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Thursday, November 17, 2011

जेम्स फोरसिथ पगडंडी पर बीएचईएल भोपाल यूनिट के सदस्यों ने की साहसिक ट्रेकिंग

पचमढ़ी हिल स्टेशन के खोजकर्ता कैप्टन जेम्स फोरसिथ द्वारा वर्ष 1862 में पहली बार जिस रास्ते का इस्तेमाल किया, उसी रास्ते पर यूथ होस्टल्स एसोसियेशन ऑफ़ इंडिया बी.एच.ई.एल.इकाई भोपाल, के 39 सदस्यों ने दिनांक 13/11/11 से 15/11/11 तक तीन दिवसीय साहस और रोमांच से भरे ट्रेकिंग कार्यक्रम ’’री विजिटिंग फोरसिथ लैण्ड’’ मैं हिस्सा लिया.


इस अनोखे ट्रेकिंग कार्यक्रम को 10 से 17 नवंबर तक सतपुडा टाईगर रिजर्व होशंगाबाद द्वारा  पचमढ़ी खोज के 150 वर्ष पूर्ण होने और मध्यप्रदेश के वन विभाग की स्थापना के 150 साल पूरे होने के अवसर आयोजित किया.

इस यात्रा को ’’री विजिटिंग फोरसिथ लैण्ड’’ नाम दिया गया। विभाग के मुताबिक इसी पगडंडी से जाकर कैप्टन जेम्स फोरसिथ ने पचमढ़ी की खोज की थी। 1862 में बनाया गया यह रास्ता सैलानियों के लिए बंद था। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व द्वारा इस अतिदुर्गम पर्वतों के बीच से जाने वाले इस मार्ग को पहली बार ट्रेकिंग के लिये खोला गया। लगभग 37 किमी के इस दुर्गम रास्ते पर ट्रेकिंग करने का बेहद रोमांचक अनुभव इस टीम ने किया हैं। रास्ते में वन्य प्राणियों और दुर्लभ वनस्पतियों की महत्वपूर्ण जानकारी के साथ ही वहां रह रहे वनवासीयों से मुलाकात और उसकी संस्कृति जानने का मोका इस टीम को मिला.

मध्य प्रदेश के प्रभारी वनमंत्री ने हरी झंडी दिखाकर समूह को जिप्सी वाहनों से रावाना किया. दल झिरपा होते 21 किलोमीटर का सफर तय कर दोपहर के भोजन के समय तक झेला कैम्प तक पहुचा. रास्ते मे सात धारा पर थोडी देर का विराम दिया गया जिससे सदस्य मनोहारी दृश्य का मजा ले सके.
झेला कैम्प ट्रेकिंग का पहला पडाव था। इस स्थल पर ईको पर्यटन से संबंधित शैक्षणिक; मनोरंजक तथा साहसिक गतिविधियॉ संचालित की गई और रात्रि मे यही दल के सभी सदस्यों ने विश्राम किया।

दूसरे दिन सुबह झेला केम्प से पैदल देनवा नदी के किनारे ट्रेकिंग आरंभ कर  9 किलोमीटर ट्रेक करते हुये दल दोपहर 2 बजे कांजीघाट पहुचा. दोपहर का भोजन करने के बाद यहॉ सभी ट्रेकर्स कमाण्डो नेट तथा बर्मा ब्रिज जैसे साहसिक खेलों में सम्मिलित हुए। रात्रि में स्थानीय वनवासीयों ने केम्प फायर के दौरान पारंपरिक लोकनृत्य पेश किया.

तीसरे दिन कांजीघाट से सुबह चल कर दल दोपहर बाद पचमढी मे बायसन लॉज पहॅचा। वर्तमान मे पचमढी मे जो बायसन लॉज है कभी वह जेम्स फोरसिथ का आश्रय स्थल था उन्होने ही इसे बनाया था। वन प्रांतर मे स्थित साज;साल; सरई; सर्रू; हर्रा; आम जामुन; महुआ के वृक्ष और बल खाती देनवा नदी और उसके स्वच्छ जल के झरनों दुर्गम पहाडियो के बीच इस टेकिंग का अपना खास महत्व रहा।


Saturday, November 12, 2011

जंगल ट्रेक

लंच के बाद पता चला की पावर हाउस नहीं जाना हे. 3 बजते–बजते तय किया की क्यों ना आज सामने दिखाइ देती पहाड़ की चोटी पर चढा जाये. 500 मीटर से भी ज्यादा ऊची उसकी चोटी मुझे बार बार ट्रकिंग के लिये ललचाती. साल और सागोन का घना जंगल, दिसंबर की गुलाबी सर्दी. आज वो दिन आ ही गया. बस कही आग जलायेगे और रात भर चाँद की रोशनी और सितारों भरे आसमान. आइडिया रोमानी था...उस पर इस कदर दिल आया की अकेले ही जाने का सोच ली.


