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Saturday, May 28, 2011

विश्व पर्यावरण दिवस...क्या अहमियत है इसकी?


पूरे विश्व का आर्थिक तंत्र इस समय भोगवाद पर टिका है । अधिक से अधिक उपभोक्ता सामग्री बाजार में उतारो, लोगों को उत्पादों के प्रति विज्ञापनों द्वारा आकर्षित करो, उन्हें उन उत्पादों का आदी बना डालो, हर हाल में जीवन सुखमय बनाना है, और सुख की परिभाषा जब् बजार तय करता हो तो यह एक मजाक ही लगता है कि एक तरफ पर्यावरण बचाने का संदेश फैलाया जा रहा है, और दूसरी ओर लोगों को अधिकाधिक कारें खरीदने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कार से मेरा मतलब उन तमाम चीजों से है जो लोगों को दैहिक सुख प्रदान करती हैं


एसे मे विश्व पर्यावरण दिवस, ऐसा ही एक दिवस जो दुनिया वालों को याद दिलाता है कि उन्हें इस धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखना है, उसे अधिक बिगड़ने से रोकना है, उसे इस रूप में बनाए रखना है कि आने वाली पीढ़ियां उसमें जी सकें । मैं पर्यावरण के प्रति समर्पित विश्व नागरिकों की सफलता की कामना करता हूं । और यह भी कामना करता हूं कि भविष्य की अभी अजन्मी पीढ़ियों को पर्यावरण जनित कष्ट न भुगतने पड़ें।

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Friday, March 4, 2011

6500 मिलियन इंसान जय हो!


6500 मिलियन की इंसान की आबादी से लदा यह ग्रह बहुत तेजी से बदल रहा है. इस बदलाव में हम इंसानो का बहुत बडा हाथ है. जंगल के कटने से और प्राकृतिक स्रोतो का अत्यधिक दोहन से अब हम सब संकट में है.  हमारा ग्रह अब पहले जेसा नहीं रहा वो तेजी से बदल रहा है. यह सच है की जंगल खत्म हो रहे है यह भी सच है की हमने अपने रहने के लिये और खाने के लिये इन्हे बुरी तरह बरबाद किया...अगर हम यह नहीं करते तो क्या करते...6500 मिलियन लोगो को खाने और रहने के लिये यह सब शायद जरूरी था. हम मानते है की हम इसकी बरबादी का कारण गये है.


पर क्या सिर्फ हम! हम ही नहीं ब्रह्मांड की और भी बहुत सी ताकते इस ग्रह को बदल रही है सच तो यह है की हम इसे बदले या ना बदले इसे तो बदलना ही है .इसलिये हमे हर परस्थिति में जीना सीखना होगा. हम में से कुछ लोग सहारा रेगीस्तान और साइबेरिया जेसी विषम परिस्थतियों और भीषण प्रदूषण में जी रहे है. यही वो लोग होंगे जो बदली हुई परस्थिति में जिंदा रह पायेगे.

जल्दी ही  10000 मिलियन का आकडा पार कर लेगे. इतनी बढी आबादी को खाना, रहना, ....यह सब इतना आसान नहीं है. हम इंसानों ने जिंदा रहने की जिद्दो जहद में बहुत कुछ सीखा है और लगातार हम हर दिन कुछ ना कुछ नया सीख रहे है...नेये उर्जा स्रोत पता करने, नया खाना..., वो समय दूर नहीं जब हम घास को खाने लायक बना देगें. सीधे मिट्टी से हमारी फेक्ट्रीयां  पेड़ पोधों की तरह खाना बाना सकेगीं.

हमारे लिये जगह की कमी होने वाली है इसलिये हम नये रहने विकल्प तलाश कर रहे है अब वो चाहे समुद्र के अदंर हो या सागर की लहरों पर तेरता शहर. हम जल्द ही अतिंरिक्ष और दूसरे ग्रहों को भी रहने लायक बना लेगे. हमे नहीं मालुम यह सब कैसे होगा, पर हम करेगे यह हमे मालुम है.

