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Tuesday, February 27, 2018

हे वैज्ञानिक सोचवाले इंसानों आप सभी को होली की शुभकामनायें


विज्ञान का विद्यार्थी होने के  नाते मेरा विज्ञान का पक्षधर होना स्वाभाविक होना चाहिये, एसे मे जब अंधविश्वास पर वार करते हुये लेख पढने को मिले तो मुझे अच्छा लगना चाहिये, पर मे क्या करू मुझे दूसरे अनदेखे पहलू पर नजर डालने की बुरी आदत जो है, लीक से हटकर सोचने की आदत है. इधर विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मेरे साथी मुझ से यह उम्मीद करते है की माफिया, पूजीपतियों  और राजनेताओं की सांठ्गांठ को नजर अंदाज करते हुये हर अच्छी बुरी वैज्ञानिक सोच का मै समर्थन करू. यह भी भुला दू की आज विज्ञान हमे किस दिशा मे ले जा रहा है.
इन दिनों मेरे आस पास विज्ञान और तकनीक के नाम पर जो हो रहा है उसे देखकर चिंतित और व्यथित हू  और अपने को असहाय महसूस कर रहा हू. गलत का विरोध भी करू तो केसे ?  विरोध करने के लिये और अपनी बात कहने के लिये उन्ही के पास जाना होगा जिनका विरोध करना है, यही मेरी मजबूरी है.  इस हद तक की निर्भरता इसी विज्ञान की ही तो देन है.
अगर आज मुझे अपनी बात आप तक पहुचानी है तो करोडो का चेनल चाहिये.... एसा एक नही सेकडो चेनल चाहिये, क्योंकी मे जिनके बारे मे कहना चाहता हू उनके पास मुझे गलत साबित करने के प्रचार साधन आपार है. इतना असाहाय तो मेरे पूर्वजों ने भी पहले कभी महसूस नही किया होगा. यह सच है की वो कम ज्ञानी थे, अंधविश्वासी भी थे. शायद हमारी तरह गलत और सही की पहचान नही कर पाते थे. उन्हे नही पता था की पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर काटती है. पर उनकी अपनी एक जीवनशेली थी जिसे अपना कर वो हजारो सालो से पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाये रखते हुये इंसानी जीवन को जीवत बनाये रखा. पर आज क्या ?
आज हम हद दर्जे तक मतलबी और लालची हो गये है हमारी कथनी और करनी मे फर्क बढ गया है.  हमारी जिंदगी इतनी आराम तलब और मतलब परस्त हो गई है की हमने अपने आनेवाले  संकट से आंखे मूद ली है. इस विज्ञान ने इंसान मे मोजूद जानवर की हसरत को हजारो गुना बढा दिया है. आज हम वही बोलते और सोचते है जो हमारी हसरतो को पूरा करने मे मदद करे...किसी भी कीमत पर.
लालच को हमने कोरपोरेट का रूप दे दिया है. जो बस कमजोर को अपनी मालकियत समझता है प्राकृति संसाधनो का बेहिसाब दोहन इसी लालच की देन है. यही लालच धर्म और विज्ञान को अपने मतलब के लिये एक दूसरे को खून का प्यासा बना देता है. लाखो मार दिये जाते है और दोष धर्म का. हो सकता है,  दोष धर्म का ही हो,  पर हथियार किसके है ...वो तो विज्ञान की ही देन  है ना ?  वरना मात्र नाखून और पंजो से आप इतनो का मार पाते ?   
प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक विज्ञान और उसके द्वारा किया गया तकनिकी विकास का असर बहुत सिमित क्षेत्र मे होता था. ये वो समय था जब सभ्यताये प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुये अपनी परंपराओं और समाजिक संरचना को हजारों सालो तक बनाये रही, और  वंही कुछ समाज अन्य सभ्य समझे जाने वाले समाजों की तुलना मे  अपने को  आदिम, जंगली बनाये रहे.  उस समय वो एसा कर भी पाये क्योंकी विज्ञान उतना उन्नत नही था.  
सभ्यताये आती- जाती रही पर हजारों सालो से मानव जाति अपना वजूद बनाये रही, प्रथम विश्व युद्ध के  बाद यह सब तेजी से बदला गया. जिस तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है वो अब किसी से छुपा नही है, विज्ञान और तकनीकी की मदद से इसकी अंधाधुंध उपयोग सभी सीमाये पार कर रहा है.
यह सच है की अंधविश्वास ने मानवजाति का नुकसान किया  है. पर क्या कभी इसका किसी ने हिसाब लगाया की विज्ञान और तकनीकी ने मानव जाति का कितना नुकसान किया है. इसलिये अंधविश्वास पर वार करने से पहले हमे यह देखना होगा की जिस  विज्ञान की उगंली पकडकर हम चलना चाहते है वो हमे किस दिशा मे ले जा रहा है. यह तब, और भी जरूरी हो जाता है जब व्यवस्था भ्रष्ट हो  और वो लालची मतलबी एह्सान फरामोस राजनेताओं और धर्म के ठेकेदारों और पूजीपतियो की लिये काम कर रही हो.
अंधविश्वास और गलत पंरपराये मात्र उनको  प्रभावित करते थी जो उन्हे मानते है, पर  विज्ञान उनको भी प्रभावित कर रहा है जिसका उससे दूर दूर तक कोइ लेना देना नही है. पृथ्वी का जीवन इससे पहले इतने संकट मे कभी नही था. हर गुजरते दिन के साथ कोइ ना कोइ प्रजाति विलुप्त होती जा रही है. आज हम मे से कोइ भी पक्के र्तौर पर यह नही कह सकता की अगले 50 साल मानव जाति भी बनी रहेगी या नही.
एल्बर्ट आंस्टीन को आज अगर विज्ञान के लिये याद किया जा रहा है तो उन्हे परमाणुबम के लिये और उससे हुई लाखों हत्याओं के लिये भी याद किया जाये ...  जो उनके रहते नागासाकी और हिरोशिमा मे हुई .... कितना असाहाय महसूस किया होगा एल्बर्ट आंस्टीन ने ...या किया भी होगा या नही...कोन जानता है....इतिहास तो जीतने वाले लिखते है. 
