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Wednesday, September 9, 2015

हिंदी पखवाडा

हिंदी पखवाडा चल रहा है, भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन का उदघाटन माननीय मोदी जी के हाथ द्वारा होना है. भोपाल शहर उनके मुस्कराते चहरे वाले पोस्टर से पट गया है.  कुछ दिन इस सम्मेलन की समाचारों मे चर्चा रहेगी उसके बाद
...उसके बाद क्या ?
Image result for hindi उसके बाद उसे भुलाकर लोग अपनी रोजमर्रा की जिदंगी अंग्रेजी से आसान बनाने लग जायेगे. आजादी के बाद से हम एसा ही तो कर रहे है, क्योंकी हिन्दी का महिमामण्डन करने वाले सिर्फ दिखावा कर रहे हैं, उन्होने हिन्दी को अंग्रेजी के बाद दोयम दर्जे का स्थान दिया गया है. 68 साल बाद भी सिर्फ हिन्दी के ज्ञान से कोई आई.ए.एस., आई.पी.एस., न्यायाधीश, या राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों से अभियंता, चिकित्सक या प्रबंधक नहीं बन सकता. देश में शासन-प्रशासन, न्यायालय व पेशेवर सेवाओं में ऊंचे पदों पर अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वाले ही बैठ सकते हैं. हिन्दी या स्थानीय भाषा में अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले निचले पदों पर ही अपनी सेवाएं दे सकते हैं. यह कितने शर्म की बात है. अंग्रेजों के समय की गुलामी की व्यवस्था अब भी कायम है. अंग्रेजी जानने वाले स्थानीय भाषा बोलने वालों पर राज कर रहे हैं. अब शासक वर्ग की चमड़ी का रंग बदल गया है. वह देखने में अपने देश-वासियों जैसा दिखता है किंतु सोच में अभी भी अंग्रेज़ ही है.
संविधान में तो कल्पना की गई थी कि आजादी के 15 वर्षों के अंदर हम अंग्रेजी से छुटकारा पा जाएंगे. किंतु स्थिति उल्टी हो गई. जिन विद्यालयों में हिन्दी में ही पढ़ाई होती रही अब वंहा भी अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. 
हमारी गुलाम मानसिकता ने हमको अंग्रेजी के चंगुल से मुक्त नहीं होने दिया. दुनिया के ज्यादातर देश अपनी स्थानीय भाषा में ही शिक्षा देते हैं. जो लोग यह मानते हैं कि खासकर तकनीकी विषय जैसे अभियांत्रिकी या चिकित्सा की पढ़ाई हिन्दी या अन्य किसी भारतीय भाषा में नहीं हो सकती है, उन्हें सोचना चाहिए कि रूस, चीन या जापान कैसे उच्च शिक्षा अपनी भाषाओं में ही देते हैं और किसी भी मायने में अमरीका, इंग्लैण्ड या यूरोप के किसी देश से कम नहीं हैं, बल्कि कुछ मामलों में उनसे आगे ही हैं.
यदि कोई वाक़ई में हिन्दी प्रेम प्रदर्शित करना चाहता है तो देश में शिक्षा का माध्यम हिन्दी व अन्य स्थानीय भाषाओं को बनाने की बात करनी चाहिए. हिन्दी का इस्तेमाल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं होना चाहिए.
