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Thursday, July 7, 2022

मंथन- सच की आवाज बनिए

 कुछ दिन पहले वाहटस एप पर एक मेसेज मिला ...की सच को चीखने की जरूरत नही होती, सच सनातन है, सच की जीत होती है इत्यादी-इत्यादी...  सच क्या है यह केसे समझ मे आयेगा, क्योंकी यह जरूरी नहीं की आप का सच  किसी दूसरे का भी सच हो. यह तो किसी घटना को देखने का अपना  अपना नजरिया है. अब जंहागीपुरी के दंगे को ही देखो.  सबका अपना अपना सच होगा. अब आप ही बताइये आप के हिसाब से क्या सच है ?

जनाब जो चीख चीख कर बोलेगा उसे ही तो सुना जाएगा। अगर आप अपने  सच को आवाज नहीं दोगे तो, दूसरा जो चीख चीख कर बोल रहा है और उसे साबित करने के लिए उसके पास संख्याबल है, तो दुनिया उसे हे सच मानेगी, इसे ही लोकतंत्र कहते है .

एक और उदाहरण, बैंक से उधार लें सत्ता के करीबी एक ग़रीब ने एयर पोर्ट ख़रीदा और फ़िर महान सरकार ने उस गरीब का बैंक कर्ज  को माफ़ करा दिया। ! अब आप करते रहिए सच और झूठ का पोस्टमार्टम।


करोना को ही लिजिये। करोना का सच क्या है। मेरा सच यह है की एक साधारण से जुकाम को करोना का नाम दे दिया। हर होने वाले मौत को करोना मौत बताने का इंतिज़ाम किया और डर दिखाकर, धमकाकर पूरे देश का लोक डाउन करा डाला..?

कुछ लोगो का यही सच है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतने चुतियापे के बाद वो कैसे सरकार में बने रहते। यानी इस बारे मे मेरा सच सब लोगो का सच नहीं है। उनका सच बो है जो मीडिया और सरकार ने  बताया।

अब तो लोग मुझे भी सुनाने लगे हैं की सारा विश्व जिस की चपेट  में था वो तुम्हें दिखाई नहीं देता क्या। हज़ारो मौत तुम्हें दिखी नहीं। तुम्हारे अपने मरते तो तुम्हें पता चलता ...एसा ही और ना जाने क्या-क्या सुनने को मिला। अब उन्हे केसे बताउ की … उन्हे वो नहीं दिख रहा जो मुझे दिखाई दे रहा है। 


जो लीग लाशों को उठा रहे थे, मरीजो की दिन रात सेवा कर रहे थे , जो दिन रात एम्बूलेस की सेवा दे रहे थे,  मेरीजो को ले जाते हुये उनकी सेवा करते कराते हुये वो उनके सबसे नजदीक होते थे , उन्हे छू रहे थे उन्हे सहारा दे रहे थे , उन्हे तो कब का इसका शिकार होकर स्वर्ग सिधार जाना चाहिये था।  अरे! उनके अपनों  ने  भी उन्हे छूने तक से परहेज कर लिया था, तब भी ये लोग उनकी सेवा कर रहे थे। कोई मुझे बताएगा की एसे लोग जो  दिन रात मरीजो की सेवा करा रहे थे उनमे से कितनों की मौत हुई ...क्योकी जिस तरह से इस बीमारी का डर दिखाया गया था उस हिसाब से उनमे से किसी को भी नही बचना चाहिए था।

 

सच तो यह है की कुछ लोगो के लिए यह मौका है, पैसा कमाने का, सत्ता हासिल करने का. एसे दरिंदो से अगर बचना है और अपने वजूद को बचाना है तो अपनी आवाज बुलंद करिए  .. सच और झूठ का फैसला आने वाले कल पर छोड़िए.  

सत्ता को हासील करने और उसे बनाए रहने के लिए वो एसी एसी क्र्रूरतम हिंसा को कर गुजरते है जिसे हम और आप सोच भी नही सकते,  पर वो हमसे अहिंसक विरोध की चाह रखते है।  और उसे भी हमे नही करने देना चाहते। वो अहिंसक  विरोध को भी पुलिस और सेना के उपयोग से दबा देना चाहते है।  


दुर्वेश


Sunday, June 5, 2022

विश्व पर्यावरण दिवस 2022


 



हर वर्ष की तरह इस बार भी विश्व पर्यावरण पर सरकारे और पर्यावरणविद चिंता जाहीर करेगे और घड़ियाली आँसू बहाएगे , कुछ  पेड़ लगाते मुस्कराते चेहरों के साथ फोटो शेयर करेगे, फिर अपनी दुनिया मे लोटकर वही करने लगेगे जिसे ना करने का प्रण उन्होने इस दिन लिया होगा।  

गूगल से पता लगा की  विश्व मे हम इन्सानो की आबादी 750 करोड़ पार कर गई है......जय हो , अगर सब इसी तरह चलता रहा तो अगले कुछ दशक मे हम शायद 1000  करोड़ के मार्क को पार कर जाएगे ( शायद इसलिए कहा क्योंकी इसकी भी पूरी संभावना है की हम मात्र 200-से 300 करोड़ ही रह जाये).

