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Tuesday, June 16, 2020

आजादी दांव पर है.


विश्व की सरकारों ने  जिस तरह इस बिमारी पर रियेक्ट किया वो काबिले गोर है. हमारी सरकार ने भी  उसकी  मात्र नकल भर की  और नतीजा सामने है. ..धूल चाटती अर्थव्यवस्था. हम विश्व गुरू होने का सपना पालते है और WHO के समझने मे नाकाम हो जाते है. 

एक साधारण से इंफुलेंजा वायरस को किस तरह बिकाऊ मिडिया की मदद से कुछ लोगों ने विश्व की महामारी घोषित करा दिया,जिस ने भी उसके विरोध मे लिखा या बोला उसका मुह बन्द  कर दिया जा रहा है . आज जब इसके बारे मे सारी जानकारी उपलब्ध है फिर भी सरकार की हिम्मत नही हो रही है की वो बता सके की सब ठीक है. इसके उल्ट उसे हर गुजरते दिने के साथ ओर  भयावह दिखाने की बेशर्म कोशिश जारी है.

भय को एक बार फिर से बेशर्म उपयोग.  ये बेशर्म लोग अर्ध सत्य का भरपूर उपयोग कर रहे है. हम वही देख रहे है  जिसे ये  दिखा रहे है. मेरी ज्ञानियों से गुजारिश है की वो पूरा सच जाने और  इस षडयंत्र को उजागर करे. मुझे पूरा अंदेशा है की  WHO इस षडयंत्र का हिस्सा है क्योंकी पिछले 5 महोनों का जो  डाटा उपलब्ध है उसके आधार पर यह साफ है की यह कोइ खतरनाक महामारी  नही है, पर इसे अभी भी सर्वव्यापी महामारी बनाने की भरपूर कोशिश की जा रही है. WHO अपनी गलती स्वीकार नही कर रहा है जिससे साफ है की वो किसी के दबाब मे काम कर रहा है. सरकारे जनता को पूरा सच बताये, जनता को बताया जाये की इस वायरस के आने से पहले भी इसी अनुपात मे लोग इंफ्लुएंजा से पीडित होते थे. पर एसा नही हो रहा है. 

भूख और बेरोजगारी इस बिमारी से लाख गुना खतरनाक है पर इस पर अभी भी किसी का ध्यान नही जा रहा है. उद्योग धंधे सब लगभग बंद है. सरकार को टेक्स नही  मिल रहा, एसे मे देश का मजदूर, मिलट्री,और मनी (3M) संकट मे है. स्वास्थ्य, शिक्षा और  नागरिक सुरक्षा की हालत दयनीय है. अगर हम इस डर से बाहर नही निकले तो सब खत्म. आज कोविड-19 है कल कोइ ओर वायरस होगा. मरना तो एक दिन सबको है. अब यह आपको तय करना है की आप आजाद देश मे मरना चाहते हो या गुलाम देश मे.

इस बिमारी को फ्रंट पेज न्यूज बनाना बंद करे.   वेसे ही काम  पर जाना शुरू करे जेसे पहले जाते थे. यह वायरस तो जाने से रहा. वेक्सिन आप को कब तक बचायेगी और कितने वायरस से बचायेगी. इसलिये अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाये,यह कोइ राकेट साइस नही है. यह ज्ञान हमारे यंहा आसानी से उपल्ब्ध है. 

अगर हम डर से बाहर नही निकले तो मेरा विश्वासा मानिये की हम 100वी आजादी की सालगिरह किसी की गुलामी मे मना रहे होगे.  

