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Wednesday, March 15, 2017

सफर (खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट)

सफर (खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट)
सफर (खंण्ड-2/16 देवदूत)
सफर ( खंण्ड-3/16 उलझन)
सफर (खंण्ड-4/16 स्वर्ग-नरक)
सफर (खंण्ड-5/16 नया आयाम)
सफर (खंण्ड-6/16 समझ)
सफर (खंण्ड-7/16 धरर्ती पर वापसी)
सफर (खंण्ड-8/16 हे इश्वर अभी क्यों नही)
सफर (खंण्ड-9/16 कल्पना की उडान)
सफर (खंण्ड-10/16 संगीत)
सफर (खंड-11/16 इश्वर से मिलने की जिद्द)
सफर (खंड -12/16 नर्क का अहसाहस)
सफर (खंण्ड- 13/16 दर्द क्यों)
सफर (खंण्ड- 14/16 जीवात्मा)
सफर (खंण्ड- 15/16 पुनर्जन्म)
सफर (खंण्ड- 16/16 पुनर्जन्म केसे)



निवेदन...

जरा एक मिनिट ठहरीये ... इसे लिखते समय मेने इश्वर और स्वर्ग के बारे मे बहुत कुछ कहा है जो पूर्व धारणाओं पर आधारित बस एक कल्पना मात्र है. मै साफ कर देना चाहता हू की यह उपन्यास स्वर्ग और इश्वर के बारे मे कोइ आकलन नही है. यह सच है की मेने इश्वर से बहुत सारे सवाल जीवन और मृत्यु और उसके बाद की संभावनाओं के बारे मे किये है पर उस तरफ से अभी तक मुझे इस बारे मे कोइ सटीक जबाब नही मिला है जिससे मे इस बारे मे पक्के तोर पर कुछ  कह  सकू.

मै या मेरी आत्मा या फिर जीव आत्मा , है तो बस यादों और अनुभव का गुच्छा. कुछ का मानना है की यह शरीर के खत्म होते ही यह भी खत्म हो जाता है. मै और मेरे जेसे लाखों और करोडो लोग एसा नही मानते. कम से कम जो लोग डार्विन थ्योरी ओफ इवोल्यूशन को मानते है वो तो यह मान ही नही सकते की शरीर के साथ ही सब कुछ खत्म हो जाता है. क्योंकी  यह थ्योरी कहती है की जीवन दर जीवन हम अपने अनुभव से अपनी दुनिया banaate चले गये. अपने शरीर को बदलते चले गये.  

यह विश्वास और संस्कार की हमारी चेतना शरीर के खत्म होने के बाद भी बनी रहती है, शरीर से विदा होने के बाद भी हमारे वजूद को बनाये रखता है. वरना जो यह  विश्वास नही करते उंनकी चेतना उस धुये के बादल की तरह है जो जरा से हवा के झोंके के साथ हवा मे विलीन हो जाते है. और असंख्य हिस्सों मे बटकर दूसरी चेतनाओ मे विलीन हो जाती है. या फिर यों ही समय और स्पेस की प्लेन मे अपनी ही यादों की धुध मे खोई रहती है.

आगे का सफर उन्ही के लिये सभंव होता है जो इस सच को समझ लेते है की शरीर के साथ सब कुछ जो इस जगत मे था वो उनके लिये  खत्म हो गया है और अब आगे का सफर तय करना है.  

पुनर्जन्म आज एक धार्मिक सिद्धान्त मात्र नहीं है। इस पर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों एवं परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थानों में ठोस कार्य हुआ है। वर्तमान में यह अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य के रुप में स्वीकारा जा चुका है। पुनरागमन को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रमाण आज विद्यमान हैं। इनमें से सबसे बड़ा प्रमाण ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है। विज्ञान के सर्वमान्य संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा का किसी भी अवस्था में विनाश नहीं होता है, मात्र ऊर्जा का रुप परिवर्तन हो सकता है। अर्थात जिस प्रकार ऊर्जा नष्ट नहीं होती, वैसे ही चेतना का नाश नहीं हो सकता। चेतना को ऊर्जा से भी उच्चतम अवस्था कह सकते हैं।

चेतन सत्ता का एक शरीर से निकल कर नए शरीर में प्रवेश संभव है। पुनर्जन्म का भी यही सिद्धांत है।  

एसे सेकडो उदाहरण है जिन से पता चलेगा की उनके घर खानदान मे कोइ संगीतकार नही था, डांसर नही था, पेंटर नही था  और बच्चे ने विपरीत परिस्थितियों मे भी वो सब सीखने की जिद्द की और मौका मिलने पर वो उसने इस सहजता से किया जेसे उसे पहले से ही सब पता हो.

