले कि बात है, क्रिकेट के एक दिवसिय मेच में प्रायजकों को अर्थ दिवस मनाने का सूझा...उन्होने मुस्कराते हुये क्रिकेटरों से साथ ग्लोब के पास फोटो खिचवाये. कुछ भावनात्मक लफ्फाजी की और फिर फल्ड लाईट में रात्री मेच शुरू ...यही उपभोक्ता वाद है. क्योंकी ऐसा कर खेलने वाला खुश खिलाने वाला खुश और खेल देखने वाला खुश. अगर उन्हे अर्थ दिवस की इतनी ही चिंता होती तो वो उस रात्री मेच के लिये जनता से माफी मांगते हुये उसे रद्द करते और मेच को दिन में कराते,. पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. अब आप बतायें ये किसे जागरूक बना रहे थे. 
चलिये आपने सब को जागरूक बना भी दिया तो प्रतिबद्धता एवं समर्पण कहां से लाएंगे ? क्या लोग वह सब करने को तैयार होंगे जिसे वे कर सकते हैं, और जिसे उन्हें करके दिखाना चाहिए ? उत्तर है नहीं । यह मैं अपने अनुभवों के आधार पर कहता हूं । मैं पर्यावरण की गंभीरतम समस्या जलवायु परिवर्तन का मामला एक उदाहरण के तौर पर ले रहा हूं । जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाने के लिए हम में से हर किसी को कार्बन उत्सर्जन घटाने में योगदान करना पड़ेगा, जिसका मतलब है कि जीवास्म इंधनों का प्रत्यक्ष तथा परोक्ष उपयोग कम से कम किया जाए । क्या आप कार चलाना बंद करेंगे, अपने घर का एअर-कंडिशनर को बंद करेंगे, कपड़ा धोने की मशीन का इस्तेमाल बंदकर हाथ से कपड़े धोएंगे, अपने विशाल घर में केवल दो-तीन सीएफएलबल्ब जलाकर गुजारा करेंगे, और हवाई सफर करना बंद करेंगे, इत्यादि-इत्यादि ? ये सब साधन जलवायु परिवर्तन की भयावहता को बढ़ाने वाले हैं । जिनके पास सुख-सुविधा के ये साधन हैं वे उन्हें छोड़ने नहीं जा रहे हैं । इसके विपरीत जिनके पास ये नहीं हैं, वे भी कैसे उन्हें जुटायें इस चिंता में पड़े हैं । कितने होंगे जो सामर्थ्य हो फिर भी इन साधनों को स्वेच्छया कहने को तैयार हों ? क्या पर्यावरण दिवस सादगी की यह भावना पैदा कर सकता है ?
वास्तव में पर्यावरण को बचाने का मतलब वैयक्तिक स्तर पर सादगी से जीने की आदत डालना है, जो आधुनिक काल में उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाने वाली चीज है। यह दिखावे का युग है, हर व्यक्ति की कोशिश रहती है कि उसके पास अपने परिचित, रिश्तेदार, सहयोगी अथवा पड़ोसी से अधिक सुख-साधन हों । यह मानसिकता स्वयं में ही स्वस्थ पर्यावरण के विपरीत जाती है।
जरा गौर करिए इस तथ्य पर कि पूरे विश्व का आर्थिक तंत्र इस समय भोगवाद पर टिका है । अधिक से अधिक उपभोक्ता सामग्री बाजार में उतारो, लोगों को उत्पादों के प्रति विज्ञापनों द्वारा आकर्षित करो, उन्हें उन उत्पादों का आदी बना डालो, उन उत्पादों को खरीदने के लिए ऋण की व्यवस्था तक कर डालो, कल की संभावित आमदनी भी आज ही खर्च करवा डालो, ये सब आज आधुनिक आर्थिक प्रगति का मंत्र है । हर हाल में जीवन सुखमय बनाना है, भले ही ऐसा करना पर्यावरण को घुन की तरह खा जाए ।