हम ही क्या जानवर भी अपने को बदलने में लगे हुये है ...अगर वो अपने को नही बदलेगे तो इतिहास बन जायेगे ...देखा नहीं आपने गाय भी अब हमारे द्वारा छोडा गया सडा गला खाना  सीख रही है, हो सकता है वो जल्द ही  प्लास्टिक को भी पचाने लगे. जंगली जानवर शहर की ओर भाग रहे ...अब अगर शेर को जीना है तो उसे हमारे साथ रहना सीखना होगा, वेसे ही जेसे कुत्तों ने हमारे साथ जीना सीखा. ...अरे आप तो बुरा मान गये.

अब हम सिर्फ शेर के लिये तो जंगल बचाने से रहे...अगर शेर को जिंदा रहना है तो उसे भी बदलना होगा.
सब कुछ बहुत तेजी से घट रहा है. जो विकास हजारों सालों मे नही हो सका वो हमने कुछ दशकों मे कर दिया. समय और लोगों के बीच की दूरिया कम होती जा रही है.  इसलिये आम अदमी दुविधा मे है. समय के साथ यह दुविधा खत्म होती जायेगी. क्योंकी समय के चक्र को उल्टा घुमाना अभी तो असंभव है. इसलिये हमें अपने को बदलते समय के साथ खुद को बदलते रहना होगा अब चाहे वो बदलना जीवन मूल्यों का ही क्यों ना हो!

Sunday, February 20, 2011

सफाइ और बिमारी

हर भोजन के बाद दांतों को ब्रुश करना हो सकता है दांतों के लिये हानिकारक यह हम नहीं अब यह बात टूथपेस्ट बनाने वाली एक कम्पनी बोल रही है. अब तक ये माना जाता था कि खाने के बाद पानी से कुल्ली कर लेने के बाद भी भोजन के कण दांतों के बीच फंसे रह जाते है और वहां सड़कर बैक्टीरिया पनपने की वजह बनते है इसलिये भोजन के बाद दांतों को भली प्रकार टूथपेस्ट और ब्रुश से साफ करने की सलाह दी।


अब टूथपेस्ट बनाने वाली ओर कम्पनी के सहयोग से किये गये एक शोध में पाया गया है कि ऐसा करना दांतों की ऊपरी चमकीली सफेद और सख्त परत ‘ इनेमिल’ के लिये हानिकारक हो सकता है। भोजन और कार्बो नेटेड पेयों के अन्दर उपस्थिति अम्ल भोजन के समय इस इनेमेल को कमजोर कर देते हैं। इस समय यदि ब्रुश कर लिया जाये तो इस कमजोर इनेमेल पर खरोंचें पड़ जातीं हैं और बार-बार ऐसा करने पर इसको गम्भीर नुकसान पहुंचता है। कार्बोनेटेड पेय पीते हैं या कोई खट्टा फल यथा मौसमी सन्तरा नीबू आदि दांतों की मदद से काट कर खाते हैं तो उसमें उपस्थित अम्ल भी दांतों के इनेमेल को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में यदि ऊपर से ब्रुश कर लिया जाये तो इस कमजोर हुये इनेमेल को काफी नुकसान पहुंचता है। अत: भोजन के बाद , विशेषकर उस भोजन या पेय जिसमें अम्ल की मात्रा ज्यादा हो यथा खट्टे फल, कार्बो नेटेड पेय, सॉस, केचअप आदि के बाद तुरंत ब्रुश नहीं करना चाहिये। अच्छा होगा की उसके बाद आप पानी से अच्छी तरह कुल्ला कर ले. फलों के रस या कोल्ड ड्रिंक आदि स्ट्रा से पियें और स्ट्रा को भी थोड़ा ज्यादा मुंह के अन्दर रखें ताकि पेय दांतों की ऊपरी सतह को न छुये।

इन पागलों को इतने दिन बाद यह बात समझ आई. अब हमारे लोगों को यह बात कब समझ आयेगी की टूथ पेस्ट या साबुन इतना जरूरी नहीं है. हम मुह को अच्छी तरह पानी से और उँगली का इस्तेमाल से कुल्ला करके या नीम की दातुन से भी भी वही ताजगी पा सकते है.

