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Sunday, June 5, 2016

क्या प्रकृति मनुष्य की दासी है



प्रकृति का जिस तरह से हमने दोहन किया है उससे लगता है की प्रकृति मनुष्य की दासी है, जिसे वह विज्ञान व टकनॉलॉजी के दम पर चाहे जैसा रौंद सकता है, लूट सकता है और उसके साथ बलात्कार कर सकता है। इसी के साथ यह भी मान लिया गया कि आधुनिक सभ्यता द्वारा विकसित हर टकनॉलॉजी श्रेष्ठ तथा अपनाने लायक है और प्रगति की निशानी है। आधुनिक टकनॉलॉजी के प्रति अंधविश्वास की हद तक भक्ति इसमें दिखाई देती है। 
अगर एसा ना होता तो हमे अपने चारों ओर लाखों टन इ-कचरा दिखाई  देने लगता. हर साल लाखों करोडो मोबाइल और लेपटाप की बैटरियां को कचरे की तरह हम डस्टबिन मे एसे फेंक देते है जेसे वो कोइ कागज का टुकडा हो. उसमे मोजूद हानीकारक रसायनों के प्रति हमारी इस कदर की उदासीनता एक गंभीर अपराध क्यों नही मानी जा रही है. इसी तरह वाहनों का कबाड हो या घर मे इस्तेमाल फ्रिज और टीवी और वाशिंग मशीन, इनकी उम्र पूरी होने के बाद हम नई खरीद कर पुरानी को भूल जाते है. कभी सोचा की उस पुराने का क्या होता है. पुरानी नजरों से दूर होते ही जेसे  हमारी उसके प्रति जिम्मेदारी खत्म हो गई. और उसके बदले नये के साथ हम आराम से जो है. 
हमारी भूमी, जल और वायु खतरनाक तरीक से प्रदूषित हो गई उसके विनाशकारी नतीजे लगातार सामने आने के बावजूद आत्मघाती राह पर हम लगतार उसे आगे बढ़ रहा है तो उसके दो कारण हैं। एक तो इनको आगे आगे बढ़ाने में साम्राज्यवादी देशों, कंपनियों, नेताओं, अफसरों व तकनीकशाहों के नीहित स्वार्थ हैं। मानव समाज का हित और भविष्य इनके मुनाफों, कानूनी-गैरकानूनी कमाई और अहंकार के सामने बौने पड़ जाते हैं। 
जैसे भारत में ही परमाणु बिजली के नए महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के पीछे अमरीकी, फ्रांसीसी व रुसी कंपनियों के स्वार्थ हैं, हमारे नेताओं ने इन भस्मासुरों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ की उपमा दी। मंदिरों के भगवान की तरह आधुनिक टकनॉलॉजी एवं विकास को प्रतिष्ठित कर दिया गया और विवेक या तर्क को छोड़कर उसकी पूजा होने लगी। टकनॉलॉजी की यह अंधभक्ति इतनी प्रबल रुप में पढ़े-लिखे बौद्धिक समुदाय में छाई है कि इस पर सवाल उठाने वालों को कई बार अवैज्ञानिक, दकियानूसी, पीछे देखू व प्रगति विरोधी करार दिया जाता है।
यह सही है की  हमें बिजली चाहिए, कोयला, प्राकृतिक गैस, डीजल, नेप्था, परमाणु उर्जा या बड़े बांध - किसी से भी बिजली बनाएं तो समस्याएं पैदा होती हैं और फिर उनका विरोध होने लगता है। यह बिल्कुल सही है। इसका जवाब दो हिस्सों में है। एक तो यह कि उर्जा के अन्य सुरक्षित वैकल्पिक स्त्रोतों का विकास करना है। और समय के मानदंड पर जो उर्जा तकनीके खरी  उतरी हो उन्हे बढावा देना है. अभी तक साम्राज्यवादी देशों को पूरी दुनिया से कोयला, तेल, गैस व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने तथा प्रदूषण एवं पर्यावरण-विनाश करने की सुविधा इतनी आसानी से मिलती रही कि वैकल्पिक उर्जा के विकास व अनुसंधान पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। 
हमारा देश भी उन्हीं की नकल कर कोयला, प्राकृतिक गैस, डीजल, नेप्था, परमाणु उर्जा या बड़े बांध से आगे नही सोच पाया। बहुत देर बाद हमने सौर उर्जा जेसे विकल्पों के प्रति थोडी गंभीरता दिखानी शुरू की है.  आज  भी हम मांग के अनरूप सोर उर्जा सेलों के बनाने के लिये आधारभूत उद्योग नही लगा पाये. यह तरक्की भी चीन से आयातित निम्न  दर्जे  के सेलों के सहारे पर टिकी हुई है.  इस तकनीक में जन भागेदारी अब भी सरकारी आंकडो क खेल बन रही है. 

