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Saturday, August 1, 2026

2 AUG 2026, FRIENDSHIPDAY

 अविश्वास के इस माहौल में, दुनिया सुकून खो रही है,

मशीनों की इस चमक-दमक में, रूह कहीं सो रही है।

हर कोई यहाँ व्यस्त है, पर खुशियों से महरूम है,

तरक्की की इस अंधी दौड़ में, इंसानियत ही मज़बूर है।

"दुनिया तो जुड़ गई मुट्ठी में, पर दिल दूर हो गए,

वक़्त बदल रहा है इतनी तेज़ी से, और हालात बदल रहे हैं।

मंज़िलों को पाने की अंधी चाह में, अब इंसान बदल रहे हैं।"

दिखावे की इस बनावटी दुनिया में, अब वो सादगी कहाँ मिलती है,

मशीनों के इस पत्थरीले दौर में, वो इंसानी हमदर्दी कहाँ मिलती है।

लाइक और कमेंट्स के बाज़ारों में, जज़्बात बिक रहे हैं,

स्मार्टफोन की स्क्रीन पर, झूठे मुस्कुराते चेहरे दिख रहे हैं।

भीड़ तो बढ़ती जा रही है शहरों में, पर हर शख्स अकेला है,

यहाँ हर कोई अपने ही बनाए, एक नए जाल में उलझा है।

भरोसा अब एक महंगा और नायाब खिलौना बन गया है,

सच्चा यार मिलना तो मानो, एक सपना सा हो गया है।

ऐसे में, हमारा यह छोटा सा ग्रुप एक सुकून का दरिया है,

इस बदलती मतलबी दुनिया में, खुलकर जीने का ज़रिया है।

चलो संभाल कर रखें इस दोस्ती को, जो बिना शर्तों के जिंदा है,

वरना आज के इस दौर में, हर रिश्ता किसी न किसी मतलब का परिंदा है।


फ्रेंडशिप डे की आप सभी विचारशील दोस्तों को दिल से शुभकामनाएँ!

Thursday, June 18, 2020

क्षमा गेरों से नही अपनों से मांगो


क्षमा गेरों से नही अपनों से मांगो  
mail या sms पर नही
जब आमने सामने हो
तब मांगो
अनके लिये दिल मे
अगर हो कोइ खटास
तो उसे निकाल कर मांगो
भूल कर भी अंहकार, अभिमान या अहसान
आपको छू भी ना पाये
याद रहे
माफ ओरों को कर
नियति के दुशचक्र से
अपने को निकाल
भला अपना करोगे
होगा ना यह आसान
जब भी जिसके साथ
करोगे सच्चे मन से यतन
एक इश्वरीय अहसाहस से
अपने को सरोबार पाओगे

Sunday, February 21, 2016

मंथन, सच और झूठ के महासागर का

मंथन, सच और झूठ के महासागर का.
रस्सी है,  जिज्ञासा उसकी.
 एक सिरे पर है
उसके विश्वास और श्रद्धा
दूसरी तरफ है
ज्ञान और विज्ञान.
मथनी है चिंतन, 
मथना है सच और झूठ के महासागर को
निकल सके अमृत.
जो है
सच और झूठ
से परे परमसत्य
अमृत ना भी मिले.
पर मिलेगा
नये विचारों के
अनमोल रत्नों से भरे कलश
साथ ही मिलेगा जहर,
जो बनेगा 
अंधश्रद्धा , डर और लालच के झकझोरने से
जो पियेगा  जहर
वो बनेगा शिव उस मंथन का

दुर्वेश😊


Monday, December 12, 2011

भ्रष्टाचार के नाले में

मेरा देश इंडिया दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र
इसका नागरिक होने का अविवादित लाभ यह कि
यहां आप पूरी तरह स्वतंत्र है कि
सच-झूट, सार्थक-निरर्थक, मीठा-कड़ुआ
आप जो चाहे कर लें
भ्रष्टाचार के नाले में
जब चाहें, जितना चाहें नहा ले
पर इसी देश ने अपने नागरिकों को
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी दी
इसी का लाभ लेते हुए
मैं कुछ कहने जा रहा हूं
ओछी राजनिती का गंदा राज खोलने जा रहा हू
क्षमा करें यदि आप ‘ऑफेंडेड’ या आहत हों
पर क्या गलत कर रहा हूं?
‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ नामक अधिकार
का ही तो प्रयोग कर रहा हूं,
इसलिये राज की बात ध्यान से सुने कि
प्रधानमंत्री देश का असरदार सरदार होता है
पूरे देश के राजकाज को
करीने से चलाने के लिए जिम्मेदार होता है
अगर वह बेईमान लोगों को साथ लेकर चल रहा हो
उनको जो जी में आए उसे करने की छूट देता हो
उनके क्रियाकलापों की समीक्षा करने से कतराता हो
तो उसे पाक साफ नहीं कहा जा सकता है
क्योंकी कोई भी ईमानदार व्यक्ति
बेईमान लोगों की शर्तों पर
राजकाज चलाने को तैयार नहीं हो सकता
भ्रष्टाचार बढ़ता जाए
लोग ‘त्राहि माम’ कहने लगें
फिर भी प्रधानमंत्री ‘गठबंधन धर्म’
जैसे भ्रामक शब्द
बोलकर अपने दायित्व से बचता रहे
और निहायत बचकानी हरकत करते हुये
स्वच्छ छवि वाली स्वपोषित स्वघोषित घोषणा कराता रहे
कभी-कभी तो मुझे लगता है
कि वो महात्मा गांधी के
‘तीन बंदरों’ का अनुयायी हैं
इसलिये भ्रष्टाचार के बारे में वो
न देखता है, न सुनता और न कुछ बोलता हैं
शायद चुप्पी लगा आँख मूंद सोच लिया उन्होने की
समय के साथ, सब शांत हो जाएगा
जनता कि है यादाश्त कमजोर, सब वो भूल जयेगी
पर उन्हे नही मालूम की जनता को
खाने को मिले या न मिले
पास में पहनने-ओड़ने को कुछ रहे या न रहे,
खुले आसमान के नीचे पडे रात गुजारनी
फिर भी वो दाग़ी को छोडते नहीं ये बात है पुरानी

