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Monday, October 19, 2015

आपका RO आपको मुबारक

हे जिम्मेदार नागरिक,
मै जिम्मेदार नागरिक नही हू इसलिये इस मेल को जेसे का तेसा फार्वड ना कर कुछ लिखने की गुजारिश कर रहा हू. जनाब हम हजारों सालो से नदी तलाब का पानी पी रहे थे, इन नदी नालों को जिस तेजी  से आपने प्रदूषित किये है  वो तारीफे काबिल है. आपने अपने लिये तो RO की मांग कर दी. इन मे रह रहे जल जीव, इन पर पल रहे जीव उनका क्या...उनके लिये RO कंहा से लाओगे, अगर आपके लिये वो पानी जहर है तो उनके लिये भी जहर हुआ ना , या आप समझ बैठे है की इस संसार की  आप सर्वश्रेष्ठ रचना है और सिर्फ आपको जीने का अधिकार है पर आप भी उनके बिना अकेले कब तक !
आपकी शाही आदते नदी नालो को प्रदूषित करने का सबसे बडा कारण है पर जब बोतल बंद पानी मिल रहा है तो आपको  क्या चिंता है. आप लोग अपना मल मूत्र घर से बाहर बहाने के लिये सेकडो लीटर पानी बरबाद कर देते है, बिना ये सोचे की यही मल मूत्र नदी नालो को भी प्रदूषित कर रहा है. सेकडो टन साबुन रोज इस हसरत मे नदी नालो मे बहा देते है की उससे आप गोरे और सुदंर दिखाई देंगे.  कंही पर भी हग देगे ... मूत देगे...कचरा फेला देगे. प्लास्टिक की उडती पन्नीयां. नदी नालों को जाम करती ये पन्नीया उसका दोष भी आपको इन्ही पन्नीयों मे दिखाई दे रहा है इसलिये आप को अब कागज की थेलिया चाहिये. जिससे आपकी शाही आदते वेसी ही बनी रहे...क्योंकी आप तो इशवर की  बेहतरीन रचना है आपकी आदते या सोच खराब केसे हो सकती है
अभी हाल ही मे गणेश विसर्जन का नाजारा देखा एक छोटा सा तालाब और हजारों की भीड अपने अपने गणेश मूर्ति के साथ विसर्जन के लिये तैयार, लाख बताया , समझाया की POP की मूर्ति का इस्तेमाल नही करना है पर लोगों का क्या वो इसबार भी POP की सेकडो बढी-बढी मूर्तियों लेकर विसर्जन के लिये हाजिर थे. धार्मिक मामला था कोइ कुछ बोल भी नही सकता ओर तो ओर उनके हाथ मे पोलीथीन की छोटी बढी पूजा मे इस्तेमाल की हुई सामग्री से भरी. हजारों थेलिया थी उसे पोलीथीन समेत तालाब के फेंक दिया. कम से कम पोलीथीन तालाब मे फेंकने से बच सकते थे. पर एसा नही हुआ. एसा करने वाले पढे लिखे समझदार लोग थे जो गणेश विसर्जन बेंड बाजो के साथ कर रहे थे.  सच मानो ये वही सब लोग थे जो घरों मे RO का पानी पीते है. यही भीड अगर उस दिन तालाब साफ करने के लिये इकठ्ठी हुई होती तो नजारा कुछ ओर ही होता. बंदा नतमस्तक हो जाता, पर एसा हो ना सका.
प्रशासन नदारद था , वेसे अगर वो होता तो क्या कर लेता. यही लोग उसके विरोध मे उतर आते. क्या किसी को ये सब दिखाइ नही दे रहा था, सब को दिखाइ दे रहा था. पर बोले कोन,  टोके कोन,  समझाये कोन. नासमझ को समझाया जा सकता है, समझदार का क्या किया जाये. एक समय था जब इसी बदबूदार गंदे तालाब का  पानी  साफ हुआ करता था, पशु-पक्षी पानी पीते थे. तालाब जीवन था. अब वो मर रहा है. पर उन्हे क्या चिंता है. अगले गणेश उतस्व मे इससे ज्यादा गंदगी तालाब के हवाले कर देगे. उनके घरों मे तो RO है ना.  वेसे भी जिन लोगों ने गणेश की मूर्ति के  साइज को अपना शक्ति प्रदर्शन बना दिया हो. आस्था साइज से जुड गई हो भीड मूर्ति के साइज के हिसाब से जय जय कार करती हो , उनसे इस सब की उम्मीद केसे की जा सकती है.
अब ये दूसरा शगूफा,  असल कारण पर वार ना कर, सस्ते और मंहगे का रोना लेकर RO की बात कर रहे है. RO तकनीक आपको रामवाण नजर आ रही है, जो बोतल से सस्ता पानी देगी. क्या फर्क पडता है अगर RO तकनीक...50% से 60% पानी बरबाद कर देती हो. पीने वाले को वो साफ पानी दे रही है ना .