ज्ञात इतिहास मे इतनी आबादी पहले कभी नही थी। जन्म दर  घटने के बाबाजूद आबादी बढ़ती जा रही है। हर गुजरते वर्ष के साथ आबादी का नया किर्तीमान। यह अप्रत्याशित बढ़ौती म्रत्युदर मे आई कमी के कारण है।

7500 मिलियन की इंसान की आबादी से लदा यह ग्रह बहुत तेजी से बदल रहा है, इस बदलाव में हम इंसानो का बहुत बडा हाथ है. जंगल के कटने से और प्राकृतिक स्रोतो का अत्यधिक दोहन, शहरों का कंकरीट जंगल, जल के प्रकरितिक स्रोतो की बरबादी.  हमारा ग्रह अब पहले जेसा नहीं रहा हम इन्सानों ने इसे बदल दिया है. 

पर क्या सिर्फ हम! 

हम ही नहीं ब्रह्मांड की और भी बहुत सी ताकते इस ग्रह को बदलती रहती है, सच तो यह है की हम इसे बदले या ना बदले इसे तो समय के साथ बदलना ही था, पर हम इन्सानो ने बदलाव बहुत तेजी से किया जो बदलाव हजारो सालो मे नही हुआ विज्ञान और टेक्नोलोजी की मदद से कुछ सदियो मे हो गया. इसलिये अब अगर हमे जीना है, तो हमे भी उतनी तेजी से बदलना होगा. 


जंगल खत्म हो रहे है यह भी सच है की हमने अपने रहने के लिये और खाने के लिये इन्हे बुरी तरह बरबाद किया...अगर हम यह नहीं करते तो क्या करते...7500 मिलियन लोगो को खाने और रहने के लिये यह सब शायद जरूरी था. पर  यह पूरा सच नही है आज भी हमारे जिंदा रहने के लिए प्रयाप्त है पर लालच और अहंकार की कोई सीमा नही है। सच तो यह ही की मात्र 10% ने  बाकी 90% का जीवन अपने लालच के कारण नरक बनाया हुआ है। इन 90% के लिए टेक्नोलेजी और विज्ञान एक अभिशाप बनाकर सामने लाने वाले  यही 10% है। 

भौतिकवाद और बजरवाद के मेल से हम जिस रास्ते पर जा रहे है उसमे चंद कुछ पेड़ लगाने से समस्या हल नही होगी, क्योंकी आज का अर्थ-तंत्र अधिकाधिक खपत पर टीका हुआ है। आज किसी देश की संपन्नता का माप ही यह है की उसके नागरीक कितनी आरामदायक वस्तुओं का इस्तेमाल करते है। 

हर गुजरते दिन के साथ यह खपत बढ़ती ही जाएगी, चाहे उसके लिए हम इन्सानो को एक और विश्व युद्ध  का समना  ही क्यो ना करना पड़े।  

इसलिए अब समय है की हम पेड़ लगाने से आगे की बात करे। कचरा निपटान की बात करे, कचरे को रिसायकिल करने की बात करे। उन्हे सम्मान देने की बात करे जो न्यूनतम खपत की जीवन शैली अपनाना चाहते है। क्न्योकी अगर 90% लोगो ने भी उन 10% लोगो की तरह जीवन जीने का मन  बना लिया तो ........?   

हम इंसानों ने जिंदा रहने की जिद्दो जहद में बहुत कुछ सीखा है और लगातार हम हर दिन कुछ ना कुछ नया सीख रहे है...नये उर्जा स्रोत पता करने, नया खाना...,हम में से कुछ लोग सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों मे अपने को जीने लायक बनाया। 

वो समय दूर नहीं जब हम घास को खाने लायक बना देगें. सीधे मिट्टी से हमारी फेक्ट्रीयां  पेड़ पोधों की तरह खाना बाना सकेगीं. वेसे भी हम मे से बहुत से लोग कीड़े-मकोड़े, साँप , कुत्ते-बिल्ली और ना जाने क्या क्या खा जाते है। इस दिशा मे अब और भी ज्यादा गंभीर होने  की जरूरत है । 

मिलावट खोरों से सावधान होने की जरूरत है जिस तरह से वो आज  यूरिया वाला दूध, खाने पीने की चीजो मे भरपूर रसायनों का प्रयोग कर रहे है वो हम सब के लिये अब चिंता का विषय होना चाहिए. इसे रोकने के लिए गंभीर कदम भी हमे ही उठाने होगे। 

हमे भी अब बदलती प्रस्थतियों के अनुसार अपने को ढालना होगा...यानी बढ़ते तापमान का सामना एसी चलाकर नही, उसकी जगह अपनी सहन शक्ति बढ़ाकर करना होगा, जल संकट,  सही ऊर्जा उपयोग।  

हम ही क्या जानवर भी अपने को बदलने में लगे हुये है ...अगर वो अपने को नही बदलेगे तो इतिहास बन जायेगे ...देखा नहीं आपने गाय भी अब हमारे द्वारा छोडा गया सडा गला खाना  सीख रही है, हो सकता है वो जल्द ही  प्लास्टिक को भी पचाने लगे. जंगली जानवर शहर की ओर भाग रहे ...अब अगर शेर को जीना है तो उसे हमारे साथ रहना सीखना होगा, वेसे ही जेसे कुत्तों ने हमारे साथ जीना सीखा. ...अरे आप तो बुरा मान गये.

