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Sunday, June 5, 2022

विश्व पर्यावरण दिवस 2022


 



हर वर्ष की तरह इस बार भी विश्व पर्यावरण पर सरकारे और पर्यावरणविद चिंता जाहीर करेगे और घड़ियाली आँसू बहाएगे , कुछ  पेड़ लगाते मुस्कराते चेहरों के साथ फोटो शेयर करेगे, फिर अपनी दुनिया मे लोटकर वही करने लगेगे जिसे ना करने का प्रण उन्होने इस दिन लिया होगा।  

गूगल से पता लगा की  विश्व मे हम इन्सानो की आबादी 750 करोड़ पार कर गई है......जय हो , अगर सब इसी तरह चलता रहा तो अगले कुछ दशक मे हम शायद 1000  करोड़ के मार्क को पार कर जाएगे ( शायद इसलिए कहा क्योंकी इसकी भी पूरी संभावना है की हम मात्र 200-से 300 करोड़ ही रह जाये).

ज्ञात इतिहास मे इतनी आबादी पहले कभी नही थी। जन्म दर  घटने के बाबाजूद आबादी बढ़ती जा रही है। हर गुजरते वर्ष के साथ आबादी का नया किर्तीमान। यह अप्रत्याशित बढ़ौती म्रत्युदर मे आई कमी के कारण है।

7500 मिलियन की इंसान की आबादी से लदा यह ग्रह बहुत तेजी से बदल रहा है, इस बदलाव में हम इंसानो का बहुत बडा हाथ है. जंगल के कटने से और प्राकृतिक स्रोतो का अत्यधिक दोहन, शहरों का कंकरीट जंगल, जल के प्रकरितिक स्रोतो की बरबादी.  हमारा ग्रह अब पहले जेसा नहीं रहा हम इन्सानों ने इसे बदल दिया है. 

पर क्या सिर्फ हम! 

हम ही नहीं ब्रह्मांड की और भी बहुत सी ताकते इस ग्रह को बदलती रहती है, सच तो यह है की हम इसे बदले या ना बदले इसे तो समय के साथ बदलना ही था, पर हम इन्सानो ने बदलाव बहुत तेजी से किया जो बदलाव हजारो सालो मे नही हुआ विज्ञान और टेक्नोलोजी की मदद से कुछ सदियो मे हो गया. इसलिये अब अगर हमे जीना है, तो हमे भी उतनी तेजी से बदलना होगा. 


जंगल खत्म हो रहे है यह भी सच है की हमने अपने रहने के लिये और खाने के लिये इन्हे बुरी तरह बरबाद किया...अगर हम यह नहीं करते तो क्या करते...7500 मिलियन लोगो को खाने और रहने के लिये यह सब शायद जरूरी था. पर  यह पूरा सच नही है आज भी हमारे जिंदा रहने के लिए प्रयाप्त है पर लालच और अहंकार की कोई सीमा नही है। सच तो यह ही की मात्र 10% ने  बाकी 90% का जीवन अपने लालच के कारण नरक बनाया हुआ है। इन 90% के लिए टेक्नोलेजी और विज्ञान एक अभिशाप बनाकर सामने लाने वाले  यही 10% है। 

भौतिकवाद और बजरवाद के मेल से हम जिस रास्ते पर जा रहे है उसमे चंद कुछ पेड़ लगाने से समस्या हल नही होगी, क्योंकी आज का अर्थ-तंत्र अधिकाधिक खपत पर टीका हुआ है। आज किसी देश की संपन्नता का माप ही यह है की उसके नागरीक कितनी आरामदायक वस्तुओं का इस्तेमाल करते है। 

हर गुजरते दिन के साथ यह खपत बढ़ती ही जाएगी, चाहे उसके लिए हम इन्सानो को एक और विश्व युद्ध  का समना  ही क्यो ना करना पड़े।  

इसलिए अब समय है की हम पेड़ लगाने से आगे की बात करे। कचरा निपटान की बात करे, कचरे को रिसायकिल करने की बात करे। उन्हे सम्मान देने की बात करे जो न्यूनतम खपत की जीवन शैली अपनाना चाहते है। क्न्योकी अगर 90% लोगो ने भी उन 10% लोगो की तरह जीवन जीने का मन  बना लिया तो ........?   

हम इंसानों ने जिंदा रहने की जिद्दो जहद में बहुत कुछ सीखा है और लगातार हम हर दिन कुछ ना कुछ नया सीख रहे है...नये उर्जा स्रोत पता करने, नया खाना...,हम में से कुछ लोग सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों मे अपने को जीने लायक बनाया। 

वो समय दूर नहीं जब हम घास को खाने लायक बना देगें. सीधे मिट्टी से हमारी फेक्ट्रीयां  पेड़ पोधों की तरह खाना बाना सकेगीं. वेसे भी हम मे से बहुत से लोग कीड़े-मकोड़े, साँप , कुत्ते-बिल्ली और ना जाने क्या क्या खा जाते है। इस दिशा मे अब और भी ज्यादा गंभीर होने  की जरूरत है । 

मिलावट खोरों से सावधान होने की जरूरत है जिस तरह से वो आज  यूरिया वाला दूध, खाने पीने की चीजो मे भरपूर रसायनों का प्रयोग कर रहे है वो हम सब के लिये अब चिंता का विषय होना चाहिए. इसे रोकने के लिए गंभीर कदम भी हमे ही उठाने होगे। 

हमे भी अब बदलती प्रस्थतियों के अनुसार अपने को ढालना होगा...यानी बढ़ते तापमान का सामना एसी चलाकर नही, उसकी जगह अपनी सहन शक्ति बढ़ाकर करना होगा, जल संकट,  सही ऊर्जा उपयोग।  

हम ही क्या जानवर भी अपने को बदलने में लगे हुये है ...अगर वो अपने को नही बदलेगे तो इतिहास बन जायेगे ...देखा नहीं आपने गाय भी अब हमारे द्वारा छोडा गया सडा गला खाना  सीख रही है, हो सकता है वो जल्द ही  प्लास्टिक को भी पचाने लगे. जंगली जानवर शहर की ओर भाग रहे ...अब अगर शेर को जीना है तो उसे हमारे साथ रहना सीखना होगा, वेसे ही जेसे कुत्तों ने हमारे साथ जीना सीखा. ...अरे आप तो बुरा मान गये.