कुछ कार्य लोग अपने स्तर पर अवश्य कर सकते हैं, यदि वे संकल्प लें तो, और कुछ वे मिलकर सामुदायिक स्तर पर कर सकते हैं । किंतु कई कार्य केवल सरकारों के हाथ में होते हैं। पर इस सब से पहले यह तय करना जरूरी है कि उनके लिए आर्थिक विकास पहले है या पर्यावरण ? यह एक मजाक ही है कि एक तरफ पर्यावरण बचाने का संदेश फैलाया जा रहा है, और दूसरी ओर लोगों को अधिकाधिक कारें खरीदने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मैं कारको आज के युग के उपभोक्ता साधनों के प्रतिनिधि के रूप में ले रहा हूं । कार से मेरा मतलब उन तमाम चीजों से है जो लोगों को दैहिक सुख प्रदान करती हैं और उन्हें शारीरिक श्रम से मुक्त कर देती हैं । क्या यह सच नहीं है कि बेतहासा बढ़ती हुई कारों की संख्या के कारण सड़कों का चौढ़ीकरण किया जाता है, फ्लाई-ओवरों का निर्माण किया जाता है, भले ही ऐसा करने का मतलब पेड़-पौधों का काटा जाना हो और फलतः पर्यावरण को हानि पहुचाना हो ?
ऐसे अनेकों सवाल मेरे जेहन में उठते हैं । मुझे ऐसा लगता है कि पर्यावरण दिवस मनाना एक औपचारिकता भर है । मुद्दे के प्रति गंभीरता सतही भर है, चाहे बात आम लोगों की हो अथवा सरकारों की, शायद यही कारण है कि हम कुछ लोगों का विकास हर कीमत पर करना चाहते है उसके लिये अगर जंगल बरबाद होते हो तो हो, किसान बरबाद होते है तो हो. खेत बरबाद होते है तो होने दो!
आंकडे इस बात के गवाह है कि विश्व की आबादी के 20% लोग इस ग्रह की 80% प्राकृतिक स्रोतो को खत्म करने के लिये जिम्मेदार है. वो ओरों की चिंता छोड  अपने लिये  जिये जा रहे है. वहीं दूसरी तरफ हाशिये पर खडे 80% अधिसंख्य लोग इन 20% के लिये काम करते हुये  अपनी जिंदगी के लिये जूझ रहे है.  यही वो 20% लोग है जो दूसरों को तो पर्यावरण खतरा,  ग्लोबल वार्मिंग, सूखा, बाढ, उर्जा खत्म, ग्लेशियर खत्म.. तो पानी खत्म शेर खत्म तो जंगल खत्म …. हम खत्म!!!. का पाठ पढाते है और खुद एसी के लिये भी स्टेंडवाय पावर रखते है .
जब कोइ मुझे समझाता है की सडक पर कचरा फेलाना पर्यावरण के लिये नुकासान देह तो मुझे उसकी बात पर हंसी आ जाती है की उसे सडक पर धुंआ उडाता ट्रक दिखाइ नही देता और पोलीथीन का टुकडा दिखाइ देता है. और वो जनाब भी, जिसने  पोलीथीन सडक छोडा था उस पर भीरी जुर्माने की दुहाइ देते हुये कार मैं ए. सी. आन कर चल देता है. शायद यह भौतिकतावाद से उपजी नई संस्कृति है जो इस बात पर जोर देती है जब तक कानून ना हो तब तक उस अमल ना करो चाहे उसे करना कितना ही जरूरी हो, और जब कानून बना दिया जाये तो उससे बचने के बारे मे पहले सोचो, और जब बचने का कोइ रास्ता ना हो तो सिर्फ कानून से बचने के लिये जितना जरूरी हो उतना भर कर दो.
इस सब के वाबजूद 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाना है और उन जाने-अनजाने लोगों को याद कर उन्हे प्रोत्साहित करना है जो भले ही छोटा हो पर पर्यावरण बचाने के लिये गंभीर प्रयास कर रहे है. उस पर बात करना जरूरी है, क्योंकी बाकी के 364 दिन हम दूसरे कामों में अति व्यस्त जो है. कम से कम यह हमे बताता है की हम किस तेजी के साथ जैवीय संकट पैदा कर रहे है. इस लेख को लिखकर मैं अपने को अपराधमुक्त महसूस नहीं कर रहा हू...बल्कि अपराध बोध का अनुभव कर रहा हू...क्या जाने शायद यही अपराध बोध पर्यावरण संरक्षण के लिये कुछ ठोस करने को प्रेरित करे.