अब हम सिर्फ शेर के लिये तो जंगल बचाने से रहे...अगर शेर को जिंदा रहना है तो उसे  भी बदलना होगा. अगर वो हमारी दया पर रहा तो जल्द ही इतिहास बन जाएगा, हमारे डार्विन बाबा ने तो यही बताया था । 

सब कुछ बहुत तेजी से घट रहा है. जो विकास हजारों सालों मे नही हो सका वो हमने कुछ दशकों मे कर दिया. इसलिये आम अदमी दुविधा मे है. समय के साथ यह दुविधा बढ़ती ही जायेगी. 

समय के चक्र को उल्टा घुमाना अभी तो असंभव है. इसलिये हमें अपने को बदलते समय के साथ खुद को बदलते रहना होगा अब चाहे वो बदलना जीवन मूल्यों का ही क्यों ना हो!

बाजारवाद और विज्ञान के मेल ने इंसानियत को ऐसे मुकाम पर ला दिया है की कुछ  ताकतवर अगर  लालची इंसानियत की दिशा और दशा तय कर रहे है। वो अर्ध सत्य का अपने लालच के  लिये खुलकर प्रयोग कर रहे है. वो अपने स्वार्थ के लिए  धार्मिक उन्माद, नस्ल वाद का खुलकर प्रयोग करते है इस सच को समझकर इसका सामना करना है और सोशल मीडिया के प्रदूषण से अपने मन को बचाए रखना है।  विशेषकर सोशल मीडिया पर मोजूद अधकचरे ज्ञान और अर्धस्त्य को गंभीरता से पहले परखे.

सच तो यह है की हमे पता ही नही चला की कब हम टेक्नोलोजी के सहारे गुलाम बना दिये गए । एक उम्मीद अब भी बनी हुई है की हम इसके प्रति जागरूक  होंगे और इसका सामना करेगे. आने वाले दिन शुभ हो  इस लिए आज का दिन हम गंभीरता से इस पर मनन करे।  

   


दुर्वेश


Friday, October 14, 2016

जागो, बंद आंखे खोलो और देखो

चबंल के बिहड हो या फिर बुदेंल खंड का पठारी इलाका. यंहा घर मे भले ही खाने को कुछ भी ना हो, पूरे इलाके मे भुखमरी   और बेहद गरीबी है पर हर घर मे बंदूक होगी. भेसे चराते हुये भी कंधे पर बंदूक लटकाये घूमते है . मजे की बात यह है की जरा जरा सी बात में वे एक दूसरे की जान लेने से नही चूकते और दुश्मनी पुस्त दर पुस्त निभाते चले जाते है.  यह उनकी आन बान और शान का हिस्सा होता है. समझदार लोग उनकी इस नासमझी का मजाक बनाते है और उनके किस्से मजे लेकर एक दूसरे को सुनाते है. 
आज भारत और पाकिस्तान का भी यही हाल है. दोनों देशों की अधिकांश जनता के पास बुनियादी सुविधायें नही है. भुखमरी, बेरोजगारी, स्वास्थ समस्याये मुह फाडे है. पर इस सब से मूह फेरकर दोनों देश की सरकारे लाखों करोडों रूपया रक्षा के नाम पर खर्च कर रही है दोनों के पास दुनिया की बेहतरीन फौज है, दोनों देशों के पास पूरी दुनिया को कई बार खत्म कर देने लायक हथियार है, . इसके बाबजूद उनके हथियारों की भूख कम होनेे का नाम नही ले रही है. अभी हाल मे दोनों देशों ने हजारों करोडों रूपये रक्षा सामग्री पर खर्च किये है और यह बजट आने वाले समय मे बढता ही जायेगा.
दोनों देशों के हालात देखकर बचपन मे सुनी वो कहानी याद आती है जिसमे  दो बिल्लीयों  एक रोटी के टुकडे किये आपस मे झगड पडी और बंदर ने न्याय के नाम पर दोनों की रोटी खुद खा ली और बिल्लीयां एक दूसरे का मूह देखती रह गई. आजादी से पहले तक दोनों देशों का दुश्मन एक था. आज भी दोनों देशों की समस्यायें समान है. कुछ लोगों के पागलपन के कारण ना चाह्ते हुये हमे विभाजित आजादी मिली देश के तीन टुकडे हुये. उसके साथ ही जबरदस्ती की नफरत हुक्मरानों ने एक दूसरे के लिये अपनी जनता के बीच फेलायी जिससे वो खुद को सही और दूसरे को गलत साबित कर सके. दोनों ने इतिहास से कुछ भी ना सीखने की कसम खा रखी है. 
नफरत फेलाने काम बदस्तूर चालू है. दोनों ही तरफ की सरकारे और मिडिया एक दूसरे को गलत साबित करने मे लगी हुये है. दोनों ही नफरत फेलाने का कोइ मोका नही छोड रहे है. दोनों ही देशों मे पडोसी देश की बात करने वाले को देश द्रोही साबित कराने की होड लगी रहती है. एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोइ मौका हाथ से नही जाने देते. एसे मे कुछ देश बंदर की भूमिका निभाते हुये दोनों देशों की हाथियार बेच रहे है, उन्हे उकसा रहे है,  वो कभी नही चाहेगे की दोनों देश दोस्त एक अच्छे मित्र बन जाये, क्योंकी एसा होते ही उनके यंहा भुख मरी के हालात हो जायेगे.
आजादी के बाद तीन युद्ध कर चुके ये दोनों देश चोथे की हसरत पाले हुये है. कहने को तो हम अफगानिस्तान के कबीलों को बर्बर कहते है .... देखा जाये तो हम उनसे किस बात मे कम है. उन्ही की तरह हम भी विरासत मे अगली पीढी को अपने पडोसी के लिये नफरत ही दे रहे है. दोनों ही देश अपने  यंहा पनप रही अलगाववादी ताकतों से परेशान है. असमानता और भुखमरी दोनों ही देश की पहचान है.