यही सवाल अब मेरा उन लोगों से हे जो साबुन से मल मल कर नहाते है और यही टनों साबुन दिनों दिन भुमीगत स्रोंतों या फिर नदी नालों में घुलकर हम सब के लिये जहर बन रहा है. यह सच है की साबुन हमारे शरीर से गंदगी हटाने मे मदद करता है. पर केसी गंदगी और कोन सी गंदगी. अकसर हम भ्रामक विज्ञापनों के जाल मे फंसकर अपने को गोरा और चिकना बनाने के चक्कर मे इन साबुनों को अपने बदन पर घिसते रहते है. नतीजा कई बार हम त्वाचा को गंभीर क्षती पहुचा देते है. उस पर मोजूद तेलिय ग्रंथी जो त्वाचा मे जरूरी नमी बनाये रखने मे मदद करती है उसे नुकसान पहुचा देते है.

जिस्म को सिर्फ पानी से मालिश कर उतनी ताजगी और सफाइ पा सकते है जितना हम साबुन मलकर पाते है. सच तो यह है की साबुन कुछ विशेष परिस्थति में ही इस्तेमाल होना चाहिये. जेसे अगर बदन पर ग्रीस या तेल लगा हो तो बेशक आप साबुन इस्तेमाल करे पर हम तो आदत से मजबूर झूठे प्रचार के कारण मल मल कर साबुन से नहाते है की वो हमे गोरा और हमारी काया को कचंन बना देगा. फायदे से ज्यादा अपनी त्वचा का नुकसान करते है.

अब बोलोगे की साबुन से नहीं नहायेगे तो बदन से बदबू कैसे आयेगी ...? अब ये किस ने कह दिया की साबुन बदबू भी भगाता है. वो भले ही त्वाचा की बदबू को कुछ देर के लिये कम कर भी दे. पर अदंर की बदबू का क्या करोगे! असल मे वो बदबू भगाता नहीं बदबू छुपाता है. अरे पहले सिर्फ पानी से अच्छी तरहा नहा कर तो देखो पानी मसाज करके देखो. कम से कम 5 मिनिट तक मसाज और उसका असर देखो.

अरे चाहो तो बदबू भगाने के लिये अलग से सेंट लगा लो. असल में साबुन भी यही करता है! हमारे यहां उमस भरी गर्मी और पसीने के कारण हालत खराब हो जाती है..पर उसके लिये हर बार साबुन लगाने की जरूरत नहीं है. यह सलाह में साबुन के पैसे बचाने के लिये नहीं दे रहा हू. वेसे भी अगर यह पेसे बच भी जाये तो किसी अच्छे काम के लगा सकते है. पर इस साबुन की गुलामी से अपने को मुक्त करके देखो.

मानो या ना मानो पर यह सच है कि में नहाने के लिये साबुन का इस्तेमाल ना के बाराबर किया जा सकता है. इसका आपकी बदबू भगाने या ताजगी से कोइ सीधा रिश्ता नहीं है. बदबू की कई दूसरी वजह भी हो सकती है. त्वाचा और दाँत के लिये डाक्टर से अलग से राय ली जा सकती है..खाने के बाद अच्छी तरह पानी के साथ कुल्ला करने से ज्यादा फायदा है.

साबुन का अपना महत्व है. इसलिये जब बहुत जरूरी हो तभी इसका इस्तेमाल करे.