गिद्ध् भोज के after affects




जैसे-जैसे 5 जून नजदीक आ रहा है मेरे अदंर का पर्यावरण समर्थक नागरिक जोर मारने लगा है, इसके कारण मेरे आस पास होने वाली पर्यावरण विरोधी गतिविधीयों पर आजकल कुछ ज्यादा ही नजरे इनायत होने लगी है. अब देखो कल की ही बात है, मैं एक शादी मै गया था. मेजबान ने भव्य आयोजन किया था. उससे भी ज्यादा भोजन शानदार था पच्चीस से ज्यादा स्टाल लगे थे चाट से लेकर मटन कबाब तक, इडली से लेकर नूडल्स और आइसक्रीम से लेकर काफी तक सब मोजूद था.  हजार से ज्यादा लोग खाने के लिये जुटे थे. सब कुछ शानदार था फिर मेरा मन क्यों खट्टा हो गया एसा क्या देख लिया था उसने?
समारोह मे खाने की प्लेट और चम्म्च बोन चाइना की थी जो सेंट्रल टेबल पर सलाद के साथ करीने से सजी थी. पर उसके साथ स्टालों पर डिस्पोजेबल प्लास्टिक कप, प्लेट और  चम्मच का भरपूर उपयोग हो रहा था दो स्टालों पर थर्मोकोल के कप और प्लेट मे चाट और सूप सर्व किया जा रहा था. मैदान मे ड्स्टबिन रखे थे और लोग उसमे खाने के बाद बचे हुये खाने के साथ इन कप प्लेटों को डालते जा रहे थे और जेसे ही वो भरता केटरिग का आदमी तुरंत उसे वहां से उठाकर ले जाता और उसकी जगह  खाली कंटेनर रख देता. एक नजर मे देखने मे सब कुछ ठीक था, शानदार था लोग खाने का लुत्फ ले रहे थे...
पर मेरा नामुराद मन इतने से कंहा मानने वाला था. मै केटरिंग के आदमी के पीछे गया जिसने भरा हुआ कंटेनर उठा रखा था की देखें वो इसका करता क्या है. जो देखा उससे मेरा दिमाग चकरा गया पंडाल के पीछे उसने दो बच्चे बैठा रखे थे उन्होने भरे हुये कंटेनर से बोन चाइना की प्लेट और चम्मचे अलग की उन्हे अच्छी तरह से धोया और उसके बाद उस कंटेनर को दोनों ने मिलकर कूडे के ढेर पर खाली कर दिया.
उस कूडे के ढेर पर बचे हुये खाने से सरोबार प्लास्टिक, थर्मोकोल और पैपर प्लेट और गिलासों का अम्बार था और उसके आसपास कुत्ते और गायें जो खा कम और लड ज्यादा रहे थे. देखकर मुझे उल्टी आने को हुइ और मे वंहा से हट गया. अब मेरा मन इस शादी मे नही लग रहा था. बेमन से मेने अपने होस्ट को खाने के लिये धन्यवाद दिया और वर वधू को आशीर्वाद देकर घर वापस आ गया.
पर्यावरण समर्थक मन ने मुझे देर रात तक सोने नही दिया. क्योंकी मुझे मालुम है की इस छोटे से ढेर को कल सुबह एक बढे ढेर पर नगर निगम का आदमी फेंक देगा अगर उसने नही फेंका तो कुछ दिन बाद यह सडक पर उडते हुये नजर आयेगे या फिर किसी नदी नाले को को चोक कर रहे होंगे. इसी तरह तो हो रही है इस शहर की सफाइ... क्या इससे बेहतर नही हो सकता. वो दोनों बच्चे जो उस कंटेनर से बोन चाइना के प्लेट और चम्मच निकाल रहे थे और अगर वो उन्हे निकाल सकते थे, उन्हे धो और पोंछ सकते थे तो उन्होने प्लास्टिक और थर्मोकोल के साथ एसा क्यों नही किया.
जबाब आसान था. बोन चाइना की प्लेट और चम्मच मंहगी थी इस लिये उसे तो दुबारा इस्तेमाल के लिये बचाना था और बाकी सब उनके लिये कचरा था. हम सब को मालुम है की यही कचरा हमारे लिये खतरा बन गया है तो क्यों ना हम इनके इस्तेमाल पर एसे समारोह पर रोक लगा दें.
शायद इस शहर के लिये यह सभंव ना हो पर मेने आज यह प्रण ले लिया है की मै एसे समारोह मै प्लास्टिक और थेर्मोकोल से बने हुये कप प्लेट और चम्मच का इस्तेमाल तब तक नही करूगा जब तक मुझे यह विश्वास ना हो जाये की आयोजक इस्तेमाल के बाद उसका निस्पादन  सही ढंग से करेगें यानी की उसे रिसायकिल यूनिट तक सही सलामत  भेज देंगे. इस लेख के द्वारा मे आप सब से भी विनम्र आग्र्ह करूगा की आप लोग भी एसा ही करे. अपने दोस्तों और घरवालों को एसा करने को कहे. वेसे भी एसे समारोह मे डिस्पोजेबल का प्रयोग बंद होना चाहिये. नगर निगम एसे कचरे के लिये आयोजक पर जबरदस्त फाइन लगाये. जिससे एसा कचरा पैदा ही ना हो. 