अगर दोनों देश सच्चे मित्र बन जाये तो हम विश्व ताकत है, वरना अगर एसा ही चलता रहा तो विश्व के विनाश का कारण भी हम ही बन जाये तो कोई अजीब बात नहीं .    

Tuesday, May 31, 2016

सांवली या गोरी

दैनिक जागरण 1 जून 2016 मे प्रकाशित ‘सांवली लडकीयों की गुहार’ लेख ने जो लिखा है वो अर्ध-सत्य है. पूरा सच तो यह है की काले और सांवले जब खुद यह मान लेते है की गोरा रंग सुदंरता, सभ्यता और अक्ल का प्रतीक है तो फिर कोइ ओर क्या करे. काली लडकी को गोरा पति चाहिये और और काले लडके  को गोरी पत्नी. अगर एसा ना हो, तो लाखों करोडो रूपये का गोरे बनाने के पागलपन कारोबार एसे ही नही चलता. मजेदार बात तो यह है की आज तक कोइ इन क्रीमों से गोरा नही हुआ है. फिर भी लगाये जा रहे है.
आपको क्या लगता है की गोरे पन का यह लफडा अंग्रेजों के भारत आने के बाद शुरू हुआ? अगर आप एसा सोच रहे है तो भारी गलती कर रहे है. इस गोरे पन की खाज हमारी संस्कृति मे तब से है जब से इस संस्कृति का उदय हुआ. तब से ही काले और सांवले देत्य , असुर और राक्षस नजर आते रहे है. और गोरे देवता. अब आप बोलोगे की राम और कृषण तो सांवले थे. यह सही है की वो सांवले थे पर राम और कृषण जेसे सांवले को भी हमने भगवान तब माना जब उन्होने सांवले और कालों का वध किया. कहने को तो वो सांवले थे पर उन्होने काम गोरों के लिये ही किया. आप किसी से भी पूछ लो वो सब राक्षस या देत्य और असुर को  काला ही बतायेगे.
इसी तरह इस देश मे यह मान लिया गया है की सारी अक्ल और सभ्यता अंग्रेजी पढे लिखे छोकरे छोकरीयों मे ही है. कुछ दिन पहले एक खबर  पढी था की हिन्दी किसी को प्रधान मंत्री तो बना सकती है पर इजीनियर, डाक्टर और आइ ए एस नही बना सकती. यह एसी सोच है जिसे हम चाहे तो बदल सकते है. पर याद रहे यह किसी सरकार के बस मे नही है की वो एसी सोच को बदल सके. यह तो आपकी अपनी इच्छा शक्ति से ही संभव हो सकता है.
आज हम ग्लोबल है, तो अपनी सोच को भी ग्लोबल करे. अक्ल का इस्तेमाल करे और देखे की सभ्यता और शिक्षा का ना रंग से कोइ वास्ता है और ना ही अंग्रेजी से. जो आपको रंग के कारण  नापसंद करता हो  उसे अनदेखा कर आगे बढे, इस बात की हीन ग्रंथी अपने दिमाग मे ना पाले. यह सही है की अधिंकाश भारतीय गोरे रंग को अहमियत देते है, पर आप इस बात को ज्यादा तब्बजो ना देते हुये आगे बढे. आज लाखो करोडों लोग हैं जो काले है या सांवले होते हुये भी हर फील्ड में इतिहास रच रहे है , इस दुनिया को नई दिशा दे रहे है, बेहतरीन नेता साबित हो रहे है. एसे लोगों से सीख सकते हो तो सीखों.
आज कल तो गोरे भी अपनी गोरी चमडी से परेशान है अगर एसा नही है हो तो उन्हे सूर्य स्नान करते हुये अपनी त्वाचा को टेन करने की जरूरत नही होती. अब तो विज्ञान भी सांवली और काली त्वाचा के  फायदे गिना रहा है तो हम फिर से अपने को बेवकूफ क्यों साबित करने पर तुले हुये है.

स्मार्ट बनिये, फेशनेबल बनिये, उसके लिये आपको गोरे होने की कतई जरूरत नही है. एक बात अच्छी तरह समह लो की कोइ भी पहले अपनी नजरों मे नीचे गिरता है फिर किसी ओर की निगाह मे नीचा होता है. स्वाभिमान को अपने रंग़ से नही, अपने हुनर और अक्ल से जोडो और आगे बढों या फिर गोरे पन की क्रीम मलते रहो.