अब हम सिर्फ शेर के लिये तो जंगल बचाने से रहे...अगर शेर को जिंदा रहना है तो उसे  भी बदलना होगा. अगर वो हमारी दया पर रहा तो जल्द ही इतिहास बन जाएगा, हमारे डार्विन बाबा ने तो यही बताया था । 

सब कुछ बहुत तेजी से घट रहा है. जो विकास हजारों सालों मे नही हो सका वो हमने कुछ दशकों मे कर दिया. इसलिये आम अदमी दुविधा मे है. समय के साथ यह दुविधा बढ़ती ही जायेगी. 

समय के चक्र को उल्टा घुमाना अभी तो असंभव है. इसलिये हमें अपने को बदलते समय के साथ खुद को बदलते रहना होगा अब चाहे वो बदलना जीवन मूल्यों का ही क्यों ना हो!

बाजारवाद और विज्ञान के मेल ने इंसानियत को ऐसे मुकाम पर ला दिया है की कुछ  ताकतवर अगर  लालची इंसानियत की दिशा और दशा तय कर रहे है। वो अर्ध सत्य का अपने लालच के  लिये खुलकर प्रयोग कर रहे है. वो अपने स्वार्थ के लिए  धार्मिक उन्माद, नस्ल वाद का खुलकर प्रयोग करते है इस सच को समझकर इसका सामना करना है और सोशल मीडिया के प्रदूषण से अपने मन को बचाए रखना है।  विशेषकर सोशल मीडिया पर मोजूद अधकचरे ज्ञान और अर्धस्त्य को गंभीरता से पहले परखे.

सच तो यह है की हमे पता ही नही चला की कब हम टेक्नोलोजी के सहारे गुलाम बना दिये गए । एक उम्मीद अब भी बनी हुई है की हम इसके प्रति जागरूक  होंगे और इसका सामना करेगे. आने वाले दिन शुभ हो  इस लिए आज का दिन हम गंभीरता से इस पर मनन करे।  

   


दुर्वेश


Wednesday, August 28, 2019

पर्यावरण दिवस 2021


हम एक बार फिर पर्यावरण दिवस मना रहे है. आज फिर लफ्फाजी का दिन है बडी बडी हांकने का दिन है. यह बताने का दिन है की जगंल और शेर खतरे मे है और अगर वो खतरे मे है तो हम खतरे मै है. पानी की बरबादी सूखा लायीगी...भयंकर सूखा. यही सब सुनकर और सुनाकर इस दिन को मनाया जाता है. पिछले कुछ समय से 1 घंटे के लिये बिजली बन्द करने का चलन भी शुरू हुआ है. जेसे हम किसी को श्रृद्धाजंली दे रहे हो. आज मै ना कुछ एसा करूगा ना ही सुनुगां. कुछ अलग करने का मन है, आज कोइ बडी बातें नही, बस आत्मावलोकन की जो मै कर रहा हू क्या उससे अच्छा कर सकता हू. आज खुद को उपदेश देने का मन है, छोटे छोटे पर ठोस कदमों को प्लान करने का मन है. कुछ एसे कदम जो मेरे आसपास के माहोल को कुछ ओर अच्छा बना सके मुझे बेहतर बना सके. मेरा  बदमाश मन उकसाता है की तुम्हारे एक के अच्छे हो जाने से या कुछ अच्छा कर देने भर से दुनिया नही बदल सकती. अरे... मै दुनिया की नही अपने आसपास के माहोल की बात कर रहा हू...वेसे भी मै अकेला कंहा हू मेरी तरह लाखों करोडो लोग है जो कर रहे है और मै उनमे से एक बनना चाहता हू जो बोल कर नही करके दिखा रहे है.
·         साल मे कम से कम 2 बडे पेड लगाउगा और पक्का करूंगा की वो फले फूलें.
·         धीरे धीरे सोलर आधारित उर्जा इस वर्ष 200 वाट और फिर प्रति वर्ष 200 वाट जोडते जाना है.
·         घर की कम से कम एक लाइट को प्रतिमाह को रेगुलेटड LED लाइट में बदलना है.
·         ह्वाइ यात्रा मैं कम से कम 50% कटौती जब जरूरी हो तभी करू.
·         कूलर और एसी में प्रतिदिन 4 घंटे की कटौती :)
·         एसी का तापमान 27 deg-C
·         कम से कम 70% पोलीथीन रिसायकिल्, कम से कम 25% पोलीथीन को खुद रिसायकिल करूंगा
·         माह में कम से कम एक बार पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग
·         सोलर वाटर प्यूरीफायर बनाना है( 1 ltr per day, experimental)
·         नहाने के साबुन में 90% कमी. मेरा अब मानना है शरीर पानी की मालिश मांगता है साबुन नही
·         40% कच्चा खाना, 50% उबला खाना, 10% बजार का जंक फूड ( वर्तमान स्थति 5-60-35)
·         किचिन गार्डन.
·         प्यूरीफायर वाटर ड्रेन किचिन गार्डन में
·         E-पैपर, E-बुक से कागज में 80% कटौती.
·         किचिन कम्पोस्टींग
·         Install water level alarm in roof top tank