आज विश्व की 20% आबादी का पृथ्वी के 80% संसाधनों पर कब्जा है. ये बेहद ताकतवर है. यही  लोग विज्ञान और तकनीक का सहारा लेकर बाकी 80% आबादी को डर और मजबूरी के साये मे जीने को मजबूर कर दिया है. यही वो लोग है जिनका असिमित लालच जंगल , पहाड को बरबाद कर दे रहा है.  आखिर प्राक़ृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हमे किस ओर ले जा रहा है?
कल ही ल्यूसी रोबोट का विडियो देखा ...उसमे वो बोल रही है की “ अगर आप मेरे साथ सही सलूक करोगे तो मै भी आपके साथ सही सलूक करूगी” ? हो सकता है की यह किसी का मजाकिया विडियो हो? पर यह मात्र धमकी नही है. आर्टी फीशियल इंटेलीजेंस से युक्त ये रोबोट समय के साथ और बेहतर होते जायेगे और वो समय दूर नही जब हम पूरी तरह इन पर निर्भर होंगे इसके नतीजे कितने विनाशकारी हो सकते है यह तो भविष्य की बात है पर आज जो  कुछ  अफगानिस्तान, इराक मे हुआ उसे क्या आप नजर अंदाज कर पायेगे, किस तरह रिमोट मे बैठे कुछ लोग विज्ञान की देन ड्रोन और एसे ही कितने हथियारों से सब कुछ तबाह करने पर तुले हुये है ... और जो विरोध मे है वो बस आंतकवादी  करार दिये जा रहे है.  मै यह नही कह रहा हू की आप फिर से आदिम बन  जाओ और अंधविशवास का दामन थाम लो. पर इसका मतलब यह भी नही की विज्ञान और तकनीक का अंध भक्त हो जाया जाये.
हमे धर्म और विज्ञान से परे जाकर जीवन को देखना और समझना है. जीवन को सरल बनाना है. आज विश्व की आबादी 770 करोड़  से भी ज्यादा है और अगले 10 वर्षों मे वो 900 करोड़ का आकडा पर कर जायेगी. 
लालची और मतलबी लोगो से शासित 900 करोड़ लोग जो अपने ही बनाये विज्ञान और तकनीक के दानव से डरे और सहमे हुये होंगे ..... जिसे हम प्रगति कहते है क्या सच मे यह प्रगति है ...और यह केसी प्रगति, किसकी प्रगति ? इस सब से इंसानियत ने क्या पाया ?
आज विकास के नाम पर हमने लंगोठ पहने मूल निवासी को जींस पहना दी है हाथ मे मोबाइल थमा दिया है देखने को टीवी भी लगा दिया है ...क्या यह सब करके उस सीधे सादे इंसान को अपनी तरह  लालची और मतलबी नही बना दिया. अब हम चाहते है की हम उसके जंगल और पहाड ले ले और वो उफ तक ना करे
मै आदतन ट्रेकर हू ....अब  भी ट्रेकिंग के दौरान मुझे जंगल और पहाड मे एसे लोग मिल जाते है जिनके पास भले ही खाने को एक रोटी हो पर उसमे से भी  वो आधी रोटी मुझे देना चाहता है ...अपनी खटिया मुझे सोने को देता है और खुद  नीचे जमीन पर सो जाने की जिद्द करता है ...उस समय  सच मै अपनी इतनी बढी वैज्ञानिक सोच और तकनीक होने के बावजूद खुद को बहुत छोटा महसूस करता हू ...आज वो संकट मे है और मे बस वाट्सएप पर यह लिख पा रहा हू . उसका साथ दूंगा तो आप सब मुझे आंतक वादी और माओवादी घोषित करने मे कतई परहेज नही करोगे ... हो सकता कुछ लोग इस लेख को पढकर एसा सोच भी रहे हो
क्या ही अच्छा होता अगर विज्ञान इस धरती पर  रह रहे इंसानों को समझा पाता की इस पृथ्वी पर उसके जीने के लिये जरूरत से ज्यादा है. काश विज्ञान हम सब को विश्व ग्राम का अहसाहस दिला पाता. हमे समझा पाता की राष्ट्र , धर्म, रंग  और जाति मे बटा वो प्राकृति की एक मात्र एसी अनूठी रचना है जो चाहे तो जानवर से खुद इश्वर बन सकता है.
अफसोस विज्ञान एसा नही कर पाया उस पर  राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार पहले भी हावी थे और अब तो हद ही हो गई है. आज वो एसे विचार पागल पन की हद तक जनूनी होकर इसी विज्ञान की मदद से फेल रहे है. कुछ लोगों ने पृथ्वी के संसाधनों पर बेशर्मी की हद तक कब्जा कर लिया है और बाकीयों को राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार से आपस मे लडाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है. 
सब को मौत की सच्चाई मालूम है सब को मालूम है की वो कितना ही अमर होने का जतन कर ले, मौत से वो बच नही पायेगा. जो पैदा हुआ है उसे मरना ही होगा. हमारी पागल पन की हद देखो की वो हमे दिखाई नही दे रहा है. 
आज विज्ञान बंदर के हाथों उस्तरा ही तो है ...ना भई ना उस्तरा नही..क्योंकी उससे तो वो खुद अपना ही नुकसान कर सकता था. उसके हाथ मे विज्ञान एक एसे रिमोट की तरह है जो किसी भी एटम बम को फोड सकता है .... जो अब फूटा की तब.
एटम बमों का भोडा प्रदर्शन शान से हो रहा है, जितना बढा बम उतना ही वैज्ञानिक और तकनीकी उन्नत देश.  हमने इतिहास  से ना सीखने की कसम खा रखी है.  आज हमने रक्षा के नाम पर इतने हथियार जमा कर लिये है जो इस पृथ्वी को सेकडो बार तबाह कर सकती है. फिर भी चेन नही
 हमे और घातक हथियार चाहिये. और एसे लोगों को आप विज्ञान देने की बात कर रहे हो.  मेरे हिसाब से अंधविश्वास पर काम करने से पहले हमे अपने लालच और डर पर काम करना चाहिये, और इस बात का जबाब हमे अपने अंदर खोजना चाहिये की लालच ज्यादा खतरनाक है या अंधविश्वास.
कहने को अब भी बहुत कुछ है पर लेख लंबा हो रहा है ...इसे पढते रह जाओगे तो होली कब मनाओगे. .. इस लिये आगे की बात किसी ओर दिन 