यदि बिजली पैदा करने में इतनी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, तो इसके अंधाधुंध उपयोग को भी नियंत्रित करना होगा। खास तौर पर बिजली व उर्जा के विलासितापूर्ण उपयोग व फिजूलखर्च पर बंदिशें लगानी पड़ेगी। इसके लिए आधुनिक जीवन शैली और भोगवाद को भी छोड़ने की तैयारी करनी होगी।
आधुनिक टकनॉलॉजी, आधुनिक जीवनशैली, उपभोक्ता संस्कृति, कार्पोरेट मुनाफे, वैश्विक गैर बराबरी, साम्राज्यवाद, पर्यावरण संकट - इन सबका आपस में गहरा संबंध है और ये मिलकर आधुनिक औद्योगिक सभ्यता को परिभाषित करते हैं, 
इनके विकल्पों पर आधारित एक नई सभ्यता के निर्माण से ही मानव और उसकी मानवता को बचाया जा सकता है तथा एक बेहतर व सुंदर दुनिया को गढ़ा जा सकता है। अभी तो फिलहाल पर्यावर्ण के नाम पर कुछ स्लोगन बनाना. लेख लिखना, और बहुत हुआ तो कुछ पोधों को रोप देना भर है. जेसे हम इस को मनाकर प्राकृति पर कोइ बहुत बढा अहसान कर रहे है. 