Saturday, March 7, 2015

सार्वजनिक - यानी मन चाहा, गेजिम्मेदार उपयोग

हमारे यंहा सार्वजनिक का मतलब उसे बेशर्मी की हद तक इस्तेमाल करने का अधिकार और उसके रखरखाव का ठेका किसी ओर का ( यानी भगवान भरोसे). पानी के स्रोत चाहे वो नदी या तालाब का हो या भूमीगत हो सार्वजनिक होता है. इसलिये जिसे जेसा मौका मिला उसने उसका मनमर्जी से इस्तेमाल किया. उसको प्रदूषित करने मे हमने कोइ कसर नही छोडी. हमने बेशर्मी की हद तक उसे बरबाद किया है. 

Image result for clean water courseबुरा हो इन बिजली चलित पम्पों का जिन से हमने भूमीगत जल स्रोतों का बेहिसाब बेदर्दी से दोहन किया और एश की हद तक उसे बरबाद होने दिया. बुरा हो इन आधुनिक कमोडों का जो एक व्यक्ति के मल-मूत्र को बहाने के लिये कम से कम दिन भर में 30 से 40 लीटर पानी बरबाद करता है.  यह सच है की इन आधुनिक कमोडों के कारण अब हम घर मे ही मल मूत्र विसर्जित करने के बाबजूद घर को बदबू रहित रख सकते है. पर उसकी कीमत में हम किसी नदी तलाब या भूमीगत जल को जहर मे बदल रहै होते है. अपना मल मूत्र नदीयों तालाबों और भूमीगत जल स्रोतों मे मिलाकर जो फ्री था उसे जहर बना दे रहे होते है. सफाइ का एसा पागलपन की हर शहर हर दिन टनों साबुन नदीयों और तालाबों में बहा रहा है. साफ गोरी काया के लिये एसा का एसा पागल दिवानापन मिसाल हम इंसानों मे ही मिलेगी.
जब तक हमसे असली कीमत वसूल ना की जाये उसके महत्व का हम अंदाज नही लगा पाते. यह गलत फहमी  है की प्रकृति ने हमे हवा पानी और रोशनी मुफ्त दे दी है. इसका पता तो तब चलता है जब वो हमारे पास ना हो. क्या रेगीस्तान मे पानी उसने मुफ्त दिया है?
अब बेक्टीरिया वाइरस का एसा भय की हम दिनभर हाथों को धोते रहते है. इस डर से की अगर बिना धोये कुछ खाया या पिया तो हमारा अंत.  दिन भर TV यही सब दिखाता रहता है और हम यह सब देखकर साबुन एंटी सेप्टिक लोशन इस्तेमाल कर रहे है. हम भूल गये की हमारे स्वास्थ का राज हमारा अपना इम्यून सिस्टम है ना की साबुन और एंटीसेप्टिक लोशन और दवाइयां.
हम यह भी भूल गये की हमारे आसपास दिखाइ देने वाले पेड पौधे और प्राणी जगत के होने की वजह दिखाइ ना देने वाला एक भरापूरा जीता जागता माइक्रो जीव- बेक्टीरिया, फंगस, वाइरस से भरा संसार है जो हर समय ह्म सब को चारों ओर से घेरे हुये है यह हमारे अदंर है हमारे बाहर है उसमे से कुछ हमारे दोस्त है और कुछ दुशमन. हमारा  इम्यून सिस्टम इन्हे पहचानता और रात दिन इन पर निगाह रखता है जो हमारे दोस्त है उन्हे फलने फूलने देता है और जो दुश्मन है उन्हे शरीर से मार भगाता है.
Image result for clean water courseमाना की हमारा इम्यून सिस्टम जब किसी कारण से overburden हो जाता है तो हमे दवाइयों से मदद मिलती है, पर अगर इस मदद के हर समय मोहताज रहने लगे और अपने इम्यून सिस्टम पर भरोसा ना रहे, तो यह गंभीरतम मामला हो जाता है. बाजारवाद तो यही चाहता है की हमे अपने पर भरोसा ना रहे. हमारा डर इस बजार को फलने फूलने मे मदद जो करता है.

साफ सफाइ का अपना महत्व है पर इसे पूरे प्रपेक्ष मे देखना चाहिये क्योंकी हमारे घर के साफ होने का कोइ मतलब नही रह जाता अगर हमारा पास पडोस गंदगी का अबांर हो, हमारी करनी से नदी तलाब बरबाद हो रहे हों. 