शुभ होली
                                                                                                                                     सादर
       दुर्वेश      

Thursday, February 25, 2016

पानी रे पानी



जल ही जीवन है यह बात रेगीस्तान मे आसानी से समझ मे आ जाती है. वंहा मेने एक बाल्टी पानी के लिये मीलों दूर जाते देखा है. उस पर भी अगर उस पानी को कोइ शहरी देखे तो इसे पीने लायक तो बिल्कुल नही कहेगा. वंहा जाकर ही जान पाया की सच मे पानी अमृत होता है. वो दिन दूर नही जब हमारे शहर पानी के मामले मे किसी रेगीस्तान से कम नही होंगे. सुना है की तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिये होगा. इसका तो पता नही पर आज हर गली महोल्लों मे पानी के लिये जो होता है वो किसी महायुद्ध से कम भी नही है. मेरी बात आप सब को मजाक लग रही हो. 

अगर एसा है  तो इस खबर को पढे
 ...
महाराष्ट्र में प्रशासन ने लातूर शहर में पानी को लेकर संघर्ष रोकने के लिए जल स्रोतों के आस-पास धारा 144 लगा दी है. लातूर में पानी के स्रोतों के आसपास अब 5 से अधिक लोगों के इकठ्ठा होने पर निषेधाज्ञा है. हालात महानगरपालिका अधिकारियों के नियंत्रण से बाहर हो चुके थे, इसीलिए जिलाधिकारी को निषेधाज्ञा लागू करनी पड़ी.
लातूर में पानी को लेकर इतने बुरे हालात पहले कभी नहीं थे. पानी को लेकर हिंसा की आशंका बनी रहती है. लिहाज़ा जिलाधिकारी ने जमावबंदी यानी निषेधाज्ञा आदेश जारी कर दिए हैं.

कॉर्पोरेशन टैंकर के ज़रिए 200 लीटर पानी प्रति परिवार दस दिनों के लिए देता है. चाहे परिवार छोटा हो या बड़ा. घर के बाहर 200 लीटर का बैरल रखा होता है जिसमें टैंकर उतना ही पानी देता है. फिर टैंकर दोबारा कभी 12 तो कभी 15 दिनों के बाद आता है.

खाना पकाते समय जैसे तेल डालते हैं, वैसे ही अभी पानी का इस्तेमाल हो रहा है. 200 लीटर पानी किसी भी परिवार को पूरा नहीं पड़ता, दूसरी ओर टैंकर माफिया हालात का फ़ायदा उठाकर लोग को निजी रूप से टैंकरों से पानी बेच रहे हैं.
महिन्द्रकर बताते हैं कि 5 हज़ार लीटर टैंकर का पानी पहले 300-400 रुपये में मिल जाता था. आज वो एक हज़ार रुपये में मिलता है. ये आज की बात है. हो सकता है कल इसके लिए डेढ़ हज़ार रुपये देने पड़ें.
यह हालत मार्च मे है और अभी तो 3 महिने गर्मी पडेगी. अगर इस बार भी यदि मानसून ठीक नहीं रहा तो? कोइ आशचर्य नही की आधा लातूर खाली हो जायेगा. लातूर जेसे ही हालत धीरे धीरे सारे देश मे होते जा रहे है. भू जल तेजी से नीचे जा रहा है. इतनी गहराइ स निकाले जानेवाले पानी  मे हेवी मेटल का होना आम बात है जो गंभीर बिमारी की वजह बन रहा है.

जो शहर पानी के मामले मे ठीक थे उनके भी अधिकांश पानी के स्वच्छ स्रोत्र बरबाद होते जा रहे है. जो बचे है उन्हे बरबाद करने की हम कोइ कसर नही छोड रहे है. हम सब को मालुम है की नदी और नालों और तालाबों मे स्वत: ही पानी को स्वच्छ करने की गजब की प्रतिभा होती है. यह काम उसमे मोजूद दोस्त बेक्टीरिया आसानी से कर देते है.

जब से हमने साबुन और अन्य काटाणु नाशकों का इस्तेमाल करना शुरू किया है नदी तालाबों की यह प्रणाली नष्ट होती जा रही है. शहर के दूषित नालों का पानी और उसमे मोजूद सडे हुये पदार्थ पानी मे मोजूद ओक्सीजन की मात्रा को बेहद कम कर देते है. जिस से उसमे मोजूद दोस्त बेक्टीरिया खत्म होने लगते है और एसे एनारोबिक बेक्टीरिया पनपते है जो सडान पैदा कर बिमारी फेलाते है.
टनों साबुन का इस्तेमाल पानी को जहर बना रहा है. हम अच्छी तरह समझ ले एक बार अगर साबुन मिला दिया तो वो पानी उसके बाद  हमारे नदी तलाबों मे मोजूद दोस्त जीवाणु और पेड पोधं को नुकसान पहुचाता है. कभी आपने सोचा है की आपके नल मे आता साफ पानी कंहा से आ रहा है.

आज भी ज्यादतर शहरों मे मिन्यूसिपल सप्लाइ किसी नदी या तालाब का पानी ही शहर वासियों को पीने के लिये स्पलाइ करती है. यानी की ह्मारे ही द्वारा दूषित पानी हम पीने को मजबूर हो जाते है. हो सकता है आपने अपने लिये RO लगवा लिया हो या फिर आप बोटल खरीद कर अपनी प्यास बुझाते हों. पर कब तक? यह इस समस्या का उपाय पूर्ण उपाय नही हो सकता.

क्या आप को मालुम है की पानी पूरी तरह रिसायकिल हो सकता है. हां यह सच है इसका अनोखा उदाहरण अंतिरिक्ष यान है. जंहा मोजूद अंतिरिक्ष यात्री उसी पानी को रिसायकिल कर बार बार इस्तेमाल करते है. यह सच है की वो तकनीक बेहद मंहगी है, पर हम भी आसानी से कुछ कामों मे पानी को रिसायकिल कर बहुत सारा पानी बचा सकते है.

आज हमारे हर घर मे एक ही तरह का पानी सप्लाइ होता है जिसे हम पीने से लेकर नहाने धोने और बगीचों मे इस्तेमाल करते है. अब समय आ गया है की कम से कम नहाने , धोने और बाग बगीचों मे रिसायकिल पानी का इस्तेमाल करना सीखे.
एसा तभी कर पायेगे जब हम पानी मे साबुन और अन्य कीटाणुओ नाशकों को पानी मे मिलने से रोके. हम कम से कम नहाने और धोने मे साबुन और अन्य किटाणु नाशकों के इस्तेमाल से परहेज करे. हमारे द्वार विसर्जित पानी कम से कम इस तरह का हो की वो कम से कम पेड पौधों को नुकसान ना पहुचाये.