इन समारोह में स्टील और बोन चाइना से बने कप प्लेटों और गिलास की ही इस्तेमाल करे और अगर एसा संभव ना हो तो उपवास का बहाना बना कर उस का विनम्रता से बहिष्कार कर दें. इस तरह कम से कम मेरी तरह उस अपराध बोध से तो बचेगें जिसने मुझे देर रात इस लेख को लिखने के लिये मजोअबूर कर दिया है. या फिर पत्तों से बनी दोना पत्तल क्या बुरी है. प्लास्टिक और थर्मोकोल से बनी कप प्लेटों और गिलास का इस्तेमाल तभी अच्छा है जब इन्हे रिसायकिल किया जा सके. ह्म सब यह अच्छी तरह समझ लें की यह अपने आप रिसायकिल नही होती इन्हे रिसायकिल करना पडता है और इसके लिये इन्हे रिसायकिल प्लांट तक भेजना पडता है, इसलिये अगर आप इन्हे रिसायकिल प्लांट तक भेजना सुनिश्चित नही कर सकते तो  इनके उपयोग से बचे.
जो लोग मान बैठे है कि इस कचरे से उनका क्या लेना देना, अगर समय पर सही कदम नही उठाये गये तो अनके लिये वो दिन दूर नही जब कचरा उनके घर के दरवाजे पर सडेगा और जिस जगह से वो निकलेगें सडी बदबू. उससे फेलती बिमारी. ना ना ...यह बद दुआ नही है ...भविष्य का सच है. अरे! क्या आपको यह सब अपने शहर मे दिखाइ नही दे रहा. अगर नही दिखाइ दे रहा तो कार के सीसे नीचे किजिये और अपने आसपास गोर से देखिये. हो सकता है की यह सब आपके घर से थोडी दूर पर हो रहा हो ...उसे आपके घर पर पहुचने में अब कितना समय लगेगा. एक बात अच्छी तरह से समझ लिजिये, यह मुसीबत हमने ही पैदा की है और इसका इलाज भी हमे ही करना है. अगर बडा कदम नही उठा सकते तो कम से कम छोटे-छोटे कदमों से शुरूआत करें और अपने आस पास के लोगों के लिये एक जिंदा मिसाल कायम करें.
यूथ हस्टल एशोसियेशन का मेंम्बर हू.  वो जब भी ट्रेकिंग कराते है तो उनमे शामिल होने वाले मेंम्बर को साथ में अपनी-अपनी  प्लेट और गिलास लाने का नियम सख्ती से पालन कराते है. एक छोटा से नियम पर गजब की ताकत है इस नियम में. वो लोग कितने टन कचरे को फेलाने के अपराध  से बच जाते है. हमसे अच्छे तो जेल के कैदी है जो खाने के बाद अपने कप और प्लेट को खुद साफ करते है जिससे वो दुबारा उन्हे इस्तेमाल कर सके. हमारे गांधी बाबा भी हमसे कुछ एसा ही करने हिदायत दे गये थे. काश हम इन समारोह मे भी कुछ एसा कर पाते. मुझे याद है पहले एसा ही होता था. पर जाने केसे हमारी इस अच्छी परपंरा को किसी की बुरी नजर लग गई. प्लास्टिक के कप प्लेटों में खाकर अपने को साहब समझने लगे. पर्यावरण तो एक व्यापक शब्द है, मुझे तो फिलहाल अपने आस पास सफाइ रहे इसकी फिक्र है पर इसका मतलब यह नही है की मै अपना कचरा कीसी दूसरे की जगह पर फेंक दू.
बायोमास वाला कचरा तो गुजरते समय के साथ अपने आप कुछ दिन मे सड-गल कर जमीन और हवा में मिल जाता है, पर प्लास्टिक, थर्मोमोकोल एल्यूमिनियमऔर् पोलीथीन से बने  टेट्रापैक, ग्लास, कप, प्लेट और थेलियां सालों साल तक जेसी है वेसा ही बने रहती है और जो बरबादी का नाजारा पेश करता है, उसकी कुछ पिक्चर मै नीचे दे रहा हू. इसलिये इसे अगर सही तरीके से रिसायकिल ना किया जाये तो हमारे लिये अभिषाप बन जाता है.
...अरे अपने शहर को साफ रखने मुहिम से नाता तो जोडिये, शुरू तो किजिये फिर देखना आपके अपने दिमाग से कितने आइडिया निकलते है.आज कुछ ज्यादा तो नही हो गया....!!