हम सब यह महसूस करते है की इस देश को अपनी भाषा चाहिये. एक एसी भाषा जो कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक और गुजरात से लेकर नागालेंड तक सबकी अपनी हो. इसलिये हिन्दी को बहुजन भाषा के रूप मे चुना गया. उस पर गेर हिन्दी भाषीयों और खुद हिन्दी भाषीयों ने अपने संक्रीण स्वार्थों के लिये राजनिती कर उसे सही अर्थों मे राष्ट्र भाषा नही बनने दिया.
दर्द बहुत है पर यह मौका दर्द दिखाने का नही, उसे खत्म करने के बारे मे कुछ कर गुजरने का है, मेरे दिमाग मे एक आइडिया है कृपया गोर फरमायें ..
क्यों ना हम उस भाषा की बात करे जो ना हिंदी है ना इगलिश ना उर्दू है ना मराठी और ना ही वो तमिल है. एक जन सामान्य की भाषा, उसमे सभी भाषाओं के प्रचलित शब्द हों जिससे किसी को यह शिकायत ना रहे कि उसे अनदेखा कर दिया. 
एक बात ओर पूरे भारत मे लिखने की एक ही लिपी का इस्तेमाल हो. अगर मानक लिपी मे अन्य भाषा का कोई विशेष स्वर वाला अक्षर ना हो तो उसे उसमे जोडा जा सकता है. इस मानकीकरण  से पूरे भारत मे एक जेसा लिखा जा सकेगा. अभी तो तमिल नाडू में तमिल में तो केरल में मलियाली मे तो बंगाल में बँगला, आन्ध्रा में तेलगू मे लिखा होता है.   अगर किसी एक लिपी का इस्तेमाल हो, तो कम से कम उसे हर भारतीय पढ तो सकता है. अभी तो हाल यह है की दूसरे राज्यों के लोग बसों पर लिखी जगह का नाम तक नहीं पढ पाते. 
एक लिपी होने से दूसरे राज्यों की भाषा को सीख़ना भी  आसान हो जायेगा. जब अंग्रेजी  खुले दिल से दूसरे भाषा से शब्दों को आयात कर अपने को दिनों दिन विकिसित करती जा रही है तो फिर हम अपनी भाषा के साथ एसा क्यों नही कर सकते.
अगर आपको लगता है की हिंदी को इस देश की प्रथम भाषा होनी चाहिये तो राजनिती से उपर उठकर पहले कम से कम इतना भर कर ले की देवनागरी लिपी को सभी जगह लिखने के लिये इस्तेमाल करे. अगर जरूरी हो तो इसमे नये अक्षर जोडे जा सकते है. अरे...इसे ही तो भाषा का विकास कहते है. या उसे भी हम राजनीती में उलझा देना चाहते है.
हमें बाते कम और काम ज्यादा करना है. नहीं तो हम और आप हिंदी और अंग्रेजी करते रह जायेगे....और कोई  हमारे वतन में ही हमे अजनबी बना देगा.   
जो लाखों करोडों किताबे और इंटर नेट पर ज्ञान है उस सबका अनुवाद हिंदी मे करना है. जिस दिन एसा कर पायेगे ...हिंदी इस देश की क्या वो विश्व भाषा बन जायेगी. अगर सच में आप 150 करोड़ हो तो उसे काम से साबित करो.  कुछ लोग इस काम मे लगे हुये है...आप चाहो तो आप भी उनके साथ मिल जाओ...वरना शोर ना मचाओ. ना ही राज नेता की तरह बाते करो. जेसे अपुन आज कर रहा है...
 काम करो... . अगर आप भाषाई राजनिती से उपर नही उठोगे तो नीचे जाओगे...अरे नीचे जाओगे क्या ...आपकी दुआ से नीचे जा रहे है.
वेसे हम बेशर्म लोग है जी. कितना भी बुरा भला कहा लो हम वो काम नहीं करेगे जो दिल कहता है, हम वो काम करेगे जो हमसे डंडे की चोट पर कराया जाता है. या फिर पैसा फेंक कर हमसे कोई भी काम करा लो....यार कुछ तो बोलो...भगवान भला करे आपका 