Tuesday, October 20, 2015

स्वच्छ भारत अभियान क्या सिर्फ सरकारी कार्यक्रम है

इण्डिया टुडे के 21 अक्टूबर के अंक मे प्रकाशित गंदे शहरों की सूची ने स्वच्छ भारत अभियान की जमीनी सच्चाइ को उजागर कर दिया. 2014 में सरकार और जनता दोनों ही झाडू हाथ मे लिये फोटो खिचवाते नजर आये लगा की स्वच्छ भारत का सपना बस अब थोडी ही दूर है पर इस रिपोर्ट से पता लगा की सपना तो हवा हो गया.
Image result for कचरादेश के प्रधानमंत्री ने इसे अपनी प्राथमिकताओं की लिस्ट बहुत उपर रखा था. हर दूसरे भाष्ण मे इसका जिक्र होता था यंहा तक की विदेशी धरती पर दिये भाषण मे उन्होने इस बात को जोरदार तरीक से रखा. उनकी इस बात को देश के असरदार लोगों ने सिर आंखो पर लिया और हर रोज कोइ ना कोइ हाथ में झाडू लिये फोटो खिचावाता नजर आने लगा. मिडिया मे लम्बी बहसे. जनता भी दिल से चाहती थी की उसका शहर से गंदगी  का नामोनिशान मिट जाये. इसके बावजूद एसा क्या हुआ की हालत सुधरने की बजाय बद से बदतर होते जा रहे है. लोग नाक पर रूमाल रखे कूडे के ढेर के बगल से निकलते रहते है, कुछ उन पर थूकते हुये तो कुछ उस पर और कूडा फेकते हुये निकल जाते है. छोटा सा ढेर बढा और बढा होता जाता है. लोग उस कचरे के ढेर को देखकर चिंता करते है और चिंता का चिंतन करते नजर आते है.  
रिपोर्ट से लगा की हमारे शहरों की नगर पालिकायें जिनके जिम्मे शहर की सफाइ का जिम्मा है संसाधन की कमी  से जूझ रही है. नगर पालिकाओं का एक महत्व पूर्ण कार्य शहर को साफ रखना है. उसके लिये उसे हर घर से कूडा जमा करना, गली महोल्लों के सडकों को साफ रखना, नालीयों की नियमित सफाइ, और कचरे का सही निष्पादन करना होता है. रिपोर्ट से साफ की वो इस कार्य को करने नाकाम हो रहे है.
इस काम के लिये उन्होने सफाइ कर्मचारीयों की फोज रखी हुई है पर हर सरकारी महकमे की तरह यह भी इतने सफाइ कर्मचारीयों के बावजूद इनकी कमी से जूझ रहा है. क्या बात सिर्फ इतनी भर है. अगर एसी बात होती तो उस्का रास्ता तो आसानी से निकाला जा सकता है. कुछ समय पहले अमीर खान के शो से पता लगा की कुछ संस्र्थाये कूडा इकठठा करने और उसके निष्पादन का काम अपने हाथ मे लेना चहती थी और उसके बदले नगर पालिका को धेला खर्च करने की जगह उल्टा उन्हे इससे आमदनी होती पर उन्होने इसकी इजाजत नही दी,  क्योंकी एसा होने पर काली कमाइ का क्या होता. दो ट्रक कचरे को उठया जाता है और रजिस्टर में दर्ज होता है 10 ट्रक. हर दिन 300 से 400 टन कचरे का निष्पादन बताया जाता है और शहर से 100 टन कचरा भी नही उठाया जाता है.
चलो मान लिया की नगर पालिकाओं के पास इस कचरे को इकठठा करने की समुचित व्यव्स्था है तो भी कचरे को निष्पादन के नाम पर मात्र इसे लेंड फिल जोन मे भेज दिया जायेगा. इन लेंडफिल मे इसके पहाड बन जाते है और उस पर घूमती आवारा गाय, कुत्ते और कभी कभी गिद्ध नजर अ जाते है. जब इन लेंड्फिल जोन में ओर कचरा ना फेंका जा सके तो दूसरे लेंड फिल जोन की खोज होती है. प्रधान मंत्री के स्वच्छ भारत मिशन का यह तो मतलब नही हो सकता की कचरे को एक जगह से उठाओ और उसे दूसरी जगह फेंक दो.
अच्छा होता अगर स्वच्छ भारत के अभियान की शरूआत करने से पहले इसे पाइलेट प्रोजेक्ट के तरह कुछ गिने चुने शहरों पर लागू किया जाता. उन शहरों को केसे zero waste  बनाना है उस पर गंभीरत से सोचकर अमल किया जाता. उन शहरों मे इसे सफल बनाया जाता. उसमे लगने वाले श्रम और लागत का ठीक ठाक आकलन किया जाता.  उसके बाद इसे पूरे भरत में लागू करने के बारे मे सोचा जाता . उस मे जन भागीदारी के बारे मे खुलकर साफ साफ बताया जाता. नागरीकों मे उनकी भूमिका के बारे मे बताया जाता समझाया जाता..और यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती जब तक वो देश की आदत ना बन जाये. पर अफसोस यह मात्र राजनितिक बयान बाजी बनकर रह गया.
एक बात साफ है की स्वच्छ भारत अभियान की सफलता मात्र राज्य प्रायोजित कार्यक्रम से संभव नही है. इस मे जन भागीदारी बहुत जरूरी है. लोगों को समझाना होगा की केसे उनकी थोडी सी मदद से अधिंकांश कचरे को रिसायकिल किया जा सकता है. हम केसे 90% कचरे को अपने स्तर पर ही रिसाकिल कर सकते है. इस तरह से आप उसे आसानी से अतिरिक्त कमाइ का सधन बना सकते है. विशवास नही होता ना. पर ये आपकी थोडी सी जागरूकता और समझदारी से यह संभव है
क्या आपने कभी अपने घर और दुकान से निकलने वाले कचरे पर गोर किया है. इस लेख मे हम घरों और दुकानों से निकलने वाले कचरे के बारे मे बात करेगे. शहरो को गंदा करने में इस कचरे का सबसे बढा हाथ है. घर और दुकान से निकलने वाले कचरे मे मुख्यत:
1.      पैकिंग सामग्री जेसे प्लास्टिक, थर्मोकोल, पोलीथीन, प्लास्टिक रैपर, कागज, प्लास्टिक की बोतल इत्यादी.  
2.      कपडा,
3.      मिक्स कचरा जेसे टेट्रा पैक, use and thro rajor blades  
4.      मैटल दवाइयों के एल्यूमिनियम रैपर, कोला केन, स्प्रे केन इत्यादी ), तार इत्यादी
5.      गिलास
6.      खतरनाक रसायन जेसे बैटरी, CFL, दवाइयां, CFL
7.       इलेक्टानिक उपकरण,  
8.      ओरगेनिक पदार्थ ..जेसे फल और सब्जियों के छिलके, बचा हुआ खाने का समान
9.      धूल, मिट्टी,
10.  सेनेटरी नेपेकिन  