Saturday, September 17, 2011

आर्तीज की मोन कविता

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हमसब एक मिनट का मौन रखें

ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में

और फिर एक मिनट का मौन उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोधमें

सताया गया, क़ैद कियागया

जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दीगईं

जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट कामौन

अफ़गानिस्तान के मज़लूमों और अमरीकी मज़लूमों के लिए

और अगर आप इज़ाजतदें तो

एक पूरे दिन कामौन

हज़ारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हेंउनके वतन पर दशकों से काबिज़

इस्त्राइलीफ़ौजों ने अमरीकी सरपरस्ती में मार डाला

छह महीने का मौन उन पन्द्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,

जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लम्बी घेराबन्दी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरूकरूँ

दो महीने का मौन दक्षिणअफ़्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने

अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया। नौ महीने कामौन

हिरोशिमा और नागासा की के मृतकों केलिए, जहाँ मौत बरसी

चमड़ी, ज़मीन, फ़ौलादऔर कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,

जहाँ बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदाहों।

एक साल का मौन विएतनाम के लाखोंमुर्दों के लिए...

कि विएतनाम किसी जंगका नहीं, एक मुल्क का नाम है...

एक सालका मौन कम्बोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो

एक गुप्त युद्ध का शिकार थे... और ज़रा धीरेबोलिए,

हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पताचले कि वे मर चुके हैं। दो महीने का मौन

कोलम्बिया के दीर्घ कालीन मृतकों के लिए जिनके नाम

उनकी लाशों की तरह जमा होतेरहे

फिर गुम हो गए और ज़बान से उतरगए।



इससे पहले कि मैं यह कविता शुरूकरूँ।

एक घंटे का मौन एल सल्वादोरके लिए

एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ केलिए

दो दिन का मौन ग्वातेमालावासिओं के लिए

जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में चैन की एकघड़ी नसीब नहीं हुई।

45 सेकेंड का मौनआकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,

और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों केलिए

जिनकी क़ब्रें समुन्दर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुम्बी इमारत भी न होगी।

उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंतचिकित्सा के रिकॉर्ड नहीं खोले जाएंगे।

उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं

दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम

एक सदी कामौन

यहीं इसी अमरीका महाद्वीप केकरोड़ों मूल बाशिन्दों के लिए

जिनकीज़मीनें और ज़िन्दगियाँ उनसे छीन ली गईं

पिक्चर पोस्ट्कार्ड से मनोरम खित्तोंमें...

जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंडक्रीक, फ़ालन टिम्बर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।

अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुम्बकीय काव्य-पंक्तियाँ भर हैं।

तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा ?

जबकि हम बेआवाज़ हैं

हमारे मुँहों से खींच ली गईहैं ज़बानें

हमारी आखें सी दी गईहैं

खामोशी का एक लम्हा

जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं

मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ

आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन

आपको ग़म है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रही रहजाएगी

इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहलेजैसी हर्गिज़ न रहे।

कम से कम वैसी जैसीयह अब तक चली आई है।



क्योंकि यहकविता 9/11 के बारे में नहीं है

यह 9/10 के बारे में है

यह 9/9 के बारे मेंहै

9/8 और 9/7 के बारे मेंहै

यह कविता 1492 के बारे मेंहै।

यह कविता उन चीज़ों के बारे मेंहै जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं।

औरअगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर :

यह सितम्बर 9, 1973 के चीले देश के बारे मेंहै,

यह सितम्बर 12, 1977 दक्षिण अफ़्रीकाऔर स्टीवेन बीको के बारे में है,

यह 13 सितम्बर 1971 और एटिका जेल, न्यू यॉर्क में बंद हमारे भाइयों के बारे मेंहै।

यह कविता सोमालिया, सितम्बर 14, 1992 के बारे में है।

यह कविता हरउस तारीख के बारे में है जो धुल-पुँछ रही है कर मिट जाया करती है।

यह कविता उन 110 कहानियो के बारे में है जो कभी कही नहींगईं, 110 कहानियाँ

इतिहास कीपाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई ज़िक्र नहीं पाया जाता,

जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यू यॉर्क टाइम्स औरन्यूज़वीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।

यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिएहै।

आपको फिर भी अपने मृतकों की यादमें एक लम्हे का मौन चाहिए ?