धन्य है दानवीर जिम्मेदार नागरिक जनता अरे हमारी बात छोडिये,  20 रूपये देना आपकी शान मे इजाफा करता है वरना आपके जेसों के लिये टीवी पर वो एड नही आता जिस मे एक ही बोतल से दूसरे के पीने से उसे पहला वाला चांटा मारता है और कारण बताया जाता है की उससे संक्रमण फेलता है ...वाह री लाजिक .. चुम्मा से संक्रमण नही फेलता पर बोतल से फेल जाता है...वाह जी वाह क्या बात है.

Wednesday, May 1, 2013

अगर 'बोतल-किस' पर चांटा तो खाली-बोतल कही भी फेकने पर पिछाड पर लात क्यों नही?

आजकल बिसलरी पानी एक विज्ञापन टीवी पर दिखाया जा रहा है जिसमे इस बात पर जोर दिया गया की अपनी – अपनी बोतल से पानी पीओ अगर दूसरे की बोतल से मूंह लगाकर पानी पीओगे तो चांटा पडेगा!

किसी अपने ने अगर मूह लगाकर पानी पी भी लिया तो क्या हो गया? कोन सा पाप या अपराध हो गया! अगर पीने वाले के मूह मे कोइ खतरनाक संक्रमण नही है तो वो क्यों नही पी सकता.

प्यार मे चूमा चाटी जायज है क्योंकी इससे संक्रमण नही प्यार फेलता है...right!

अरे क्या खाक राइट.....अगर असली किस राइट तो बोतल किस wrong केसे?

बोतल से मूह लगाकर पानी पीना गलत केसे?

इस विज्ञापन मे यह तो बता दिया की पानी अपनी बोतल से पीओ पर यह नही बताया की जब बोतल खाली हो जाये तो उसका क्या करो. क्योंकी हम राजसी आदतों से मजबूर उसे कही भी फेंक देते और यह मानकर चलते है की सरकार का एक अदना सा आदभी जिसे सफाइ कर्मचारी कहते है उसे सही ठिकाने लगा देगा.

हमारे द्वारा फेंका गया यह कूडा आज पर्यावरण के लिये सबसे बडा खतरा बन चुका है. फिर भी यह हमे एक घूट पानी के लिये नई बोतल खरीदवाना चाहते है. अगर हम अब भी नही जागे तो हम मे और सूअर मे कोइ अतंर ना होगा. क्योंकी एक गंदगी और कचरे का आदी है और एक होने जा रहा है.

बुरा लगा ना! मुझे बुरा भाला कहने से पहले अपने आस आस फेले कूडे कचरे पर जरा नजर डालो. नदी हो या नाले सब पर इन बोतलों को तेरता देखो और सोचो कोन देगा हमे इससे निजात? शायद हमे अब भी इसकी भयावहता का सही अदांज नही है! हमे अपनी आदते सुधारनी होगी, गलत धारणाओं को पनपने से रोकना होगा.

जेसे जर्मन रोज का सामान खरीदने के लिए अपनी थैलियां अक्सर साथ में लेकर जाते हैं. और अगर वो नहीं ले गए हैं तो सुपर मार्केट में प्लास्टिक, कागज या कपड़े की थैली के लिए आपको कम से 10 सेंट से एक यूरो तक पैसे चुकाने होते हैं. कई दुकानों में रखी कपड़े की थैली वापिस करने पर आपको दिए हुए पैसे वापिस मिल जाते हैं.