अगर इन सब को मिक्स कर दिया जाये तो हमारे लिये मुसीबत बन जाता है. अगर आप ने  इसे मिक्स कर दिया तो फिर इसको अलग करना बहुत मंहगा पडेगा. इसमे मोजूद CFL, बैटरी, और उसमे  मोजूद लेड और मरकरी जेसे खरतरनाक रसायन इसे जहर बना देते है. जो भू जल को दूषित कर वाप्स ह्मे ही नुकसान पहुचाता है. वंही एसा कचरा बिमारीयों के फेलने के वजह भी बन जाता है.  
Image result for कचराहमारी पहली जिम्मेदारी कचरे के प्रकार के अनुसार उसे अलग अलग रखना सीखे. इसके लिये अगली बार अपने भंगार वाले से इस बारे मे बात करे. अधिंकाश रिसायकिल किये जाने वाले कचरे को भंगारवाले आपसे अच्छी कीमत देकर खरीद लेते है. उसके लिये अगलीबार जब वो आप से भंगार खरीदने आये तो उपर दिये 10 प्रकार के कचरे के बारे मे बात करे. वो खुशी खुशी इसमे से अधिंकांश आपसे खरीदने के लिये राजी  हो जायेगा. उसकी सलाह के हिसाब से उसे अलग अलग रखे. इस तरह आप क्रमांक 1 से लेकर 7 तक कचरे का निष्पादन से आपको आमदनी होगी.
क्रमांक 8 और 9 से आसानी से खाद बनाया जा सकता है उसके लिये कोलोनी मे पार्क के एक निश्चित कोने मे गढा कर उसमे ओर्गेनिक कचरा डाले और उस के भर जाने के बाद उसे 4 से 5 महोने तक बंद लर दे. जिससे वो अपने आप खाद मे बदल सके. इस खाद को आसानी से अच्छी कीमत देकर बेचा जा सकता है. या फिर इस खाद को कोलोनी के रहवासी खुद भी इस्तेमाल अपने गार्डन मे कर सकते है. अगर किसी कारण से आप इसे खाद बनाने मे असमर्थ है तो किसी भी खाद बनाने वालों से संपर्क कर उसे आसानी से बेच सकते है.
आप अच्छी तरह समझ ले की मिक्स कचरा सब के लिये मुसीबत है. इसलिये कचरे को किसी भी हालत मे मिक्स ना होने दे. लोग अपनी जिम्मेदारी समझे और सामान खरीदने से पहले उस के निष्पादन के बारे मे सोच ले. जेसे खराब CFL, बैटरी, को केसे ठिकाने लगाना है. क्योंकी उनके द्वारा गलत तरिके किया गया निष्पादन ही जल स्रोतों के प्रदूषित होने का सबसे बढा कारण है.
नगर निगम अपने सफाइ कर्मचारी को मिक्स कचरा ना उठाने की सख्त हिदायत दे. ओर जो मिक्स कचरा दे उस पर जबर्दस्त फाइन लगाये. जिससे अगली बर वो एसा ना कर सके.
जागरूकता अभियान का मतलब हाथ मे झाडू लेकर फोटो खिचावाना नही होता.   खुद को रोल माडल बनाना होता है. मिडिया आम आदमी को इस अभियान मे उसके रोल को सही तरीक से समझाये. उन शहर और कस्बों को दिखाये जो बाकी से इस मामले मे बेहतर है. उसेसे बाकी लोगों मे भी कुछ करने का जज्बा जगेगा. उन्हे असफलता की जगह सफल हो चुके कार्यक्रमों की जानकारी देते रहनी होगी, जिससे वो उससे सबक ले सके. एक तरफ तो बेरोजगारी की बात कर रहे है और दूसरी तरफ शहर गंदा है क्योंकी काम करने वाले लोग नही है एसा विरोधाभास भारत मे ही संभव है.  