सोचा आधे अधूरे चाँद की रोशनी तो साथ रेहेगी. उपर पावर हाउस का इनटेक गेट और जलाशय हे. वहां एक गेस्ट हाउस भी हे...उम्मीद हे वहां रात गुजारने भर के लिये जगह मिल जायेगी...अगर ना भी मिली तो क्या हुआ कही भी जग़ंल में मंगल करेगे. रात भर एफ एम सुनेगे और तारों को निहारेगे. वेसे भी अर्ध रात्री के बाद एफ एम पर पुराने गीत...क्या कहने.

तैयारी करते करते 4 बज गये सूरज पश्चिम की तरफ कुछ ज्यादा ही झुक गया, गेस्ट हाउस इचार्ज को बताने के बाद मैं तेजी से चल दिया मुझे बताया गया था की स्विच यार्ड के पास से रास्ता उपर की तरफ जाता हे. स्विच यार्ड 4 km की चढाई…कोइ जाने का साधन नहीं मिला तो पैदल ही चल दिया. स्विच यार्ड पहुचा तो 5 बज गये. वहां कोइ नहीं..किससे पूछू...तभी मुझे एक आदिवासी अपनी गायों के साथ लोटता दिखाई दिया. पास बुलाकर उपर तालाब पर जाने का रास्ता पूछा.

हां साहब जाता हे ना रास्ता… वो उपर महादेव मदिंर से दांई तरफ का रास्ता सीधे उपर बडे तालाब जाता हे साहब...उपर गांव के काम करने वाले लोग इसी रास्ते से रोज आते-जाते हे। आपने थोडी देर कर दी नहीं तो कोई ना कोई आपके साथ जाने वाला मिल जाता।

ठीक हे मुझे तालाब वाला रास्ता बताओ जो मदिंर के करीब से जाता हे.

ठीक हे साहब!

सोचा जरूरत पडी तो मदिंर पर ही रात गुजार देगे.

आसान हे साहब बस ये जो सामने पहाड़ पर जो सूखा झरना देखाइ दे रहा हे बस इसी के सहारे उपर जाइये। 1 घंटे में आप महादेव के मन्दिर पहुच जायेगे. फिर वहां से 30 मिनिट और चलना हे, आप तलाब पर होंगे... जल्द निकल जाइये शाम होने को हे...सर्दीयों के दिन हे जल्द ही अधेरा हो जायेगा.

मैं उसके बात पर मुस्कराया...देखा 5:00 बजे हे...7:00 बजे से पहले अँधेरा नहीं होना था..मेरे पास पूरे 2 घंटे थे. करीब 1 घंटे का महादेव के मदिंर का रास्ता…उसके बाद इनटेक का 30 मिनिट का सफर। मैं उससे विदा लेकर सूखे झरने की तरफ चल दिया.

दूर से आसान ढलान वाला पहाड़। पास से देखा तो होश उड गये। यह तो तीखी चढाइ हे. सामने खडा पहाड़..कहां से शुरू करू. तभी मुझे सूखा झरना दिखाइ दिया...ये एक बरसाती झरना था जो अब सूखा हुआ था...बडे बडे पत्थर...उन पर जमी सूखी काइ...चढाई आसान नही है...पर जाना तो था..

15 मिनिट का चढाई ने हालत खराब कर दी...ये तो rock क्लाईमिंग हो रही थी...हाथो पर शरीर का बोझ संभालते संभालते मेरी हालत खराब हो गई...उगलियां दर्द करने लगी...मुझे समझ नहीं आया...की गडबड क्या हे...अगर ये रोज आने जाने का रास्ता हे तो ऐसा क्यों. 50 मिनिट हो गये कही मन्दिर का नामोनिशान दिखाइ नहीं दे रहा.

सामने डूबने को तैयार सूरज…कुछ समझ नहीं आ रहा हे। खडी ढलान, खडे होने भर की भी जगह दिखाइ नहीं दे रही। उपर अब घना जंगल हे, रास्ता नजर नहीं आ रहा। अंदर से आवाज आने लगी की ....वापस जाओ। पर जिद्दी दिल इसे अपनी हार मान रहा हे…फेसला तुरंत लेना हे। अगर एक बार अँधेरा हो गया तो नीचे उतरना असंभव हो जायेगा। आस पास कोइ एसी जगह नहीं जो रात गुजारने लायक हो।

आखिर नीचे जाने का मन बना लिया। नीचे उतरते हुये जो एक बार पैर लडखडाया तो तेजी से नीचे फिसलता चला गया। शुक्र हे कही चोट नहीं लगी बस थोडे कपडे गंदे हुये। सूरज बस अब डूबने को है. मै नीचे उतर आया था।

सामने देखा तो वही आदवासी आपनी गाय के साथ मुझे घूर रहा हे…साहब मेने आपको नीचे लुढकत हुये देखा…पर साहब आप झरने में क्या कर रहे थे मेने तो आपसे इसके पास से जो ये रास्ता जा रहा हे उस पर जाने के लिये बोला था.