Saturday, May 30, 2015

किसान आत्मह्त्या क्यों ना करे ?


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वर्ष 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था. आज यह 1450 रुपए प्रति क्विंटल है यानी बीते 45 वर्षों में इसमें करीब 19 गुना वृद्धि हुई है. समर्थन मूल्य का किसान की आमदनी के साथ सीधा रिश्ता है. इसकी तुलना दूसरे तबकों के वेतन में हुए इजाफे से करें. इन वर्षों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह 110 से 120 गुना, स्कूल शिक्षकों की 280 से 320 गुना और कॉलेज शिक्षकों की 150 से 170 गुना बढ़ी है. कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वालों की आमदनी 350 से 1000 गुना तक बढ़ गई है. यदि खर्चोँ की अोर नजर डालें तो इस दौरान स्कूल फीस और इलाज के खर्चों में 200 से 300 गुना और शहरों में मकान का किराया 350 गुना तक बढ़ गया है. पेट्रोल और डीजल 30 से 40 गुना बढ गये. सोने का मूल्य 200 गुना इजाफा हुआ.  
  किसानों को खाद्यान्नों की कम कीमत का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. इस साल भी गेहूं का समर्थन मूल्य 50 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है, जिससे खाद्यान्न की कीमतें नियंत्रित रहें. धान के मूल्य में भी इतना ही इजाफा किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 3.2 फीसदी ज्यादा है. इसी बीच केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की दूसरी किस्त भी मिल गई, जो पहले से 6 फीसदी ज्यादा है. उन्हें जल्दी ही सातवें वेतन आयोग के अनुरूप वेतन और भत्ते भी मिलने लगेंगे. इसमें सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी का वेतन भी 26 हजार रुपए महीने करने की मांग हो रही है.
आज भी किसान के पूरे परिवार की ओसत आय 3 से 4 हजार रूपये महिने से ज्यादा नही है. एसे मे भूख पेट सोना उसकी नियती बन जाती है. उपर से मोसम की मार से फसलों के बरबाद हो जाने पर उसे ना कोइ बीमा कंपनी राहत देती है ना कोइ सरकारी मदद.  
यदि 45 वर्षों में सबसे कम वेतन वृद्धि के आधार पर भी देखा जाए तो किसान के लिए गेहूं के मूल्य में कम से कम 100 गुना इजाफा होना चाहिए था. इसका मतलब यह कि प्रति क्विंटल गेहूं के लिए किसान को 7,600 रुपए मिलने चाहिए, लेकिन उसे केवल 1450 रुपए मिल रहे हैं. हम मानें या नहीं मानें, लेकिन यह उसका हक है. किसान का हक दिलाने से बजार मे खाने पीनी की चीजों के मूल्य मे बेहताशा वृद्धी हो सकती है जिसे कुछ समय के लिये सरकार सबसिडी देकर रोके और उसके बाद बाजार को ही उसका असली मूल्य तय करने दो. उसी तरह जिस तरह आपने पेट्रोल और डिजल को बाजार के भरोसे छोड दिया. मेरा मानना है कि सारा बोझ गरीब किसानों के ऊपर डालने की बजाय उसे फसलों की ज्यादा कीमत दें. फिर कृषि उत्पादों को सब्सिडी के दायरे में ले आएं जिससे आम उपभोक्ताओं को भी ज्यादा कीमत न देनी पड़े. जापान के अलावा कई अमीर देशों में ऐसा ही होता है.

आसान और कम ब्याज पर ऋण की सुविधाएं बढ़ाने से भी किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते. किसान को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए. हम वर्षों से किसानों को बेहतर कमाई से वंचित करते रहे हैं. एक के बाद एक आने वाली सरकारें जानबूझकर किसानों को गरीब बने देखना चाहती हैं. 

