Wednesday, March 28, 2012

गीत गाएं गौरैया का

Meeting Project objectives differently



Blind people work together and make parts of Boilers at Trichy for IOCL’s Paradip Refinery project …..… An experience sharing.

21st December 2011 has etched an unforgettable memory in my mind. I was at Tiruchirapalli on a mission to expedite supplies of Boilers at BHEL’s works for Power plant of IOCL’s ongoing Paradip Refinery Project. BHEL has outsourced non-pressure parts of these boilers to certain vendors nearby Trichy. ‘ORBIT’ is among such outsourced vendors, who is making Pins & Clamps of these boilers for our project. We decided to visit ORBIT also for review and expediting balance supplies.

When we reached ORBIT works, we were greeted by their President Mr. P.R. Pandi, who himself is a blind person. To my utter surprise, the whole ORBIT workshop is run by blind persons. Though I was aware of certain special schools and institutions for blind persons but never heard about any manufacturing industry run completely by such persons. What I saw next inside the workshop is quite difficult to believe.

I had never witnessed such well coordinated and coherent working by blind persons. People were segregating the raw material, feeding the raw material on cutting, shearing and punching machines with the help of their fellow blind friends, collecting the final products and bagging them after quality checks. The whole manufacturing process was efficiently done and finished product was meeting the quality standards. I was lost in deep admiration seeing their untiring efforts for making vital parts for my project and emotionally touched. Their interpersonal understanding and collective effort was exemplary and far better as compared to normal workers engaged in other industrial units. Below photos depict it completely but silently…

People were working with no ego and communication was being made not with vital sensory organs like eyes, but with their hearts. I was thrilled and compelled to think that dedicated and sincere working by these special people is a great example towards values of humanity which defies all laws of Project management. Calm and peace prevail here in their coordinated rhythm of working against any feeling of industrial acrimony.

What came next was even more surprising. A physically handicapped welder was doing welding on the job and was assisted by a blind helper. We saw his blind helper almost running and going to store room next door to fetch the electrodes quickly. When enquired how he could do such job with much ease, my fellow companion from BHEL, Mr. Jai Ram told me that every worker working here is fully conversant with the layout of workshop and does the job with calculated steps – concepts of time and motion study, well grasped by them by heart. I was overwhelmed by their indomitable spirit, everlasting zeal and working in perfect harmony.

At the end, ORBIT president Mr. Pandi requested me ‘Sir, if you come across any blind person, please direct him to me, we will make him our team member here’. I controlled my emotions, advised them to maintain timelines and quickly moved out with mixed feelings, thinking and admiring effort and passion of ORBIT in this endeavour and with firm conviction that Paradip Refinery Project will soon be a realised dream.

Arvind Kumar
Chief Project Manager-PDRP
Indian Oil Corporation Ltd.
PS:I would like to thank IOCL Management & BHEL team for giving me an opportunity to have such wonderful experience with a noble cause during project expediting at BHEL,Trichy.

Efficiency

Tuesday, January 17, 2012

2D पिक्चर को केसे 3D में देखे

3D टीवी की आजकल बहुत चर्चा है. इन पर 3D मूवीस को देखने का मजा ही कुछ और है.  जेसे सब कुछ अपने पास हो रहा है, सामने से आती गोली लगता है जेसे सीने से पार हो जायेगी. हीरोइन के लहराते बाल गालों को जेसे छू लेगें.


यह कमाल केसे हो पाता है! हमे विज्ञान मे बताया गया की अपनी दो आंखों के कारण अपने आस पास की दुनिया को हम त्रियामी देखते है और इसी वजह से दूरी का सही आकलन भी कर पाते है. पिक्चर पोस्ट्कार्ड, टीवी या फिर मूवी में दृशय फ्लेट दिखाई देता, उनमे गहराई का अहसाहस नहीं होता. क्योंकी वो दो आयामी है. इस कमी को पूरा करने के लिये फोटोग्राफी की अलग तकनीक विकसित की गई. एसे केमेरे बनाये गये जो हमारी दोनों आंखो के द्वारा देखे जाने वाले दृश्य को अलग अलग कैद करते है और फिर उसे देखने के लिये मंहगा त्रियामी टीवी, इसे विशेष चश्में से देखने पर हमे उस पर दिखाइ देता दृशय त्रियामी दिखाइ देता है. यह एक एसा चश्मा है जिससे दांई आँख और बाई आँख अपने-अपने दृश्यों को ही देख सके और फिर हमारा मस्तिक उन दोनों दृशयों को एक साथ मिलाकर त्रियामी दुनिया बनाता है. सिनेमा ने भी त्रियामी फिल्मे पर्दे पर दिखाने कि नई तकनीक विकसित की जिसे पोलेराइड चशमे पहन कर देखा जा सकता है. हमे बताया गया की त्रियामी आभास हमारी दोनों आंखों से अलग अलग कोणों से बनने वाले ड्र्श्य की वजह से होता है. पर यह सच, पूरा सच नहीं है. आगे इस बारे में कुछ और लिखू.