…ओये ये रास्ता हे?

हां साहब …हम इसे ही रास्ता बोलते हे …यहां पहाड़ पर सब ऐसा ही होता हे…पर साहब आप को कही चोट तो नहीं लगी ना…

नहीं लगी...मेंने अपने कपडो से धूल झाडते हुये कहा!



भाग्यशाली हो आप…

अरे काहे का भाग्य …देखा मदिंर तक भी नहीं पहुच पाया।

अरे साहब महादेव ने चाहा तो अभी भी आप मदिंर जा सकते…

क्या फिर से उपर चढने को बोल रहे हो…अपुन पागल नहीं हे…तेरी बांतो में अब में नहीं आने वाला…

आरे नई साहब इससे भी आसान रास्ता…वो जो उधर नीचे देख रहे हे. वहां से सीढियां उपर जाती हे…आप आसानी से मदिंर पहुंच जाओगे…जल्दी जाओगे तो हो सकता हे आपको कोइ साथ जाने वाला भी मिल जये.

अरे ये पहले क्यों नहीं बताया …

अरे साहब यह सीधा रास्ता था ना!

उससे बहस करना ठिक नहीं लगा. अभी भी मदिंर तक जाने की आस थी…मेने उससे विदा ली और तेजी से नये रास्ते के लिये चल दिया।

सामने सीमेंट की सीढीयां…आसमान पर चाँद आ गया हे…शाम का धुधली रोशनी पर सब कुछ साफ दिखाई दे रहा हे. आसान सी दिखती सीढीयों की चढाई. मेरे पास पेसिल टार्च हे…रात की ट्रेकिंग का मन बना ही लिया. चाँदनी रात में ट्रेक करने का मजा ही कुछ और हे मैं इसे खोना नहीं चाह रहा। मेरे पास आग जलने के लिये माचिस है, रात के खाने का पूरा इतिंजाम है, मुझे चिंता की कोई बात दिखाई नहीं दी.

मैं अकेला ही सीढीया चढने लगा…15 मिनिट बाद ही सीमेंट की सीढीयों की जगह अब बस पत्थर थे…मैं पसीने से लथ-पथ धीरे धीरे उपर चढता रहा, आगे बढता रहा

अब रास्ता घूमकर पहाडी के पीछे आ गया 2 घंटे गुजर गये पर मदिंर अब तक नहीं आया....और ये क्या यह अँधेरा केसे घिर रहा हे…उपर सिर उठाया तो चांद को पहाडी के पीछे पाया …अब ये क्या नई मुसीबत हे इस बारे मे तो मेने सोचा ही नहीं था मुझे लगा था की चाँदनी रात मेरा साथ देगी। पर क्या मालूम था की चाँद इस तरह पहाडी के पीछे ओझल हो जायेगा। मेरे एक तरफ खड़ा पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खडी ढलान हे। चारोंओर सूखी घास. कही कोई रुकने भर की भी जगह नहीं. अब मेरे चारो और घुप्प अँधेरा हे। सन्नाटे को चीरती जंगली जानवरों की आवाज। मेरे अदंर डर समाने लगा। मुझे बार-बार उस आदवासी पर गुस्सा आ रहा हे …एक बार फिर उसने मुझे खतरे में डाल दिया।

मैं हिम्मत कर रात बिताने भर के लिये कोई ठीक जगह तलाशने के लिये टार्च जलाता हू…उसकी पतली सी रोशनी में मुझे अपने चारों सूखी लम्बी घास ओर कंटीली झाडियां… घने जंगल का अहसाहस होता है। मैं जगह की तलाश में किसी तरह टार्च की रोशनी में कदम बढता हू।

एक चट्टान के सहारे थोडी सी समतल जगह मिली. मेने कुछ सूखी घास तोडी और उसे जलाने के लिये माचिस जेब से निकाली। जेसे ही मैं तीली जलाकर नीचे झुका सर सराहट करता हुआ कोइ मेरे पेरों के बीच से निकल गया…तीली भी बुझ गई…पता नहीं क्यों लगा जेसे अभी अभी कोई जहरीला सांप मेरे पास से गुजरा हे। सर्द डर की लहर मेरी रीढ से होकर गुजर गई।

