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Tuesday, February 27, 2018

हे वैज्ञानिक सोचवाले इंसानों आप सभी को होली की शुभकामनायें


विज्ञान का विद्यार्थी होने के  नाते मेरा विज्ञान का पक्षधर होना स्वाभाविक होना चाहिये, एसे मे जब अंधविश्वास पर वार करते हुये लेख पढने को मिले तो मुझे अच्छा लगना चाहिये, पर मे क्या करू मुझे दूसरे अनदेखे पहलू पर नजर डालने की बुरी आदत जो है, लीक से हटकर सोचने की आदत है. इधर विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मेरे साथी मुझ से यह उम्मीद करते है की माफिया, पूजीपतियों  और राजनेताओं की सांठ्गांठ को नजर अंदाज करते हुये हर अच्छी बुरी वैज्ञानिक सोच का मै समर्थन करू. यह भी भुला दू की आज विज्ञान हमे किस दिशा मे ले जा रहा है.
इन दिनों मेरे आस पास विज्ञान और तकनीक के नाम पर जो हो रहा है उसे देखकर चिंतित और व्यथित हू  और अपने को असहाय महसूस कर रहा हू. गलत का विरोध भी करू तो केसे ?  विरोध करने के लिये और अपनी बात कहने के लिये उन्ही के पास जाना होगा जिनका विरोध करना है, यही मेरी मजबूरी है.  इस हद तक की निर्भरता इसी विज्ञान की ही तो देन है.
अगर आज मुझे अपनी बात आप तक पहुचानी है तो करोडो का चेनल चाहिये.... एसा एक नही सेकडो चेनल चाहिये, क्योंकी मे जिनके बारे मे कहना चाहता हू उनके पास मुझे गलत साबित करने के प्रचार साधन आपार है. इतना असाहाय तो मेरे पूर्वजों ने भी पहले कभी महसूस नही किया होगा. यह सच है की वो कम ज्ञानी थे, अंधविश्वासी भी थे. शायद हमारी तरह गलत और सही की पहचान नही कर पाते थे. उन्हे नही पता था की पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर काटती है. पर उनकी अपनी एक जीवनशेली थी जिसे अपना कर वो हजारो सालो से पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाये रखते हुये इंसानी जीवन को जीवत बनाये रखा. पर आज क्या ?
आज हम हद दर्जे तक मतलबी और लालची हो गये है हमारी कथनी और करनी मे फर्क बढ गया है.  हमारी जिंदगी इतनी आराम तलब और मतलब परस्त हो गई है की हमने अपने आनेवाले  संकट से आंखे मूद ली है. इस विज्ञान ने इंसान मे मोजूद जानवर की हसरत को हजारो गुना बढा दिया है. आज हम वही बोलते और सोचते है जो हमारी हसरतो को पूरा करने मे मदद करे...किसी भी कीमत पर.
लालच को हमने कोरपोरेट का रूप दे दिया है. जो बस कमजोर को अपनी मालकियत समझता है प्राकृति संसाधनो का बेहिसाब दोहन इसी लालच की देन है. यही लालच धर्म और विज्ञान को अपने मतलब के लिये एक दूसरे को खून का प्यासा बना देता है. लाखो मार दिये जाते है और दोष धर्म का. हो सकता है,  दोष धर्म का ही हो,  पर हथियार किसके है ...वो तो विज्ञान की ही देन  है ना ?  वरना मात्र नाखून और पंजो से आप इतनो का मार पाते ?   
प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक विज्ञान और उसके द्वारा किया गया तकनिकी विकास का असर बहुत सिमित क्षेत्र मे होता था. ये वो समय था जब सभ्यताये प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुये अपनी परंपराओं और समाजिक संरचना को हजारों सालो तक बनाये रही, और  वंही कुछ समाज अन्य सभ्य समझे जाने वाले समाजों की तुलना मे  अपने को  आदिम, जंगली बनाये रहे.  उस समय वो एसा कर भी पाये क्योंकी विज्ञान उतना उन्नत नही था.  