Tuesday, June 3, 2014

गिद्ध् भोज के after affects




जैसे-जैसे 5 जून नजदीक आ रहा है मेरे अदंर का पर्यावरण समर्थक नागरिक जोर मारने लगा है, इसके कारण मेरे आस पास होने वाली पर्यावरण विरोधी गतिविधीयों पर आजकल कुछ ज्यादा ही नजरे इनायत होने लगी है. अब देखो कल की ही बात है, मैं एक शादी मै गया था. मेजबान ने भव्य आयोजन किया था. उससे भी ज्यादा भोजन शानदार था पच्चीस से ज्यादा स्टाल लगे थे चाट से लेकर मटन कबाब तक, इडली से लेकर नूडल्स और आइसक्रीम से लेकर काफी तक सब मोजूद था.  हजार से ज्यादा लोग खाने के लिये जुटे थे. सब कुछ शानदार था फिर मेरा मन क्यों खट्टा हो गया एसा क्या देख लिया था उसने?
समारोह मे खाने की प्लेट और चम्म्च बोन चाइना की थी जो सेंट्रल टेबल पर सलाद के साथ करीने से सजी थी. पर उसके साथ स्टालों पर डिस्पोजेबल प्लास्टिक कप, प्लेट और  चम्मच का भरपूर उपयोग हो रहा था दो स्टालों पर थर्मोकोल के कप और प्लेट मे चाट और सूप सर्व किया जा रहा था. मैदान मे ड्स्टबिन रखे थे और लोग उसमे खाने के बाद बचे हुये खाने के साथ इन कप प्लेटों को डालते जा रहे थे और जेसे ही वो भरता केटरिग का आदमी तुरंत उसे वहां से उठाकर ले जाता और उसकी जगह  खाली कंटेनर रख देता. एक नजर मे देखने मे सब कुछ ठीक था, शानदार था लोग खाने का लुत्फ ले रहे थे...
पर मेरा नामुराद मन इतने से कंहा मानने वाला था. मै केटरिंग के आदमी के पीछे गया जिसने भरा हुआ कंटेनर उठा रखा था की देखें वो इसका करता क्या है. जो देखा उससे मेरा दिमाग चकरा गया पंडाल के पीछे उसने दो बच्चे बैठा रखे थे उन्होने भरे हुये कंटेनर से बोन चाइना की प्लेट और चम्मचे अलग की उन्हे अच्छी तरह से धोया और उसके बाद उस कंटेनर को दोनों ने मिलकर कूडे के ढेर पर खाली कर दिया.
उस कूडे के ढेर पर बचे हुये खाने से सरोबार प्लास्टिक, थर्मोकोल और पैपर प्लेट और गिलासों का अम्बार था और उसके आसपास कुत्ते और गायें जो खा कम और लड ज्यादा रहे थे. देखकर मुझे उल्टी आने को हुइ और मे वंहा से हट गया. अब मेरा मन इस शादी मे नही लग रहा था. बेमन से मेने अपने होस्ट को खाने के लिये धन्यवाद दिया और वर वधू को आशीर्वाद देकर घर वापस आ गया.
पर्यावरण समर्थक मन ने मुझे देर रात तक सोने नही दिया. क्योंकी मुझे मालुम है की इस छोटे से ढेर को कल सुबह एक बढे ढेर पर नगर निगम का आदमी फेंक देगा अगर उसने नही फेंका तो कुछ दिन बाद यह सडक पर उडते हुये नजर आयेगे या फिर किसी नदी नाले को को चोक कर रहे होंगे. इसी तरह तो हो रही है इस शहर की सफाइ... क्या इससे बेहतर नही हो सकता. वो दोनों बच्चे जो उस कंटेनर से बोन चाइना के प्लेट और चम्मच निकाल रहे थे और अगर वो उन्हे निकाल सकते थे, उन्हे धो और पोंछ सकते थे तो उन्होने प्लास्टिक और थर्मोकोल के साथ एसा क्यों नही किया.
जबाब आसान था. बोन चाइना की प्लेट और चम्मच मंहगी थी इस लिये उसे तो दुबारा इस्तेमाल के लिये बचाना था और बाकी सब उनके लिये कचरा था. हम सब को मालुम है की यही कचरा हमारे लिये खतरा बन गया है तो क्यों ना हम इनके इस्तेमाल पर एसे समारोह पर रोक लगा दें.
शायद इस शहर के लिये यह सभंव ना हो पर मेने आज यह प्रण ले लिया है की मै एसे समारोह मै प्लास्टिक और थेर्मोकोल से बने हुये कप प्लेट और चम्मच का इस्तेमाल तब तक नही करूगा जब तक मुझे यह विश्वास ना हो जाये की आयोजक इस्तेमाल के बाद उसका निस्पादन  सही ढंग से करेगें यानी की उसे रिसायकिल यूनिट तक सही सलामत  भेज देंगे. इस लेख के द्वारा मे आप सब से भी विनम्र आग्र्ह करूगा की आप लोग भी एसा ही करे. अपने दोस्तों और घरवालों को एसा करने को कहे. वेसे भी एसे समारोह मे डिस्पोजेबल का प्रयोग बंद होना चाहिये. नगर निगम एसे कचरे के लिये आयोजक पर जबरदस्त फाइन लगाये. जिससे एसा कचरा पैदा ही ना हो. 