डर मेरे उपर हावी होने लगा। मैं बार बार अपने को कोसने लगा. इस बार मेने साथ लाई मोमबत्ती जलाइ पर उससे भी आग नहीं जला पाया …वो भी बार बार बुझ जाती। अंधेरे में इस तरह रुकना मुझे ठिक नहीं लगा। डरे हुये मन ने जल्दी ही हार मान ली…मेने वापस जाने का एक बार फिर मन बना लिया …चाँदनी रात में एफ़ एम सुनने का भूत कब का उतर गया था। अब तो मुझे बस वापस जाना था…

टार्च के सहारे में वापस कदम बढाने लगा…एक ठोकर लगी टार्च हाथ से छिटक कर दूर जा गिरी। और में तेजी से ढलान पर फिसलता चला गया। हाथों से घास को पकडने की कोशिश में हाथ बुरी तरह छिल गये…पत्थर से पेर टकराया और में और नीचे जाने से बच गया। दोनों हाथों से घास को कस कर पकडे कर खुद को बेलेंस किया.

में पूरे जोर से चिल्ला उठा…ब…चा…ओ

रह रह कर मैं आवाज लगाता रहा. अंधेरे में कुछ समझ नहीं आ रहा …नीचे कितनी गहरी खाइ हे यह भी पता नही चल रहा…मै जेसा था वेसे ही लटका हुआ चिल्लाता रहा।

हे भगवान इस बार मुझे बचा ले… अब अगर कोइ सांप बिच्छू मुझे काट ले तो?

डर से बुरा हाल…गला बुरी तरह सूख रहा है. हातों में चुभे हुये कंटे बुरी तरह टीस मार रहे है. क्या करू...एह भगवान इस बार मुझे बचा ले...

तभी मुझे हलकी सी रोशनी दिखाई दी कोई मेरी तरफ ही आ रहा था…मैं एक बार फिर जोर से फिर चीख उठा। वो दो थे देर रात अपने गांव वापस जाते हुये उन्होने मेरी आवाज सुन ली और मुझे उपर खीच लिया.

मशाल की रोशनी में खाई की गहराई देखकर में सन्न रह गया…मेरी बोलती बंद। मेरे आशचर्य का ठिकाना ना रहा जब मेंने एक बार फिर उस आदवासी को देखा. अब में क्या बोलता जिसे ने मुझे अभी अभी अभी बचाया है उससे क्या शिकायत करता. पता चला वो अपनी एक गाय को खोज रहा था और उसने मेरे चिल्लाने की आवाह सुनी तो इस तरफ आ आ गया.

उसने इसा बार अ[पने साथ को मेरे साथ गेस्ट हाउस तक मेरे साथ जाने को कहा. पर इस हादसे के बाद आग जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. मेने नीचे ही जाना ठीक समझा। मेरी बात मानकर वो मुझे नीचे ले जाने लगे …।

रास्ते में जब रुककर वो हाथ जोडकर नमन करने लगे तो ध्यान से देखा पेड़ के सिहराने रखा एक गोल पत्थर ओर कुछ सूखे फूल. साहब यह भोलेनाथ का मदिंर हे आप भी हाथ जोडकर प्राथना कर लो…इन्होने ही आप को आज बचाया हे…

ओह तो यह मन्दिर हे…

हां सच एसे ही तो मन्दिर होते हे जंगलो में…में देरे तक हाथ जोडे खड़ा रहा। वो मुझे सडक तक छोडकर वापस मुड गये…में उन्हे ठीक से धन्यावाद भी नहीं बोल सका । यह जानकर की में अब पूरी तरह सुरक्षित हू में खुशी से उछल पडा…एक बार चांदनी रात फिर मेरे साथ थी. एफ़ एम पर आते हुइ गाने की आवाज …मैं मस्ती से गुनगुनाता वापस जाने लगा.

अजीब हे ना कुछ देर पहले मौत के इतने करीब था और अब लगा रहा है जेसे कुछ हुआ ही ना हो!

कब गेस्ट हाउस पहुचा मुझे पता ही नहीं चला। चौकीदार मेरे गंदे और फटे हुये कपडे देखकर चोंका। सब ठीक हे ना साहब… हां सब ठीक हे…और में अपने कमरे में चला गया…

बिस्तर पर लेटते ही मुझे अपनी गलतियों अहसाह्स होने लगा। मेने आज एक नहीं बहुत सारी गलतियां की हे। ट्रेक का पहला नियम की रुकने की जगह पर सूरज डूबने से पहले पहुच जाओ को नजर अदांज कर सूरज डूबने के बाद नई अनदेखी जगह पर जाने के लिये सोचा था।

चांद की चाल की तो समझ थी पर यह नहीं सोच पाया की चाँद पहाडी के पीछे भी छुप सकता है, या मैं पहाडी के अधेरी तरफ भी हो सकता हू। मेने डर को अपने उपर हावी होने दिया। पर अंत भला तो सब भला का सोचकर नींद के आगोश में चला गया। ...