चलो अब मुझे भी नींद आ रही है बाकी अगले ब्लाग में फिर कभी




Saturday, May 31, 2014

पोलीथीन या पैपर बेग



पैपर बेग और पोलीथीन बेग मे से कौन सा बेहतर विकल्प है यह सवाल हर रोज हजारों लोगों के दिमाग मे उठता है एक बार फिर 5 जून को मनाये जाने वाले पर्यावरण दिवस पर इस सवाल पर चर्चा होगी और पोलीथीन और प्लास्टिक को दोषी बनाया जायेगा. इस लेख मे मेरी कोशिश दोनों के बारे मे उपलब्ध जानकारी का विशलेषण करने की है जिससे आप सभी अपने स्तर पर सही निर्णय ले सकें.
जब भी पोलीथीन और पैपर/जूट बेग के बीच चुनने की बात आती है तो आजकल पैपर और जूट बेग के इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है. इसके पक्ष मे दलील दी जाती है की पैपर /जूट बेग बायोडिग्रडेबल है और इसे रिसायकल भी किया जा सकता है, वंही पोलीथीन बायोडिग्रडेबल नही है. इसे अगर जानवर, चिडिया  खाले तो उसकी जान पर बन आती है. यह नालियां चोक कर देती है नदी और तालाब को गंदा कर पर्यावरण के लिये गंभीर खतरा बन जाती है. यह गंदगी हमारी आंखो को खटकती है. इधर उधर बिखरी पोलीथीन की पन्नियां भला किसको अच्छी लग सकती है.
प्लास्टिक केरी बेग पोलीथीन से बनाया जाता है. दुनिया भर में इसे खाद्य पदार्थ, दवा, और पानी को स्टोर करने के लिये सुरक्षित माना गया है. भारत में भी BIS मानक (refer IS 10146:1982 Reaffirmed on Feb-2003). के अंतर्गत इसे सुरक्षित माना गया है.   पोलीथीन Recyclable, reusable, light-weight, high strength, low carbon and water footprint, tear resistent, space saving, bacteria resistant, waterproof and tear resistant, सस्ता, सास्थ्यकर,  प्रयावरण के लिये सुरक्षित, कम उर्जा खपत के साथ साथ पैपर या जूट बेग से बहुत सस्ती होने के बावजूद यह आज हमे पर्यावरण की दुशमन नम्बर वन नजर आ रही है.
पोलीथीन रैपर और पैकिंग मिठाइ, नमकीन, ब्रेड, केक, बिस्कुट उद्योग और खान पान से जुडे दूसरे व्यवसाय जिसमें खाद्य पदार्थ को सुरक्षित रखना हो तो उसे पोलीथीन पैक किया जाता है. इसे आसानी से वेक्यूम् और नाइट्रोजन फिल पैक में भी बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके इस्तेमाल से खाद्य पदार्थ अब 6 महिने तक आसानी से स्टोर किया सकता है. हमारे देश और अन्य विकासशील देशों मे 10% से 15% प्रतिशत खाद्य पदार्थ खराब पैकिंग और स्टोर की वजह से खराब हो जाता है.  इसकी वजह से सीधा नुकासान तो होता ही है इसके सडने की वजह से निकली मिथेन और कार्बनडाइओक्साइड गेसों के कारण ग्रीन हाउस प्रभाव पर्यावरण पर उल्टा प्रभाव डाल रहा है. इस सच को हम नकार नही सकते की पोलीथीन रैपर के कारण आसानी से  खराब हो जाने वाले खाद्य पदार्थ को भी अब अधिक दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है. दूर दराज के इलाकों मे इसे सुरक्षित पहुचाया जा सकता है. बाढ और भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा के समय पोलीथीन पैक सुरक्षित खाद्य सामग्री, पानी, दवाइयां जीवनरक्षक का काम करती है.