हम आपको देसकते हैं जीवन भर का खालीपन :

बिनानिशान की क़ब्रें

हमेशा के लिए खो चुकीभाषाएँ

जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों सेउखड़े हुए इतिहास

अनाम बच्चों के चेहरोंसे झांकती मुर्दा टकटकी

इस कविता कोशुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं

या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ

फिर भी आप चाहेंगे कि

हमारी ओर से कुछ और मौन।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन

तो रोक दो तेल के पम्प

बन्द कर दो इंजन और टेलिविज़न

डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज़

फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट

बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां

डिलीट कर दो सरे इंस्टेंट मैसेज

उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेलट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हामौन, तो टैको बैल की खिड़की पर ईंट मारो,

और वहां के मज़दूरोंका खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त करदो तमाम शराब की दुकानें,

सारे के सारेटाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्लेबॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन

तो रहो मौन ''सुपर बॉल'' इतवार के दिन

फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई के रोज़

डेटन की विराट 13-घंटे वाली सेल के दिन

या अगली दफ़े जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमाहों

और आपका अपराधबोध आपको सतानेलगे।

अगर आपको चाहिए एक लम्हामौन

तो अभी है वह लम्हा

इस कविता केशुरू होने से पहले। 

Monday, January 17, 2011

एक अफ़गानी शहर…

सूरज डूब गया,
मलवे का ढेर
ये शहर डूबा हे अँधेरे में,
रोशनी का एक कतरा भी नहीं!
उजाड़ बियाबान
सूनी सड़कें,
दो पैर के
किसी भी चलते फिरते
जानवर को
गोली मारने का
खुला आदेश
कुछ आवारा
कुत्ते गली में घूमते ...
टूटी फूटी दीवारों
के पीछे डर
से कांपती आंखें!
भूखे पेट
सहमे बच्चे,
रोना कब के भूल चुके
कुछ दिन पहले
ये शहर जिंदा था. 

Tuesday, November 17, 2009

मैं

कभी शांत 
तो कभी बैचेन 
कभी दोस्तों की भीड 
तो कभी तन्हा अकेला
वेरागी मन
कभी भागता 
सपनों के पीछे
कभी चाहता रहना अकेला 
अनगिनीत सवाल का बाबन्डर 
का केंद्र 
 महा शून्य 
जिसे पाना है बस साकक्षी भाव से 




रामलीला

इस बार रामलीला में

राम को देखकर-

विशाल पुतले का रावण थोड़ा डोला,

फिर गरजकर राम से बोला-

ठहरो!

बड़ी वीरता दिखाते हो,

हर साल अपनी कमान ताने चले आते हो!

शर्म नहीं आती,

काग़ज़ के पुतले पर तीर चलाते हो।

मैं पूछता हूँ

क्या मारने के लिए केवल हमीं हैं

या तुम्हारे इस देश में ज़िंदा रावणों की कमी है?

प्रभो,

आप जानते हैं

कि मैंने अपना रूप कभी नहीं छिपाया है

जैसा भीतर से था

वैसा ही तुमने बाहर से पाया है।

आज तुम्हारे देश के ब्रम्हचारी,

बंदूके बनाते-बनाते हो गए हैं दुराचारी।

तुम्हारे देश के सदाचारी,

आज हो रहे हैं व्याभिचारी।

यही है तुम्हारा देश!

जिसकी रक्षा के लिए

तुम हर साल

कमान ताने चले आते हो?

आज तुम्हारे देश में विभीषणों की कृपा से

जूतों दाल बट रही है।

और सूपनखा की जगह

सीता की नाक कट रही है।

प्रभो,

आप जानते हैं कि मेरा एक भाई कुंभकर्ण था,

जो छह महीने में एक बार जागता था।

पर तुम्हारे देश के ये नेता रूपी कुंभकर्ण पाँच बरस में एक बार जागते हैं।

तुम्हारे देश का सुग्रीव बन गया है तनखैया,

और जो भी केवट हैं वो डुबो रहे हैं देश की बीच धार में नैया।

प्रभो!

अब तुम्हारे देश में कैकेयी के कारण

दशरथ को नहीं मरना पड़ता है,

बल्कि कम दहेज़ लाने के कारण

कौशल्याओं को आत्मदाह करना पड़ता है।

अगर मारना है तो इन ज़िंदा रावणों को मारो

इन नकली हनुमानों के

मुखौटों के मुखौटों को उतारो।

नाहक मेरे काग़ज़ी पुतले पर तीर चलाते हो

हर साल अपनी कमान ताने चले आते हो।

मैं पूछता हूँ

क्या मारने के लिए केवल हमीं हैं

या तुम्हारे इस देश में ज़िंदा रावणों की कमी है

......इंटरनेट से साभार