तेज तूफानी हवाओं ने मुझे फिर से जगा दिया…हे भगवान क्या तूफान था…रात को अगर जंगल में आग जलाये हुये ये तूफान आया होता ॥तो क्या होता!…सोचकर में आज भी कांप जाता हू।

इस ट्रेक में मेने कई गलतिया की थी…उसके बाद भी सुरक्षित हू! मैं उन सभी को दिल से धन्यावाद देता हू जो मेरे बचने का कारण थे।



Monday, November 17, 2008

रेगीस्तान ट्रेक


गोपालसर मोड आते ही बस कंडक्टर अवाज ने लगाई...और में उतर गया...ठसाठस भरी बस से बाहर निकलते जेसे सांस में सांस आई। पर तेज गर्म हवा के थपेडों का सामना हुआ। लगा जेसे किसी ने मुझे तंदूर के अदंर झोक दिया हो। जल्दी से अपने चेहरे को टावल से कवर किया। और तेजी से बरगद के पेड़ की छांव की तरफ दौड गया। इन्दरा गांधी नहर होने के कारण पानी हे और हरियाली भी. स्टेट हाइवे से दांयी तरफ का रास्ता रेंज में जाता हे. में अपने सिर और चेहरे को फिर से ढक लेता हू. एक चाय की दुकान, एक साइकिल पंक्चंर जोडने की दुकान, एसटीडी बूथ और एक ककडी बेचने वाले का हाथ ठेला और एक परचूनी की दुकान...बस यही गोपालसर चौराहा हे… भरी दुपहर में बस चाय वाला जागता सा दिखा।


दुपहर 2 बजे हे...मुझे ले जाने के लिये कोई कार या जीप दिखाई नहीं दे रही, 

शायद, आने वाली होगी! पेड की छांव में आराम करते कुछ लोग. चायवाला मुझे देखकर मुस्कराया उसे लगा की में चाय के लिये उससे कहूगा. चलो चाय पी जाये इस बहाने उससे कुछ बात भी हो जायेगी, पर इतनी गर्मी में चाय. बोटल के खोलते गर्म पानी से तो बेहतर ही होगी. मे उसे चाय बनाने का इशारा करता हू और समान लेकर उसके पास आकर बेंच पर बेठ जाता हू. भरी तपती दुपहरी में गर्मा गर्म चाय.

साहब रेंज जायेगे क्या?

हां..

पर अभी-अभी तो एक गाडी रेंज को गई.. बस थोडी सी देर हो गई.

कोई बात नहीं मेरे लिये अलग से गाडी आयेगी...

हां साहब, बिना गाडी के थोडी ही आप जायेगे और वो हंस दिया,

18 km अभी और जाना हे तब कही जाकर गेस्ट हाउस पहुंच पायेगे. देखा एक और बस आकर रुकी, एक जवान उसमे से उतरा और तेजी से हमारी तरफ आया. उसे देखकर में समझ गया की अब मे अकेला नहीं हू...एक मुसकराहट से अजनबी पन जाता रहा..

मेने उसके लिये भी चाय बनाने को कहा. हम दोनों ही एक घंटे तक गाडी का इतिजार करते रहे.
पेड की छांव में भी जेसे आग बरस रही हे...तेज गर्म हवा...मे बार बार पानी से अपना गला तर करता हू...पर ये गाडी क्यों नहीं आई अब तक ...! वो जवान भी शायद मेरे ही भरोसे पर हे...

क्यों तुम कैसे जाओगे...!

बस साहब थोडी देर इतिजार करते हे ..कोई गाडी आती हे तो ठीक वरना पैदल मार्च...

पैदल!!..18 km पैदल.... पागल हो गये हो क्या!

वो हंस दिया...हां साहब ये पागल कर देने वाली जगह हे...आज केंप में रिपोर्ट करना हे मुझे..अगर गाडी नहीं मिली तो पैदल ही जाना होगा...एक बार जा चुका हू...फिर हम तो जवान हे...पर आप...वो भी इतने सामन के साथ..?

‘अगर गाडी नही आई तो आप क्या करेगे’.

‘अरे गाडी ना आने का सवाल ही नहीं हे’.

नहीं साहब इतना भरोसा मत किजिये यहाँ कुछ भी हो सकता हे...

अरे डरा नहीं यार ...मेने हंसते हुये कहा!

डरा नहीं रहे सच कह रहे हे...रास्ता कभी भी बंद हो जाता है..रेत के चलते फिरते टीले...ये रेत के पहाड कभी भी रास्ता बंद कर देते हे. इतनी देर से कोई गाडी आती दिखाई नहीं दी...इसलिये शक बढ रहा है!