अब यह वहम की साबुन बेक्टीरिया मारता है, हम सब को लुई पास्चर बना रहा है. साबुन से बेक्टीरिया कम होते हो? पर कितनी देर के लिये. ये तो हवा की तरह हमारे चारो और मोजूद है. खुद बेक्ट्रिया के वहम से लुई पास्चर 65 साल की जवानी में ही खुदा को प्यारा हो गये थे.

देखा जाये तो डिटोल साबुन की एक बोतल पूरे परिवार को साल भर के लिये काफी होनी चाहिये.

हां कपडे जरूर साबुन से धोने की मजबूरी है..पर उस पर भी खोज जारी है एसे कपडे की जो  शरीर के लिये आरामदेह हो और बिना साबुन के साफ होता हो अच्छा हो की पानी की भी जरूरत ना हो ऐसा कुछ की हवा के प्रेशर से ही वो साफ हो जाये. सोचो अगर ऐसा हो जाये तो हमारी पानी और प्रदूषण की कीतनी समस्या हल हो जायेगी....

जो बच्चे मिट्टी के साथ खेलते है उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली जो बच्चे मिट्टी के साथ नहीं खेलते उनसे बहेतर  होती है। इसलिये अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को ताकतवर बनाए. पर उसके लिये हर बार साबुन की जरूरत नहीं है.

मुझे अकसर सिरफिरे सफाइ पसंद यात्री ट्रेन में सफर करते मिल जाते है जो खिड़की का परदा भी रुमाल से पकडकर खिसकाते है कि पता नहीं कैसे कैसे हाथोँ ने उसे छुआ होगा. बेड रोल की चादर से सीट साफ करते है और फिर अपने साथ लाइ हुई चादर बिछाते है. और दूसरोँ के लिये अपनी गदंगी फेलाकर चले जाते है. अकसर एसे लोगोँ से मेरी कहासुनी हो जाती है. जब भी कोई ऐसा मिल जाता है तो उनकी जम कर क्लास लेता हू. उन्हे एसे एसे सफाइ भरे किस्से सुनाता हू की उन्हे अपने आप से घिन आने लगती है.

शायद उन्हे मालूम नहीं कि टायलेट सीट से ज्यादा जीवाणुओ का घनत्व  मोबाइल या कम्प्यूटर की बोर्ड पर हो सकती है. Stuffed toys या फिर एसी ही चीजेँ जीवाणुओ से भरें हो सकते है. इसलिए एसा  विश्वास विकसित करें कि आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली आपके शरीर की देखभाल करने में सक्षम है। और ये रोगाणु आपको तब तक नुकसान नहीं पहुंचाएंगे जब तक आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली अच्छी  हो।

बेशक रोकथाम इलाज से बेहतर है लेकिन आपको रोकथाम के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है?

हमे पब्लिक प्लेस की सफाइ का भी उतना ही ख्याल रखना चाहिये जेसा हम अपने लिये चाह्ते है कम से कम उसे और गंदा नहीं करे. आपकी अपने खुद की इस तरह की सफाइ का कोइ मतलब नहीं होता जब आपके आस पास गंदगी और खाने पीने के सामान में बेशर्मी की हद तक मिलावट हो.