इन समारोह में स्टील और बोन चाइना से बने कप प्लेटों और गिलास की ही इस्तेमाल करे और अगर एसा संभव ना हो तो उपवास का बहाना बना कर उस का विनम्रता से बहिष्कार कर दें. इस तरह कम से कम मेरी तरह उस अपराध बोध से तो बचेगें जिसने मुझे देर रात इस लेख को लिखने के लिये मजोअबूर कर दिया है. या फिर पत्तों से बनी दोना पत्तल क्या बुरी है. प्लास्टिक और थर्मोकोल से बनी कप प्लेटों और गिलास का इस्तेमाल तभी अच्छा है जब इन्हे रिसायकिल किया जा सके. ह्म सब यह अच्छी तरह समझ लें की यह अपने आप रिसायकिल नही होती इन्हे रिसायकिल करना पडता है और इसके लिये इन्हे रिसायकिल प्लांट तक भेजना पडता है, इसलिये अगर आप इन्हे रिसायकिल प्लांट तक भेजना सुनिश्चित नही कर सकते तो  इनके उपयोग से बचे.
जो लोग मान बैठे है कि इस कचरे से उनका क्या लेना देना, अगर समय पर सही कदम नही उठाये गये तो अनके लिये वो दिन दूर नही जब कचरा उनके घर के दरवाजे पर सडेगा और जिस जगह से वो निकलेगें सडी बदबू. उससे फेलती बिमारी. ना ना ...यह बद दुआ नही है ...भविष्य का सच है. अरे! क्या आपको यह सब अपने शहर मे दिखाइ नही दे रहा. अगर नही दिखाइ दे रहा तो कार के सीसे नीचे किजिये और अपने आसपास गोर से देखिये. हो सकता है की यह सब आपके घर से थोडी दूर पर हो रहा हो ...उसे आपके घर पर पहुचने में अब कितना समय लगेगा. एक बात अच्छी तरह से समझ लिजिये, यह मुसीबत हमने ही पैदा की है और इसका इलाज भी हमे ही करना है. अगर बडा कदम नही उठा सकते तो कम से कम छोटे-छोटे कदमों से शुरूआत करें और अपने आस पास के लोगों के लिये एक जिंदा मिसाल कायम करें.
यूथ हस्टल एशोसियेशन का मेंम्बर हू.  वो जब भी ट्रेकिंग कराते है तो उनमे शामिल होने वाले मेंम्बर को साथ में अपनी-अपनी  प्लेट और गिलास लाने का नियम सख्ती से पालन कराते है. एक छोटा से नियम पर गजब की ताकत है इस नियम में. वो लोग कितने टन कचरे को फेलाने के अपराध  से बच जाते है. हमसे अच्छे तो जेल के कैदी है जो खाने के बाद अपने कप और प्लेट को खुद साफ करते है जिससे वो दुबारा उन्हे इस्तेमाल कर सके. हमारे गांधी बाबा भी हमसे कुछ एसा ही करने हिदायत दे गये थे. काश हम इन समारोह मे भी कुछ एसा कर पाते. मुझे याद है पहले एसा ही होता था. पर जाने केसे हमारी इस अच्छी परपंरा को किसी की बुरी नजर लग गई. प्लास्टिक के कप प्लेटों में खाकर अपने को साहब समझने लगे. पर्यावरण तो एक व्यापक शब्द है, मुझे तो फिलहाल अपने आस पास सफाइ रहे इसकी फिक्र है पर इसका मतलब यह नही है की मै अपना कचरा कीसी दूसरे की जगह पर फेंक दू.
बायोमास वाला कचरा तो गुजरते समय के साथ अपने आप कुछ दिन मे सड-गल कर जमीन और हवा में मिल जाता है, पर प्लास्टिक, थर्मोमोकोल एल्यूमिनियमऔर् पोलीथीन से बने  टेट्रापैक, ग्लास, कप, प्लेट और थेलियां सालों साल तक जेसी है वेसा ही बने रहती है और जो बरबादी का नाजारा पेश करता है, उसकी कुछ पिक्चर मै नीचे दे रहा हू. इसलिये इसे अगर सही तरीके से रिसायकिल ना किया जाये तो हमारे लिये अभिषाप बन जाता है.
...अरे अपने शहर को साफ रखने मुहिम से नाता तो जोडिये, शुरू तो किजिये फिर देखना आपके अपने दिमाग से कितने आइडिया निकलते है.आज कुछ ज्यादा तो नही हो गया....!!