बीयर  या फिर जूस खरीदते समय  ग्लास या प्लास्टिक की बोतलों पर कुछ पैसे डिपॉजिट किए जाते हैं जो आठ सेंट से 25 सेंट के बीच होते हैं. जब आप ये बोतलें लौटाते हैं तो पैसे वापिस मिलते हैं. 25 सेंट की चार बोतलें एक यूरो और एक यूरो की रुपये में कीमत कम से कम 65 रुपये.

अगर एसा हमारे यंहा भी हो सके

 क्यों ना हम भी बोतल बेचने वालों को ही खाली और बेकार बोतलों को सही ठिकाने पहुचाने की जिम्मेदारी दे. आसान सा विक्ल्प ...खाली बोतल वापस करो और उसके बदले नई बोतल की कीमत मे रियायत पाओ.
मुझे याद है दूध की बोतल को बार बार इस्तेमाल किया जाता था. यहां तक की कोला और पेप्सी को भी बोतलों को बार बार इस्तेमाल करता था. पर उस को आधुनिकता और स्वास्थ के नाम पर बंद क दिया गया.

  कचरे को उसके प्रकार के आधार पर अलग अलग डिब्बों मे डाला जाये जिससे उसके सही निराकरण मे असानी हो. जो मिक्स कचरा डाले उस पर भारी जुर्माना हो और इस जुर्माने की जिम्मेदारी समाज की हो..हर काम हम सरकार पर नही डाल सकते. कुछ काम हमे भी करने होंगे. बच्चों को पर्यावरण के प्रति किताबी ज्ञान सीखाने की जगह हमे खुद एक उदाहरण बनना होगा.


आज हम पानी के फुट प्रिंट की बात करते है, कार्बन फुट प्रिंट की बात करते है अब जरूरत है की अब पोलीथीन और प्लास्टिक फुट प्रिंट की भी बात करे जो हमारे पर्यावरण, नदी नालों और तालाबों के लिये खतरा बन गये है.


आगे आपकी मर्जी....























Tuesday, June 5, 2012

आगे रास्ता जाम है...रोहतांगपास


रोहतांगपास के नाम पर टेक्सी वाले ने हमे मडी पर लाकर खडा कर दिया है.जब कहा की आगे रोहतांग पास तक लेके क्यों नही जा रहे हो तो बोला की साहब आगे रास्ता जाम है. आप भी देखो कोइ आगे नही जा रहा है सब यही तक लेके आते है.
चारों तरफ नजर दौडता हू... जहां तक नजर जाती है लोगों का हूजूम...  मेला लगा है खाने पीने के स्टाल है.  अपनी मस्ती मे डूबे लोग. खुली धूप ठ्डी हवा ... मै भी ब्रेड आमलेट का आडर देकर कुर्सी पर पसर जाता हू. बेटा कब का भीड मे गायब हो गया है. अब वो इतना बडा हो गया है की उसके खोने का डर नही है. मालूम है थोडी देर मे मस्ती कर के खुद ही हमे डूडता हुआ वापस आ जायेग. हां बीबी थोडी परेशान है....उसके लिये अभी भी वो बच्चा है.
ब्रेड की पहली बाइट लेते ही मेरी नजर दो तीन लोगों पर पडी हाथों मे पोस्टर पकडे हुये...ओह YHAI  द्वारा आयोजित पर्यावरण जागरूकता अभियान मे लगे वोलेंटीयर. देखकर अच्छा लगा. उनके मोजूदगी का असर साफ है. ना तो यहां वहां बिख्ररे पोलिथीन के टुकडे है और ना ही गंदगी, हर दुकानदार का अपना अपना ड्स्ट्बिन. काश एसी जागरूकता हम सभी सार्वजनिक जगहों पर दिखाते.