Tuesday, February 27, 2018

हे वैज्ञानिक सोचवाले इंसानों आप सभी को होली की शुभकामनायें


विज्ञान का विद्यार्थी होने के  नाते मेरा विज्ञान का पक्षधर होना स्वाभाविक होना चाहिये, एसे मे जब अंधविश्वास पर वार करते हुये लेख पढने को मिले तो मुझे अच्छा लगना चाहिये, पर मे क्या करू मुझे दूसरे अनदेखे पहलू पर नजर डालने की बुरी आदत जो है, लीक से हटकर सोचने की आदत है. इधर विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मेरे साथी मुझ से यह उम्मीद करते है की माफिया, पूजीपतियों  और राजनेताओं की सांठ्गांठ को नजर अंदाज करते हुये हर अच्छी बुरी वैज्ञानिक सोच का मै समर्थन करू. यह भी भुला दू की आज विज्ञान हमे किस दिशा मे ले जा रहा है.
इन दिनों मेरे आस पास विज्ञान और तकनीक के नाम पर जो हो रहा है उसे देखकर चिंतित और व्यथित हू  और अपने को असहाय महसूस कर रहा हू. गलत का विरोध भी करू तो केसे ?  विरोध करने के लिये और अपनी बात कहने के लिये उन्ही के पास जाना होगा जिनका विरोध करना है, यही मेरी मजबूरी है.  इस हद तक की निर्भरता इसी विज्ञान की ही तो देन है.
अगर आज मुझे अपनी बात आप तक पहुचानी है तो करोडो का चेनल चाहिये.... एसा एक नही सेकडो चेनल चाहिये, क्योंकी मे जिनके बारे मे कहना चाहता हू उनके पास मुझे गलत साबित करने के प्रचार साधन आपार है. इतना असाहाय तो मेरे पूर्वजों ने भी पहले कभी महसूस नही किया होगा. यह सच है की वो कम ज्ञानी थे, अंधविश्वासी भी थे. शायद हमारी तरह गलत और सही की पहचान नही कर पाते थे. उन्हे नही पता था की पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर काटती है. पर उनकी अपनी एक जीवनशेली थी जिसे अपना कर वो हजारो सालो से पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाये रखते हुये इंसानी जीवन को जीवत बनाये रखा. पर आज क्या ?
आज हम हद दर्जे तक मतलबी और लालची हो गये है हमारी कथनी और करनी मे फर्क बढ गया है.  हमारी जिंदगी इतनी आराम तलब और मतलब परस्त हो गई है की हमने अपने आनेवाले  संकट से आंखे मूद ली है. इस विज्ञान ने इंसान मे मोजूद जानवर की हसरत को हजारो गुना बढा दिया है. आज हम वही बोलते और सोचते है जो हमारी हसरतो को पूरा करने मे मदद करे...किसी भी कीमत पर.
लालच को हमने कोरपोरेट का रूप दे दिया है. जो बस कमजोर को अपनी मालकियत समझता है प्राकृति संसाधनो का बेहिसाब दोहन इसी लालच की देन है. यही लालच धर्म और विज्ञान को अपने मतलब के लिये एक दूसरे को खून का प्यासा बना देता है. लाखो मार दिये जाते है और दोष धर्म का. हो सकता है,  दोष धर्म का ही हो,  पर हथियार किसके है ...वो तो विज्ञान की ही देन  है ना ?  वरना मात्र नाखून और पंजो से आप इतनो का मार पाते ?   
प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक विज्ञान और उसके द्वारा किया गया तकनिकी विकास का असर बहुत सिमित क्षेत्र मे होता था. ये वो समय था जब सभ्यताये प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुये अपनी परंपराओं और समाजिक संरचना को हजारों सालो तक बनाये रही, और  वंही कुछ समाज अन्य सभ्य समझे जाने वाले समाजों की तुलना मे  अपने को  आदिम, जंगली बनाये रहे.  उस समय वो एसा कर भी पाये क्योंकी विज्ञान उतना उन्नत नही था.  
सभ्यताये आती- जाती रही पर हजारों सालो से मानव जाति अपना वजूद बनाये रही, प्रथम विश्व युद्ध के  बाद यह सब तेजी से बदला गया. जिस तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है वो अब किसी से छुपा नही है, विज्ञान और तकनीकी की मदद से इसकी अंधाधुंध उपयोग सभी सीमाये पार कर रहा है.
यह सच है की अंधविश्वास ने मानवजाति का नुकसान किया  है. पर क्या कभी इसका किसी ने हिसाब लगाया की विज्ञान और तकनीकी ने मानव जाति का कितना नुकसान किया है. इसलिये अंधविश्वास पर वार करने से पहले हमे यह देखना होगा की जिस  विज्ञान की उगंली पकडकर हम चलना चाहते है वो हमे किस दिशा मे ले जा रहा है. यह तब, और भी जरूरी हो जाता है जब व्यवस्था भ्रष्ट हो  और वो लालची मतलबी एह्सान फरामोस राजनेताओं और धर्म के ठेकेदारों और पूजीपतियो की लिये काम कर रही हो.
अंधविश्वास और गलत पंरपराये मात्र उनको  प्रभावित करते थी जो उन्हे मानते है, पर  विज्ञान उनको भी प्रभावित कर रहा है जिसका उससे दूर दूर तक कोइ लेना देना नही है. पृथ्वी का जीवन इससे पहले इतने संकट मे कभी नही था. हर गुजरते दिन के साथ कोइ ना कोइ प्रजाति विलुप्त होती जा रही है. आज हम मे से कोइ भी पक्के र्तौर पर यह नही कह सकता की अगले 50 साल मानव जाति भी बनी रहेगी या नही.
एल्बर्ट आंस्टीन को आज अगर विज्ञान के लिये याद किया जा रहा है तो उन्हे परमाणुबम के लिये और उससे हुई लाखों हत्याओं के लिये भी याद किया जाये ...  जो उनके रहते नागासाकी और हिरोशिमा मे हुई .... कितना असाहाय महसूस किया होगा एल्बर्ट आंस्टीन ने ...या किया भी होगा या नही...कोन जानता है....इतिहास तो जीतने वाले लिखते है. 
आज विश्व की 20% आबादी का पृथ्वी के 80% संसाधनों पर कब्जा है. ये बेहद ताकतवर है. यही  लोग विज्ञान और तकनीक का सहारा लेकर बाकी 80% आबादी को डर और मजबूरी के साये मे जीने को मजबूर कर दिया है. यही वो लोग है जिनका असिमित लालच जंगल , पहाड को बरबाद कर दे रहा है.  आखिर प्राक़ृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हमे किस ओर ले जा रहा है?
कल ही ल्यूसी रोबोट का विडियो देखा ...उसमे वो बोल रही है की “ अगर आप मेरे साथ सही सलूक करोगे तो मै भी आपके साथ सही सलूक करूगी” ? हो सकता है की यह किसी का मजाकिया विडियो हो? पर यह मात्र धमकी नही है. आर्टी फीशियल इंटेलीजेंस से युक्त ये रोबोट समय के साथ और बेहतर होते जायेगे और वो समय दूर नही जब हम पूरी तरह इन पर निर्भर होंगे इसके नतीजे कितने विनाशकारी हो सकते है यह तो भविष्य की बात है पर आज जो  कुछ  अफगानिस्तान, इराक मे हुआ उसे क्या आप नजर अंदाज कर पायेगे, किस तरह रिमोट मे बैठे कुछ लोग विज्ञान की देन ड्रोन और एसे ही कितने हथियारों से सब कुछ तबाह करने पर तुले हुये है ... और जो विरोध मे है वो बस आंतकवादी  करार दिये जा रहे है.  मै यह नही कह रहा हू की आप फिर से आदिम बन  जाओ और अंधविशवास का दामन थाम लो. पर इसका मतलब यह भी नही की विज्ञान और तकनीक का अंध भक्त हो जाया जाये.
हमे धर्म और विज्ञान से परे जाकर जीवन को देखना और समझना है. जीवन को सरल बनाना है. आज विश्व की आबादी 770 करोड़  से भी ज्यादा है और अगले 10 वर्षों मे वो 900 करोड़ का आकडा पर कर जायेगी. 
लालची और मतलबी लोगो से शासित 900 करोड़ लोग जो अपने ही बनाये विज्ञान और तकनीक के दानव से डरे और सहमे हुये होंगे ..... जिसे हम प्रगति कहते है क्या सच मे यह प्रगति है ...और यह केसी प्रगति, किसकी प्रगति ? इस सब से इंसानियत ने क्या पाया ?
आज विकास के नाम पर हमने लंगोठ पहने मूल निवासी को जींस पहना दी है हाथ मे मोबाइल थमा दिया है देखने को टीवी भी लगा दिया है ...क्या यह सब करके उस सीधे सादे इंसान को अपनी तरह  लालची और मतलबी नही बना दिया. अब हम चाहते है की हम उसके जंगल और पहाड ले ले और वो उफ तक ना करे
मै आदतन ट्रेकर हू ....अब  भी ट्रेकिंग के दौरान मुझे जंगल और पहाड मे एसे लोग मिल जाते है जिनके पास भले ही खाने को एक रोटी हो पर उसमे से भी  वो आधी रोटी मुझे देना चाहता है ...अपनी खटिया मुझे सोने को देता है और खुद  नीचे जमीन पर सो जाने की जिद्द करता है ...उस समय  सच मै अपनी इतनी बढी वैज्ञानिक सोच और तकनीक होने के बावजूद खुद को बहुत छोटा महसूस करता हू ...आज वो संकट मे है और मे बस वाट्सएप पर यह लिख पा रहा हू . उसका साथ दूंगा तो आप सब मुझे आंतक वादी और माओवादी घोषित करने मे कतई परहेज नही करोगे ... हो सकता कुछ लोग इस लेख को पढकर एसा सोच भी रहे हो
क्या ही अच्छा होता अगर विज्ञान इस धरती पर  रह रहे इंसानों को समझा पाता की इस पृथ्वी पर उसके जीने के लिये जरूरत से ज्यादा है. काश विज्ञान हम सब को विश्व ग्राम का अहसाहस दिला पाता. हमे समझा पाता की राष्ट्र , धर्म, रंग  और जाति मे बटा वो प्राकृति की एक मात्र एसी अनूठी रचना है जो चाहे तो जानवर से खुद इश्वर बन सकता है.
अफसोस विज्ञान एसा नही कर पाया उस पर  राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार पहले भी हावी थे और अब तो हद ही हो गई है. आज वो एसे विचार पागल पन की हद तक जनूनी होकर इसी विज्ञान की मदद से फेल रहे है. कुछ लोगों ने पृथ्वी के संसाधनों पर बेशर्मी की हद तक कब्जा कर लिया है और बाकीयों को राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार से आपस मे लडाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है. 
सब को मौत की सच्चाई मालूम है सब को मालूम है की वो कितना ही अमर होने का जतन कर ले, मौत से वो बच नही पायेगा. जो पैदा हुआ है उसे मरना ही होगा. हमारी पागल पन की हद देखो की वो हमे दिखाई नही दे रहा है. 
आज विज्ञान बंदर के हाथों उस्तरा ही तो है ...ना भई ना उस्तरा नही..क्योंकी उससे तो वो खुद अपना ही नुकसान कर सकता था. उसके हाथ मे विज्ञान एक एसे रिमोट की तरह है जो किसी भी एटम बम को फोड सकता है .... जो अब फूटा की तब.
एटम बमों का भोडा प्रदर्शन शान से हो रहा है, जितना बढा बम उतना ही वैज्ञानिक और तकनीकी उन्नत देश.  हमने इतिहास  से ना सीखने की कसम खा रखी है.  आज हमने रक्षा के नाम पर इतने हथियार जमा कर लिये है जो इस पृथ्वी को सेकडो बार तबाह कर सकती है. फिर भी चेन नही
 हमे और घातक हथियार चाहिये. और एसे लोगों को आप विज्ञान देने की बात कर रहे हो.  मेरे हिसाब से अंधविश्वास पर काम करने से पहले हमे अपने लालच और डर पर काम करना चाहिये, और इस बात का जबाब हमे अपने अंदर खोजना चाहिये की लालच ज्यादा खतरनाक है या अंधविश्वास.
कहने को अब भी बहुत कुछ है पर लेख लंबा हो रहा है ...इसे पढते रह जाओगे तो होली कब मनाओगे. .. इस लिये आगे की बात किसी ओर दिन 