देखिये साहब अभी 4 बजे यहां से आखरी बस शहर जायेगी. आप चाहो तो वापस जा सकते हो..उसके बाद शहर जाने का कोई साधन नहीं...वेसे भी यहां रात में रुकने का कोई इतिंजाम नहीं....
देखो भाइ...वापस जाने का तो सवाल ही नहीं...रही गाडी की बात, तो हो सकता हे किसी कारण से देर हो रही हो...वो आयेगी...यार यहां मोबाइल भी तो काम नही कर रहा हे
हां साहब ना रेंज में काम करेगा ना यहां पर...बस इस std बूथ का ही सहारा हे...इसी से रेंज मे बात हो सकती है 

तो करके देखो 

टेलीफोन डेड है?


आखरी बस भी आकर चली गई..अपनी जिद्द या फिर ना समझी के कारण मे वापस नाही गया 

गाडी को ना आना था ना आई...शाम के 5 बज गये..जो लोग रुके हुये थे वो भी चले दिये...चाय वाला भी दुकान बंद करने लगा...जवान भी जाने के लिये बेचेन होने लगा..उसे हर हाल में आज रिपोर्ट करना हे ..

साहब अब में नहीं रुक सकता आप भी मेरे साथ चलिये कहो तो आप का सामान् मैं उठा लेता हू...मेरे पास एक लेप टाप बेग और एक ट्राली बेग और पानी की बोटल.. प्लास्ट्क की थेली में कुछ खाने का सामन.

मुझे भी चिंता ने आ घेरा...गाडी क्यों नही आई..मुझे बोला गया था की गाडी मेरा इतिंजार करेगी...एक बात साफ हो गई की अब यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं...बस अब हम दो....साहब एक काम करते हे धीरे धीरे आगे बडते हे ...अगर कोई गाडी रास्ते में मिल गई तो ठीक वरना 9-10 बजे तक पहुंच ही जायेगे.

उसकी बात में दम था...अब यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं...मुझे नहीं मालूम उन्होने गाडी क्यों नहीं भेजी..जो हुआ बुरा हुआ...अब हमें ही कुछ करना था..

शाम के 5 बज गये पर अभी भी हवा बेहद गर्म ...रेत से निकलती आग ...जवान के पास बस एक रग-शेक बेग उसने उसे कंधे पर लगाया और एक पानी की बोटल...अब वो जाने के लिये तैयार हे ...... आपना बेग मुझे दीजिये.... आप बिना बेग थोडा तेज चल पायेगे...मेरा ही फायदा होगा.. उसने हंसते हुये कहा....
 
लेपटाप मेने सँभाला, उसने Trolly बेग को ले लिया उसमे लगे पहिये..वो आसानी से उसे सड़क पर चलाने लगा...भला हो जिसने पहिये लगे बेग बनाये..जरूर वो एसे ही किसी जगह फंसा होगा और पहिये का ख्याल आया होगा. आदि मानव ने पहिया बनाया और VIP वालों ने पहिये वाला trolly bag...

रेत के पीछे छुपता सूरज का लाल गोला...आशचर्य मुगध और चकित सा उसे डूबता देखता रह गया...जो सारे दिन से आग बरसा रहा था..अब कितना शांत होकर विदा ले रहा हे. सूरज डूबते ही रेत तेजी से ठंडी होने लगी...आसमान में बदलते रंगो की छटा और किशन का गुनगुनाते हुये मस्ती से चलना ...देखा 1 घंटे में ही हम ने 5 km का रास्ता तय कर लिया. अभी भी बार बार पानी पी रहा हू। 2 लीटर की बोटल खत्म होने को आई..अब गला सूखने लगा.. किशन भी पसीने से नहा गया...मुझे देखकर मुस्कराया...

साहब..थक तो नहीं गये...

नहीं मेने अपनी सांसो को काबू में लेते हुये, मेने बोटल से चाय की तरह गर्म पानी के 2 घूटं पीया देखो किशन सामने गांव दिखाइ दे रहा है।

साहब इसे ही गोपाल सर गांव कहते हे इस रास्ते का सबसे बढा गांव. यहाँ से हो सकता हे कोई गाडी मिल जाये..कोई उट वाल जाने को तैयार हो जाये.. 20-25 घर का छोटा सा गांव...जमीन में शायद थोडा पानी हे। सब नहर के कारण. कुछ खेत दिखाई दे रहे हे. और खजूर के बहुत सारे पेड भी. गांव में एक भी ऊठ गाडी दिखाई नहीं दी...सब शहर में जो गये हे देर रात वापस आयेगे..अब क्या करे... अब गाडी मिलने की सारी उम्मीद खत्म हो गई हे...समझ गये सारा रास्ता पेदल ही जाना होगा...