Monday, January 9, 2012

one massive container ship pollution >= 50 million cars pollution


It is reported that in one year, a single large container ship can emit cancer and asthma-causing pollutants equivalent to that of 50 million cars. The low grade bunker fuel used by the worlds 90,000 cargo ships contains up to 2,000 times the amount of sulfur compared to diesel fuel used in automobiles. The recent boom in the global trade of manufactured goods has also resulted in a new breed of super sized container ship which consume fuel not by the gallons, but by tons per hour, and shipping now accounts for 90% of global trade by volume.

In international waters ship emissions remains one of the least regulated parts of our global transportation system. The fuel used in ships is waste oil, basically what is left over after the crude oil refining process. It is the same as asphalt and is so thick that when cold it can be walked upon . It's the cheapest and most polluting fuel available and the world's 90,000 ships chew through an astonishing 7.29 million barrels of it each day, or more than 84% of all exported oil production from Saudi Arabia, the worlds largest oil exporter.

Shipping is by far the biggest transport polluter in the world. There are 760 million cars in the world today emitting approx 78,599 tons of Sulphur Oxides (SOx) annually. The world's 90,000 vessels burn approx 370 million tons of fuel per year emitting 20 million tons of Sulphur Oxides. That equates to 260 times more Sulphur Oxides being emitted by ships than the worlds entire car fleet. One large ship alone can generate approx 5,200 tonnes of sulphur oxide pollution in a year, meaning that 15 of the largest ships now emit as much SOx as the worlds 760 million cars. Airborne pollution from these giant diesel engines has been linked to sickness in coastal residents near busy shipping lanes. Up to 60,000 premature deaths a year worldwide are said to be as a result of particulate matter emissions from ocean-going ship engines.