दुर्वेश😟

Sunday, March 8, 2015

गर्मा गर्म पानी ....यानी चाय की एसी की तैसी

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पीलिया होने क बाद मुझे चाय और काफी को छोडना पडा क्योंकी उनके पीते ही उबकाइ करने का मन होता था. हमारे घरों मे चाय और काफी अनिवार्य स्वागत पेय है. किसी भी अतिथी का स्वागत आजकल अब इसी से करते है. एसी हालत मे मेरा इसे पीने से मना करना मेजबान को परेशानी में डाल देता और फिर वो ठंडा, सोडा या कोला पीने की पेशकस करने लगते. इसलिये सोची समझी रणनिती का तहत मेने उनसे इसके विकल्प में गर्म पानी मांगना शुरू कर दिया, वेसे भी उन्हे चाय और काफी बनाने के गर्म पानी करना ही होता है. इस तरह में गर्म चाय की जगह गर्म पानी पीने वाला बन गया.
मेने लोगों को पानी मे नीबूं या फिर ग्रीन चाय मिलाकर पीते देखा है, पर मेने चाय की तरह सिर्फ गर्म सादा पानी ही पिया. जब जितनी बार मन ने चाहा उतनी बार पिया, बिना इस डर से की इससे मुझे कोइ नुकसान होगा. इस बात का जरूर ध्यान रखता कि इससे कंही मे अपने होंठ और जीभ ना जला बेंठू. उसकी वजह से मुझे इसे चाय की तरह ही धीरे धीरे पीना पडता. शुरू शुरू मे बेस्वाद लगा पर कुछ दिनों मे ही मुझे उसमें स्वाद आने लगा. अपने ही स्लाइवा का स्वाद जो कभी हल्का मीठा तो कभी कडवा तो कभी खट्टा सा या कभी कभी नमकीन. इसे मेने पहले कभी महसूस नही किया था. महसूस होता भी केसे नोर्मल पानी को एक ही सांस में जो गटक जाता था. वेसे भी स्वाद, अच्छा या बुरा नही होता, यह सब हमारे दिमाग मे है, देखा जाये तो शराब से बुरा स्वाद भी कुछ हो सकता है! पर इसके स्वाद के बारे मे उसके किसी पीनेवाले से पूछों और फिर उसकी आंखों की चमक देखो.
मेरा तो इतना कहना है की आप भी इसे चाय के विकल्प के तोर पर शुरू किजिये और फिर कुछ दिनों मे ही इसका असर देखिये. शुरू-शुरू मे हो सकता है की आपको इसके पीने से एसीडीटी होने लगे या फिर गला सूखा-सूखा सा लगे. अगर एसा हो तो बस आपको पानी की मात्रा को ओर बढाना  है कुछ दिन मे एसीडीटी का एहसास खत्म हो जायेगा.
एक महिने बाद अगर आपको लगे की  चाय इससे बेहतर है तो कोइ बात नही आप फिर से चाय शुरू कर देना. पर मुझे विश्वास है की मेरी तरह आप भी इसके चमत्कारी असर को अनदेखा नही कर पायेंगे.
हमारी बहुत सारी बिमारीयों और शारारिक परेशानीयों की वजह कम पानी पीना है. एक नोर्मल व्यक्ति को अपने शरीर के वजन का 0.06 से 0.08  गुना पानी एक दिन मे पीना चाहिये. यानी की अगर आपका वजन 80 किलो है तो कम से कम 4.5 लीटर पानी आपको पीना चाहिये.  
अगर हम लगातार कम पानी पीते रहे तो कुछ समय बाद शरीर कम पानी को ही अपनी नियती मान लेता है और हमारा शरीर अंगों के महत्व के हिसाब से पानी की राशनिंग तय कर देता है. कम महत्वपूर्ण अंग जेसे स्किन, डाइजिस्टिव ट्रेक, पैनक्रिया, किडनी, हड्डियों के जोड और मांसपेशियां के लिये जबरदस्त राशनिंग और दिमाग और ह्रदय जेसे महत्वपूर्ण अंग मतलब कोइ राशनिंग नही.  
कभी आपने महसूस किया है प्यास से गला सूख रहा है और आप एक-एक बूंद पानी के लिये तरस रहे है. उसके बावजूद आपको भरपूर पसीना आ रहा होता है. जिस समय आप एक-एक बूंद के लिये तरस रहे होते है आपका शरीर पानी को पसीने की शक्ल मे बरबाद कर रहा होता है. असल मे तब वो आपके तापमान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा होता है. जो आपकी जान बचाने के लिये उस समय ज्यादा जरूरी है.