Monday, October 19, 2015

आपका RO आपको मुबारक

हे जिम्मेदार नागरिक,
मै जिम्मेदार नागरिक नही हू इसलिये इस मेल को जेसे का तेसा फार्वड ना कर कुछ लिखने की गुजारिश कर रहा हू. जनाब हम हजारों सालो से नदी तलाब का पानी पी रहे थे, इन नदी नालों को जिस तेजी  से आपने प्रदूषित किये है  वो तारीफे काबिल है. आपने अपने लिये तो RO की मांग कर दी. इन मे रह रहे जल जीव, इन पर पल रहे जीव उनका क्या...उनके लिये RO कंहा से लाओगे, अगर आपके लिये वो पानी जहर है तो उनके लिये भी जहर हुआ ना , या आप समझ बैठे है की इस संसार की  आप सर्वश्रेष्ठ रचना है और सिर्फ आपको जीने का अधिकार है पर आप भी उनके बिना अकेले कब तक !
आपकी शाही आदते नदी नालो को प्रदूषित करने का सबसे बडा कारण है पर जब बोतल बंद पानी मिल रहा है तो आपको  क्या चिंता है. आप लोग अपना मल मूत्र घर से बाहर बहाने के लिये सेकडो लीटर पानी बरबाद कर देते है, बिना ये सोचे की यही मल मूत्र नदी नालो को भी प्रदूषित कर रहा है. सेकडो टन साबुन रोज इस हसरत मे नदी नालो मे बहा देते है की उससे आप गोरे और सुदंर दिखाई देंगे.  कंही पर भी हग देगे ... मूत देगे...कचरा फेला देगे. प्लास्टिक की उडती पन्नीयां. नदी नालों को जाम करती ये पन्नीया उसका दोष भी आपको इन्ही पन्नीयों मे दिखाई दे रहा है इसलिये आप को अब कागज की थेलिया चाहिये. जिससे आपकी शाही आदते वेसी ही बनी रहे...क्योंकी आप तो इशवर की  बेहतरीन रचना है आपकी आदते या सोच खराब केसे हो सकती है
अभी हाल ही मे गणेश विसर्जन का नाजारा देखा एक छोटा सा तालाब और हजारों की भीड अपने अपने गणेश मूर्ति के साथ विसर्जन के लिये तैयार, लाख बताया , समझाया की POP की मूर्ति का इस्तेमाल नही करना है पर लोगों का क्या वो इसबार भी POP की सेकडो बढी-बढी मूर्तियों लेकर विसर्जन के लिये हाजिर थे. धार्मिक मामला था कोइ कुछ बोल भी नही सकता ओर तो ओर उनके हाथ मे पोलीथीन की छोटी बढी पूजा मे इस्तेमाल की हुई सामग्री से भरी. हजारों थेलिया थी उसे पोलीथीन समेत तालाब के फेंक दिया. कम से कम पोलीथीन तालाब मे फेंकने से बच सकते थे. पर एसा नही हुआ. एसा करने वाले पढे लिखे समझदार लोग थे जो गणेश विसर्जन बेंड बाजो के साथ कर रहे थे.  सच मानो ये वही सब लोग थे जो घरों मे RO का पानी पीते है. यही भीड अगर उस दिन तालाब साफ करने के लिये इकठ्ठी हुई होती तो नजारा कुछ ओर ही होता. बंदा नतमस्तक हो जाता, पर एसा हो ना सका.
प्रशासन नदारद था , वेसे अगर वो होता तो क्या कर लेता. यही लोग उसके विरोध मे उतर आते. क्या किसी को ये सब दिखाइ नही दे रहा था, सब को दिखाइ दे रहा था. पर बोले कोन,  टोके कोन,  समझाये कोन. नासमझ को समझाया जा सकता है, समझदार का क्या किया जाये. एक समय था जब इसी बदबूदार गंदे तालाब का  पानी  साफ हुआ करता था, पशु-पक्षी पानी पीते थे. तालाब जीवन था. अब वो मर रहा है. पर उन्हे क्या चिंता है. अगले गणेश उतस्व मे इससे ज्यादा गंदगी तालाब के हवाले कर देगे. उनके घरों मे तो RO है ना.  वेसे भी जिन लोगों ने गणेश की मूर्ति के  साइज को अपना शक्ति प्रदर्शन बना दिया हो. आस्था साइज से जुड गई हो भीड मूर्ति के साइज के हिसाब से जय जय कार करती हो , उनसे इस सब की उम्मीद केसे की जा सकती है.
अब ये दूसरा शगूफा,  असल कारण पर वार ना कर, सस्ते और मंहगे का रोना लेकर RO की बात कर रहे है. RO तकनीक आपको रामवाण नजर आ रही है, जो बोतल से सस्ता पानी देगी. क्या फर्क पडता है अगर RO तकनीक...50% से 60% पानी बरबाद कर देती हो. पीने वाले को वो साफ पानी दे रही है ना .