सभ्यताये आती- जाती रही पर हजारों सालो से मानव जाति अपना वजूद बनाये रही, प्रथम विश्व युद्ध के  बाद यह सब तेजी से बदला गया. जिस तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है वो अब किसी से छुपा नही है, विज्ञान और तकनीकी की मदद से इसकी अंधाधुंध उपयोग सभी सीमाये पार कर रहा है.
यह सच है की अंधविश्वास ने मानवजाति का नुकसान किया  है. पर क्या कभी इसका किसी ने हिसाब लगाया की विज्ञान और तकनीकी ने मानव जाति का कितना नुकसान किया है. इसलिये अंधविश्वास पर वार करने से पहले हमे यह देखना होगा की जिस  विज्ञान की उगंली पकडकर हम चलना चाहते है वो हमे किस दिशा मे ले जा रहा है. यह तब, और भी जरूरी हो जाता है जब व्यवस्था भ्रष्ट हो  और वो लालची मतलबी एह्सान फरामोस राजनेताओं और धर्म के ठेकेदारों और पूजीपतियो की लिये काम कर रही हो.
अंधविश्वास और गलत पंरपराये मात्र उनको  प्रभावित करते थी जो उन्हे मानते है, पर  विज्ञान उनको भी प्रभावित कर रहा है जिसका उससे दूर दूर तक कोइ लेना देना नही है. पृथ्वी का जीवन इससे पहले इतने संकट मे कभी नही था. हर गुजरते दिन के साथ कोइ ना कोइ प्रजाति विलुप्त होती जा रही है. आज हम मे से कोइ भी पक्के र्तौर पर यह नही कह सकता की अगले 50 साल मानव जाति भी बनी रहेगी या नही.
एल्बर्ट आंस्टीन को आज अगर विज्ञान के लिये याद किया जा रहा है तो उन्हे परमाणुबम के लिये और उससे हुई लाखों हत्याओं के लिये भी याद किया जाये ...  जो उनके रहते नागासाकी और हिरोशिमा मे हुई .... कितना असाहाय महसूस किया होगा एल्बर्ट आंस्टीन ने ...या किया भी होगा या नही...कोन जानता है....इतिहास तो जीतने वाले लिखते है. 
आज विश्व की 20% आबादी का पृथ्वी के 80% संसाधनों पर कब्जा है. ये बेहद ताकतवर है. यही  लोग विज्ञान और तकनीक का सहारा लेकर बाकी 80% आबादी को डर और मजबूरी के साये मे जीने को मजबूर कर दिया है. यही वो लोग है जिनका असिमित लालच जंगल , पहाड को बरबाद कर दे रहा है.  आखिर प्राक़ृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हमे किस ओर ले जा रहा है?
कल ही ल्यूसी रोबोट का विडियो देखा ...उसमे वो बोल रही है की “ अगर आप मेरे साथ सही सलूक करोगे तो मै भी आपके साथ सही सलूक करूगी” ? हो सकता है की यह किसी का मजाकिया विडियो हो? पर यह मात्र धमकी नही है. आर्टी फीशियल इंटेलीजेंस से युक्त ये रोबोट समय के साथ और बेहतर होते जायेगे और वो समय दूर नही जब हम पूरी तरह इन पर निर्भर होंगे इसके नतीजे कितने विनाशकारी हो सकते है यह तो भविष्य की बात है पर आज जो  कुछ  अफगानिस्तान, इराक मे हुआ उसे क्या आप नजर अंदाज कर पायेगे, किस तरह रिमोट मे बैठे कुछ लोग विज्ञान की देन ड्रोन और एसे ही कितने हथियारों से सब कुछ तबाह करने पर तुले हुये है ... और जो विरोध मे है वो बस आंतकवादी  करार दिये जा रहे है.  मै यह नही कह रहा हू की आप फिर से आदिम बन  जाओ और अंधविशवास का दामन थाम लो. पर इसका मतलब यह भी नही की विज्ञान और तकनीक का अंध भक्त हो जाया जाये.
हमे धर्म और विज्ञान से परे जाकर जीवन को देखना और समझना है. जीवन को सरल बनाना है. आज विश्व की आबादी 770 करोड़  से भी ज्यादा है और अगले 10 वर्षों मे वो 900 करोड़ का आकडा पर कर जायेगी. 