चलो अब मुझे भी नींद आ रही है बाकी अगले ब्लाग में फिर कभी




Sunday, November 27, 2011

रिटेल मे FDI.. आपका स्वागत है जी

पिछले 2 दिन से टीवी और मिडिया मे पुर जोर से रिटेल क्षेत्र को प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के लिए खोलने का विरोध हो रहा है. यह विरोध सिद्धांतिक कम और सियासी ज्यादा है. क्योंकी हम सब सुविधा पसंद और आराम तलब लोग हो गये है. अब हमे वातानुकुलित माल की आदत सी हो गई है,  टीवी देखते हुये और बरगर पीजा खाते हुये बडी हो रही  युवा पीढी के लिये वो अब स्टेटस सिम्बोल है. जिस किसी की हेसियत उसमे खरीददारी करने की है वो वही करना चाहता है. और जो नही कर सकते है वो आइसक्रीम खाते हुये विंडो शापिंग का मजा लेते हुये उसमे एक दिन दिल खोलकर खरीद दारी करने का सपना  देखता है.


रिटेल क्षेत्र को विदेशी निवेशक कुछ वेसा ही बनाने में मदद करेगा जेसा आज कल के सुपर माल है. इन सुविधाओं की कीमत वो खरीददारों से ही वसूल करेगा. अगर ऐसा होगा तो उनके सामानों के दाम आज स्थापित छोटे दुकानदारों से ज्यादा होंगे. इसके बाबजूद कुछ लोगा गुंणवत्ता और सुविधा और स्टेटस के लिये वहाँ से ही खरीद दारी करना चाहेगे. आज उपभोक्ता का एक बडा समूह सुविधा और गुण्वत्ता और स्टेटस के लिये कोई भी कीमत देने को तैयार है. उसे जो यह दे देगा वो उसे अपने सिर आंखों पर बैठायेगा. इसलिये यह बजार अभी फिलहाल उन्ही के लिये है.

जो लोग छाती पीट कर रोने का नाटक कर रहे है वो नींद से जागे. और समय के साथ चले. वेसे भी 125 करोड़ की आबादी वाला ये देश बहुत बड़ा बाजार है. यहाँ हर किसी के लिये जगह है. पर टिकेगा वही जो उपभोक्ता के माप दंडो पर खरा उतरेगा. उपभोक्ता अब बदबूदार कीचड और धूल भरी सडकों, गायों और सुअरों की बीच खरीद दारी नहीं करना चाहता. वो अब अपनी मर्जी से और अपनी पसंद से माल खरीदना चाहता है क्या आप इसमे कोई मदद कर सकते है ...अगर नहीं ...!! तो जो करने को आ रहा है उसे आने दे.