Saturday, May 31, 2014

पोलीथीन या पैपर बेग



पैपर बेग और पोलीथीन बेग मे से कौन सा बेहतर विकल्प है यह सवाल हर रोज हजारों लोगों के दिमाग मे उठता है एक बार फिर 5 जून को मनाये जाने वाले पर्यावरण दिवस पर इस सवाल पर चर्चा होगी और पोलीथीन और प्लास्टिक को दोषी बनाया जायेगा. इस लेख मे मेरी कोशिश दोनों के बारे मे उपलब्ध जानकारी का विशलेषण करने की है जिससे आप सभी अपने स्तर पर सही निर्णय ले सकें.
जब भी पोलीथीन और पैपर/जूट बेग के बीच चुनने की बात आती है तो आजकल पैपर और जूट बेग के इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है. इसके पक्ष मे दलील दी जाती है की पैपर /जूट बेग बायोडिग्रडेबल है और इसे रिसायकल भी किया जा सकता है, वंही पोलीथीन बायोडिग्रडेबल नही है. इसे अगर जानवर, चिडिया  खाले तो उसकी जान पर बन आती है. यह नालियां चोक कर देती है नदी और तालाब को गंदा कर पर्यावरण के लिये गंभीर खतरा बन जाती है. यह गंदगी हमारी आंखो को खटकती है. इधर उधर बिखरी पोलीथीन की पन्नियां भला किसको अच्छी लग सकती है.
प्लास्टिक केरी बेग पोलीथीन से बनाया जाता है. दुनिया भर में इसे खाद्य पदार्थ, दवा, और पानी को स्टोर करने के लिये सुरक्षित माना गया है. भारत में भी BIS मानक (refer IS 10146:1982 Reaffirmed on Feb-2003). के अंतर्गत इसे सुरक्षित माना गया है.   पोलीथीन Recyclable, reusable, light-weight, high strength, low carbon and water footprint, tear resistent, space saving, bacteria resistant, waterproof and tear resistant, सस्ता, सास्थ्यकर,  प्रयावरण के लिये सुरक्षित, कम उर्जा खपत के साथ साथ पैपर या जूट बेग से बहुत सस्ती होने के बावजूद यह आज हमे पर्यावरण की दुशमन नम्बर वन नजर आ रही है.
पोलीथीन रैपर और पैकिंग मिठाइ, नमकीन, ब्रेड, केक, बिस्कुट उद्योग और खान पान से जुडे दूसरे व्यवसाय जिसमें खाद्य पदार्थ को सुरक्षित रखना हो तो उसे पोलीथीन पैक किया जाता है. इसे आसानी से वेक्यूम् और नाइट्रोजन फिल पैक में भी बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके इस्तेमाल से खाद्य पदार्थ अब 6 महिने तक आसानी से स्टोर किया सकता है. हमारे देश और अन्य विकासशील देशों मे 10% से 15% प्रतिशत खाद्य पदार्थ खराब पैकिंग और स्टोर की वजह से खराब हो जाता है.  इसकी वजह से सीधा नुकासान तो होता ही है इसके सडने की वजह से निकली मिथेन और कार्बनडाइओक्साइड गेसों के कारण ग्रीन हाउस प्रभाव पर्यावरण पर उल्टा प्रभाव डाल रहा है. इस सच को हम नकार नही सकते की पोलीथीन रैपर के कारण आसानी से  खराब हो जाने वाले खाद्य पदार्थ को भी अब अधिक दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है. दूर दराज के इलाकों मे इसे सुरक्षित पहुचाया जा सकता है. बाढ और भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा के समय पोलीथीन पैक सुरक्षित खाद्य सामग्री, पानी, दवाइयां जीवनरक्षक का काम करती है.
यह सच है की आज पालीथीन पर्यावरण के लिये खतरा साबित हो रही है, पर क्या इसके लिये हम पूरा दोष पालीथीन को दे सकते है? सच है की जो जानवर इसे खा जाते है उनके जीवन के लिये खतरा साबित होती है इससे नालियां चोक हो जाती है. इधर उधर बिखरी पालीथीन की पन्नियां  देखने मे किसी को भी अच्छी नही लगती.
यह तो पोलीथीन निष्पादन का दोष हुआ क्योंकी हम शान से इसे कंही भी फेंक देते है जेसे आजाद देश मे हमारा यह जन्म सिद्ध अधिकार हो. इसे सही ठिकाने लगाने का काम नगर निगम का अदना से सफाइ कर्मचारी को दे दिया गया है. वो गरीब भी क्या करे बायोमास के बदबूदार कचरे मे से वो पन्नियां केसे अलग करे?
 मजबूरी मे वो भी इसे अनदेखा कर कूडे के ढेर पर पटक देता है या फिर यहां वहां उडती हुई पन्नियां कभी नाली को जाम कर देती है कभी नदी तलाबों के तैरती नजर आती है. जिस पोलीथीन को आसानी से रियासकल किया कजा सकता था हमारी गलत आदतों के कारण हमारे लिये खतरा बन गई. अब इसके लिये हम अपनी आदतों को सुधारे या फिर अपनी शाही आदर्तों को बरकरार रखते हुये पैपर और जूट बेग को अपना कर उस से बढे खतरे को अपने गले लगा लें! 
हमारी इस बेवकूफी को सही निराकरण पर्यावरणवादी और पर्यावरण को समर्पित हमारी सरकार को कागज या जूट से बने बेग के उपयोग मे दिखाइ देता है. इसे इस्तेमाल करो और फिर सडने के लिये इसे कंही भी फेंक दो यह जाने बिना की जब यह सड्ता है तो पर्यावरण का ज्यादा नुकसान करता है. यह नुकसान हमे समझ मे नही आता क्योंकी हमे दिखाइ नही देता. पोलीथीन पन्नियां हमे दिखाइ दे रही है शायद इसलिये हमारी आंखो मे ज्यादा खटक रही है.
यह सही है की पैपर रिसायकल हो सकता है पर क्या आपको मालुम है कि हमारे नदी नालों को प्रदूषित करने मे पैपर उद्योग का बडा हाथ है. सच तो यह है की पैपर या जूट बेग पोलीथीन से कंही बडा खतरा है क्यों विशवास नही होता ना? नीचे दिये आंकडों पर गोर करने से यह बात आसानी से समझ आ जायेगी. 