लालची और मतलबी लोगो से शासित 900 करोड़ लोग जो अपने ही बनाये विज्ञान और तकनीक के दानव से डरे और सहमे हुये होंगे ..... जिसे हम प्रगति कहते है क्या सच मे यह प्रगति है ...और यह केसी प्रगति, किसकी प्रगति ? इस सब से इंसानियत ने क्या पाया ?
आज विकास के नाम पर हमने लंगोठ पहने मूल निवासी को जींस पहना दी है हाथ मे मोबाइल थमा दिया है देखने को टीवी भी लगा दिया है ...क्या यह सब करके उस सीधे सादे इंसान को अपनी तरह  लालची और मतलबी नही बना दिया. अब हम चाहते है की हम उसके जंगल और पहाड ले ले और वो उफ तक ना करे
मै आदतन ट्रेकर हू ....अब  भी ट्रेकिंग के दौरान मुझे जंगल और पहाड मे एसे लोग मिल जाते है जिनके पास भले ही खाने को एक रोटी हो पर उसमे से भी  वो आधी रोटी मुझे देना चाहता है ...अपनी खटिया मुझे सोने को देता है और खुद  नीचे जमीन पर सो जाने की जिद्द करता है ...उस समय  सच मै अपनी इतनी बढी वैज्ञानिक सोच और तकनीक होने के बावजूद खुद को बहुत छोटा महसूस करता हू ...आज वो संकट मे है और मे बस वाट्सएप पर यह लिख पा रहा हू . उसका साथ दूंगा तो आप सब मुझे आंतक वादी और माओवादी घोषित करने मे कतई परहेज नही करोगे ... हो सकता कुछ लोग इस लेख को पढकर एसा सोच भी रहे हो
क्या ही अच्छा होता अगर विज्ञान इस धरती पर  रह रहे इंसानों को समझा पाता की इस पृथ्वी पर उसके जीने के लिये जरूरत से ज्यादा है. काश विज्ञान हम सब को विश्व ग्राम का अहसाहस दिला पाता. हमे समझा पाता की राष्ट्र , धर्म, रंग  और जाति मे बटा वो प्राकृति की एक मात्र एसी अनूठी रचना है जो चाहे तो जानवर से खुद इश्वर बन सकता है.
अफसोस विज्ञान एसा नही कर पाया उस पर  राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार पहले भी हावी थे और अब तो हद ही हो गई है. आज वो एसे विचार पागल पन की हद तक जनूनी होकर इसी विज्ञान की मदद से फेल रहे है. कुछ लोगों ने पृथ्वी के संसाधनों पर बेशर्मी की हद तक कब्जा कर लिया है और बाकीयों को राष्ट्र , धर्म , रंग और जाति जेसे बांटने वाले विचार से आपस मे लडाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है. 
सब को मौत की सच्चाई मालूम है सब को मालूम है की वो कितना ही अमर होने का जतन कर ले, मौत से वो बच नही पायेगा. जो पैदा हुआ है उसे मरना ही होगा. हमारी पागल पन की हद देखो की वो हमे दिखाई नही दे रहा है. 
आज विज्ञान बंदर के हाथों उस्तरा ही तो है ...ना भई ना उस्तरा नही..क्योंकी उससे तो वो खुद अपना ही नुकसान कर सकता था. उसके हाथ मे विज्ञान एक एसे रिमोट की तरह है जो किसी भी एटम बम को फोड सकता है .... जो अब फूटा की तब.
एटम बमों का भोडा प्रदर्शन शान से हो रहा है, जितना बढा बम उतना ही वैज्ञानिक और तकनीकी उन्नत देश.  हमने इतिहास  से ना सीखने की कसम खा रखी है.  आज हमने रक्षा के नाम पर इतने हथियार जमा कर लिये है जो इस पृथ्वी को सेकडो बार तबाह कर सकती है. फिर भी चेन नही
 हमे और घातक हथियार चाहिये. और एसे लोगों को आप विज्ञान देने की बात कर रहे हो.  मेरे हिसाब से अंधविश्वास पर काम करने से पहले हमे अपने लालच और डर पर काम करना चाहिये, और इस बात का जबाब हमे अपने अंदर खोजना चाहिये की लालच ज्यादा खतरनाक है या अंधविश्वास.
कहने को अब भी बहुत कुछ है पर लेख लंबा हो रहा है ...इसे पढते रह जाओगे तो होली कब मनाओगे. .. इस लिये आगे की बात किसी ओर दिन 