घरो से उठता धुआ..शाम के खाने की तैयारी.....हम लोग थोडा सुस्ताने के बाद फिर से चल दिये...पूरब से उगता चाँद...मंत्र मुग्ध ..शाम के 7 बज गये पर अभी भी काफी रोशनी है। हम चलते रहे …चलते रहे गांव में पानी मिल गया था…वेसे भी अब हवा में ठडंक थी। पूर्व में चाँद उग आया… रेत पर बिखरती चांदनी...

अब मे कैसे बयान करू...बस देखता ही रह गया. शायद आज पूर्णिमा हे. अंधेरा होते–होते हमने आधे से ज्यादा रास्ता तय कर लिया...बस साहब 6-7 km के बाद चौकी मिल जायेगी..हो सकता हे वहां से हमे कुछ मदद मिल जाये.

नहीं किशन भाई आज मदद की कोई उम्मीद मत दिलाओ...मे हंस दिया...वो कुछ ना कुछ गाता रहा... देखा रास्ते के किनारे बंजारे रेत पर डेरा जमाये हुये हे...सडक के किनारे खाट पर हुक्का गुडगुडाता बूढा....मेने उसे नमस्ते की... तेज चलने के कारण पसीने से नहाया बदन..उसने हमें रुकने का इशारा किया

आप लोग पैदल..!!

हां दाद्दा आज गाडी लेने नहीं आई...

मालूम हे ... आज रास्ता बंद हे..आगे रेत ने सारा रास्ता बंद कर दिया...दुपहर बाद कोई गाडी नहीं निकली...मेरे लडके उधर ही काम पर गये हे...

ओह तो यह बात हे...

आप लोग थक गये हो। आज रात आराम करो..सुबह किसी गाडी से चले जाना..नही तो मेरी ऊठ गाडी आपको छोड आयेगी..

दद्दू की शुद्ध हिंदी सुनकर में चोंक गया...किशन थोडा सुस्ता लेते हे...उसने अपने पास ही दूसरी खाट लगवा दी...पता चला वो सेना में कभी जवान था...उसके लडके भी रेंज में ठेका लेते हे,..थोडी देर सुस्ताने के बाद किशन जाने की जिद्द करने लगा..उसे हर हाल में आज रिपोर्ट जो करना था...पर में उस बुजुर्ग के निमंत्रण को ना ठुकरा सका..चूल्हे पर सिकती रोटिया..भूख भडक उठी...उपर से थकान और चांदनी रात... यह दिलचस्प बुजर्ग...उससे बहुत सारी बाते करनी थी...मेने किशन को अपनी जरुरी जानकारी देकर उसे विदा किया...और में रुक गया.

खुली जगह पर लगा डेरा..सेकडो की तादाद में भेडे...4-5 ऊठ गाडी पर लदा घर का समान.... शाम का खाना खाते और मस्ती करते 10-12 बच्चे, 2 जलते चूल्हे..और उनके किनारे बेठी औरते. ये भरी दुपहर मे भी खुली जमीन पर डेरा लगाते हे. किसी पेड के नीचे डेरा लगाना इन्हे पसंद नही. तपती धूप मे उनके बच्चे यों रेत पर खेलते रहते हे जेसे दिस्मबर की सर्द सुबह मे धूप का आनंद ले रहे हो. अभी तक इन्हे दूर से ही देखा था..आज पहले बार इनके पास बैठा हू,,,किशन चला गया...

दद्दू...इस तपते रेगीस्तान मे बसे लोगों को लेकर बहुत से सवाल हे...आपने तो सेना की जिदंगी जी हे...शहर में भी रहे हो..वापस इस जिदंगी में आ गये कुछ समझ नहीं आया. एसा क्या हे यहां कि, लोगों यहा बसे हुये हे...क्या ये व्यवसायिक मजबूरी हे या फिर जमीन से जुडना हमारी फितरत ...कि जो जहां पैदा हुआ उसी जगह से जुड गया..उसे उसी जगह से प्यार हो गया. जीवन देने वाला एसा कुछ भी यहां नही हे...फिर भी आप यहां हो..और यह बंजारा जिदंगी..!

साहब आपने सच्च कहा...अब अगर इस जगह के बारे में समझना हे तो यहाँ कुछ दिन रह कर देखो. या तो भाग जाओगे...या फिर रुक जाओगे...अगर रुके तो सारे सवालों का जबाब तुम्हे खुद मिल जायेगा...और अगर भाग खडे हुये तो इसका मतलब यह की आपको मेरी बात समझ नहीं आयेगी...उसने गोल मोल जबाब दिया...और अपनी मूछों पर ताव देता हुआ मुस्कराने लगा.