Weight
140 lbs.
15 lbs.
Cubic Feet
17.8 cu. feet
0.4 cu. feet
Cost
8 to 10 times
Biodegradable?
yes
yes
Recyclable?
yes
yes
Air Emissions
3.225 lbs. solids
1.62 lbs. solids
Petroleum used
3.67 lbs.
1.62 lbs.
BTUs required
1,629,000
649,000
Indefinite recycled life?
no
yes
CEII (Composite Environmental Impact Index)
77.69
6.46

   



Energy (GJ) for manufacture
29
67


Air pollution
 
 


SO2
9.9
28.1


NOx
6.8
10.8


CHx
3.8
1.5


CO
1
6.4


Dust
0.5
3.8


Waste water burden
 
 


COD
0.5
107.8


BOD
0.02
43.1


अगर उत्पादित बेग को दुकानदारों तक उपयोग के लिये पहुचाने पर होने वाले ट्रंसपोर्टेशन का पर्यावरण के असर को भी शामिल कर ले तो पैपर और जूट बेग के लिये स्थति और भी खराब हो जाती है. पैपर उद्योग को बढावा यानी जंगलों का और तेजी से सफाया. प्लास्टिक बेग की तुलना में  जूट या पैपर् बेग की बनाने में तीन गुना ज्यादा उर्जा की खपत होती है. इसके बावजूद जब जूट बेग के सडने से  मिथेन और कार्बनडाइओक्साइड गेसें निकलेगी उसका दुषप्रभाव क्या होता है यह भी हम सब को मालूम है.
लोगों द्वारा कूडा कचरा केसे भी और कंही भी फेंक देने से रोकने का काम किसका है. क्या इसके लिये भी हम को पुलिस का डंडा चाहिये. क्यों नही उस क्षेत्र की साफ रखने की नैतिक जिम्मेदारी उस जगह के आसपास या उसका उपयोग करने वालों के उपर डाली जाये. और जो ना करे उस पर भारी जुर्माना. यूरोप और अमेरिका, सिंगापुर, जिन शहरों की सफाइ की दुहाइ हम देते है वंहा गंदगी फेलाने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है. इसी जुर्माने की डर से लोगों ने कचरा सही तरह से ठिकाने लगाना शुरू किया और अब वो उनकी आदत बन गया है.
बुराइ पोलीथीन बनाने या इस्तेमाल में नही है बल्की इसके इस्तेमाल करने के बाद उसके निस्पादन के तरीके मे है. हम खराब आदत से मजबूर कचरे को मिक्स कर देते है यानी की बायो कचरे के साथ प्लास्टिक कचरा जिसे बाद मे अलग करना असंभव हो जाता है या फिर बेहद मंहगा साबित होता है. हम यह समझ लें की प्लास्टिक बेग अपने आप मे इतनी बडी समस्या नही की उसकी जगह हम पैपर बेग या जूट बेग को इस्तेमाल करने को मजबूर हो जाये समस्या की जड तो हमारी गलत आदत है. अगर पोलीथीन को कंही भी फेकने की जगह उसे सही कचरे के डिब्बे मे डाला जाये तो समस्या ही नही बचती. अगर सफाइ कर्मचारी मिले जुले कचरे को उठाने से ही मना कर दे और रहवासियों को कचरे के किस्म के अनुसार अलग अलग डिब्बे मे डालने पर जोर दे तो समस्या ही ना रहे.
क्या आपको पता है की पालीथीन और प्लास्टिक कचरे से कमाइ हो सकती है. अगली बार भंगार वाला  जब आपकी गली में आवाज लगाये तो उससे इस बारे मे बात करके देखना.
हम सब को मालुम है की पोलीथीन और प्लास्टिक पेट्रोलियम उत्पाद से बनते है, वही जिससे पेट्रोल और डिजल बनता है. 93% पेट्रोलियम इधंन के रूप में इस्तेमाल होता है मात्र 4% ही प्लास्टिक या पोलीथीन बनाने मे इस्तेमाल होता है. हर बार बहस का मुद्दा होता है की प्लास्टिक और पोलीथेन का इस्तेमाल होने के बाद उसके कचरे का निस्पादन केसे होगा. अगर 4% प्लास्टिक कचरे को अंत भी इधन के रूप् मे जला दिया जाये तो क्या बुराइ है!
पोलीथीन को पूरी तरह से रिसायकल किया जा सकता है, अब तो प्लास्टिक और पोलीथीन कचरे को सडक बनाने मे भी इस्तेमाल होने लगा है और उसके उतसाहवर्धक नतीजे मिल रहे है.
पैपर और जूट उद्योग का पानी के स्र्तों को दूषित करने में बडा हाथ है. आजकल पैपर बेग या पैपर कोन/ ग्लास को बनाने मे एसे पदार्थों का इस्तेमाल होता है जो इसे तुरंत सडने से रोकते है, इसके कारण यह भी नालियों को चोक करते है. सडे-गले कागज से मिथेन उत्सर्जित होती है जो कार्बनडाइओक्साइड  से 20 गुना ज्यादा हानीकारक है.
पैपर बेगे के पक्ष मे कहा जाता है की पैपर रिसायकल किया जा सकता है. पर क्या आपको मालूम है रिसायकल पैपर नये पैपर से ज्यादा मंहगा होता जिसे सरकारी अनुदान देकर सस्ता किया जाता है. माना की  रिसायकल पैपर को बनाने में नये पैपर की तुलना मे कम पनी की खपत होती है. पर इंधन की खपत करीब 31% ज्यादा होती है.
अगर एक परिवार पोलीथीन बेग को साल भर के लिये पूर्णत: रोक लगा दें तो साल भर में वो 1 लीटर तेल की बचत कर पायेगा जो आसानी से हर रोज आधा  किलोमीटर गाडी कम चला कर या 40 वाट के बल्ब को 30 मिनिट हर रोज कम जलाकर भी इस कमी को पूरा किया जा सकता है.
मै मानता हू की हमारी बहुत सी पर्यावरण  समस्याओं की तरह पोलीथीन / पैपर बेग की समस्या का हल आसान नही है, पर हम सब के सम्मलित पर ठोस प्रयास अच्छे नतीजे ला सकता है. अपनी आदतों मे थोडा सा सुधार लाकर हम पोलीथीन को अपना और पर्यावरण का दोस्त बना सकते है.
इसके लिये हमे, हमारी कचरा फेलानी की नबाबी आदत से निजात पानी होगी. कचरा निस्पादन के लिये उचित प्रबंधन पर ध्यान देना होगा. देखा जाये तो शहरो द्वरा उत्पन्न कचरे मे मात्र 5% ही प्लास्टिक कचरा होता है. बाकी का कागज, मिट्टी, डायपर्स बायोमास होता है इसलिये पोलीथीन पर रोक इसका सही इलाज नही है उल्टा इसके बंद होने से स्थति और बिगडेगी. इसका सही इलाज हम सब मे उचित आदत का विकास है, जो कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही डिब्बे मे डाले और सही समय पर और सही तरीके से कचरे का प्रबंधन करे. जेसे बयोमास से बनी अच्छी खाद से हाजारों करोड रूपये की बरबादी को सीधे सीधे बचाया जा सकता है.
हम प्रण लें की :