शुभ होली
                                                                                                                                     सादर
       दुर्वेश      

Monday, June 5, 2017

पर्यावरण दिवस ...जय हो उसे उसे मनाने वालों की


यह लेख उन  जिम्मेदार नागरिकों को  समर्पित है जो पोलीथीन को नंबर एक दुश्मन घोषित करने के लिये कमर कस चुके है. गुजारिश है की एक बार इस लेख को पूरा पढे और उसके बाद सही निर्णय लें.  
पैपर बेग, जूट बेग या फिर पोलीथीन बेग मे से कौन सा बेहतर विकल्प है. आज पोलीथीन को दोषी करार दिया गया है. अब आप पैपर  बेग को इस्तेमाल के बाद उसे कचरे मे फेंकने को आजाद है पर पोलेथीन को फेंका तो कडी सजा.  आज सारे प्रयावरण वादी और सरकारें एक साथ पोलीथीन के विरूध उठ खडे हुये है, और बहुत से राज्यों की तरह मध्यप्रदेश मे भी पोलीथीन बेग के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है.  इसे इस्तेमाल करने वालों के विरूध  कडी सजा का प्रावधान किया जा चुका है.  
एक बार फिर 5 जून को मनाये जाने वाले पर्यावरण दिवस पर मेरी कोशिश दोनों के बारे मे उपलब्ध जानकारी का विशलेषण करने की है जिससे आप सभी अपने स्तर पर सही निर्णय ले सकें. जब भी पोलीथीन और पैपर/जूट बेग के बीच चुनने की बात आती है तो आजकल पैपर और जूट बेग के इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है. इसके पक्ष मे दलील दी जाती है की पैपर /जूट बेग बायोडिग्रडेबल है , वंही पोलीथीन बायोडिग्रडेबल नही है. इसे अगर जानवर, चिडिया  खाले तो उसकी जान पर बन आती है. यह नालियां चोक कर देती है नदी और तालाब को गंदा कर पर्यावरण के लिये गंभीर खतरा बन जाती है. यह गंदगी हमारी आंखो को खटकती है. इधर उधर बिखरी पोलीथीन की पन्नियां भला किसको अच्छी लग सकती है.
प्लास्टिक केरी बेग पोलीथीन से बनाया जाता है. दुनिया भर में इसे खाद्य पदार्थ, दवा, और पानी को स्टोर करने के लिये सुरक्षित माना गया है. भारत में भी BIS मानक (refer IS 10146:1982 Reaffirmed on Feb-2003). के अंतर्गत इसे सुरक्षित माना गया है.   पोलीथीन Recyclable, reusable, light-weight, high strength, low carbon and water footprint, tear resistent, space saving, bacteria resistant and waterproof, सस्ता, सास्थ्यकरप्रयावरण के लिये सुरक्षित, कम उर्जा खपत के साथ साथ पैपर या जूट बेग से बहुत सस्ती  और वजन मे हल्का होने के बावजूद यह आज हमे पर्यावरण की दुशमन नम्बर वन नजर आ रही है.
पोलीथीन रैपर और पैकिंग मिठाइ, नमकीन, ब्रेड, केक, बिस्कुट उद्योग और खान पान से जुडे दूसरे व्यवसाय जिसमें खाद्य पदार्थ को सुरक्षित रखना हो तो उसे पोलीथीन पैक किया जाता है. इसे आसानी से वेक्यूम् और नाइट्रोजन फिल पैक में भी बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके इस्तेमाल से खाद्य पदार्थ अब 6 महिने तक आसानी से स्टोर किया सकता है. हमारे देश और अन्य विकासशील देशों मे 10% से 15% प्रतिशत खाद्य पदार्थ खराब पैकिंग और स्टोर की वजह से खराब हो जाता है.  इसकी वजह से सीधा नुकासान तो होता ही है इसके सडने की वजह से निकली मिथेन  गेस के कारण ग्रीन हाउस प्रभाव पर्यावरण पर उल्टा प्रभाव डाल रहा है. इस सच को हम नकार नही सकते की पोलीथीन रैपर के कारण आसानी से  खराब हो जाने वाले खाद्य पदार्थ को भी अब अधिक दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है. दूर दराज के इलाकों मे इसे सुरक्षित पहुचाया जा सकता है. बाढ और भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा के समय पोलीथीन पैक सुरक्षित खाद्य सामग्री, पानी, दवाइयां जीवनरक्षक का काम करती है.
यह सच है की आज पालीथीन पर्यावरण के लिये खतरा साबित हो रही है, पर क्या इसके लिये हम पूरा दोष पालीथीन को दे सकते है? सच है की जो जानवर इसे खा जाते है उनके जीवन के लिये खतरा साबित होती है इससे नालियां चोक हो जाती है. इधर उधर बिखरी पालीथीन की पन्नियां  देखने मे किसी को भी अच्छी नही लगती.
पर यह तो पोलीथीन निष्पादन का दोष हुआ क्योंकी हम शान से इसे कंही भी फेंक देते है जेसे आजाद देश मे हमारा यह जन्म सिद्ध अधिकार हो. इसे सही ठिकाने लगाने का काम नगर निगम का अदना से सफाइ कर्मचारी को दे दिया गया है. वो गरीब भी क्या करे बायोमास के बदबूदार कचरे मे से वो पन्नियां केसे अलग करे?
 मजबूरी मे वो भी इसे अनदेखा कर कूडे के ढेर पर पटक देता है या फिर यहां वहां उडती हुई पन्नियां कभी नाली को जाम कर देती है कभी नदी तलाबों के तैरती नजर आती है. जिस पोलीथीन को आसानी से रिसायकिल किया कजा सकता था हमारी गलत आदतों के कारण हमारे लिये खतरा बन गई.