पानी बचाइये…पानी कमाइये

पानी हमेशा से एक सामुदायिक संपत्ति रहा है। पुराने समय में पानी लेने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी क्योंकी इसके लिये नदी और तालाब जेसे स्रोतों के पास जाना पडता था या कुओं, बावडी, से पानी खीचना पडता था, लेकिन आधुनिक सदी में घर में पानी के सीधे पाइप से पहुंचा दिया। इससे हमारी मानसिकता में भी बदलाव आ गया। अब हम बड़ी आसानी से पानी ले लेते हैं। पानी का इतनी आसानी से मिल जाने से ही पानी की बरबादी शुरू हुई। इसका नतीजा ये हुआ की भूमिगत जलस्तर घट रहा है, हैंडपंपों में पानी खत्म हो रहा है। कुएं और बाबडी सूख रहे है. हमारी नादानियों के कारण पानी के मूल स्रोत नदी और तालाब और भूमिगत जल प्रदूषित हो रहे है.
महानगरों की आबादी का दबाब के कारण नलों में पानी हमेशा नहीं रहेगा। पानी की कमी के लिए लोग खुद जिम्मेदार हैं, उन्हें सीखना चाहिए कि पानी को कैसे और कितना इस्तेमाल करना है। पहले हैंडपंप से या कुओं से पानी खींचकर लोग सिमित पानी इस्तेमाल करते थे. खर्च हुये पानी की भरपाइ मानसून से हो जाया करती थी, लेकिन अब तो घरों में नल और फव्वारों से बेशर्मी की हद तक बरबादी होती है. पूरा का पूरा शहर भूमिगत जल से पानी लेकर उसे पीने और नहाने धोने का कार्य कर रहा है. उसका असर यह हुआ की भूजल तेजी से नीचे जा रहा है. किसी शहर में पानी की कमी होना एक भयावह स्थिति है। अगर हमारे पास पानी ही नहीं होगा तो 8-9 फीसदी आर्थिक विकास की बातें करना सब बेमानी ही है। कारखाने बंद हो सकते हैं। बड़ी मात्रा में विस्थापन हो सकता है।
ठीक है कुछ शहरों में ऐसी स्थिति हो सकती है जहां पानी थोड़ा-थोड़ा टुकड़ों में मिलता रहे पर बाकी शहरों में तो स्थिति भयावह ही होगी। इतिहास में एसे बहुत से शहर और सभ्यताए दर्ज है जो पानी की कमी की वजह से ही खत्म हो गये। पानी के लिए युध्द, शायद आज असंगत लगे पर जरा सोचिये, अगर हमारे शहर में दो तीन वर्ष लगातार मानसून धोखा दे जाये? आप देख रहे हैं कि आज गली महोल्लों में पानी के मारामारी तो मची रहती है, या फिर तमिलनाडू और कर्नाटक का जल विवाद हो या भारत-पाक जल विवाद हो या मलेशिया और सिंगापुर के बीच भी पानी को विवाद इसे लेकर संबंधों में तनाव स्थिति पहले से और खराब होती जा रही है.