एक छोटा सा प्रयोग कीजिये. अपनी कोई भी एक आँख बंद कर अपने चारों ओर देखिये क्या अतंर महसूस हुआ ....कुछ खास नहीं ना! सभी कुछ अपनी जगह पर, वही गहराइ का अहसाहस् ...कुछ भी बदलाव नजर नहीं आया ना. फिर क्या कारण है की हमे पोस्ट कार्ड, टीवी, या मूवी के दृशय हमे फ्लेट दिखाई देते है? और एक आंख से देखाइ देने वाली दुनिया अभी भी हमे त्रियामी दिखाई दे रही है.

जब भी हम किसी दृशय को देखते है तो हमे त्रियामी अहसाहस दोनों आंखों के द्वारा अलग अलग कोणों से आंखों की रेटीना पर बनने वाली तस्वीर के कारण होता है. पर इसके साथ ही बचपन से ले कर अब तक हमने दृश्यों के बारे में अपनी जो समझ विकसित की है उसका उपयोग भी दिमाग दूरी के आकलन मे करता है. जेसे हमे मालूम है की नीला आसमान सबसे पीछे होता है पहाड उसके आगे. अगर एक के पीछे दूसरी वस्तु छुप रही है तो छुपने वाली वस्तु की दूरी पहले वाली से ज्यादा होगी. कुछ वस्तुओं के साइज का अंदाजा हमे पहले से ही होता है और हम उस आभासी साइज से उसकी दूरी का अंदाज लगा लेते है. यह हमारे अंतरर्मन में इस तरह बसा हुआ है की एक आँख बंद होने पर भी हमे कुछ खास अंतर दिखाई नहीं देता.

इसका अहसाहस मुझे हिमालय में कई बार हुआ, जब ट्रेक करते हुये बर्फ से ढ्की पहाड़ की चोटी सामने के पहाड़ से छुपी होने कारण लगता था जेसे बहुत करीब है पर जेसे ही हम उस पहाड पर चढ्ते है तो वो हमे फिर से वो दूर दिखाई देती ....क्यों? क्योंकी तब उस बर्फ की चोटी और हमारे बीच और भी बहुत से पहाड दिखाई देने लगते.

अच्छा एक ओर छोटा सा प्रयोग कीजिये. पेपर को रोल कर एक छोटा सा छेद बनाकर उसमे से 10 फिट से ज्यादा दूर वाली सामने की किसी भी वस्तु को कुछ इस तरह देखिये की बस वो ही दिखाई दे...उसके आस पास की और कोई भी चीज आपको दिखाई ना दे....क्या अब आप उसकी दूरी का सही अंदाज लगा पा रहे है...ओह आप बोलेगे की आप एक आँख से देख रहे है ...ओके अब ऐसा ही दोनों आंखो से किजिये. शर्त बस एक है की उसके आस पास की और कोई चीज आप को दिखाई ना दे. क्यों जी!! दूरी का अंदाज लगाने मे कठनाई हो रही है ना! ...उम्मीद है अब आप मेरी बात से सहमत हो गये होंगे की दो आंखो वाला त्रियामी सिद्धांत आपकी कोई खास मदद नहीं कर पा रहा है. उस पर अब अगर कोई रंगो का समायोजन बिगाड दे तो हम बुरी तरह धोखा खा जायेगे. इसी तरह अगर वास्तविक वस्तु का ठीक वेसा ही छोटा या बड़ा माडल हमारे सामने हो तो भी हम उसकी दूरी के आकलन में बुरी तरह धोखा खा जायेगे.

असल मे दो आंखो से बनी त्रियामी दुनिया का उपयोग 10 से 12 फिट की दूरी तक ही हमारा दिमाग ठीक तरह से कर पाता है. इस तरह दूरी का सही आकलन हमे चीजों को पकडने या फिर उसे  लांघने और कूदने मे मदद करता है. उसके बाद जो कुछ भी त्रियामी दिखाई देता है वो अकसर हमारा अनुभव भर होता है.