उसके बाबवजूद अगर आपने कोइ जहरीली चीज खा ली तो तुरंत कई लीटर पानी उबकाई की शक्ल मे भी बाहर आ सकता है, यह सब पानी उसने कंहा से पाया.  सिम्पल, इसे उसने शरीर के दूसरे अंगो से जबरदस्ती हासिल किया. इसे ही राशनिंग कहते है. कब किस अंग को कितना पानी देना है इसका निर्णय लगातार हमारा शरीर लेता रहता है. इसलिये आप इतना पानी पीते रहे की हर समय शरीर में इतना पानी बना रहे की उसे राशनिंग की कम से कम जरूरत पडे. क्योंकी राशनिंग का सबसे पहला असर किडनी फिल्टर पर होता है. हो सकता है पानी की कमी के कारण आपकी पूरी पेशाब ही ना बने. जिसके कारण आपके शरीर का टाक्सिन जो पेशाब के रास्ते आसानी से निकल सकते थे, उनके पूरी तरह ना निकलने के कारण वो बिमारी का कारण बन जाये. 
दुर्गंध युक्त पीली, कथ्थई पेशाब शरीर मे पानी की कमी का संकेत हो सकता है. पानी की लगातार कमी  हमारे कुछ अंगों पर बहुत बुरा असर डालती है. अब पेनक्रिया को ही ले ले इसका हमारे हमारे भोजन के पाचन मे और शरीर में शुगर नियंत्रण मे सबसे बडा हाथ है. अगर हम लगातार कम पानी पीती रहे तो कुछ समय बाद पेनक्रिया कमजोर हो जायेगा. जिसके कारण पहले हमारा पाचन प्रभावित होगा और उसके बाद शुगर नियंत्रण प्रणाली कमजोर हो जायेगी और नतीजा डायबटीज, एसीडीटी और ना जाने क्या क्या.
हमारे खून का PH 7.35 से 7.45 के बीच रहना चाहिये अगर यह 7.35 से कम हो जाता है तो खून अम्लिय (acidic) माना जाता है और अगर यह 7.45 से उपर हो जाता है खून क्षारीय (alkaline) माना जाता है और दोनों ही स्थति मे इसके हमारे शरीर पर गंभीर प्रभाव होते है इसलिये हमारी क़िडनी लगातार इसको नियंत्रित करती रहती है और अतिर्रिक्त अमल्ता या क्षार को पेशाब के द्वारा निकालती रहती है. पर इसके लिये उसे भरपूर मात्रा मे पानी चाहिये होता है.
अगर पानी की कमी बनी रहे तो अमल्ता को नियंत्रित करने के लिये हड्डी मे से कल्सियम लेना शुरू कर देती है और नतीजा ओस्टो प्रोसिस की पूरी संभावना बन जाती है. इसी तरह ब्ललड प्रेशर के कंट्रोल मे भी पाने का बडा महत्व है.   
पानी खाली पेट आसानी से पच जाता है यानी की आंतो द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है. इसके लिये उसे ज्यादा से ज्यादा 20 से 40 मिनिट का समय लगता है शायद इसीलिये हमारे बुजर्गों ने सुबह की शुरूआत भरपूर पानी पीकर करने की सलाह से दी. जिससे रातभर में हुई पानी की कमी को शरीर आसानी से पूरा कर सके.   
भोजन के दौरान या उसके तुरंत बाद पिया गया पानी किये गये भोजन का हिस्सा बन जाता है और वो उस भोजन के साथ ही पचेगा और पाचन को धीमा कर देता है. इसलिये अकसर भोजन के साथ लिया गया पानी पाचन पर अतिरिक्त बोझ साबित होता है और पाचन को कमजोर बनाता है. इसलिये इसे उस समय विष के समान माना गया. 
अच्छा हो की आप पानी को भोजन से आधा घंटा पहले भरपूर मात्रा में पी लें जिससे भोजन शुरू करने से पहले ही वो पानी आसानी से पच जाये. इसी तरह खाने के 1 घंटे के बाद आप भरपूर मात्रा मे पानी पी सकते है. इससे आपका पाचन दुरस्त बना रहेगा. इसके अतिरिक्त जब भी इच्छा हो गर्मा गर्म पानी पीते रहे.
गर्म पानी शरीर की मेटाबोलिक रेट बढा देता है और नतीजा आप बेहतर अनुभव करते है. मेरा अपना अनुभव यह है की गर्म पानी आपके वजन को घटाने मे भी मदद करता है. मेने बिना कीसी अतिरिक्त जिद्दो-जहद के आसानी से 6-7 किलो वजन कम कर लिया है. अब मे पहले से ज्यादा फिट हू स्वस्थ हू.
ध्यान रहे, प्यास लगना एक तुलनात्मक अहसास है, जरूरी नही की वो सही समय पर आपको चेतावनी सिगनल दें, इसलिये आप प्यास लगने का इंतिजार ना करे. अकसर जब हम किसी महत्व्पूर्ण कार्य मे लगे होते है तो हमे भूख और प्यास का पता भी नही चलता. पर इसका यह मतलब तो नही की हमारे शरीर को पानी और खाने की जरूरत ही नही है.