शुभ होली
                                                                                                                                     सादर
       दुर्वेश      

Saturday, May 30, 2015

किसान आत्मह्त्या क्यों ना करे ?


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वर्ष 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था. आज यह 1450 रुपए प्रति क्विंटल है यानी बीते 45 वर्षों में इसमें करीब 19 गुना वृद्धि हुई है. समर्थन मूल्य का किसान की आमदनी के साथ सीधा रिश्ता है. इसकी तुलना दूसरे तबकों के वेतन में हुए इजाफे से करें. इन वर्षों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह 110 से 120 गुना, स्कूल शिक्षकों की 280 से 320 गुना और कॉलेज शिक्षकों की 150 से 170 गुना बढ़ी है. कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वालों की आमदनी 350 से 1000 गुना तक बढ़ गई है. यदि खर्चोँ की अोर नजर डालें तो इस दौरान स्कूल फीस और इलाज के खर्चों में 200 से 300 गुना और शहरों में मकान का किराया 350 गुना तक बढ़ गया है. पेट्रोल और डीजल 30 से 40 गुना बढ गये. सोने का मूल्य 200 गुना इजाफा हुआ.  
  किसानों को खाद्यान्नों की कम कीमत का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. इस साल भी गेहूं का समर्थन मूल्य 50 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है, जिससे खाद्यान्न की कीमतें नियंत्रित रहें. धान के मूल्य में भी इतना ही इजाफा किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 3.2 फीसदी ज्यादा है. इसी बीच केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की दूसरी किस्त भी मिल गई, जो पहले से 6 फीसदी ज्यादा है. उन्हें जल्दी ही सातवें वेतन आयोग के अनुरूप वेतन और भत्ते भी मिलने लगेंगे. इसमें सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी का वेतन भी 26 हजार रुपए महीने करने की मांग हो रही है.
आज भी किसान के पूरे परिवार की ओसत आय 3 से 4 हजार रूपये महिने से ज्यादा नही है. एसे मे भूख पेट सोना उसकी नियती बन जाती है. उपर से मोसम की मार से फसलों के बरबाद हो जाने पर उसे ना कोइ बीमा कंपनी राहत देती है ना कोइ सरकारी मदद.  
यदि 45 वर्षों में सबसे कम वेतन वृद्धि के आधार पर भी देखा जाए तो किसान के लिए गेहूं के मूल्य में कम से कम 100 गुना इजाफा होना चाहिए था. इसका मतलब यह कि प्रति क्विंटल गेहूं के लिए किसान को 7,600 रुपए मिलने चाहिए, लेकिन उसे केवल 1450 रुपए मिल रहे हैं. हम मानें या नहीं मानें, लेकिन यह उसका हक है. किसान का हक दिलाने से बजार मे खाने पीनी की चीजों के मूल्य मे बेहताशा वृद्धी हो सकती है जिसे कुछ समय के लिये सरकार सबसिडी देकर रोके और उसके बाद बाजार को ही उसका असली मूल्य तय करने दो. उसी तरह जिस तरह आपने पेट्रोल और डिजल को बाजार के भरोसे छोड दिया. मेरा मानना है कि सारा बोझ गरीब किसानों के ऊपर डालने की बजाय उसे फसलों की ज्यादा कीमत दें. फिर कृषि उत्पादों को सब्सिडी के दायरे में ले आएं जिससे आम उपभोक्ताओं को भी ज्यादा कीमत न देनी पड़े. जापान के अलावा कई अमीर देशों में ऐसा ही होता है.

आसान और कम ब्याज पर ऋण की सुविधाएं बढ़ाने से भी किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते. किसान को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए. हम वर्षों से किसानों को बेहतर कमाई से वंचित करते रहे हैं. एक के बाद एक आने वाली सरकारें जानबूझकर किसानों को गरीब बने देखना चाहती हैं. 