इन सब का इलाज दरअसल सिंगापुर और यूरोप की तरह पानी को रीसाइकल और रीयूज़ करना है. इस तकनीक के बारे मे फेली भ्रांतियों के बारे मे लोगों को जागरूक बनाकर इस के लिये उन्हे तैयार करना है.

लातूर जेसे शहर मे सूरज की रोशनी पूरी तरह मेहरबान है लोग अपने घर के पानी को एक जगह इकठ्ठा कर सोलर तकनीक से उसे वास्प मे बदलकर कंडेस कर दुबारा इस्तेमाल के लायक बना स्कते है. इस तरह आसानी से 90% पानी को दुबारा इस्तेमाल के योग्य बनाया जा सकता है.

हो सकता है मेरी यह सलाह आज आप लोगों को जले पर नमक लगे. पर यही भविष्य मुझे दिखाई दे रहा है. जितना जल्द हम इसे लागू कर पानी को रिसायकिल करना शुरू करे उतना ही हमारे लिये अच्छा होगा.

जरूरत है इस तकनीक को आसान बनाकर आम जनता के बीच पहुचाया जाये. जेसे जेसे गम्री बढती है वाष्पीकरण की गति भी बढती है. मेने गूग्ल से कुछ चित्र पोस्ट किये . इन्हे देखक्र आप अपने लिये आसान सा सोलर आधारित वाटर दिस्टीलेशन यंत्र बना सकते है


 