तो फिर क्यों ना भरपूर पानी पिया जाये. पानी धीरे धीरे स्वाद लेते हुये उसे आदर देते हुये पिया जाये. एक बात ओर समझ लीजिये चाय या काफी सादे पानी का विकल्प  नही है. सच तो यह है की चाय और काफी के रूप मे जो टाक्सिन लिया है उस टाक्सिन को निकालने मे ही शरीर को उस से दुगना पानी व्यय करन होगा.
आजकल जूस के नाम पर बजार में ना जाने क्या मिल रहा है. पेप्सी और कोला के नुकसान के बारे मे गूगल करो और खुद जान जाओ.  इसलिये इसे भी सादे पानी का विकल्प मानने की भूल ना करें.
अगर आपको नीचे दी गई लिस्ट मे से किसी एक से भी परेशान है,
·           मोटापा   
·           जोडो मे दर्द
·           हर समय थकान बनी रहना
·           सुबह उठने का मन नही करता है शरीर थका थका सा लगता है   
·           मांस पेसियों मे एंठन रहना
·           त्वाचा रूखी सूखी है
·           सिर मे रूसी
·           डायबटीज
·           क़िडनी इंफेक्शन  
·           जुकाम
·           सिर दर्द रहना  
·           पेट खराब रहना
·           एसीडीटी
·           अकसर कब्ज
·           हाथ पैर ठंडे रहना
·           पाइल्स
·           ब्ल्ड प्रेशर
तो अपने डाक्टर से इस बारे मे बात किजिये और पानी से इसके सबंध के बारे मे पूछिये.
इस बात पर जरूर बहस हो सकती है की पीने के पानी का तापमान क्या हो. कुछ लोग नोर्मल तापमान के पानी को पीने की सलाह देंगे तो कुछ ठंडा पानी पीने का, तो कुछ मेरे जेसे लोग गर्म पानी की. पर कोई भी पानी के महत्व को नजर अदांज नही कर सकता है.
लोग कहते है गर्मी में और गर्म पानी?...कोइ पागल ही एसा सोचेगा.
अजीब लोग है, गर्मी मे गर्म चाय पी सकते है पर गर्म पानी पीने को कहो तो! ..... भगवान ही एसी सोच वालों का भला कर सकता है. वेसे भी डाक्टरलोग पानी उबालकर पीने की सलाह देते है जिससे कि उसके अदंर मोजूद बेक्टिरिया और वायरस खत्म हो सके. अतंर सिर्फ इतना है की लोग उसके बाद उसे फ्रिज मे ठंडा करने के लिये रख देते है. जबकी मेरी सलाह है की उसे चाय की तरह गर्मा गर्म पिया जाये, कम से कम चाय की जगह तो इसे पिया ही जा सकता है.
मेने लोगों को दिन भर में 1 लीटर से भी कम पानी पीते हुये देखा है. उन्हे पता ही नही होता की उनके शारारिक कष्टों की वजह कम पानी पीना है और वो डाक्टरो के यंहा किसी रामबाड दवाइ की उम्मीद मे लाइन लगाये बेठें है.
अति महत्वपूर्ण : आप सुबह की शुरूआत चार से पांच गिलास ( 1 से 1.25 लीटर ) पानी पीने से करे. अगर इसके पीने से आपको चक्कर आने लगे, या हाथ पेरों मे सूजन आने लगे, या नाक से पानी बहने लगे  तो इसे आगे नही करना है और इस बारे मे अपने डाक्टर से बात करे क्योंकी यह कुछ खास बिमारी के लक्षण हो सकते है जेसे हाथ पेरों मे सूजन क़िडनी के ठीक से काम नही करने के कारण हो सकती है. इसी तरह नाक से पानी आना फेफडों की प्राब्लम के कारण हो सकता है और चक्कर आना न्यूरोलोजिकल परेशानी के कारण हो सकता है. 
उम्मीद है की एक महिने तक हर रोज 8 से 10 कप गर्म पानी जरूर पियेंगे. लेख लंबा हो गया है और आप मेरे फंडे से पूरी तरह पक गये है. इसलिये पानी के महातम पर आगे चर्चा किसी ओर दिन, पानी कब, केसे और कितना पीना चाहिये उसके बारे में आयुर्वेद मे विस्तार से समझाया गया है पर उस पर भी चर्चा अगले ब्लाग में.

यह लेख एक सलाह मात्र है. आपके लिये आपके डाक्टर की सलाह सर्वोपरी है.