अगर किसी ने 50 साल पहले कहा होता की एक दिन लोग पानी को बोतलबंद करके अच्छे दामों पर बेचेंगे तो शायद उसे लोग पागल समझते। लेकिन आज हो रहा है। पानी का निजीकरण हो रहा है। ऐसे में ही पानी की कालाबाजारी शुरू होती है। लोगों का शोषण और नियंत्रण करने के लिए पानी का इस्तेमाल होगा। आम आदमी पानी की कमी की मार झेल रहा है, जबकि दूसरी ओर पांच-सितारा होटलों में लोग आधे-आधे घंटे तक नहाते रहते हैं। यानी अगर आपके पास पैसा है तो आज आप पानी खरीद कर उसे बरबाद कर सकते है, पर वो दिन अब दूर नहीं जब पैसा भी पानी को नही खरीद पायेगा.
पानी की बरबादी रोकने के लिये और उसका एक समान वितरण के लिये सरकार द्वरा जल कर पूर्ण समाधान नहीं हो सकता क्योंकी यह पक्षपात पूर्ण है. इससे सिर्फ पैसे वाले लोग ही पानी को खरीदेंगे, जो पानी का मूल्य नहीं चुका पायेगे उन्हें यह नहीं मिल पाएगा। यह तो अन्याय होगा क्योंकी पानी तो एक बुनियादी जरूरत है.
ठीक है कुछ शहरों में ऐसी स्थिति हो सकती है जहां पानी थोड़ा-थोड़ा टुकड़ों में मिलता रहे पर बाकी शहरों में तो स्थिति भयावह ही होगी। पानी ज्यादा मात्रा में उपलब्ध नहीं है। पानी की समस्या का समाधान जल सरंक्षण, पानी को रिसाइकिल (परिशोधन), पानी का बुद्धीपूर्ण इस्तेमाल है, गंदे पानी को इस तरह रिसाइकिल (परिशोधन) किया जाना चाहिये की वो पीने के योग्य बन जाये. सिंगापुर इसका एक अच्छा उदाहरण है वहां गंदे पानी को रिसाइकिल (परिशोधन) किया जा रहा है और एक टी.वी. पर प्रसारित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री जी वही परिशोधित पानी पिया था।
पानी का अधिक उपयोग सफाइ और धुलाइ में होता है. हमे उसके विकल्प को बढावा देना होगा. जो इस काम में पानी का कम से कम उपयोग सुनिश्चित कर सके. जेसे एरीयेटेड वाटर (हवा और पानी मिश्रित) वाले नल और शावर. एरीयेटेड वाटर पानी की खपत को सीधे 40% तक कम कर सकता है. हमे इजराइल जेसे देश से कम से कम पानी में खेती करने की तकनीक सीखनी चाहिये. जंगल और खनिज की तरह भूमिगत जल भी देश की संपत्ति मानकर इसके दोहन को नियंत्रित करना चाहिये. जल हार्वेस्टींग को विकल्प के तोर पर ना देखकर उसे गंभीरता से लेना चाहिये.
हम कार्बन पाइंट की तरह ही जल पाइंट अपनाकर पानी खर्चने की सीमा तय कर सकते है उससे ज्यादा खर्च करने वाले को फाइन और उससे कम खर्च करने वाले को प्रोत्साहन देने के लिये उसे इनाम दे सकते है वेसे ही जेसे कार्बन पाईंट दुनिया भर में उद्योग कमा रहे है इस विचार को आम जनता के बीच प्रचलन में लाना चाहिये जिससे कम से कम पानी के इस्तेमाल के लिये सभी प्रोत्साहित हो सके. पानी बचाना मतलब पैसा कमाना।