यह सच है की आज पालीथीन पर्यावरण के लिये खतरा साबित हो रही है, पर क्या इसके लिये हम पूरा दोष पालीथीन को दे सकते है? सच है की जो जानवर इसे खा जाते है उनके जीवन के लिये खतरा साबित होती है इससे नालियां चोक हो जाती है. इधर उधर बिखरी पालीथीन की पन्नियां  देखने मे किसी को भी अच्छी नही लगती.
यह तो पोलीथीन निष्पादन का दोष हुआ क्योंकी हम शान से इसे कंही भी फेंक देते है जेसे आजाद देश मे हमारा यह जन्म सिद्ध अधिकार हो. इसे सही ठिकाने लगाने का काम नगर निगम का अदना से सफाइ कर्मचारी को दे दिया गया है. वो गरीब भी क्या करे बायोमास के बदबूदार कचरे मे से वो पन्नियां केसे अलग करे?
 मजबूरी मे वो भी इसे अनदेखा कर कूडे के ढेर पर पटक देता है या फिर यहां वहां उडती हुई पन्नियां कभी नाली को जाम कर देती है कभी नदी तलाबों के तैरती नजर आती है. जिस पोलीथीन को आसानी से रियासकल किया कजा सकता था हमारी गलत आदतों के कारण हमारे लिये खतरा बन गई. अब इसके लिये हम अपनी आदतों को सुधारे या फिर अपनी शाही आदर्तों को बरकरार रखते हुये पैपर और जूट बेग को अपना कर उस से बढे खतरे को अपने गले लगा लें! 
हमारी इस बेवकूफी को सही निराकरण पर्यावरणवादी और पर्यावरण को समर्पित हमारी सरकार को कागज या जूट से बने बेग के उपयोग मे दिखाइ देता है. इसे इस्तेमाल करो और फिर सडने के लिये इसे कंही भी फेंक दो यह जाने बिना की जब यह सड्ता है तो पर्यावरण का ज्यादा नुकसान करता है. यह नुकसान हमे समझ मे नही आता क्योंकी हमे दिखाइ नही देता. पोलीथीन पन्नियां हमे दिखाइ दे रही है शायद इसलिये हमारी आंखो मे ज्यादा खटक रही है.
यह सही है की पैपर रिसायकल हो सकता है पर क्या आपको मालुम है कि हमारे नदी नालों को प्रदूषित करने मे पैपर उद्योग का बडा हाथ है. सच तो यह है की पैपर या जूट बेग पोलीथीन से कंही बडा खतरा है क्यों विशवास नही होता ना? नीचे दिये आंकडों पर गोर करने से यह बात आसानी से समझ आ जायेगी. 

Weight
140 lbs.
15 lbs.
Cubic Feet
17.8 cu. feet
0.4 cu. feet
Cost
8 to 10 times
Biodegradable?
yes
yes
Recyclable?
yes
yes
Air Emissions
3.225 lbs. solids
1.62 lbs. solids
Petroleum used
3.67 lbs.
1.62 lbs.
BTUs required
1,629,000
649,000
Indefinite recycled life?
no
yes
CEII (Composite Environmental Impact Index)
77.69
6.46

   



Energy (GJ) for manufacture
29
67


Air pollution
 
 


SO2
9.9
28.1


NOx
6.8
10.8


CHx
3.8
1.5


CO
1
6.4


Dust
0.5
3.8


Waste water burden
 
 