उसकी बातों में दम हे...पर मेरा भूख से बुरा हाल...ब्च्चे मुझे घेर कर खडे हो गये..मै उन्हें टाफी देता हू...वो खुशी खुशी ले लेते हे...

आते ही बच्चो को बिगाडने लगी आप...वो हंसते हुये बोला.

अच्छा अब हाथ मूह धो लो ...और खाना खाओ...उसने पानी का लोटा मेरी और बढाते हुये कहा...

दद्दा एक बात बोलो आप पानी कहां से लाते हो।

साहब लडके उठ गाडि से रास्ते में जो गांव मिला था ना वहां से ले आते हे।

वो तो ठीक हे पर इतने सारे लोग फिर तुम्हारे जानवर भी हे नहाने धोने का काम …पानी तो बहुत लगता होगा।

नहीं साहब हमने कम पानी में जिंदा रहना सीख लिया हे कई बार तो एक बालटी पानी से ही हम सब का गुजारा हो जाता हे।

बस एक बाल्टी पानी …???दद्दू आपको मालूम हे अभी अभी 2-3 घटे में ही मेने इस पूरी बोतल का पानी पी लिया वो भी शाम के समय में।

जिंदगी सब सिखा देती हे साहब! जानवर क्या और आदमी क्या सब पानी का मोल जानते हे।

खाना शानदार रहा ..और शानदार रही उनकी मेहमानबाजी...देर रात तक वो गाते बजाते रहे..कुछ समझा..और बहुत कुछ ना समझ में आने वाले गीत संगीत...ठंडी रेत पर, नंगे पाँव घूमने लगा ...

साह्ब राते ठंडी होती हे...और खतरनाक भी...अकसर सांप और बिच्छू निकलते रहते हे. जरा देखकर चलना...

वो चाहे तो आसानी से इससे अच्छी जगह बस सकते हे पर फिर भी यहां हे और खुश हे..जिदगी को कुछ एसा बना लिया की, जो हे, जितना हे, उसी मे खुश...ये आधी बालटी पानी...मे 2 दिन निकाल देते हे...और हम 2 घंटे नही निकाल पाते. अपनी शारारिक जरूरतो को उसी हिसाब से ढाल लिया. खुश होने और खुश रहने के अपने- अपने तरीके...एक ही बात समझ आयी की कष्ट और दुख तुलनात्मक होता हे. अब यह हम पर हे की हम किससे तुलना करते हे.

सुबह 4 बजे ही ऊठों की आवाज ने मुझे जगा दिया...वो अभी अभी वापस आये हे, रास्ता साफ हो गया हे..सुबह होने को हे...पूर्व में लाली हवा में ठंडक...सूरज की सुनहरी किरणों के साथ भेड का दूध और रोटी का नाश्ता...अब ऊट की सवारी का आनंद लेने के लिये तैयार हू..

अरे तुम ...स्वामी की आंखे मुझे इतनी सुबह देखकर आश्चर्य से फेल गई. और फिर जेसे उसे कुछ समझ आ गया हो वो खुशी से चीख उठा ....और मुझे से कस कर लिपट गया...

मुझे कुछ समझ नही आया ...

क्या हुआ...!!

यार कल तुम्हे आना था..रास्ता बंद था तो गाडी नहीं भेज पाये..सब बोले की तुम गाडी नहीं देखकर 4 बजे वाली बस से वापस चले जाओगे...पर मुझे पता नहीं क्यों लगा की तुम नहीं जाओगे और किसी भी तरह बेस पर आजाओगे..बात की बात...हम लोगों में शर्त लग गई थी...अब जब रात तक तुम नहीं आये तो में यह शर्त के 500/- हार गया.

..पर अब लग रहा हे की तुम सच में वापस नहीं गये थे...तभी तो इतने सुबह बेस पर हो...हां तुमने सही कहा ...

पर मेरी खबर लेकर जवान नहीं आया आपके पास.?

नहीं तो!

हो सकता हे वो दूसरी रेजीमेंट का जवान रहा होगा..और फिर रात थी..जाने दो... मेरा हाथ पकडकर मेस ले जाने लगा...चलो अभी तो 500/- वसूल किये जाये।

देखा सब नाश्ते पर जमे हे..मुझे देखकर हेरत में...स्वामी को 500 मिल गये..वो जीत गया था...आज रात को जीत की पार्टी तय हे...पर उन्हे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा की में रात भर बंजारो के साथ था. उन्हें अभी भी लग रहा हे की में शहर से कार किराये पर लेकर सीधे बेस तक आ गया हू. वो बाहर आकर पक्का करते हे की में कोई गाडी लेकर नहीं आया हू.....और फिर बोले ..एक और सिरफिरा...