अब एक बार फिर उसी सवाल पर की हमे सिनेमा का दृशय फ्लेट क्यों दिखाइ देता है. इसका जबाब देने से पहले एक ओर प्रयोग. इस बार सिनेमा देखने जाये तो अपनी सीट का चयन इस तरह कीजिये की आपकी आंख द्वारा पर्दे पर दांये से बांये बनने वाला कोण 90 डिग्री से ज्यादा का हो. और आपकी आंख का लेवल करीब-करीब पर्दे के बीच के लेवल पर हो.  मूवी के स्टंट सीन शुरू होते ही आप अपनी एक आंख बंद कर लीजिये और दूसरी आंख से अपनी उंगलियों की झिरी का इस्तेमाल करते हुये पर्दे पर मूवी को इस तरह देखिये की सिर्फ पर्दा पर चल रही मूवी ही दिखाई दे, बाकी कुछ नही. थोडी देर मूवी को इसी तरह देखिये. क्यों मजा आया ना.... हुआ ना 3D मूवी का अहसाहस. इस काम को आसान करने के लिये आप 2.5x पावर का बाइनोकुलर का इस्तेमाल भी कर सकते है, बस उसके एक लेंस पर कवर लगा रहे. जिससे एक आंख ही दृशय को देख सके.

यह कमाल केसे हुआ? जब आपने उंगलियों की झिरी का इस्तेमाल करते हुये पर्दे पर मूवी को देखा तो पर्दे और आपके बीच की दूरी का आभास आपके दिमाग को नही रहा. और वो आसानी से दृश्य मे खो गया और आपको त्रियामी अहसाहस होने लगा. खासकर स्टंट वाले दृश्य मे यह अहसाहस ज्यादा होता है.

अगर किसी फोटो को उसी तरह देखे जिस तरह उस फोटोग्राफॅर ने फोटो लेते समय उसे देखा होगा तो हम भी उस पिक्चर की सुदंरता और गहराइ का अहसाहस उसी तरह होगा जेसा उस फोटोग्राफर को हुआ होगा. उसके लिये महत्वपूर्ण है कि जिस कोण से केमरे मे उसे देखा गया फोटो को देखते हुये उसी कोण को बनाने का प्रयास किया जाये और उसे एक ही आंख से देखा जाये. और हम सिर्फ फोटो को ही देखे.

Monday, January 9, 2012

one massive container ship pollution >= 50 million cars pollution


It is reported that in one year, a single large container ship can emit cancer and asthma-causing pollutants equivalent to that of 50 million cars. The low grade bunker fuel used by the worlds 90,000 cargo ships contains up to 2,000 times the amount of sulfur compared to diesel fuel used in automobiles. The recent boom in the global trade of manufactured goods has also resulted in a new breed of super sized container ship which consume fuel not by the gallons, but by tons per hour, and shipping now accounts for 90% of global trade by volume.

In international waters ship emissions remains one of the least regulated parts of our global transportation system. The fuel used in ships is waste oil, basically what is left over after the crude oil refining process. It is the same as asphalt and is so thick that when cold it can be walked upon . It's the cheapest and most polluting fuel available and the world's 90,000 ships chew through an astonishing 7.29 million barrels of it each day, or more than 84% of all exported oil production from Saudi Arabia, the worlds largest oil exporter.

Shipping is by far the biggest transport polluter in the world. There are 760 million cars in the world today emitting approx 78,599 tons of Sulphur Oxides (SOx) annually. The world's 90,000 vessels burn approx 370 million tons of fuel per year emitting 20 million tons of Sulphur Oxides. That equates to 260 times more Sulphur Oxides being emitted by ships than the worlds entire car fleet. One large ship alone can generate approx 5,200 tonnes of sulphur oxide pollution in a year, meaning that 15 of the largest ships now emit as much SOx as the worlds 760 million cars. Airborne pollution from these giant diesel engines has been linked to sickness in coastal residents near busy shipping lanes. Up to 60,000 premature deaths a year worldwide are said to be as a result of particulate matter emissions from ocean-going ship engines.