धन्य है दानवीर जिम्मेदार नागरिक जनता अरे हमारी बात छोडिये,  20 रूपये देना आपकी शान मे इजाफा करता है वरना आपके जेसों के लिये टीवी पर वो एड नही आता जिस मे एक ही बोतल से दूसरे के पीने से उसे पहला वाला चांटा मारता है और कारण बताया जाता है की उससे संक्रमण फेलता है ...वाह री लाजिक .. चुम्मा से संक्रमण नही फेलता पर बोतल से फेल जाता है...वाह जी वाह क्या बात है.

Monday, May 20, 2013

घुमक्कडी से आलोकिक आनंद






आज तनाव, दबाव व घोर कंपीटीशन में खुद फंसे आदमी के लिये जरूरी सुविधाओं की लम्बी लिस्ट है जिसे पाने के लिये हम् दिन रात पागल की तरह लगे रहते है और प्रकृति प्रांगण में उपलब्ध मुफ्त अलौकिक आनंद का रसपान करना भूल जाता है क्योंकी सुविधाओं के मामले में हम सब लकीर के फकीर हैं। हमें हर जगह हर तरह की सुविधाएं चाहिये। कुदरत ने हमें अनेक अनमोल व अद्वितीय सुविधाएं दी हैं। इनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। दूसरे इन सुविधाओं का विकल्प भी नहीं है। इस बात को एक ट्रेकर ही अच्छी तरह समझ सकता है.

इसलिये भौतिक आराम को थोडे समय के लिये भूलकर व्यस्त जीवन से अपने लिये भी समय निकालकर प्रकृति के आंगन में सहज जीवन के निर्मल आनंद का कभी कभी सौम्य उत्सव मनाना ही चाहिये जिससे प्रकृति ने हमे जो अनमोल सुविधायें दी है उन्हे पहचान सके और सच्चे दिल से उसे सहजने का प्रयास करे.