इसके लिये हम अपनी आदतों को सुधारे या फिर अपनी शाही आदर्तों को बरकरार रखते हुये पैपर और जूट बेग को अपना कर उस से बढे खतरे को अपने गले लगा लें! हमारी इस बेवकूफी को सही निराकरण पर्यावरणवादी और पर्यावरण को समर्पित हमारी सरकार को कागज या जूट से बने बेग के उपयोग मे दिखाइ देता है. इसे इस्तेमाल करो और फिर सडने के लिये इसे कंही भी फेंक दो यह जाने बिना की जब यह सड्ता है तो पर्यावरण का ज्यादा नुकसान करता है. यह नुकसान हमे समझ मे नही आता क्योंकी हमे दिखाइ नही देता. पोलीथीन पन्नियां हमे दिखाइ दे रही है शायद इसलिये हमारी आंखो मे ज्यादा खटक रही है.
यह सही है की पैपर रिसायकल हो सकता है पर क्या आपको मालुम है कि हमारे नदी नालों को प्रदूषित करने मे पैपर उद्योग का बडा हाथ है. सच तो यह है की पैपर या जूट बेग पोलीथीन से कंही बडा खतरा है क्यों विशवास नही होता ना? गूगल करो और खुद जान जाओ. 
पैपर उद्योग को बढावा यानी जंगलों का और तेजी से सफाया. प्लास्टिक बेग की तुलना में  जूट या पैपर् बेग की बनाने में तीन गुना ज्यादा उर्जा की खपत होती है. इसके बावजूद जब जूट बेग के सडने से  मिथेन और कार्बनडाइओक्साइड गेसें निकलेगी उसका दुषप्रभाव क्या होता है यह भी हम सब को मालूम है.
बुराइ पोलीथीन बनाने या इस्तेमाल में नही है बल्की इसके इस्तेमाल करने के बाद उसके निस्पादन के तरीके मे है. हम खराब आदत से मजबूर कचरे को मिक्स कर देते है यानी की बायो कचरे के साथ प्लास्टिक कचरा जिसे बाद मे अलग करना असंभव हो जाता है या फिर बेहद मंहगा साबित होता है. हम यह समझ लें की प्लास्टिक बेग अपने आप मे इतनी बडी समस्या नही की उसकी जगह हम पैपर बेग या जूट बेग को इस्तेमाल करने को मजबूर हो जाये समस्या की जड तो हमारी गलत आदत है.
लोगों द्वारा कूडा कचरा केसे भी और कंही भी फेंक देने से रोकने का काम किसका है. क्या इसके लिये भी हम को पुलिस का डंडा चाहिये. क्यों नही उस क्षेत्र की साफ रखने की नैतिक जिम्मेदारी उस जगह के आसपास या उसका उपयोग करने वालों के उपर डाली जाये. और जो ना करे उस पर भारी जुर्माना. यूरोप और अमेरिका, सिंगापुर, जिन शहरों की सफाइ की दुहाइ हम देते है वंहा गंदगी फेलाने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है. इसी जुर्माने की डर से लोगों ने कचरा सही तरह से ठिकाने लगाना शुरू किया और अब वो उनकी आदत बन गया है.
अगर पोलीथीन को कंही भी फेकने की जगह उसे सही कचरे के डिब्बे मे डाला जाये तो समस्या ही नही बचती. अगर सफाइ कर्मचारी मिले जुले कचरे को उठाने से ही मना कर दे और रहवासियों को कचरे के किस्म के अनुसार अलग अलग डिब्बे मे डालने पर जोर दे तो समस्या ही ना रहे. क्या आपको पता है की पालीथीन और प्लास्टिक कचरे से कमाइ हो सकती है. अगली बार भंगार वाला  जब आपकी गली में आवाज लगाये तो उससे इस बारे मे बात करके देखना.
हम सब को मालुम है की पोलीथीन और प्लास्टिक पेट्रोलियम उत्पाद से बनते है, वही जिससे पेट्रोल और डिजल बनता है. 93% पेट्रोलियम इधंन के रूप में इस्तेमाल होता है मात्र 4% ही प्लास्टिक या पोलीथीन बनाने मे इस्तेमाल होता है. हर बार बहस का मुद्दा होता है की प्लास्टिक और पोलीथेन का इस्तेमाल होने के बाद उसके कचरे का निस्पादन केसे होगा. अगर 4% प्लास्टिक कचरे को अंत भी इधन के रूप् मे जला दिया जाये तो क्या बुराइ है!
पोलीथीन को पूरी तरह से रिसायकल किया जा सकता है, अब तो प्लास्टिक और पोलीथीन कचरे को सडक बनाने मे भी इस्तेमाल होने लगा है और उसके उतसाहवर्धक नतीजे मिल रहे है.
याद रहे पैपर और जूट उद्योग का पानी के स्र्तों को दूषित करने में बडा हाथ है. आजकल पैपर बेग या पैपर कोन/ ग्लास को बनाने मे एसे पदार्थों का इस्तेमाल होता है जो इसे तुरंत सडने से रोकते है, इसके कारण यह भी नालियों को चोक करते है. सडे-गले कागज से मिथेन उत्सर्जित होती है जो कार्बनडाइओक्साइड  से 20 गुना ज्यादा हानीकारक है. पैपर बेगे के पक्ष मे कहा जाता है की पैपर रिसायकल किया जा सकता है. पर क्या आपको मालूम है रिसायकल पैपर नये पैपर से ज्यादा मंहगा होता जिसे सरकारी अनुदान देकर सस्ता किया जाता है. माना की  रिसायकल पैपर को बनाने में नये पैपर की तुलना मे कम पनी की खपत होती है. पर इंधन की खपत करीब 31% ज्यादा होती है.
मै मानता हू की हमारी बहुत सी पर्यावरण  समस्याओं की तरह पोलीथीन / पैपर बेग की समस्या का हल आसान नही है, पर हम सब के सम्मलित पर ठोस प्रयास अच्छे नतीजे ला सकता है. अपनी आदतों मे थोडा सा सुधार लाकर हम पोलीथीन को अपना और पर्यावरण का दोस्त बना सकते है. इसके लिये हमे, हमारी कचरा फेलानी की नबाबी आदत से निजात पानी होगी. कचरा निस्पादन के लिये उचित प्रबंधन पर ध्यान देना होगा. देखा जाये तो शहरो द्वरा उत्पन्न कचरे मे मात्र 5% ही प्लास्टिक कचरा होता है. बाकी का कागज, मिट्टी, डायपर्स बायोमास होता है इसलिये पोलीथीन पर रोक इसका सही इलाज नही है उल्टा इसके बंद होने से स्थति और बिगडेगी. इसका सही इलाज हम सब मे उचित आदत का विकास है, जो कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही डिब्बे मे डाले और सही समय पर और सही तरीके से कचरे का प्रबंधन करे. जेसे बयोमास से बनी अच्छी खाद से हाजारों करोड रूपये की बरबादी को सीधे सीधे बचाया जा सकता है.
हम प्रण लें की :