Sunday, June 13, 2010

हरित शौचालयः ईको फ्रैंडली टॉयलेट

आजकल सामान्य तौर पर उपयोग किये जाने वाले आधुनिक शौचालय (फ़्लश वाले शौचालय) का आविष्कार हुए सम्भवतः सौ वर्ष हो चुके हैं, हालांकि इस बात पर मतभेद हो सकते हैं, क्योंकि यह पता नहीं है कि फ़्लश शौचालय का आविष्कार असल में किसने और कब किया होगा। बहरहाल, करोड़ों लोगों के लिये जिन्हें रोजमर्रा के जीवन में यह फ़्लश शौचालय की सुविधा आसानी से हासिल है, और करोड़ों ऐसे भी लोग, जिन्हें यह आधुनिक सुविधा हासिल नहीं है, उन सभी के लिये एक मिनट रुककर सोचने का अवसर है कि लाखों टन प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले “मानवजनित अपशिष्ट” के भविष्य के बारे में चिंता की जाए। क्या फ़्लश शौचालय उपयुक्त है? खासकर उस स्थिति में जबकि हमें यह पता हो कि थोड़े से अपशिष्ट को भी ठिकाने लगाने और हमारी आँखों और दिमाग से दूर हटाने के लिये बड़ी मात्रा में पानी लगाना पड़ता है।इसका उत्तर अलग-अलग हो सकता है। सच तो यही है कि भले ही फ़्लश शौचालयों ने हमें एक अद्वितीय सुविधा प्रदान की है, लेकिन पिछली शताब्दी में ये शौचालय, पर्यावरण स्वच्छता और आर्थिक बोझ के रूप में एक बुरा सपना ही साबित हुए हैं। इस मानव अपशिष्ट को उपचार संयंत्रों तक ले जाने वाली, पानीदार विशालकाय संरचनायें एक तरफ़ जहाँ निर्माण में बर्बादी की कगार तक महंगी हैं वहीं दूसरी ओर उनका रखरखाव भी बहुत खर्चीला है। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि अमेरिका और यूरोप के पुराने सीवेज पाइप लाइनों को अगर दुरुस्त करना हो अथवा बदलना हो तो तत्काल लाखों डालरों की आवश्यकता होगी। कोई नहीं जानता कि इतना पैसा कहाँ से और कैसे आयेगा? इससे भी बदतर स्थिति यह है कि अचानक आये हुए तूफ़ानों और बाढ़ के चलते सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट (मलजल उपचार संयंत्र) पानी की अधिकता के कारण काम करना बन्द कर देते हैं, उस स्थिति में मलजल को बिना उपचार के नदियों अथवा समुद्र में ऐसे ही छोड़ने के अलावा कोई और रास्ता शेष नहीं होता। इस बारे में भारत में मौजूद व्यवस्था के बारे में कहना बेकार ही है। बिना उपचारित किया हुए मलजल का प्रदूषण, ज़मीन और भूमिगत जल पर कितना गहरा असर डालता है? न सिर्फ़ यह मलजल हमारे कुँओं, बावड़ियों, नहरों और नदियों के पानी को नाइट्रेट और पैथोजन्स से प्रदूषित करता है, वरन जब यह समुद्र में पहुँचता है तब समुद्री जल-जीवन और मूंगा की चट्टानों को घातक रूप से प्रभावित करता है। सब जानते हैं कि दिल्ली के नज़दीक से बहने वाली पवित्र यमुना नदी को हमने कैसे एक “राष्ट्रीय नाला” बनाकर रख दिया है। विडम्बना यह है कि जिसे हम “अपशिष्ट” या बेकार समझकर दूर-दूर नदियों और समुद्रों में छोड़ देते हैं, बहा आते हैं, वैज्ञानिक शोधों द्वारा अब यह साबित हो चुका है कि असल में वह अपशिष्ट मिट्टी और ज़मीन के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के लिये उपयोगी मित्र साबित हो सकता है। क्या अब हम पुराने “चेम्बर पॉट” सिस्टम पर लौट सकते हैं? क्या शहरी जनता की “सुविधा” को तकलीफ़ में न बदलते हुए भी इस दिशा में कुछ किया जा सकता है? आर्थिक योजनाकारों, नीतिनियंताओं और यहाँ तक कि बड़े-बड़े पर्यावरणविदों के लिये भी जनता को इस बारे में समझाना मुश्किल है, खासकर शहरी जनता को, कि अब वे लोग फ़्लश टायलेट का उपयोग बन्द करके पुराने तरीके पर लौटें।