हमने लाखों करोडों का काला धन विदेशों मे जमा करने मे शर्म नही की. उनकी संस्कृति को अपनाने मे कोई कसर नही छोडी. तो अब यह घडीयाली आंसू किस लिये. ?

अब आगे आगे देखो होता है क्या । मीडिया उनका,  दुकान उनकी माल उनका वो बार बार अपने माल को सबसे अच्छा बाताएगे  और तुम्हारे बाप दादाओ  ने जो खाया पिया उसे बुरा बाताएगे।  बेहिसाब पैसा आपके हीरो को देगे जो उनके माल को आपके लिए सबसे  अच्छा बाताएगे और उसके बाद आप उसे किसी भी की मत पर  खरीदने को मजबूर हो जायेगे फिर उसके लिए उधार लेना पड़े तो क्या ?
तुम ऊअनके लिए मात्र बाजार हो जिसके मालिक वो है।

 ॥ बच्चा ॥ अबे सालों ...इसे ही तो गुलामी कहते है॥
....happy shopping

दुर्बेश

Tuesday, August 23, 2011

भ्रष्टाचार की सांस्कृति

भारतीय इस सिद्धांत में विश्वास नहीं करते कि यदि उनमें से प्रत्येक नैतिक आचरण करे तो वे सभी ऊपर उठ सकते हैं, क्योंकि यह उनके विश्वास  में नहीं है। उनकी जाति व्यवस्था उन्हें अलग करती है। वे यह नहीं मानते कि सभी मनुष्य समान हैं। इसके परिणामस्वरूप उनका विभाजन हुआ और वे दूसरे धर्मों की ओर पलायन करने लगे। कई लोगों ने सिख, जैन, बुद्ध जैसे अपना स्वयं का विश्वास शुरू किया और कई ईसाई और इस्लाम में परिवर्तित हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीयों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं रहा। 

परिणामस्वरूप, भरोसे और विस्वास  का क्रम मे पहले मित्र, फिर परिवार, जाती, धर्म, क्षेत्र , राज्य और देश और सबसे आखिर मे मनुष्यता आती है,  इस तरह एक पूरी तरह से भ्रष्ट राजनेता  के वो आसान शिकार होते है। 

असमानता के परिणामस्वरूप एक भ्रष्ट समाज बन गया है। भारत में हर कोई एक दूसरे के खिलाफ है। भारत में भ्रष्टाचार एक सांस्कृतिक पहलू है. ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय भ्रष्टाचार के बारे में कुछ भी अनोखा नहीं सोचते हैं। यह हर जगह है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्तियों को सुधारने के बजाय उन्हें बर्दाश्त करते हैं। कोई भी मानव जन्म से  भ्रष्ट नहीं होता। लेकिन एक जाति को उसकी संस्कृति से भ्रष्ट किया जा सकता है।
यह जानने के लिए कि भारतीय भ्रष्ट क्यों हैं, आइए उनके पैटर्न और प्रथाओं पर नजर डालें। चूँकि अब यह समझने का समय आ गया है कि एक भारतीय को भगवान को प्रसाद के रूप में भारी नकदी और सोने के आभूषण चढ़ाने की क्या आवश्यकता है। जब वे ऐसा करते हैं तो वास्तव में उनके दिमाग में क्या चल रहा होता है। 

निश्चित रूप से यह समाज के कल्याण के लिए नहीं है. वे भगवान को नकद दान देते हैं और बारी से पहले इनाम की आशा करते हैं। यह वास्तव में स्वयं के कल्याण के लिए है। वे मोक्ष और अपने फायदे के नाम पर किसी भी हद तक जा सकते हैं। मंदिर की दीवारों के बाहर की दुनिया में ऐसे लेन-देन को नाम दिया गया है- रिश्वत