दुर्वेश😟

Sunday, February 20, 2011

मेगा वाट से वाट की ओर

जब भी हम गैर पारंपरिक ऊर्जा से बिजली बनाने की बात करते है तो लागत और उच्च दक्षता की बात करते है और हम उसकी तुलना सरकार -द्वारा बनाए गए बङेबङे बिजली बोर्डों से मिलने वाली सस्ती बिजली से करने लगते है। देखने के लिए भले ही हमें ये सस्ती बिजली दे रहें है पर खुद हज़ारों करोङ के घाटे में डूबते जा रहे है। वैसे भी यह सस्ती बिजली हमें सरकारी सब्सीडी के बाद मिलती है। सरकार यह घाटा या तो ज़्यादा टैक्स लगाकर वसूल करती है या फिर ज़्यादा नोट छापकर, दोनों ही स्थति में उसका बोझ आम उपभोक्ता पर ही जाएगा। अब तो घाटा कम करने का एक और आसान इलाज मिल गया है। बिजली घरों, को ओनेपौने दाम पर बेच दो।

विद्युत को बनाने और वितरण करने के लिए 3 फ़ेज 50 हर्ट्ज - सिस्टम का जन्म हुआ। बङेबङे पॉवर हाउसों से बिजली सेकङों किलोमीटर तारों के द्वारा , अनेक ट्रासंफार्मरों से परिवर्तित होकर यह आम उपभोक्ता तक पहुँचती है। यह तरीक़ा अब तक तो ठीक था, पर अब इसकी ख़ामियाँ उजागर होने लगी है। जनरेशन, ट्रासमीशन और वितरण का यह नेट वर्क एक बहुत बङी सिनक्रोनस मशीन की तरह काम करता है। जितना बङा नेट वर्क उतना ही बङा ख़तरा उसके अस्थिर होने का बना रहता है। नेट वर्क फेल होने का डर हमेशा बना रहता है। इसके फेल होने से सारी व्यवस्था चरमरा जाती है।

जनरेशन, ट्रासमीशन और वितरण का यह कापलेक्स सिस्टम सरकारी और ग़ैरसरकारी एजंसियों की मनमर्जी के पर चल रहा है। सोचा गया था कि बङे पॉवर हाउस अपने साथ उच्च तकनीक और अच्छा प्रबंधन लेकर आएगें जिससे आम व्यक्ति को एक सस्ती और भरोसे मंद विधुत व्यवस्था मिलेगी। आज बङी परियोजनाएँ चाहे वो थर्मल हो, हाइड्रो हो या न्यूक्लियर, अपने साथ पर्यावरण तथा विस्थापन जैसी गंभीर समस्याएँ साथ लेकर आती है। कुप्रबंधन और धन की कमी के कारण बङी परियोजनाएँ महगी भी साबित हो रही है। पॉवर हाउसों की टरबाईनों और जनेरेटरो की दक्षता हमने भले ही उच्च स्तर की प्राप्त कर ली है पर ओसत वार्षिक उत्पादन 50% से 60% होने के कारण यह अपनी पूरी जिदंगी खराब दक्षता से चलने वाली साबित होती है।

हमारे देश में ओसत ट्रासमिशन बरबादी क़रीब 22 प्रतिशत है। इसलिए प्लांट चाहे पनी उच्च दक्षता पर चलता हो पर उपभोक्ता तक उसका सर आते आते यह सबसे खऱाब दक्षता वाले साबित होते है। इस व्यवस्था का विकल्प डिस्ट्रीब्यूटेड पॉवर सिस्टम हो सकता है। संसार की सभी पॉवर कम्पनियाँ डिस्ट्रीब्यूटेड पॉवर सिस्टम पर काम कर रही है। ब मेनटींनेंस फ्र.ी जनरेटर और उच्च दक्षता के माइक्रो टर्बाइन ौर फ्यूल सेल, सोलर सेल, वायु ऊर्जा के कारण यह सस्ता विकल्प बनकर उभर रहा है। इसमें लगने वाला कम समय और कम पूँजी के कारण यह लोकप्रिय भी हो रही है। आने वाले 10 से 15 सालों में जब पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की कमी हो जाएगी तब हमें गैरपारंपरिक ऊर्जा से मिलने वाली बिजली पर निर्भर होना होगा।