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Sunday, March 8, 2015

गर्मा गर्म पानी ....यानी चाय की एसी की तैसी

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पीलिया होने क बाद मुझे चाय और काफी को छोडना पडा क्योंकी उनके पीते ही उबकाइ करने का मन होता था. हमारे घरों मे चाय और काफी अनिवार्य स्वागत पेय है. किसी भी अतिथी का स्वागत आजकल अब इसी से करते है. एसी हालत मे मेरा इसे पीने से मना करना मेजबान को परेशानी में डाल देता और फिर वो ठंडा, सोडा या कोला पीने की पेशकस करने लगते. इसलिये सोची समझी रणनिती का तहत मेने उनसे इसके विकल्प में गर्म पानी मांगना शुरू कर दिया, वेसे भी उन्हे चाय और काफी बनाने के गर्म पानी करना ही होता है. इस तरह में गर्म चाय की जगह गर्म पानी पीने वाला बन गया.
मेने लोगों को पानी मे नीबूं या फिर ग्रीन चाय मिलाकर पीते देखा है, पर मेने चाय की तरह सिर्फ गर्म सादा पानी ही पिया. जब जितनी बार मन ने चाहा उतनी बार पिया, बिना इस डर से की इससे मुझे कोइ नुकसान होगा. इस बात का जरूर ध्यान रखता कि इससे कंही मे अपने होंठ और जीभ ना जला बेंठू. उसकी वजह से मुझे इसे चाय की तरह ही धीरे धीरे पीना पडता. शुरू शुरू मे बेस्वाद लगा पर कुछ दिनों मे ही मुझे उसमें स्वाद आने लगा. अपने ही स्लाइवा का स्वाद जो कभी हल्का मीठा तो कभी कडवा तो कभी खट्टा सा या कभी कभी नमकीन. इसे मेने पहले कभी महसूस नही किया था. महसूस होता भी केसे नोर्मल पानी को एक ही सांस में जो गटक जाता था. वेसे भी स्वाद, अच्छा या बुरा नही होता, यह सब हमारे दिमाग मे है, देखा जाये तो शराब से बुरा स्वाद भी कुछ हो सकता है! पर इसके स्वाद के बारे मे उसके किसी पीनेवाले से पूछों और फिर उसकी आंखों की चमक देखो.
मेरा तो इतना कहना है की आप भी इसे चाय के विकल्प के तोर पर शुरू किजिये और फिर कुछ दिनों मे ही इसका असर देखिये. शुरू-शुरू मे हो सकता है की आपको इसके पीने से एसीडीटी होने लगे या फिर गला सूखा-सूखा सा लगे. अगर एसा हो तो बस आपको पानी की मात्रा को ओर बढाना  है कुछ दिन मे एसीडीटी का एहसास खत्म हो जायेगा.
एक महिने बाद अगर आपको लगे की  चाय इससे बेहतर है तो कोइ बात नही आप फिर से चाय शुरू कर देना. पर मुझे विश्वास है की मेरी तरह आप भी इसके चमत्कारी असर को अनदेखा नही कर पायेंगे.
हमारी बहुत सारी बिमारीयों और शारारिक परेशानीयों की वजह कम पानी पीना है. एक नोर्मल व्यक्ति को अपने शरीर के वजन का 0.06 से 0.08  गुना पानी एक दिन मे पीना चाहिये. यानी की अगर आपका वजन 80 किलो है तो कम से कम 4.5 लीटर पानी आपको पीना चाहिये.  
अगर हम लगातार कम पानी पीते रहे तो कुछ समय बाद शरीर कम पानी को ही अपनी नियती मान लेता है और हमारा शरीर अंगों के महत्व के हिसाब से पानी की राशनिंग तय कर देता है. कम महत्वपूर्ण अंग जेसे स्किन, डाइजिस्टिव ट्रेक, पैनक्रिया, किडनी, हड्डियों के जोड और मांसपेशियां के लिये जबरदस्त राशनिंग और दिमाग और ह्रदय जेसे महत्वपूर्ण अंग मतलब कोइ राशनिंग नही.  
कभी आपने महसूस किया है प्यास से गला सूख रहा है और आप एक-एक बूंद पानी के लिये तरस रहे है. उसके बावजूद आपको भरपूर पसीना आ रहा होता है. जिस समय आप एक-एक बूंद के लिये तरस रहे होते है आपका शरीर पानी को पसीने की शक्ल मे बरबाद कर रहा होता है. असल मे तब वो आपके तापमान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा होता है. जो आपकी जान बचाने के लिये उस समय ज्यादा जरूरी है.
उसके बाबवजूद अगर आपने कोइ जहरीली चीज खा ली तो तुरंत कई लीटर पानी उबकाई की शक्ल मे भी बाहर आ सकता है, यह सब पानी उसने कंहा से पाया.  सिम्पल, इसे उसने शरीर के दूसरे अंगो से जबरदस्ती हासिल किया. इसे ही राशनिंग कहते है. कब किस अंग को कितना पानी देना है इसका निर्णय लगातार हमारा शरीर लेता रहता है. इसलिये आप इतना पानी पीते रहे की हर समय शरीर में इतना पानी बना रहे की उसे राशनिंग की कम से कम जरूरत पडे. क्योंकी राशनिंग का सबसे पहला असर किडनी फिल्टर पर होता है. हो सकता है पानी की कमी के कारण आपकी पूरी पेशाब ही ना बने. जिसके कारण आपके शरीर का टाक्सिन जो पेशाब के रास्ते आसानी से निकल सकते थे, उनके पूरी तरह ना निकलने के कारण वो बिमारी का कारण बन जाये. 
दुर्गंध युक्त पीली, कथ्थई पेशाब शरीर मे पानी की कमी का संकेत हो सकता है. पानी की लगातार कमी  हमारे कुछ अंगों पर बहुत बुरा असर डालती है. अब पेनक्रिया को ही ले ले इसका हमारे हमारे भोजन के पाचन मे और शरीर में शुगर नियंत्रण मे सबसे बडा हाथ है. अगर हम लगातार कम पानी पीती रहे तो कुछ समय बाद पेनक्रिया कमजोर हो जायेगा. जिसके कारण पहले हमारा पाचन प्रभावित होगा और उसके बाद शुगर नियंत्रण प्रणाली कमजोर हो जायेगी और नतीजा डायबटीज, एसीडीटी और ना जाने क्या क्या.
हमारे खून का PH 7.35 से 7.45 के बीच रहना चाहिये अगर यह 7.35 से कम हो जाता है तो खून अम्लिय (acidic) माना जाता है और अगर यह 7.45 से उपर हो जाता है खून क्षारीय (alkaline) माना जाता है और दोनों ही स्थति मे इसके हमारे शरीर पर गंभीर प्रभाव होते है इसलिये हमारी क़िडनी लगातार इसको नियंत्रित करती रहती है और अतिर्रिक्त अमल्ता या क्षार को पेशाब के द्वारा निकालती रहती है. पर इसके लिये उसे भरपूर मात्रा मे पानी चाहिये होता है.