1.     ह्म पोलीथीन और पैपर बेग के अति प्रयोग से बचेगें.
2.     पोलीथीन को प्राथमिकता देगें पर उसके निस्पादन को भी सुनिन्श्चित करेगें.
3.     जब पोलीथीन बेग का सही निस्पादन करने में संदेह हो, तो ही हम पैपर बेग का इस्तेमाल करेगें.
4.     कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही कचरे के डिब्बे मे डालेगें.
5.     अच्छा हो की दुकानदार केरी बेग के लिये ग्राहक से पूछे. जब तक ग्राहक ना मांगे उसे पोलीथीन या पैपर बेग देने से बचे. अगर ग्राहक बेग मे लेने से मना करे तो उसके लिये उसे धन्यवाद दें.
6.     सामान की अतिरिक्त पैकिंग से बचे. हम अकसर पहले से ही पैक किये सामान को एक बेग में और फिर वो बेग दूसरे बेग मे डालते है, जब की उस सामान को कुछ दूर खडी गाडी में रखना भर होता है.
7.     हमारी गलत आदतों के कारण सरकारी एजंसियों को मजबूरन बाजार मे 40 माइक्रोन से कम मोटाइ की पोलीथीन बेग पर रोक लगानी पडी जबकी 10 से 15 माइक्रोन की पोलीथीन भी एक सामान्य पैपर बेग का आसानी से मुकाबला कर सकती है. बस हमे इतना करना है की इस्तेमाल के बाद उसे सही कचरे के डिब्बे मे डालें.  
8.     हम कचरे को पोलीथीन में डालकर उसे सीधे कचरे मे डाल देते है. एसा कभी ना करें. पोलीथीन बेग के कचरे को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डालने के बाद पोलीथीन को भी उसके लिये किये गये नियत डिब्बे मे डाल दें.
9.     हम अकसर घरों मे पैदा होने वाले कचरे को पोलीथीन मे भर देते है और फिर उस कचरे को पोलीथीन के साथ ही कचरे की डिब्बे डाल देते है. जो गलत है. इससे पोलीथीन और बायोमास एक साथ मिसक्स हो जाता है जिसे बाद मे अलग नही कर पाते. हमें पोलीथीन मे मोजूद गंदगी को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डाल कर पोलीथीन को भी उसके सही कचरे के डिब्बे डालना चाहिये.
10.  100% रिसायकल हो सकने वाली पोलीथीन का फायदा समाज को दें.