1.     हम  पोलीथीन और पैपर बेग के अति प्रयोग से बचेगें.
2.     पैपर पैक की जगह पोलीथीन को प्राथमिकता देगें पर उसके निस्पादन को भी सुनिन्श्चित करेगें. जब पोलीथीन बेग का सही निस्पादन करने में संदेह हो, तो ही हम पैपर बेग का इस्तेमाल करेगें.
4.    कचरे को उसके प्रकार के अनुसार सही कचरे के डिब्बे मे डालेगें.
5.     अच्छा हो की दुकानदार केरी बेग के लिये ग्राहक से पूछे. जब तक ग्राहक ना मांगे उसे पोलीथीन या पैपर बेग देने से बचे. अगर ग्राहक पोलीथीन या पैपर बेग मे लेने से मना कर घर से लाये अपने बेग मे सामान ले  तो उसे धन्यवाद दें.
6.     सामान की अतिरिक्त पैकिंग से बचे. हम अकसर पहले से ही पैक किये सामान को एक बेग में और फिर वो बेग दूसरे बेग मे डालते है, जब की उस सामान को कुछ दूर खडी गाडी में रखना भर होता है.
7.     हमारी गलत आदतों के कारण सरकारी एजंसियों को मजबूरन बाजार मे 40 माइक्रोन से कम मोटाइ की पोलीथीन बेग पर रोक लगानी पडी जबकी 10 से 15 माइक्रोन की पोलीथीन भी एक सामान्य पैपर बेग का आसानी से मुकाबला कर सकती है. बस हमे इतना करना है की इस्तेमाल के बाद उसे सही कचरे के डिब्बे मे डालें.  
8.     हम कचरे को पोलीथीन में डालकर उसे सीधे कचरे मे डाल देते है. एसा कभी ना करें. पोलीथीन बेग के कचरे को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डालने के बाद पोलीथीन को भी उसके लिये किये गये नियत डिब्बे मे डाल दें.
9.     हम अकसर घरों मे पैदा होने वाले कचरे को पोलीथीन मे भर देते है और फिर उस कचरे को पोलीथीन के साथ ही कचरे की डिब्बे डाल देते है. जो गलत है. इससे पोलीथीन और बायोमास एक साथ मिसक्स हो जाता है जिसे बाद मे अलग नही कर पाते. हमें पोलीथीन मे मोजूद गंदगी को उसके सही कचरे के डिब्बे मे डाल कर पोलीथीन को भी उसके सही कचरे के डिब्बे डालना चाहिये.

10.  100% रिसायकल हो सकने वाली पोलीथीन का फायदा समाज को दें.

Monday, June 6, 2016

मंथन-1 क्या यह सब सुधारेने के लिये किसी पर्यावरण दिवस की जरूरत है?