अगर पानी की कमी बनी रहे तो अमल्ता को नियंत्रित करने के लिये हड्डी मे से कल्सियम लेना शुरू कर देती है और नतीजा ओस्टो प्रोसिस की पूरी संभावना बन जाती है. इसी तरह ब्ललड प्रेशर के कंट्रोल मे भी पाने का बडा महत्व है.   
पानी खाली पेट आसानी से पच जाता है यानी की आंतो द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है. इसके लिये उसे ज्यादा से ज्यादा 20 से 40 मिनिट का समय लगता है शायद इसीलिये हमारे बुजर्गों ने सुबह की शुरूआत भरपूर पानी पीकर करने की सलाह से दी. जिससे रातभर में हुई पानी की कमी को शरीर आसानी से पूरा कर सके.   
भोजन के दौरान या उसके तुरंत बाद पिया गया पानी किये गये भोजन का हिस्सा बन जाता है और वो उस भोजन के साथ ही पचेगा और पाचन को धीमा कर देता है. इसलिये अकसर भोजन के साथ लिया गया पानी पाचन पर अतिरिक्त बोझ साबित होता है और पाचन को कमजोर बनाता है. इसलिये इसे उस समय विष के समान माना गया. 
अच्छा हो की आप पानी को भोजन से आधा घंटा पहले भरपूर मात्रा में पी लें जिससे भोजन शुरू करने से पहले ही वो पानी आसानी से पच जाये. इसी तरह खाने के 1 घंटे के बाद आप भरपूर मात्रा मे पानी पी सकते है. इससे आपका पाचन दुरस्त बना रहेगा. इसके अतिरिक्त जब भी इच्छा हो गर्मा गर्म पानी पीते रहे.
गर्म पानी शरीर की मेटाबोलिक रेट बढा देता है और नतीजा आप बेहतर अनुभव करते है. मेरा अपना अनुभव यह है की गर्म पानी आपके वजन को घटाने मे भी मदद करता है. मेने बिना कीसी अतिरिक्त जिद्दो-जहद के आसानी से 6-7 किलो वजन कम कर लिया है. अब मे पहले से ज्यादा फिट हू स्वस्थ हू.
ध्यान रहे, प्यास लगना एक तुलनात्मक अहसास है, जरूरी नही की वो सही समय पर आपको चेतावनी सिगनल दें, इसलिये आप प्यास लगने का इंतिजार ना करे. अकसर जब हम किसी महत्व्पूर्ण कार्य मे लगे होते है तो हमे भूख और प्यास का पता भी नही चलता. पर इसका यह मतलब तो नही की हमारे शरीर को पानी और खाने की जरूरत ही नही है.
तो फिर क्यों ना भरपूर पानी पिया जाये. पानी धीरे धीरे स्वाद लेते हुये उसे आदर देते हुये पिया जाये. एक बात ओर समझ लीजिये चाय या काफी सादे पानी का विकल्प  नही है. सच तो यह है की चाय और काफी के रूप मे जो टाक्सिन लिया है उस टाक्सिन को निकालने मे ही शरीर को उस से दुगना पानी व्यय करन होगा.
आजकल जूस के नाम पर बजार में ना जाने क्या मिल रहा है. पेप्सी और कोला के नुकसान के बारे मे गूगल करो और खुद जान जाओ.  इसलिये इसे भी सादे पानी का विकल्प मानने की भूल ना करें.
अगर आपको नीचे दी गई लिस्ट मे से किसी एक से भी परेशान है,
·           मोटापा   
·           जोडो मे दर्द
·           हर समय थकान बनी रहना
·           सुबह उठने का मन नही करता है शरीर थका थका सा लगता है   
·           मांस पेसियों मे एंठन रहना
·           त्वाचा रूखी सूखी है
·           सिर मे रूसी
·           डायबटीज
·           क़िडनी इंफेक्शन  
·           जुकाम
·           सिर दर्द रहना  
·           पेट खराब रहना
·           एसीडीटी
·           अकसर कब्ज
·           हाथ पैर ठंडे रहना
·           पाइल्स
·           ब्ल्ड प्रेशर
तो अपने डाक्टर से इस बारे मे बात किजिये और पानी से इसके सबंध के बारे मे पूछिये.
इस बात पर जरूर बहस हो सकती है की पीने के पानी का तापमान क्या हो. कुछ लोग नोर्मल तापमान के पानी को पीने की सलाह देंगे तो कुछ ठंडा पानी पीने का, तो कुछ मेरे जेसे लोग गर्म पानी की. पर कोई भी पानी के महत्व को नजर अदांज नही कर सकता है.
लोग कहते है गर्मी में और गर्म पानी?...कोइ पागल ही एसा सोचेगा.
अजीब लोग है, गर्मी मे गर्म चाय पी सकते है पर गर्म पानी पीने को कहो तो! ..... भगवान ही एसी सोच वालों का भला कर सकता है. वेसे भी डाक्टरलोग पानी उबालकर पीने की सलाह देते है जिससे कि उसके अदंर मोजूद बेक्टिरिया और वायरस खत्म हो सके. अतंर सिर्फ इतना है की लोग उसके बाद उसे फ्रिज मे ठंडा करने के लिये रख देते है. जबकी मेरी सलाह है की उसे चाय की तरह गर्मा गर्म पिया जाये, कम से कम चाय की जगह तो इसे पिया ही जा सकता है.
मेने लोगों को दिन भर में 1 लीटर से भी कम पानी पीते हुये देखा है. उन्हे पता ही नही होता की उनके शारारिक कष्टों की वजह कम पानी पीना है और वो डाक्टरो के यंहा किसी रामबाड दवाइ की उम्मीद मे लाइन लगाये बेठें है.
अति महत्वपूर्ण : आप सुबह की शुरूआत चार से पांच गिलास ( 1 से 1.25 लीटर ) पानी पीने से करे. अगर इसके पीने से आपको चक्कर आने लगे, या हाथ पेरों मे सूजन आने लगे, या नाक से पानी बहने लगे  तो इसे आगे नही करना है और इस बारे मे अपने डाक्टर से बात करे क्योंकी यह कुछ खास बिमारी के लक्षण हो सकते है जेसे हाथ पेरों मे सूजन क़िडनी के ठीक से काम नही करने के कारण हो सकती है. इसी तरह नाक से पानी आना फेफडों की प्राब्लम के कारण हो सकता है और चक्कर आना न्यूरोलोजिकल परेशानी के कारण हो सकता है. 
उम्मीद है की एक महिने तक हर रोज 8 से 10 कप गर्म पानी जरूर पियेंगे. लेख लंबा हो गया है और आप मेरे फंडे से पूरी तरह पक गये है. इसलिये पानी के महातम पर आगे चर्चा किसी ओर दिन, पानी कब, केसे और कितना पीना चाहिये उसके बारे में आयुर्वेद मे विस्तार से समझाया गया है पर उस पर भी चर्चा अगले ब्लाग में.