यही वजह है की मोर्जाट चार वर्ष की अवस्था में संगीत कम्पोज कर सकता था। ‘लार्ड मेकाले’  और विचारक ‘मील’  चलना सीखने से पूर्व लिखना सीख गए थे। वैज्ञानिक ‘जान गास’ तब तीन वर्ष का था तभी अपने पिताजी की गणितीय त्रुटियों को ठीक करता था। इससे प्रकट है कि पूर्व में ऐसे बालकों को अपने क्षेत्र में विशेष महारथ हासिल थी। तभी वर्तमान जीवन में संस्कार मौजूद रहे। प्रथमतः शिशु जन्म लेते ही रोता है। स्तनपान करने पर चुप हो जाता है। कष्ट में रोना और अनुकूल स्थिति में प्रसन्नता प्रकट करता है। चौपाया स्वत: ही चलना सीख जाता है। पक्षी आसानी से उडना सीख जाते है. इस तरह की घटनाएं हमें विवश करती हैं यह सोचने के लिए कि जीव पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आता है। वरन इन नन्हें शिशुओं को कौन सिखाता है.

इंटरनेट  पर एसे हजारों वैज्ञानिक शोध मिल जायेगे जिस मे उन्होने पिछले जन्म की यादों का मामलों पर खोजबीन की है. उसमे से बहुत से मामले वो अब तक झुठला नही सके. अगर एक भी मामला असली मे सही है तो फिर मेरे पूर्वजन्म के कथन को बल मिलता है. यह सच है की एसी घटनाओं मे जेसे जेसे बच्चे बढे होते जाते है वो भूलते जाते है जेसे हम अपने सपनों को भूल जाते है. जैसे-जैसे वो संसार में व्यस्त होते जाते हैं वो सूक्ष्म लोकों और पृथ्वी पर अपने पिछले जन्मों को भूल जाते हैं । हमारी भौतिक इंद्रियां यानी पंचज्ञानेंद्रियां, छठी ज्ञानेंद्रिय उन यादों को पूरी तरह से ढंक लेती हैं । यह हम पर ईश्वर की कृपा ही है कि उन्होंने वह व्यवस्था की है कि हम पिछले जन्मों के विषय में भूल जाते हैं । अन्यथा अपने इस जीवन के क्रियाकलापों को संभालते हुए पूर्वजन्म के संबन्धों का भी स्मरण रहना कितना कष्टप्रद होता ।

कल्पना करो कि कोई बच्चा यदि पानी में जाने से डरता है, तो हो सकता है उसके मां बाप और रिश्तेदारों ने उसके अदंर यह भय बैठाया होगा. अगर एसा नही है तो यह तय है कि पिछले जन्म में उसकी मौत पानी में डूबने से हुई होगी, या फिर उसकी मौत के पीछे पानी ही कोई कारण रहा होगा। इसी तरह हम सब सांप से डरते है कुछ तो इस कदर डरते है की उसका चित्र देखाकर भी उनका चेहरा भय से सफेद हो जाता है. जब की इस जन्म मे उन्होने कभी सांपो का सामना नही किया. वंही कुछ आसानी से सांप से एसे खेलते है जेसे वो कोइ रस्सी का टुकडा हो. आप ओरों की छोडीये आप अपने अदंर मोजूद डर का विशलेष्ण करेगे तो कुछ डर आप एसे पायेगे जिस का कोइ सिर पैर नही है. 