पानी की मारामारी: देखा गया है इस तरह की हालात मे जल्दबाजी और खींचातीनी और तानातानी की स्थति बन जाती है.  एसे में 10 से 20% पानी बरबाद हो जाता है. अगर कोइ कमजोर और बिमार है तो वो अपना पानी केसे भरेगा.  जिस तरह लोग अपने अपने पाइप टेंक मे डाल रहे है उससे पानी का दूषित होने की संभावना बनी रहती है, 
इस का एक उअपाय है, सभी महोल्लों में कुओं की तरह अंदर ग्राउंड सील्ड टेंक बनाये जाये. जिसे जरूरत के अनुसार पानी के टेंकर से भरा जाये. उन टेंकों के उपर हेंड पंप लगे हो जिससे लोग जरूरत के अनुसार कभी भी पानी भर सके. बरसात के मौसम मे इन टेंकों को रेन हार्वेस्ट के द्वारा भरने की व्यवस्था भी जाये. इससे लोगों को  रेन हार्वेस्ट के लिये प्रेरित किया जा सकेगा. इससे  धारा 144 भी नही लगानी होगी और आपसी भाई चारा भी बना रहेगा. 
अगर टेंकर को अडंर ग्राउड टेंक मे खाली किया जाये तो पानी को इस तरह दूषित होने से बचाया जा सकेगा और जरूरत मंदो को पानी के लिये इस तरह युद्ध की तैयारी भी नही करनी होगी.  


विसर्जन: विसर्जन आस्था से जुडा है. इसमे  जब भी प्रशासन ने इसे रोकने की सखती की तो इसे आस्था पर हमला माना गया. क्यों ना नदी तालाबों की जगह कुछ छोटे छोटे विसर्जन ताल नदी और तालाबों के किनारे बना दिये जाये और श्रधालुओं को विसर्जन उन मे करने को प्रेरित किया जाये.  एसे स्थानों पर कुछ वोलेंटिय़र को खडा किया जाये जो लोगों को प्लास्टिक पन्नियों के साथ पूजन सामग्री  को फेंकने से रोके. उसके बाबजूद भी कुछ लोग एसा करने से बाज नही आयेगे. उसके लिये  विसर्जन के स्थान पर पानी के अदंर नेट डालक़र एक घेरा बनाया जा सकता है. जिससे लोग विसर्जन की सामग्री डाले तो वो जाल मे फंस जाये . बीच बीच मे जाल को बाहर निकालते रहे . इससे प्लास्टिक और अन्य सामग्री को आसानी से बाहर निकाला जा सकेगा. 
उस ताल के पानी को सूर्य द्वारा सूखने दिया जाये. उसके सूखने के बाद उसकी सफाइ कर उसे पानी से फिर भर दिया जाये. 
हो सकता शि नीचे चित्र मे दिये गये गंदगी के नजारे को देखकर अपनी आस्था के बारे मे वो गंभीरता से सोचे और एसा करने से वो बाज आये.  



Sunday, June 5, 2016

क्या प्रकृति मनुष्य की दासी है



प्रकृति का जिस तरह से हमने दोहन किया है उससे लगता है की प्रकृति मनुष्य की दासी है, जिसे वह विज्ञान व टकनॉलॉजी के दम पर चाहे जैसा रौंद सकता है, लूट सकता है और उसके साथ बलात्कार कर सकता है। इसी के साथ यह भी मान लिया गया कि आधुनिक सभ्यता द्वारा विकसित हर टकनॉलॉजी श्रेष्ठ तथा अपनाने लायक है और प्रगति की निशानी है। आधुनिक टकनॉलॉजी के प्रति अंधविश्वास की हद तक भक्ति इसमें दिखाई देती है। 
अगर एसा ना होता तो हमे अपने चारों ओर लाखों टन इ-कचरा दिखाई  देने लगता. हर साल लाखों करोडो मोबाइल और लेपटाप की बैटरियां को कचरे की तरह हम डस्टबिन मे एसे फेंक देते है जेसे वो कोइ कागज का टुकडा हो. उसमे मोजूद हानीकारक रसायनों के प्रति हमारी इस कदर की उदासीनता एक गंभीर अपराध क्यों नही मानी जा रही है. इसी तरह वाहनों का कबाड हो या घर मे इस्तेमाल फ्रिज और टीवी और वाशिंग मशीन, इनकी उम्र पूरी होने के बाद हम नई खरीद कर पुरानी को भूल जाते है. कभी सोचा की उस पुराने का क्या होता है. पुरानी नजरों से दूर होते ही जेसे  हमारी उसके प्रति जिम्मेदारी खत्म हो गई. और उसके बदले नये के साथ हम आराम से जो है. 
हमारी भूमी, जल और वायु खतरनाक तरीक से प्रदूषित हो गई उसके विनाशकारी नतीजे लगातार सामने आने के बावजूद आत्मघाती राह पर हम लगतार उसे आगे बढ़ रहा है तो उसके दो कारण हैं। एक तो इनको आगे आगे बढ़ाने में साम्राज्यवादी देशों, कंपनियों, नेताओं, अफसरों व तकनीकशाहों के नीहित स्वार्थ हैं। मानव समाज का हित और भविष्य इनके मुनाफों, कानूनी-गैरकानूनी कमाई और अहंकार के सामने बौने पड़ जाते हैं। 
जैसे भारत में ही परमाणु बिजली के नए महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के पीछे अमरीकी, फ्रांसीसी व रुसी कंपनियों के स्वार्थ हैं, हमारे नेताओं ने इन भस्मासुरों को आधुनिक भारत के मंदिरकी उपमा दी। मंदिरों के भगवान की तरह आधुनिक टकनॉलॉजी एवं विकास को प्रतिष्ठित कर दिया गया और विवेक या तर्क को छोड़कर उसकी पूजा होने लगी। टकनॉलॉजी की यह अंधभक्ति इतनी प्रबल रुप में पढ़े-लिखे बौद्धिक समुदाय में छाई है कि इस पर सवाल उठाने वालों को कई बार अवैज्ञानिक, दकियानूसी, पीछे देखू व प्रगति विरोधी करार दिया जाता है।
यह सही है की  हमें बिजली चाहिए, कोयला, प्राकृतिक गैस, डीजल, नेप्था, परमाणु उर्जा या बड़े बांध - किसी से भी बिजली बनाएं तो समस्याएं पैदा होती हैं और फिर उनका विरोध होने लगता है। यह बिल्कुल सही है। इसका जवाब दो हिस्सों में है। एक तो यह कि उर्जा के अन्य सुरक्षित वैकल्पिक स्त्रोतों का विकास करना है। और समय के मानदंड पर जो उर्जा तकनीके खरी  उतरी हो उन्हे बढावा देना है. अभी तक साम्राज्यवादी देशों को पूरी दुनिया से कोयला, तेल, गैस व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने तथा प्रदूषण एवं पर्यावरण-विनाश करने की सुविधा इतनी आसानी से मिलती रही कि वैकल्पिक उर्जा के विकास व अनुसंधान पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। 
हमारा देश भी उन्हीं की नकल कर कोयला, प्राकृतिक गैस, डीजल, नेप्था, परमाणु उर्जा या बड़े बांध से आगे नही सोच पाया। बहुत देर बाद हमने सौर उर्जा जेसे विकल्पों के प्रति थोडी गंभीरता दिखानी शुरू की है.  आज  भी हम मांग के अनरूप सोर उर्जा सेलों के बनाने के लिये आधारभूत उद्योग नही लगा पाये. यह तरक्की भी चीन से आयातित निम्न  दर्जे  के सेलों के सहारे पर टिकी हुई है.  इस तकनीक में जन भागेदारी अब भी सरकारी आंकडो क खेल बन रही है. 