यह लेख एक सलाह मात्र है. आपके लिये आपके डाक्टर की सलाह सर्वोपरी है.

Saturday, March 7, 2015

सार्वजनिक - यानी मन चाहा, गेजिम्मेदार उपयोग

हमारे यंहा सार्वजनिक का मतलब उसे बेशर्मी की हद तक इस्तेमाल करने का अधिकार और उसके रखरखाव का ठेका किसी ओर का ( यानी भगवान भरोसे). पानी के स्रोत चाहे वो नदी या तालाब का हो या भूमीगत हो सार्वजनिक होता है. इसलिये जिसे जेसा मौका मिला उसने उसका मनमर्जी से इस्तेमाल किया. उसको प्रदूषित करने मे हमने कोइ कसर नही छोडी. हमने बेशर्मी की हद तक उसे बरबाद किया है. 

Image result for clean water courseबुरा हो इन बिजली चलित पम्पों का जिन से हमने भूमीगत जल स्रोतों का बेहिसाब बेदर्दी से दोहन किया और एश की हद तक उसे बरबाद होने दिया. बुरा हो इन आधुनिक कमोडों का जो एक व्यक्ति के मल-मूत्र को बहाने के लिये कम से कम दिन भर में 30 से 40 लीटर पानी बरबाद करता है.  यह सच है की इन आधुनिक कमोडों के कारण अब हम घर मे ही मल मूत्र विसर्जित करने के बाबजूद घर को बदबू रहित रख सकते है. पर उसकी कीमत में हम किसी नदी तलाब या भूमीगत जल को जहर मे बदल रहै होते है. अपना मल मूत्र नदीयों तालाबों और भूमीगत जल स्रोतों मे मिलाकर जो फ्री था उसे जहर बना दे रहे होते है. सफाइ का एसा पागलपन की हर शहर हर दिन टनों साबुन नदीयों और तालाबों में बहा रहा है. साफ गोरी काया के लिये एसा का एसा पागल दिवानापन मिसाल हम इंसानों मे ही मिलेगी.
जब तक हमसे असली कीमत वसूल ना की जाये उसके महत्व का हम अंदाज नही लगा पाते. यह गलत फहमी  है की प्रकृति ने हमे हवा पानी और रोशनी मुफ्त दे दी है. इसका पता तो तब चलता है जब वो हमारे पास ना हो. क्या रेगीस्तान मे पानी उसने मुफ्त दिया है?
अब बेक्टीरिया वाइरस का एसा भय की हम दिनभर हाथों को धोते रहते है. इस डर से की अगर बिना धोये कुछ खाया या पिया तो हमारा अंत.  दिन भर TV यही सब दिखाता रहता है और हम यह सब देखकर साबुन एंटी सेप्टिक लोशन इस्तेमाल कर रहे है. हम भूल गये की हमारे स्वास्थ का राज हमारा अपना इम्यून सिस्टम है ना की साबुन और एंटीसेप्टिक लोशन और दवाइयां.
हम यह भी भूल गये की हमारे आसपास दिखाइ देने वाले पेड पौधे और प्राणी जगत के होने की वजह दिखाइ ना देने वाला एक भरापूरा जीता जागता माइक्रो जीव- बेक्टीरिया, फंगस, वाइरस से भरा संसार है जो हर समय ह्म सब को चारों ओर से घेरे हुये है यह हमारे अदंर है हमारे बाहर है उसमे से कुछ हमारे दोस्त है और कुछ दुशमन. हमारा  इम्यून सिस्टम इन्हे पहचानता और रात दिन इन पर निगाह रखता है जो हमारे दोस्त है उन्हे फलने फूलने देता है और जो दुश्मन है उन्हे शरीर से मार भगाता है.
Image result for clean water courseमाना की हमारा इम्यून सिस्टम जब किसी कारण से overburden हो जाता है तो हमे दवाइयों से मदद मिलती है, पर अगर इस मदद के हर समय मोहताज रहने लगे और अपने इम्यून सिस्टम पर भरोसा ना रहे, तो यह गंभीरतम मामला हो जाता है. बाजारवाद तो यही चाहता है की हमे अपने पर भरोसा ना रहे. हमारा डर इस बजार को फलने फूलने मे मदद जो करता है.