हमारे शहर के आस पास फैली प्रदूषण मुक्त नयनाभिराम हरियाली, नीले खुले आसमान में पक्षियों की चहचाहट से भरपूर संगीतमय सुंदर पर्यावरण. प्राकृतिक के सबसे बडे HD TV .पर 7.1 sound system से भी कंही बेहतर वो भी सब कुछ सहज और मुफ्त में। इसलिये जीवन से बिजनेस, मोबाइल, अंधी प्रतियोगिता व कमरे मे लगे छोटे से HD TV चैनल्स को तिलांजलि देकर अपने ट्रेकर्स साथियों के साथ ट्रेकिंग का आनंद लेते रहना चाहिये। इस तरह की ट्रेकिंग हमें प्रकृति के करीब ले आती है। वन्य जन्तुओं की बहुरंगी दुनिया में पहुंचकर एक नवीन ताजगी का एहसास होता है और अपनी सारी थकान मिटाकर हम खुद को फिर से तैयार कर लेते हैं जीवन की संघर्षमय यात्रा के लिये।

Friday, November 18, 2011

YHAI मेम्बर शिप क्यों!!!



YHAI मेम्बर शिप क्यों!!!




यूथ होस्टल एशोसियेशन आफ इन्डिया अनखोजे अनजाने या फिर जाने पहचाने लोकल ट्रेक राष्ट्रीय ट्रेक और साहस और रोमांच से भरपूर खेल कराती है...

  • क्या आप परिवार के साथ छुट्टीयां प्लान कर रहे हें?
  • क्या दोस्तों के साथ ट्रेकिंग या घूमने का प्रोग्राम बना रहे है?
  • क्या आप विदेश जा रहे है?
  • क्या आपका स्कूल विद्यार्थियों के लिये टूर पैकेज प्लान कर रहा हे?
  • या फिर ठहरने के लिये सस्ते पर साफ-सुथरे बजट होटल और होस्टल की तलाश है

फिर इंतिजार किस बात का यूथ होस्टल्स एसोसियेशन ओफ इंडिया के मेम्बर बन कर यह सब सभंव करें।

मेम्बर शिप के फायदे:
  • 48 से ज्यादा जगहों पर यूथ होस्टल के सस्ते होस्टल में ठहरने की सुविधा
  • यह मेम्बरशिप कार्ड पूरी दुनिया के बेहतरीन 4500 जगहों पर काम आता है
  • समय समय पर आयोजित होने वाले एडवेंचर और ट्रेकिंग प्रोग्राम में भाग ले सकते हे
  • निरुला रेस्टारेंट में YHAI मेम्बर को डीस्काउंट।
  • GTDC (Goa tourism development corporation) होटल में डीस्काउंट।
  • HPTDC (Himachal Pradesh Tourism Development Corporation) के होटल और ट्रासपोर्ट में डीस्काउंट।
  • UP (Run by UP State Tourism).ट्यूरिस्ट होटल के होटल और ट्रासपोर्ट में डीस्काउंट।

 मेम्बरशिप की विभिन्न दरें जानने के लिये YHAI साईट पर क्लिक करे

मेम्बरशिप लेने के लिये मेम्बरशिप फार्म डाउनलोड कर उसे पूरी तरह भरकर एवं उसके साथ

• 1-फोटो ( 2फोटो लाइफ मेम्बरशिप के लिये)
• मेम्बरशिप शुल्क का डिमांड ड्राफ्ट in favour of "YOUTH HOSTELS ASSOCIATION OF INDIA" payable at New Delhi.
• Identity cum address proof के लिये (पासपोर्ट , वोटर कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस की फोटो कोपी जरूरी है

यूथ होस्टल्स एसोसियेशन ओफ इंडिया , बी एच ई एल भोपाल यूनिट की सदस्यता पाने के लिये आप भरा हुआ फार्म  नीचे दिये पते पर जमा कर सकते है-

 यूथ होस्टल्स एसोसियेशन ओफ इंडिया

 बी एच ई एल भोपाल यूनिट
कार्यालय: 05/N-3/'D'-सेक्टर बरखेडा भोपाल-462021
मेल: yhaibhel@bhelbpl.co.in