चाहे तरल हो या ठोस रूप में, मानव अपशिष्ट के द्वारा एक उत्तम किस्म का उर्वरक बनाया जा सकता है, इसी प्रकार मानव मूत्र जिसे वैज्ञानिक सभ्य भाषा में ALW अर्थात “एंथ्रोपोजेनिक लिक्विड वेस्ट” कहा जाता है, वह भी अपने एंटीबैक्टीरियल गुणों के लिये जाना जाता है। बजाय इसके कि इस बेहतरीन उर्वरक का उपयोग मानव प्रजाति की खाद्य सुरक्षा में किया जाये, हमने करोड़ों डालर कृत्रिम उर्वरक बनाने के कारखानों में लगा दिये हैं, ऐसे उर्वरक जो प्रकृति ने पहले से ही मानव शरीर द्वारा निर्मित करके दिये हैं। ज़ाहिर है कि हमें इस समस्या को नये सिरे से देखने की आवश्यकता है, क्या अब हम पुराने “चेम्बर पॉट” सिस्टम पर लौट सकते हैं? क्या शहरी जनता की “सुविधा” को तकलीफ़ में न बदलते हुए भी इस दिशा में कुछ किया जा सकता है? आर्थिक योजनाकारों, नीतिनियंताओं और यहाँ तक कि बड़े-बड़े पर्यावरणविदों के लिये भी जनता को इस बारे में समझाना मुश्किल है, खासकर शहरी जनता को, कि अब वे लोग फ़्लश टायलेट का उपयोग बन्द करके पुराने तरीके पर लौटें। सो अब जबकि राष्ट्र एक नई शताब्दी में प्रवेश कर चुका है, सुरक्षित रूप से कचरा निपटान नहीं करने के कारण, सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्याओं पर पकड़ बनाने और स्वच्छता अभियान के विभिन्न लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये हमें आर्थिक रूप से सक्षम और पर्यावरण की दृष्टि से स्थाई व्यवस्था का निर्माण करना होगा। सच का सामना करना ही होगा कि दुनिया की लगभग ढाई अरब से भी अधिक उस आबादी के लिये, जिसे उचित सेनिटेशन और पानी मुहैया नहीं है, हमें भी एक पहल करनी होगा, हमें समझना होगा कि इस समस्या को हल्के से नहीं लेना चाहिये। विकल्प मौजूद हैं, बस उन पर काम करने की आवश्यकता है। “प्राकृतिक स्वच्छता” एक प्रकार का विशिष्ट प्रतिमान है जो अपशिष्ट को एक संसाधन में बदल सकता है। अधिक विस्तार में न जाते हुए सिर्फ़ यह जानें कि “ईको-सैन” पद्धति में पानी के उपयोग के बिना ही अपशिष्ट को उसके मूल स्रोत पर ही ठोस और तरल रूप में अलग-अलग कर दिया जाता है, और फ़िर उस अपशिष्ट को उपयोग करने लायक खाद में बदला जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस “ईको-सैन” कार्ययोजना को लागू करने और उसे लोकप्रिय करने में हमारी संस्था “अर्घ्यम” में हम इस दिशा में काम कर रहे हैं। इसी के साथ हम विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों को इस सिलसिले में शोध और ट्रेनिंग देने के लिए भी कह रहे हैं। हमारा ल्ष्यृ सामान्य तौर पर ऐसे छोटे किसान हैं जिनके पास पारम्परिक शौचालय नहीं हैं और उन्हें महंगे उर्वरक खरीदने में भी कठिनाई होती है। केले की खेती पर ALW के उत्तम उपयोग के प्रभाव को देखने के लिये आपको खुद ही देखना होगा तभी आप इस पर विश्वास करेंगे। एक किसान को आसानी से एक बार में ही इस “ईको-सैन” तकनीक के बारे में समझाया जा सकता है जो उसके उर्वरकों पर खर्च के हजारों रुपये तो बचायेगा ही साथ ही उसकी मिट्टी के उपजाऊपन को भी बरकरार रखेगा। यदि यह इतना ही आसान और प्रभावशाली हल है तो फ़िर क्यों नहीं यह तेजी से पूरे देश में लागू किया जा सकता, बल्कि समूचे विश्व में भी? लेकिन इस राह में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे जागरूकता, अच्छी डिजाइन, सरकार की नीतियाँ, आर्थिक और अन्य प्रोत्साहनों के साथ-साथ भारत जैसे देश में संस्कृति और जात-पात से भी जूझना पड़ेगा। “ईको-सैन” छोटे ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता प्रबन्धन का समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम है। हालांकि इनमें से कोई भी पूर्ण नहीं है, लेकिन हमें नई “ग्रीन अर्थव्यवस्था” बनाने हेतु विजेताओं की आवश्यकता है। ऐसे विजेता जो लगातार और आशावादी तरीके से आज के मार्केट आधारित सिस्टम पर खरे उतर सकें, लोगों को समझा सकें कि पर्यावरण बदलाव क्या है और हमें लम्बे समय तक टिकाऊ स्वच्छता पाने के लिये क्या-क्या करना चाहिये। “इन्द्रधनुषी सपनों का पीछा करने वालों को निश्चित रूप से अन्त में सोना हाथ लगता है। “