Friday, January 6, 2012

गुम हो चली भोपाल और नवाबों की पहचान

नवाब और तांगा वर्षो से भोपाल की पहचान रहे है। लेकिन ये दोनों चीजें इस शहर से धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं। नवाब तो रहे नहीं, शहर की सड़कों पर तांगा भी अब इक्का दुक्का ही दिखते है।एक दौर था जब भोपाल में आवागमन का एक मात्र साधन तांगे हुआ करते थे। इसे तो लोग नवाबों की सवारी मानते थे। हो भी क्यों न इनकी चमक-दमक कुछ इस तरह की होती थी कि इस पर सवारी करने वाला अपने आप को नवाब ही समझ बैठता था। तांगे भी कई किस्मों के होते थे। कुछ तांगे बग्घी जैसे होते थे, उनकी सजावट हर किसी का मन मोह लेती थी तो कुछ आम तांगे भी होते थे। इनमें सवारी करने वाले लोग एक दूसरे से पीठ मिलाकर बैठते थे। भोपाल के तांगों की पूरे देश में चर्चा रही है। फिल्म नया दौर में तो दिलीप साहब ने भोपाल के पास की एक घाटी में तांगा दौड़ाया था।आज परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं। तांगों की जगह अब आटो और बसों ने ले लिया है। जो तांगा बचे है उनमें सवारियां नहीं बल्कि सामान ढोया जाता है। तांगे की सवारी का शौक रखने वाले लोगों का दिल अब तांगों की हालत को देख कर बैठ जाता है। घोड़ों की खुराक के लिए हर रोज कम से कम सौ रुपये की जरूरत होती है। जब से मिनी बस और आटो का प्रचलन शुरू हुआ है तब से लोगों का तांगों से मोहभंग हो गया। इसकी वजह यह है कि तांगे की सवारी थोड़ी महंगी है और वक्त भी ज्यादा लगता है। ऐसे में तांगा चलाना उनके लिए मुश्किल हो गया है। इसलिए वे सवारी ढोने के बजाए माल ढोना ज्यादा पसंद करते है।भोपाल से गुम हो रहे तांगों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग को भोपाल कार्निवाल के दौरान इस मामले में जन जागरण लाने के लिए तांगा राइडिंग का आयोजन करना पड़ा। तमाम कोशिशों के बावजूद केवल सात तांगों का ही इंतजाम हो पाया।यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में नवाबों के किस्सों की तरह तांगों की कहानियां भी अगली पीढ़ी सुनेगी।