COD
0.5
107.8


BOD
0.02
43.1


अगर उत्पादित बेग को दुकानदारों तक उपयोग के लिये पहुचाने पर होने वाले ट्रंसपोर्टेशन का पर्यावरण के असर को भी शामिल कर ले तो पैपर और जूट बेग के लिये स्थति और भी खराब हो जाती है. पैपर उद्योग को बढावा यानी जंगलों का और तेजी से सफाया. प्लास्टिक बेग की तुलना में  जूट या पैपर् बेग की बनाने में तीन गुना ज्यादा उर्जा की खपत होती है. इसके बावजूद जब जूट बेग के सडने से  मिथेन और कार्बनडाइओक्साइड गेसें निकलेगी उसका दुषप्रभाव क्या होता है यह भी हम सब को मालूम है.
लोगों द्वारा कूडा कचरा केसे भी और कंही भी फेंक देने से रोकने का काम किसका है. क्या इसके लिये भी हम को पुलिस का डंडा चाहिये. क्यों नही उस क्षेत्र की साफ रखने की नैतिक जिम्मेदारी उस जगह के आसपास या उसका उपयोग करने वालों के उपर डाली जाये. और जो ना करे उस पर भारी जुर्माना. यूरोप और अमेरिका, सिंगापुर, जिन शहरों की सफाइ की दुहाइ हम देते है वंहा गंदगी फेलाने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है. इसी जुर्माने की डर से लोगों ने कचरा सही तरह से ठिकाने लगाना शुरू किया और अब वो उनकी आदत बन गया है.
बुराइ पोलीथीन बनाने या इस्तेमाल में नही है बल्की इसके इस्तेमाल करने के बाद उसके निस्पादन के तरीके मे है. हम खराब आदत से मजबूर कचरे को मिक्स कर देते है यानी की बायो कचरे के साथ प्लास्टिक कचरा जिसे बाद मे अलग करना असंभव हो जाता है या फिर बेहद मंहगा साबित होता है. हम यह समझ लें की प्लास्टिक बेग अपने आप मे इतनी बडी समस्या नही की उसकी जगह हम पैपर बेग या जूट बेग को इस्तेमाल करने को मजबूर हो जाये समस्या की जड तो हमारी गलत आदत है. अगर पोलीथीन को कंही भी फेकने की जगह उसे सही कचरे के डिब्बे मे डाला जाये तो समस्या ही नही बचती. अगर सफाइ कर्मचारी मिले जुले कचरे को उठाने से ही मना कर दे और रहवासियों को कचरे के किस्म के अनुसार अलग अलग डिब्बे मे डालने पर जोर दे तो समस्या ही ना रहे.
क्या आपको पता है की पालीथीन और प्लास्टिक कचरे से कमाइ हो सकती है. अगली बार भंगार वाला  जब आपकी गली में आवाज लगाये तो उससे इस बारे मे बात करके देखना.
हम सब को मालुम है की पोलीथीन और प्लास्टिक पेट्रोलियम उत्पाद से बनते है, वही जिससे पेट्रोल और डिजल बनता है. 93% पेट्रोलियम इधंन के रूप में इस्तेमाल होता है मात्र 4% ही प्लास्टिक या पोलीथीन बनाने मे इस्तेमाल होता है. हर बार बहस का मुद्दा होता है की प्लास्टिक और पोलीथेन का इस्तेमाल होने के बाद उसके कचरे का निस्पादन केसे होगा. अगर 4% प्लास्टिक कचरे को अंत भी इधन के रूप् मे जला दिया जाये तो क्या बुराइ है!
पोलीथीन को पूरी तरह से रिसायकल किया जा सकता है, अब तो प्लास्टिक और पोलीथीन कचरे को सडक बनाने मे भी इस्तेमाल होने लगा है और उसके उतसाहवर्धक नतीजे मिल रहे है.
पैपर और जूट उद्योग का पानी के स्र्तों को दूषित करने में बडा हाथ है. आजकल पैपर बेग या पैपर कोन/ ग्लास को बनाने मे एसे पदार्थों का इस्तेमाल होता है जो इसे तुरंत सडने से रोकते है, इसके कारण यह भी नालियों को चोक करते है. सडे-गले कागज से मिथेन उत्सर्जित होती है जो कार्बनडाइओक्साइड  से 20 गुना ज्यादा हानीकारक है.
पैपर बेगे के पक्ष मे कहा जाता है की पैपर रिसायकल किया जा सकता है. पर क्या आपको मालूम है रिसायकल पैपर नये पैपर से ज्यादा मंहगा होता जिसे सरकारी अनुदान देकर सस्ता किया जाता है. माना की  रिसायकल पैपर को बनाने में नये पैपर की तुलना मे कम पनी की खपत होती है. पर इंधन की खपत करीब 31% ज्यादा होती है.
अगर एक परिवार पोलीथीन बेग को साल भर के लिये पूर्णत: रोक लगा दें तो साल भर में वो 1 लीटर तेल की बचत कर पायेगा जो आसानी से हर रोज आधा  किलोमीटर गाडी कम चला कर या 40 वाट के बल्ब को 30 मिनिट हर रोज कम जलाकर भी इस कमी को पूरा किया जा सकता है.
मै मानता हू की हमारी बहुत सी पर्यावरण  समस्याओं की तरह पोलीथीन / पैपर बेग की समस्या का हल आसान नही है, पर हम सब के सम्मलित पर ठोस प्रयास अच्छे नतीजे ला सकता है. अपनी आदतों मे थोडा सा सुधार लाकर हम पोलीथीन को अपना और पर्यावरण का दोस्त बना सकते है.
इसके लिये हमे, हमारी कचरा फेलानी की नबाबी आदत से निजात पानी होगी. कचरा निस्पादन के लिये उचित प्रबंधन पर ध्यान देना होगा. देखा जाये तो शहरो द्वरा उत्पन्न कचरे मे मात्र 5% ही प्लास्टिक कचरा होता है. बाकी का कागज, मिट्टी, डायपर्स बायोमास होता है इसलिये पोलीथीन पर रोक इसका सही इलाज नही है उल्टा इसके बंद होने से स्थति और बिगडेगी. इसका सही इलाज हम सब मे उचित आदत का विकास है, जो कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही डिब्बे मे डाले और सही समय पर और सही तरीके से कचरे का प्रबंधन करे. जेसे बयोमास से बनी अच्छी खाद से हाजारों करोड रूपये की बरबादी को सीधे सीधे बचाया जा सकता है.
हम प्रण लें की :