चिकित्सा विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि हमारी कई आदतें और परेशानियां पिछले जन्मों से जुड़ी होती हैं। कई बार हमारे सामने ऐसी चीज़ें आती है या ऐसी घटनाएं घटती हैं, जो होती तो पहली बार हैं लेकिन हमें महसूस होता है कि इस तरह की परिस्थिति से हम पहले भी गुजर चुके हैं। चिकित्सा विज्ञान इसे हमारे अवचेतन मन की यात्रा मानता है, ऐसी स्मृतियां जो पूर्व जन्मों से जुड़ी हैं। बहरहाल पुनर्जन्म अभी भी एक अबूझ पहेली की तरह ही हमारे सामने है। ज्योतिष, धर्म और चिकित्सा विज्ञान ने इसे खुले रूप से या दबी जुबान से स्वीकारा तो है लेकिन इसे अभी पूरी तरह मान्यता नहीं दी है क्रमिक विकास सिद्धांत में एक और दलील दी जाती है कि उत्त्पत्ति अनियमितआकस्मिकनिरुद्देश्यबेतरतीबक्रम रहित, और  सहसा उत्पन्न घटनाओं का परिणाम है और प्राणी का शरीर विकास और बदलाव इन्ही घटनाओं का परिणाम है..मुझे इसमे कोई दम नजर नही आती.  इतना परिष्कृतजटिल और विवेकी शरीर सिर्फ सहसा उत्पन्न घटनाओं का परिणाम है.

क्या आप यह मानने को तैयार है की लोहे का ढेर, कुछ कांच और रबर के सहसा अचानक बेतरतीव मेल से कार बन सकती है. नही ना..अगर कार जेसी साधारण चीज अगर बेतरतीव मेल का परिणाम नहीं हो सकती तो फिर चारों तरफ दिखाई देते करोडो जीव कैसे अनियमितआकस्मिकनिरुद्देश्य घटनाओ का प्ररिणाम हो सकते है.

 

इसके लिये यादों और अनुभव का बने रहना जरूरी होगा जो जीवन के बाद भी बना रहे. क्योंकी इवोल्यूश्न एक ही जन्म मे संभव नही होता है वो जन्मों जन्मों तक चलने वाली निरतंर और बहुत ही धीमी प्रक्रिया है. जो survival of fittest  के साथ जुडी है. जिन्होने अपनी चेतना का विकास कर अपने शरीर मे जरूरी फेर बदल किये वही आगे जिंदा रह सके. बाकी सब इतिहास बन गये.  

हमारा भौतिक शरीर पांच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बना है। मृत्यु के पश्चात शरीर पुन: इन्हीं पांचों तत्वों में विलिन हो जाता है और चेतना  शरीर से  मुक्त हो जाती  है। एक समय तक मुक्त रहने के पश्चात आत्मा अपने पूर्व कर्मों एवं संस्कारों के अनुसार पुन: एक नया शरीर प्राप्त कर सकती है। यह उसका अपना निर्णय होता है. इसी तरह  जन्म मृत्यु के चक्र चलता रहता है।

मै कुछ स्थापित नहीं करना चाहता...मुझे जो पता था ईमानदारी से रख दिया है. किसी पक्ष के भी तर्क मुझे आसानी से पचते नहीं. विज्ञान का विद्यार्थी हूँ, इसलिये सच तो मै भी जानना चाहता हूँ,,,.... आप सभी से एक अनुरोध है....आप शोध करें,,अनुभव लिखें.... मुझे जो समझ आया मैंने लिखा है,,,...लिखने के पीछे कारण आप लोगों से मार्गदर्शन की ही है. जब तक सच जान नही लेता खुद को अज्ञानी ही समझूगा, खोज लगातार जारी रहेगी. मन सवाल करता रहेगा और उसके जबाब की खोज मे लगा रहेगा. सहिष्णु होकर सभी संभावनाओं पर विचार करते रहना चाहिये. भला को इंटरनेट का की इतनी सारी चेतानाओं के साथ इतनी आसानी से संपर्क मे हू .

मै किसी के विशवास पर चोट नही कर रहा हू की वो कंहा से आया है और मौत के बाद उसे कंहा जाना है. ना ही मै कुछ स्थापित नहीं करना चाहता...यह तो बस मौत के बाद की असीम संभवनाओं में से एक की कल्पना है, जिसने जीवन और मौत के पहलुओं को बस छुआ भर है. उम्मीद है इसे पढते समय आप अपनी कल्पनाओं के पंख को पूरी तरह खोलते हुये मेरा साथ एक नये सफर पर चलेगे.

 


खंण्ड-1/16 एक्सीडेंट


रात के 11 बजे एफ एम पर गाने सुनते हुआ अपनी कार हाइवे पर तेजी से कार चला रहा हू. सडक के बीच बनी सफेद पट्टीया का सम्मोहन हे या पार्टी का असर मेरी आंखे भारी हो रही है. मेने सुस्ती को दूर भगाने के लिये रेडियो की आवाज को तेज कर,  दरवाजे का सीसा  नीचे किया. ठंडी हवा का तेज झोका मेरे चेहरे से टकराया. मुझे ठंडी हवा अच्छी लगी. दूर तक खाली सडक, मेने एक्सीलेटर पर पेर का दबाब बढाया. नजर स्पीडोमीटर पर गई... 140 की स्पीड के निशान पर नीडल के टच करते ही मेरे सारे शरीर मे एक झुरझुरी महसूस हुई.