यदि बिजली पैदा करने में इतनी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, तो इसके अंधाधुंध उपयोग को भी नियंत्रित करना होगा। खास तौर पर बिजली व उर्जा के विलासितापूर्ण उपयोग व फिजूलखर्च पर बंदिशें लगानी पड़ेगी। इसके लिए आधुनिक जीवन शैली और भोगवाद को भी छोड़ने की तैयारी करनी होगी।
आधुनिक टकनॉलॉजी, आधुनिक जीवनशैली, उपभोक्ता संस्कृति, कार्पोरेट मुनाफे, वैश्विक गैर बराबरी, साम्राज्यवाद, पर्यावरण संकट - इन सबका आपस में गहरा संबंध है और ये मिलकर आधुनिक औद्योगिक सभ्यता को परिभाषित करते हैं
इनके विकल्पों पर आधारित एक नई सभ्यता के निर्माण से ही मानव और उसकी मानवता को बचाया जा सकता है तथा एक बेहतर व सुंदर दुनिया को गढ़ा जा सकता है। अभी तो फिलहाल पर्यावर्ण के नाम पर कुछ स्लोगन बनाना. लेख लिखना, और बहुत हुआ तो कुछ पोधों को रोप देना भर है. जेसे हम इस को मनाकर प्राकृति पर कोइ बहुत बढा अहसान कर रहे है. 


Saturday, March 7, 2015

सार्वजनिक - यानी मन चाहा, गेजिम्मेदार उपयोग

हमारे यंहा सार्वजनिक का मतलब उसे बेशर्मी की हद तक इस्तेमाल करने का अधिकार और उसके रखरखाव का ठेका किसी ओर का ( यानी भगवान भरोसे). पानी के स्रोत चाहे वो नदी या तालाब का हो या भूमीगत हो सार्वजनिक होता है. इसलिये जिसे जेसा मौका मिला उसने उसका मनमर्जी से इस्तेमाल किया. उसको प्रदूषित करने मे हमने कोइ कसर नही छोडी. हमने बेशर्मी की हद तक उसे बरबाद किया है. 

Image result for clean water courseबुरा हो इन बिजली चलित पम्पों का जिन से हमने भूमीगत जल स्रोतों का बेहिसाब बेदर्दी से दोहन किया और एश की हद तक उसे बरबाद होने दिया. बुरा हो इन आधुनिक कमोडों का जो एक व्यक्ति के मल-मूत्र को बहाने के लिये कम से कम दिन भर में 30 से 40 लीटर पानी बरबाद करता है.  यह सच है की इन आधुनिक कमोडों के कारण अब हम घर मे ही मल मूत्र विसर्जित करने के बाबजूद घर को बदबू रहित रख सकते है. पर उसकी कीमत में हम किसी नदी तलाब या भूमीगत जल को जहर मे बदल रहै होते है. अपना मल मूत्र नदीयों तालाबों और भूमीगत जल स्रोतों मे मिलाकर जो फ्री था उसे जहर बना दे रहे होते है. सफाइ का एसा पागलपन की हर शहर हर दिन टनों साबुन नदीयों और तालाबों में बहा रहा है. साफ गोरी काया के लिये एसा का एसा पागल दिवानापन मिसाल हम इंसानों मे ही मिलेगी.
जब तक हमसे असली कीमत वसूल ना की जाये उसके महत्व का हम अंदाज नही लगा पाते. यह गलत फहमी  है की प्रकृति ने हमे हवा पानी और रोशनी मुफ्त दे दी है. इसका पता तो तब चलता है जब वो हमारे पास ना हो. क्या रेगीस्तान मे पानी उसने मुफ्त दिया है?
अब बेक्टीरिया वाइरस का एसा भय की हम दिनभर हाथों को धोते रहते है. इस डर से की अगर बिना धोये कुछ खाया या पिया तो हमारा अंत.  दिन भर TV यही सब दिखाता रहता है और हम यह सब देखकर साबुन एंटी सेप्टिक लोशन इस्तेमाल कर रहे है. हम भूल गये की हमारे स्वास्थ का राज हमारा अपना इम्यून सिस्टम है ना की साबुन और एंटीसेप्टिक लोशन और दवाइयां.
हम यह भी भूल गये की हमारे आसपास दिखाइ देने वाले पेड पौधे और प्राणी जगत के होने की वजह दिखाइ ना देने वाला एक भरापूरा जीता जागता माइक्रो जीव- बेक्टीरिया, फंगस, वाइरस से भरा संसार है जो हर समय ह्म सब को चारों ओर से घेरे हुये है यह हमारे अदंर है हमारे बाहर है उसमे से कुछ हमारे दोस्त है और कुछ दुशमन. हमारा  इम्यून सिस्टम इन्हे पहचानता और रात दिन इन पर निगाह रखता है जो हमारे दोस्त है उन्हे फलने फूलने देता है और जो दुश्मन है उन्हे शरीर से मार भगाता है.
Image result for clean water courseमाना की हमारा इम्यून सिस्टम जब किसी कारण से overburden हो जाता है तो हमे दवाइयों से मदद मिलती है, पर अगर इस मदद के हर समय मोहताज रहने लगे और अपने इम्यून सिस्टम पर भरोसा ना रहे, तो यह गंभीरतम मामला हो जाता है. बाजारवाद तो यही चाहता है की हमे अपने पर भरोसा ना रहे. हमारा डर इस बजार को फलने फूलने मे मदद जो करता है.

साफ सफाइ का अपना महत्व है पर इसे पूरे प्रपेक्ष मे देखना चाहिये क्योंकी हमारे घर के साफ होने का कोइ मतलब नही रह जाता अगर हमारा पास पडोस गंदगी का अबांर हो, हमारी करनी से नदी तलाब बरबाद हो रहे हों.