1.     ह्म पोलीथीन और पैपर बेग के अति प्रयोग से बचेगें.
2.     पोलीथीन को प्राथमिकता देगें पर उसके निस्पादन को भी सुनिन्श्चित करेगें.
3.     जब पोलीथीन बेग का सही निस्पादन करने में संदेह हो, तो ही हम पैपर बेग का इस्तेमाल करेगें.
4.     कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही कचरे के डिब्बे मे डालेगें.
5.     अच्छा हो की दुकानदार केरी बेग के लिये ग्राहक से पूछे. जब तक ग्राहक ना मांगे उसे पोलीथीन या पैपर बेग देने से बचे. अगर ग्राहक बेग मे लेने से मना करे तो उसके लिये उसे धन्यवाद दें.
6.     सामान की अतिरिक्त पैकिंग से बचे. हम अकसर पहले से ही पैक किये सामान को एक बेग में और फिर वो बेग दूसरे बेग मे डालते है, जब की उस सामान को कुछ दूर खडी गाडी में रखना भर होता है.
7.     हमारी गलत आदतों के कारण सरकारी एजंसियों को मजबूरन बाजार मे 40 माइक्रोन से कम मोटाइ की पोलीथीन बेग पर रोक लगानी पडी जबकी 10 से 15 माइक्रोन की पोलीथीन भी एक सामान्य पैपर बेग का आसानी से मुकाबला कर सकती है. बस हमे इतना करना है की इस्तेमाल के बाद उसे सही कचरे के डिब्बे मे डालें.  
8.     हम कचरे को पोलीथीन में डालकर उसे सीधे कचरे मे डाल देते है. एसा कभी ना करें. पोलीथीन बेग के कचरे को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डालने के बाद पोलीथीन को भी उसके लिये किये गये नियत डिब्बे मे डाल दें.
9.     हम अकसर घरों मे पैदा होने वाले कचरे को पोलीथीन मे भर देते है और फिर उस कचरे को पोलीथीन के साथ ही कचरे की डिब्बे डाल देते है. जो गलत है. इससे पोलीथीन और बायोमास एक साथ मिसक्स हो जाता है जिसे बाद मे अलग नही कर पाते. हमें पोलीथीन मे मोजूद गंदगी को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डाल कर पोलीथीन को भी उसके सही कचरे के डिब्बे डालना चाहिये.
10.  100% रिसायकल हो सकने वाली पोलीथीन का फायदा समाज को दें.