भोपाल श्हर

भोपाल हरे-भरे जंगलों और पहांडों से घिरा भोपाल शहर खूबसूरत शहरों में से एक है। यहां की बंडी झील, ताजूल मस्जिद, भारत भवन, पर्दा, नामर्दा, जर्दा, बतौलबाजी और तांगा इसकी पहचान है। यहां की शाम और भोपाली उर्दू जुबान, इसकी खूबसूरत शाम और शांत वातावरण.....पर अब तेजी से बदल रहा हे
जिस झील के किनारे सैकंडों पर्यटकों और प्रेमी बैठकर इसकी खूबसूरत फिंजा को देखते थे वहीं आज यह बिरान सी लगने लगी है। ऐसे ही भोपाल की उर्दू, फारसी और अरबी जुबान भी अपनी विशेष पहचान रखती है। लेकिन अब वह भी भगवान भरोसे हो गई है। एक समय था, जब यहां वॉल्टर और फ्लोरा सारकस नाम की शायर रहा करते थे। असद भोपाली और कैफे भोपाली फिल्मी गीतकारों की हैसियत से भोपाल नगरी की पहचान थी…
तिरपन बरस पहले का भोपाल राजा भोज की नगरी थी। कहा जाता है कि तब यह भोपाल न होकर भोजपाल हुआ करता था और इस भोपाल शहर को उस समय के नवाबों ने संजोया और संवारा। तब भोपाल राजधानी भी नहीं था। तिरपन बरस पहले जब नये मध्यप्रदेश की स्थापना हुई और राजधानी के लिये भोपाल को चुन लिया गया। राजधानी बनने के साथ भोपाल दो हिस्सो में बंट गया। अब शहर एक और नाम दो थे। पुराना भोपाल और नया भोपाल। इन बावन सालों में पुराना भोपाल तो जस का तस रहा किन्तु नया भोपाल की सूरत साल-दर-साल बदलती गयी। पुराना भोपाल अपनी यादों के साथ आज भी जी रहा है। यादों के इस भोपाल में तांगे और बग्घी अब थोड़े से बच गये हैं और बाकियों को धुंआ उड़ाते आटोरिक्शा न लील लिया है। भोपाल की पहचान जरी-बटुआ उद्योग अब गुमनामी के साये में हैं। पुराने भोपाल की ताजुल मस्जिद में सजदा करते हजारों लोग, नफासत के साथ बतियाते लोग और वही पुरानी तंग गलियां, पानी के लिए नलों के सामने आपस में सुबह किलकिल और सांझ को साथ बैठ एक-दूसरे का सुख-दुख बांटती औरतें ही पुराने भोपाल की पहचान रह गई हैं। भोपाल का यह वही हिस्सा है जहां कभी कारखाने से निकली जहरीली गैस ने हजारों जिंदगियों को नींद में ही इस दुनिया से रूखसत कर दिया था। भोपाल की पहचान एक समय एशिया के सबसे बड़े ताजुल मस्जिद से थी तो ढाई सीढ़ियों की एशिया की सबसे छोटी मस्जिद भी भोपाल में है। मिंटो हाल, नया विधानसभा भवन, नेशनल लॉ यूर्निवसिटी, साइंस सेंटर और राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भी इस शहर की पहचान हैं। इस शहर की शान कलाओं का घर भारत भवन है। इस शहर की पहचान कामरेड शाकिर अली खां और बरकतउल्लाह भोपाली से हे तो इसी भोपाल ने देश को शंकरदयाल शर्मा जेसे विशाल व्यक्तित्व का राष्ट्रपति भी दिया। एशिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली से है तो दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से इस शहर को एक नयी पहचान दी। अपने शेर-ए-शायरी के लिए पहचाने जाने वाले जनाब बशीर बद्र भी तो भोपाल से ही हैं। मंजर भोपाली, जावेद अख्तर के नाम के साथ भोपाल की पहचान जुड़ी है तो कमाल अमरोही और जगदीप भी इसी भोपाल से वास्ता रखते हैं तो लोक एवं आदिवासी कलाकारों को भोपाल के रास्ते नाम मिला। भोपाल ताल इस शहर की प्यास बुझाता है तो सैलानियों के लिए स्वर्ग जैसा है और इसी बड़े ताल से लगा हुआ है छोटा ताल। छोटा ताल नहीं कहलाता बल्कि तालाब कहलाता है और यह पुराने भोपाल के हिस्से में आता है। पुराने भोपाल की पहचान इतवारा, मंगलवारा, बुधवारा जैसे मोहल्ले से है तो नया भोपाल नम्बरों का शहर है। १२५०, १४६४, ७४ बंगले, सेकंड स्टॉप, दो नं, पांच नं, सवा छह, छह, साढ़े छै, सात, दस, ग्यारह और बारह नम्बरों में भोपाल बसा हुआ है। यह माना जाता है कि पुराने भोपाल के मोहल्ले के नाम उनके साप्ताहिक बाजारो के कारण पड़ा होगा तो नये भोपाल की पहचान वहां नये बने मकानों की संख्या से आशय रहा होगा। राज्यपाल निवास, मुख्यमंत्री निवास, विधानसभा भवन, मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय नये भोपाल के हिस्से में हैं। पर्दा, जर्दा और मर्दा के लिये मशहूर भोपाल का उल्लेख केवल उसके राजधानी होने के कारण नहीं होता हे बल्कि इसके और भी कारण हैं। यह शहर देश के चुनिंदा महंगे शहरों में शामिल है। इन बावन सालों में बहुत सारी चीजें बदली। निजाम बदलते गए, व्यवस्था बदलती गई। किसी ने इस शहर को सुव्यवस्थित करने का प्लान बनाया तो कोई पेरिस की शक्ल देने में जुट गया। बात बनी नहीं और बेजा कब्जा वाले पसरते गए राजधानी होने का सुख भोपाल ने खूब भोगा तो दुख भी इस भोपाल ने झेले हैं। झाबुआ से बस्तर तक की राजधानी कहलाने का सुख भोगने वाले भोपाल को बीसवीं सदी के समाप्त होते-होते जोर का झटका लगा। इस राजधानी के मुकाबले एक और राजधानी बन गयी वह छत्तीसगढ़ की थी। मध्यप्रदेश विभाजित हो गया और अपने ही जन्मदिन एक नवम्बर को विभाजन की पीड़ा भोगनी पड़ी।