140 पर भी कार सधी हुई चल रही है सारे शरीर मे मस्ती और रोमांच का नशा. तेजी से गुजरती सफेद पट्टीयां पूरा ध्यान सडक और कान गाने की धुन पर, मस्ती और रोमांच का नशा. काश मे इसे और तेज चला पाता. मेने एक्सीलेटर पूरा दबाया हुआ है .

सामने देखा सडक पर हल्की सी धुंध है, इससे पहले भी इसी तरह की धुंध मेने  कई बार पार की है. अकसर सर्दी के दिनों मे एसा होता रहता है ..धुंध के बावजूद मुझे रास्ता दूर तक साफ दिखाई दे रहा है मेने अपनी रफ्तार को कायम रखा. और हल्की धुंध कार घुस गई.

एक तेज धमाके के साथ गाडी हवा मे बहुत उपर तक उछल गई. मै कुछ समझ पाता उससे पहले एक साथ बहुत सारे विंड स्क्रीन के कांच के टुकडे मेरे चेहरे से टकराये ...एक तीखा दर्द मेने अपनी पसलियों मे भी महसूस किया. गाडी ने हवा मे एक के बाद एक कई बार गुलाटी ली. भला हो की मेने सीट बेल्ट बांधी हुई थी जिससे मेरा बदन सीट के साथ चिपका रहा. मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा है की यह अचानक क्या हो गया है. ब्लास्ट के साथ एयर बेग फूल कर मेरे से चिपक गया. अभी अच्छी भली तो गाडी चल रही थी. अचानक यह सब क्या हो गया.

एक बार फिर तेज धमाके के साथ गाडी की छत जमीन से टकराइ और छत मेरे सिर से. लगा जेसे किसी ने जबरदस्त हथोडा मेरे सिर पर मारा हो. गरदन की हड्डीयों की कडकडाती आवाज लगा जेसे मेरी गरदन टूट गई, दर्द का महाविस्फोट...  एक गहरी खामोशी या शायद बेहोशी मुझे नही मालुम.

मेन खुद को एक कमरे मे खडा पाया. उसकी दिवारे सफेद रंग की थी. मेरा असंमजस ओर बढ गया जब मेने देखा की उसमे ना कोइ खिडकी है और ना कोइ दरवाजा  है. मुझे कुछ समझ नही आ रहा. मेने अपने दिमाग पर जोर डाला. ओह  याद आया मेरा तो भयानक एक्सीडेंट हुआ था. और मुझे गंभीर चोट भी आइ थी. मेने अपने हाथ पांव को देखा सब सही सलामत है ...यंहा तक की मेने अपने चेहरे पर भी किसी चोट को महसूस नही किया. मुझे अच्छी तरह याद है की जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था तो मेरे सिर और गरदन पर गहरी चोट लगी थी, सीने मे भी तो पसलियों को तोडता हुआ कुछ घुसा था. मेन सभी जगह हाथ लगाकर देखा सब ठीक लगा. मै जितना सोच रहा हू , उलझता जा रहा हू. ना तो मुझे कोइ चोट लगी थी और नाही यह कोइ अस्पताल का कमरा है. मै  यंहा पहुचा केसे!

कंही यह सपना तो नही है. क्योंकी एसा केसे हो सकता है की मेरा एक्सीडेंट हो ओर मेरे शरीर पर कोइ चोट ना हो. जब की मुझे अच्छी तरह याद है की मुझे गंभीर चोटे लगी थी. मै यंहा क्यों हू मुझे यंहा कोन लाया है.

मै असंमजस में अपनी गरदन घुमाकर चारों ओर देखता हू. मेने ध्यान से एक बार फिर अपने  चारो तरफ देखा  इस बार मुझे दिवार के साथ कुछ सीढीयां भी देखाई दे रही है इनमे से कुछ नीचे की ओर कुछ उपर की ओर जा रही है. 