अमीर भारतीय आगे चलकर नकद नहीं बल्कि सोने के मुकुट और  हीरे जवाहारात  की पेशकश करता है। ये उपहार किसी गरीब का पेट नहीं भर सकते, . यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जून 2009 में, द हिंदू ने कर्नाटक के मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी द्वारा तिरूपति को 45 करोड़ रुपये का सोने और हीरे का मुकुट उपहार में देने की एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
भारतीयों के मंदिर इतना अधिक संग्रह कर लेते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि इसका क्या करें। कुछ प्रसिद्ध मंदिरों की तहखानों में अरबों रुपये धूल जमा कर रहे हैं। भारतीयों का मानना ​​है कि यदि भगवान अपने उपकार के लिए धन स्वीकार करते हैं, तो वही कार्य करने में कुछ भी गलत नहीं है। मंदिरों के पुजारी द्वारा भगवान को रिश्वत देने को प्रोत्साहित किया जाता है, आप जितना अधिक रिश्वत देंगे आप भगवान के मंदिर से उतने ही अधिक वीआईपी उपचार के पात्र होंगे। इन मंदिरों को भगवान के नाम पर अपने भक्तों से उनकी संपत्ति के स्रोत का पता लगाए बिना भारी रिश्वत मिलती है...क्यों?
यही कारण है कि भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट हो जाते हैं। भारतीय संस्कृति ऐसे लेन-देन को नैतिक रूप से समायोजित करती है। कोई वास्तविक कलंक नहीं है. भ्रष्टाचार के प्रति भारतीय नैतिक अस्पष्टता उसके इतिहास में भी दिखाई देती है।
भारतीय इतिहास शहरों और राज्यों पर कब्ज़ा करने के बारे में बताता है जब गार्डों को गेट खोलने के लिए भुगतान किया जाता था, और कमांडरों को आत्मसमर्पण करने के लिए भुगतान किया जाता था। यह भारत के लिए अद्वितीय है. भारतीयों की भ्रष्ट प्रकृति का अर्थ उपमहाद्वीप पर सीमित युद्ध है। यह आश्चर्यजनक है कि प्राचीन ग्रीस और आधुनिक यूरोप की तुलना में भारतीयों ने वास्तव में कैसे संघर्ष किया है। भारत में लड़ाई की जरूरत नहीं थी, सेनाओं को विदा करने के लिए रिश्वत देना ही काफी था। नकद खर्च करने का इच्छुक कोई भी आक्रमणकारी भारतीय राजाओं को दरकिनार कर सकता था, चाहे उनकी पैदल सेना में कितने ही दसियों हजार सैनिक क्यों न हों।
प्लासी के युद्ध में भारतीयों द्वारा बहुत कम प्रतिरोध किया गया। क्लाइव ने मीर जाफ़र को भुगतान किया और पूरा बंगाल 3,000 की सेना में तब्दील हो गया। 1687 में गुप्त पिछला दरवाज़ा खुला छोड़ दिए जाने के बाद गोलकुंडा पर कब्ज़ा कर लिया गया। मुगलों ने मराठों और राजपूतों को रिश्वत के अलावा कुछ नहीं परास्त किया। श्रीनगर के राजा ने रिश्वत लेने के बाद दारा शिकोह के बेटे सुलेमान को औरंगजेब को सौंप दिया था।

'अनेकता में एकता' वो दिखावी है . अविश्वास इतना गहरा है कि थोड़ी सी उत्तेजना उन्हें पागल बना सकती है और विभिन्न जातियों और धर्मों के बीच दंगे भड़का सकती है। वे उन पड़ोसियों को लूट सकते हैं और मार सकते हैं जिनके साथ वे कुछ दिन पहले परिवार के रूप में थे।