Sunday, February 20, 2011

पानी बचाइये…पानी कमाइये

पानी हमेशा से एक सामुदायिक संपत्ति रहा है। पुराने समय में पानी लेने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी क्योंकी इसके लिये नदी और तालाब जेसे स्रोतों के पास जाना पडता था या कुओं, बावडी, से पानी खीचना पडता था, लेकिन आधुनिक सदी में घर में पानी के सीधे पाइप से पहुंचा दिया। इससे हमारी मानसिकता में भी बदलाव आ गया। अब हम बड़ी आसानी से पानी ले लेते हैं। पानी का इतनी आसानी से मिल जाने से ही पानी की बरबादी शुरू हुई। इसका नतीजा ये हुआ की भूमिगत जलस्तर घट रहा है, हैंडपंपों में पानी खत्म हो रहा है। कुएं और बाबडी सूख रहे है. हमारी नादानियों के कारण पानी के मूल स्रोत नदी और तालाब और भूमिगत जल प्रदूषित हो रहे है.
महानगरों की आबादी का दबाब के कारण नलों में पानी हमेशा नहीं रहेगा। पानी की कमी के लिए लोग खुद जिम्मेदार हैं, उन्हें सीखना चाहिए कि पानी को कैसे और कितना इस्तेमाल करना है। पहले हैंडपंप से या कुओं से पानी खींचकर लोग सिमित पानी इस्तेमाल करते थे. खर्च हुये पानी की भरपाइ मानसून से हो जाया करती थी, लेकिन अब तो घरों में नल और फव्वारों से बेशर्मी की हद तक बरबादी होती है. पूरा का पूरा शहर भूमिगत जल से पानी लेकर उसे पीने और नहाने धोने का कार्य कर रहा है. उसका असर यह हुआ की भूजल तेजी से नीचे जा रहा है. किसी शहर में पानी की कमी होना एक भयावह स्थिति है। अगर हमारे पास पानी ही नहीं होगा तो 8-9 फीसदी आर्थिक विकास की बातें करना सब बेमानी ही है। कारखाने बंद हो सकते हैं। बड़ी मात्रा में विस्थापन हो सकता है।
ठीक है कुछ शहरों में ऐसी स्थिति हो सकती है जहां पानी थोड़ा-थोड़ा टुकड़ों में मिलता रहे पर बाकी शहरों में तो स्थिति भयावह ही होगी। इतिहास में एसे बहुत से शहर और सभ्यताए दर्ज है जो पानी की कमी की वजह से ही खत्म हो गये। पानी के लिए युध्द, शायद आज असंगत लगे पर जरा सोचिये, अगर हमारे शहर में दो तीन वर्ष लगातार मानसून धोखा दे जाये? आप देख रहे हैं कि आज गली महोल्लों में पानी के मारामारी तो मची रहती है, या फिर तमिलनाडू और कर्नाटक का जल विवाद हो या भारत-पाक जल विवाद हो या मलेशिया और सिंगापुर के बीच भी पानी को विवाद इसे लेकर संबंधों में तनाव स्थिति पहले से और खराब होती जा रही है.
अगर किसी ने 50 साल पहले कहा होता की एक दिन लोग पानी को बोतलबंद करके अच्छे दामों पर बेचेंगे तो शायद उसे लोग पागल समझते। लेकिन आज हो रहा है। पानी का निजीकरण हो रहा है। ऐसे में ही पानी की कालाबाजारी शुरू होती है। लोगों का शोषण और नियंत्रण करने के लिए पानी का इस्तेमाल होगा। आम आदमी पानी की कमी की मार झेल रहा है, जबकि दूसरी ओर पांच-सितारा होटलों में लोग आधे-आधे घंटे तक नहाते रहते हैं। यानी अगर आपके पास पैसा है तो आज आप पानी खरीद कर उसे बरबाद कर सकते है, पर वो दिन अब दूर नहीं जब पैसा भी पानी को नही खरीद पायेगा.
पानी की बरबादी रोकने के लिये और उसका एक समान वितरण के लिये सरकार द्वरा जल कर पूर्ण समाधान नहीं हो सकता क्योंकी यह पक्षपात पूर्ण है. इससे सिर्फ पैसे वाले लोग ही पानी को खरीदेंगे, जो पानी का मूल्य नहीं चुका पायेगे उन्हें यह नहीं मिल पाएगा। यह तो अन्याय होगा क्योंकी पानी तो एक बुनियादी जरूरत है.
ठीक है कुछ शहरों में ऐसी स्थिति हो सकती है जहां पानी थोड़ा-थोड़ा टुकड़ों में मिलता रहे पर बाकी शहरों में तो स्थिति भयावह ही होगी। पानी ज्यादा मात्रा में उपलब्ध नहीं है। पानी की समस्या का समाधान जल सरंक्षण, पानी को रिसाइकिल (परिशोधन), पानी का बुद्धीपूर्ण इस्तेमाल है, गंदे पानी को इस तरह रिसाइकिल (परिशोधन) किया जाना चाहिये की वो पीने के योग्य बन जाये. सिंगापुर इसका एक अच्छा उदाहरण है वहां गंदे पानी को रिसाइकिल (परिशोधन) किया जा रहा है और एक टी.वी. पर प्रसारित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री जी वही परिशोधित पानी पिया था।
पानी का अधिक उपयोग सफाइ और धुलाइ में होता है. हमे उसके विकल्प को बढावा देना होगा. जो इस काम में पानी का कम से कम उपयोग सुनिश्चित कर सके. जेसे एरीयेटेड वाटर (हवा और पानी मिश्रित) वाले नल और शावर. एरीयेटेड वाटर पानी की खपत को सीधे 40% तक कम कर सकता है. हमे इजराइल जेसे देश से कम से कम पानी में खेती करने की तकनीक सीखनी चाहिये. जंगल और खनिज की तरह भूमिगत जल भी देश की संपत्ति मानकर इसके दोहन को नियंत्रित करना चाहिये. जल हार्वेस्टींग को विकल्प के तोर पर ना देखकर उसे गंभीरता से लेना चाहिये.
हम कार्बन पाइंट की तरह ही जल पाइंट अपनाकर पानी खर्चने की सीमा तय कर सकते है उससे ज्यादा खर्च करने वाले को फाइन और उससे कम खर्च करने वाले को प्रोत्साहन देने के लिये उसे इनाम दे सकते है वेसे ही जेसे कार्बन पाईंट दुनिया भर में उद्योग कमा रहे है इस विचार को आम जनता के बीच प्रचलन में लाना चाहिये जिससे कम से कम पानी के इस्तेमाल के लिये सभी प्रोत्साहित हो सके. पानी बचाना मतलब पैसा कमाना।