साफ सफाइ का अपना महत्व है पर इसे पूरे प्रपेक्ष मे देखना चाहिये क्योंकी हमारे घर के साफ होने का कोइ मतलब नही रह जाता अगर हमारा पास पडोस गंदगी का अबांर हो, हमारी करनी से नदी तलाब बरबाद हो रहे हों. 

Tuesday, June 3, 2014

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस क्या अहमियत है इसकी?


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विश्व पर्यावरण दिवस, ऐसा दिवस जो दुनिया वालों को याद दिलाता है कि उन्हें इस धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखना है, उसे अधिक बिगड़ने से रोकना है, उसे इस रूप में बनाए रखना है कि आने वाली पीढ़ियां उसमें जी सकें । लेकिन यह दिवस अपने उद्येश्यों में सफल हो भी सकेगा इसमें मुझे शंका है । काश कि मेरी शंका निर्मूल सिद्ध हो! कुछ भी हो, मैं पर्यावरण के प्रति समर्पित विश्व नागरिकों की सफलता की कामना करता हूं । और यह भी कामना करता हूं कि भविष्य की अभी अजन्मी पीढ़ियों को पर्यावरण जनित कष्ट न भुगतने पड़ें।
अभी तक वैश्विक स्तर पर अनेकों दिवसघोषित हो चुके हैं, यथा इंटरनैशनल वाटर डे’ (22 मार्च), ‘इंटरनैशनल अर्थ डे’ (22 अप्रैल), वर्ल्ड नो टोबैको डे’ (31 मई), ‘इंटरनैशनल पाप्युलेशन डे’ (11 जुलाई), ‘वर्ल्ड पॉवर्टी इरैडिकेशन डे’ (17 दिसंबर), ‘इंटरनैशनल एंटीकरप्शन डे’ (9 दिसंबर), आदि । इन सभी दिवसों का मूल उद्येश्य विभिन्न छोटी-बड़ी समस्याओं के प्रति लोगों का ध्यान खींचना, उनके बीच जागरूकता फैलाना, समस्याओं के समाधान के प्रति उनके योगदान की मांग करना है, इत्यादि । परंतु यह साफ-साफ नहीं बताया जाता है कि लोग क्या करें और कैसे करें ।
पर्यावरण शब्द के अर्थ बहुत व्यापक हैं । सड़कों और खुले भूखंडों पर आम जनों के द्वारा फैंके जाने वाले प्लास्टिक थैलियों और कूडे तक ही यह सिमित नहीं है। शहरों में ही नहीं गांवों में भी कांक्रीट जंगलों के रूप में विकसित हो रहे रिहायशी इलाके पर्यावरण को प्रदूषित ही करते हैं। भूगर्भ जल का अमर्यादित दोहन, नदीयों में मिलते शहरी नाले जहर और गंदगी घोल रहे है । हमारे शहरों एवं गांवों में फैली गंदगी का कोई कारगर इंतजाम नहीं है । ध्वनि प्रदूषण भी यदाकदा चर्चा में आता रहता है। जलवायु परिवर्तन को अब इस युग की गंभीरतम समस्या के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसी तमाम समस्याओं के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश की जा रही है एक दिवस मनाकर । क्या जागरूकता की बात सतत चलने वाली प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए ? एक दिन विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये पर्यावरण दिवस मनाना क्या कुछ ऐसा ही नहीं जैसे हम किसी का जन्मदिन मनाते हैं, या कोई तीज-त्योहार ? एक दिन जोरशोर से मुद्दे की चर्चा करो और फिर 364 दिन के लिए उसे भूल जाओ ?
मात्र जागरूकता से क्या होगा ? यह तो बतायें कि किसी को (1) वैयक्तिगत एवं (2) सामुदायिक स्तर पर करना क्या है ? समस्या से लोगों को परिचित कराने के बाद आप उसका समाधान भी सुझायें! कुछ दिन पहले कि बात है, क्रिकेट के एक दिवसिय मेच में प्रायजकों को अर्थ दिवस मनाने का सूझा...उन्होने मुस्कराते हुये क्रिकेटरों से साथ ग्लोब के पास फोटो खिचवाये. कुछ भावनात्मक लफ्फाजी की और फिर फल्ड लाईट में रात्री मेच शुरू ...यही उपभोक्ता वाद है. क्योंकी ऐसा कर खेलने वाला खुश खिलाने वाला खुश और खेल देखने वाला खुश. अगर उन्हे अर्थ दिवस की इतनी ही चिंता होती तो वो उस रात्री मेच के लिये जनता से माफी मांगते हुये उसे रद्द करते और मेच को दिन में कराते,. पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. अब आप बतायें ये किसे जागरूक बना रहे थे. 
चलिये आपने सब को जागरूक बना भी दिया तो प्रतिबद्धता एवं समर्पण कहां से लाएंगे ? क्या लोग वह सब करने को तैयार होंगे जिसे वे कर सकते हैं, और जिसे उन्हें करके दिखाना चाहिए ? उत्तर है नहीं । यह मैं अपने अनुभवों के आधार पर कहता हूं । मैं पर्यावरण की गंभीरतम समस्या जलवायु परिवर्तन का मामला एक उदाहरण के तौर पर ले रहा हूं । जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाने के लिए हम में से हर किसी को कार्बन उत्सर्जन घटाने में योगदान करना पड़ेगा, जिसका मतलब है कि जीवास्म इंधनों का प्रत्यक्ष तथा परोक्ष उपयोग कम से कम किया जाए । क्या आप कार चलाना बंद करेंगे, अपने घर का एअर-कंडिशनर को बंद करेंगे, कपड़ा धोने की मशीन का इस्तेमाल बंदकर हाथ से कपड़े धोएंगे, अपने विशाल घर में केवल दो-तीन सीएफएलबल्ब जलाकर गुजारा करेंगे, और हवाई सफर करना बंद करेंगे, इत्यादि-इत्यादि ? ये सब साधन जलवायु परिवर्तन की भयावहता को बढ़ाने वाले हैं । जिनके पास सुख-सुविधा के ये साधन हैं वे उन्हें छोड़ने नहीं जा रहे हैं । इसके विपरीत जिनके पास ये नहीं हैं, वे भी कैसे उन्हें जुटायें इस चिंता में पड़े हैं । कितने होंगे जो सामर्थ्य हो फिर भी इन साधनों को स्वेच्छया कहने को तैयार हों ? क्या पर्यावरण दिवस सादगी की यह भावना पैदा कर सकता है ?
वास्तव में पर्यावरण को बचाने का मतलब वैयक्तिक स्तर पर सादगी से जीने की आदत डालना है, जो आधुनिक काल में उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाने वाली चीज है। यह दिखावे का युग है, हर व्यक्ति की कोशिश रहती है कि उसके पास अपने परिचित, रिश्तेदार, सहयोगी अथवा पड़ोसी से अधिक सुख-साधन हों । यह मानसिकता स्वयं में ही स्वस्थ पर्यावरण के विपरीत जाती है।
जरा गौर करिए इस तथ्य पर कि पूरे विश्व का आर्थिक तंत्र इस समय भोगवाद पर टिका है । अधिक से अधिक उपभोक्ता सामग्री बाजार में उतारो, लोगों को उत्पादों के प्रति विज्ञापनों द्वारा आकर्षित करो, उन्हें उन उत्पादों का आदी बना डालो, उन उत्पादों को खरीदने के लिए ऋण की व्यवस्था तक कर डालो, कल की संभावित आमदनी भी आज ही खर्च करवा डालो, ये सब आज आधुनिक आर्थिक प्रगति का मंत्र है । हर हाल में जीवन सुखमय बनाना है, भले ही ऐसा करना पर्यावरण को घुन की तरह खा जाए ।
कुछ कार्य लोग अपने स्तर पर अवश्य कर सकते हैं, यदि वे संकल्प लें तो, और कुछ वे मिलकर सामुदायिक स्तर पर कर सकते हैं । किंतु कई कार्य केवल सरकारों के हाथ में होते हैं। पर इस सब से पहले यह तय करना जरूरी है कि उनके लिए आर्थिक विकास पहले है या पर्यावरण ? यह एक मजाक ही है कि एक तरफ पर्यावरण बचाने का संदेश फैलाया जा रहा है, और दूसरी ओर लोगों को अधिकाधिक कारें खरीदने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मैं कारको आज के युग के उपभोक्ता साधनों के प्रतिनिधि के रूप में ले रहा हूं । कार से मेरा मतलब उन तमाम चीजों से है जो लोगों को दैहिक सुख प्रदान करती हैं और उन्हें शारीरिक श्रम से मुक्त कर देती हैं । क्या यह सच नहीं है कि बेतहासा बढ़ती हुई कारों की संख्या के कारण सड़कों का चौढ़ीकरण किया जाता है, फ्लाई-ओवरों का निर्माण किया जाता है, भले ही ऐसा करने का मतलब पेड़-पौधों का काटा जाना हो और फलतः पर्यावरण को हानि पहुचाना हो ?
ऐसे अनेकों सवाल मेरे जेहन में उठते हैं । मुझे ऐसा लगता है कि पर्यावरण दिवस मनाना एक औपचारिकता भर है । मुद्दे के प्रति गंभीरता सतही भर है, चाहे बात आम लोगों की हो अथवा सरकारों की, शायद यही कारण है कि हम कुछ लोगों का विकास हर कीमत पर करना चाहते है उसके लिये अगर जंगल बरबाद होते हो तो हो, किसान बरबाद होते है तो हो. खेत बरबाद होते है तो होने दो!
आंकडे इस बात के गवाह है कि विश्व की आबादी के 20% लोग इस ग्रह की 80% प्राकृतिक स्रोतो को खत्म करने के लिये जिम्मेदार है. वो ओरों की चिंता छोड  अपने लिये  जिये जा रहे है. वहीं दूसरी तरफ हाशिये पर खडे 80% अधिसंख्य लोग इन 20% के लिये काम करते हुये  अपनी जिंदगी के लिये जूझ रहे है.  यही वो 20% लोग है जो दूसरों को तो पर्यावरण खतरा,  ग्लोबल वार्मिंग, सूखा, बाढ, उर्जा खत्म, ग्लेशियर खत्म.. तो पानी खत्म शेर खत्म तो जंगल खत्म …. हम खत्म!!!. का पाठ पढाते है और खुद एसी के लिये भी स्टेंडवाय पावर रखते है .
जब कोइ मुझे समझाता है की सडक पर कचरा फेलाना पर्यावरण के लिये नुकासान देह तो मुझे उसकी बात पर हंसी आ जाती है की उसे सडक पर धुंआ उडाता ट्रक दिखाइ नही देता और पोलीथीन का टुकडा दिखाइ देता है. और वो जनाब भी, जिसने  पोलीथीन सडक छोडा था उस पर भीरी जुर्माने की दुहाइ देते हुये कार मैं ए. सी. आन कर चल देता है. शायद यह भौतिकतावाद से उपजी नई संस्कृति है जो इस बात पर जोर देती है जब तक कानून ना हो तब तक उस अमल ना करो चाहे उसे करना कितना ही जरूरी हो, और जब कानून बना दिया जाये तो उससे बचने के बारे मे पहले सोचो, और जब बचने का कोइ रास्ता ना हो तो सिर्फ कानून से बचने के लिये जितना जरूरी हो उतना भर कर दो.
इस सब के वाबजूद 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाना है और उन जाने-अनजाने लोगों को याद कर उन्हे प्रोत्साहित करना है जो भले ही छोटा हो पर पर्यावरण बचाने के लिये गंभीर प्रयास कर रहे है. उस पर बात करना जरूरी है, क्योंकी बाकी के 364 दिन हम दूसरे कामों में अति व्यस्त जो है. कम से कम यह हमे बताता है की हम किस तेजी के साथ जैवीय संकट पैदा कर रहे है. इस लेख को लिखकर मैं अपने को अपराधमुक्त महसूस नहीं कर रहा हू...बल्कि अपराध बोध का अनुभव कर रहा हू...क्या जाने शायद यही अपराध बोध पर्यावरण संरक्षण के लिये कुछ ठोस करने को प्रेरित करे.