अब सरकार के केले के बस की बात नहीं है कि वो पने दम पर सभी को बिजली सुनिश्चचित करा सके। हम सिर्फ़ गिनीचुनी कुछ बाङी परियोजना के के बल पर आने वाले समय में बिजली की कमी को पूरा नहीं कर सकते। बङे प्रोजेक्ट चाहे वो सरकारी हो या ग़ैरसरकारी, सस्ती बिजली की गांरटी नहीं है। इसलिए अब हमें मेगावॉट की बात ना कर किलोवाट और वॉट की बात करनी होगी। जिससे आम जनता की सीधी भागीदारी को बढ़ाया जा सके। उनके -द्वारा इस्तमाल की जाने वाली बिजली को बनाने और ख़र्च करने का नियंत्रण उनके पास होना चाहिए, ना कि सेकङो मील दूर बने बिजली घरों और कंट्रोल केंद्रों को। डिस्ट्रीब्यूटेड पॉवर जनरेशन में ऊर्जा स्रोत उपभोक्ता के नज़दीक होने के कारण ट्रासमिंशन में ऊर्जा की बरबादी कम होती है, उपभोक्ता इसे अपनी ज़रूरत के हिसाब से सचांलित कर सकता है।

हमें ऐसे सभी विकल्पों पर ध्यान देना होगा जिसे लोग आसानी से लगा और चला सके। अब उन्हें कम से कम अपने लिए बिजली खुद बनानी सीखनी होगी। तकनीकी तौर पर यह सभंव है, सरकार को  नियमों और पॉलसी में सुधार लाकर इन छोटेछोटे बिजली सयंत्रों को बढ़ावा देना चाहिए। ऐसे में गैरपारंपरिक ऊर्जा स्रोत  मुख्य भूमिका निभा सकते है। ख़ासकर सौर ऊर्जा और हवा ऐसा विकल्प बनकर उभरे है जो वातावरण को प्रदूषित किए बिना सस्ती बिजली उपलब्ध करा सकते है। इन उपकरणों का रखरखाव भी आसान है।

गैर पारंपरिक ऊर्जा स्र्तों से शहरों में बिजली शुरूआती तौर पर मँहगी ज़रूर हो सकती है पर इससे दूरदराज गाँवों में बिजली निश्चचित तौर पर सस्ती पङेगी और फिर सवाल मँहगी और सस्ती से बढ़कर उसकी उपलब्धता का है। गाँव की बात तो दूर आज हम शहरों को भी बिजली नहीं दे पा रहे है। चार से छः घंटे की बिजली कटौती आम बात है। जहाँ तक गाँवों की बात है, सिर्फ़ तार बिछाने से बिजली तो नहीं मिल जाती। ऐसे कितने गाँवों है जहाँ हम 24 घंटे बिजली दे पा रहे है। शायद एक भी नहीं है, अगर होता तो गीनीज बुक में उसका नाम आ जाता।

डिस्ट्रीब्यूटेड पॉवर जनरेशन सिस्टम की शुरुआत हम ऐसे गाँवों से कर सकते है जहाँ बिजली  नहीं पँहुची है। आज भी गाँवों में रात को रोशनी करने के लिए सरसों के तेल का दिया या फिर मिट्‌टी के तेल का लैंप या लालटेंन इस्तेमाल करते है । इसकी कमज़ोर रोशनी में पढ़ाई लिखाई का काम कितना कष्टप्रद है वो इसको इस्तेमाल करने वाले ही समझ सकते है। समय पर बिजली ना मिलने से फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती और किसान की अच्छी भली खेती बरबाद हो जाती है। किसान मजबूरी में डीजल पम्प का उपयोग करता है। इसमें आने वाला ख़र्च निश्च्चित तौर पर गैर पारंपरिक ऊर्जा से मिलने वाली बिजली से ज़्यादा पङेगा। आज का गाँव वासी इसको समझ पा रहा है। कमी है तो उन्हें सही तकनीक समझाने की और उनके लिए कम ब्याज पर पूँजी की व्यवस्था करने की । गैर पारंपरिक ऊर्जा के क्षेत्र में सरकारी एवं ग़ैरसरकारी एजंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है जो उनकी ज़रूरतों को सझकर उन्हें सही राय दे सकें।