ध्यान से देखा... बांयी तरफ एक दरवाजा भी है जो पूरी तरह बंद है. एसा लग रहा है जेसे मे किसी मेट्रो स्टेशन के प्लेट फार्म पर खडा हू ओर  मुझे यंहा से मेट्रो ट्रेन पकडनी है पर ना तो यहा मेरे सिवाय कोइ दूसरा यात्री है ना ही रेल की पटरी दिखाइ दे रही है ना टिकट बूथ ना गार्ड ... पूरी तरह शांत माहोल कोइ हलचल नही . एक बात ओर मुझे अजीब लग रही है की इस कमरे मे कंही से भी रोशनी आती नही दिख रही फिर भी कमरा पूरी तरह रोशन है. मै कमरे मे चहल कदमी करने लगा. मुझे अपनी पदचाप की आवाज साफ सुनाई दे रही है वेसे ही जेसे ग्रेनाइट फ्लोर पर चलने से होती है.

हेलो ..मेने किसी तरह हिम्मत कर आवाज लगाइ... कोइ है जो मुझे बताये की इस समय मै कंहा हू और मे यंहा केसे आया....मुझे मेरी ही आवाज गूंजती हुई सुनाइ दे रही है, उसी तरह जिस तरह किसी खाली कमरे मे सुनाइ देती है. मुझे कुछ समझ नही आ रहा है. इतना  सब हो जाने के बावजूद न मेरे मन मे कोइ डर है ना कोइ चिंता, पर एक जिज्ञासा जरूर है यह जानने की आखिर माजरा क्या है. यह सपना नही हो सकता क्योंकी सपने मे पहले की घटना इस तरह कोइ याद थोडे ही रहती है...अगर सपना नही तो फिर यह क्या है. 

मै एक्सीडेंट को याद करने लगा ..मुझे अच्छी तरह याद है एक्सीडेंट के समय मै 140 के उपर कार चला रहा था. जब मे धुंध से गुजर रहा था तो मेने कुछ देखा था. मै दिमाग पर जोर देने लगा की वो क्या था. हां शायद वो किसी ट्रेक्टर ट्राली का पिछवाडा था. यस मे सही हू वो ट्रेक्टर की  ट्राली ही थी. जो धुंध मे घुल मिल गई और मुझे दिखाई नही दी . 

ओह तो कार उस से टकराई थी. मै कुछ कर पाता उससे पहले ही कार उस से जा टकाराई थी. टक्कर इतनी जोरदार थी की कार हवा मे कई फुट उपर हवा मे उछल गई थी. उसके बाद उसने हवा मे ही 2 से 3 गुलाटी ली थी और छत जमीन से टकराई थी. जिस तरह का पागलपन मेरे उपर था ...140 की स्पीड..यह सब तो होना ही था. मेरे सिर, गरदन और सीने पर जबरदस्त चोट लगी थी .. उसके बाद मुझे कुछ याद नही...अब मे इस कमरे मे हू... कितना समय गुजर गया इसका भी मुझे कोइ अंदाजा नही हो पा रहा है.

मेने एक बार फिर फर्श पर नजर दौडाइ अल्ट्रा क्लीन चमकदार फ्लोर.. कंही कोइ दाग धब्बा नही. मेने जोर से सांस खीची ..मुझे हवा जाती हुई महसूस नही हुई ना ही मुझे कोइ गंध ही महसूस हुई.

मेने एक बात पर ओर गोर किया की मेने इतनी देर मे कोई सांस नही ली थी. उसके बाबजूद ना तो मुझे किसी तरह की घुटन महसूस हुई ना किसी तरह की कोइ बैचेनी महसूस हुई.. मेने अपने ह्रदय की धडकन महसूस करनी चाही कुछ भी मुझे महसूस नही हुआ.

मेने धडकन को महसूस करने के लिये बार बार हाथों को बांयी सीने पर रखा मुझे कुछ भी महसूस नही हुआ. मेने कलाइ पर चेक किया गरदन पर चेक किया हर उस जगह चेक किया जिस जगह मुझे पहले धडकन महसूस होती थी पर मुझे कंही भी धडकन सुनाई नही दी. इतनी देर से ना तो दिल धडक रहा है ना ही सांस ले रहा हू फिर भी आराम से हू

इस पहेली ने मुझे उलझा कर रख दिया. इससे पहले अगर एक मिनिट भी सांस नही लेता था तो मेरा दम फूल जाता था. पर अब एसा नही हो रहा है

मुझे अब बार बार लग रहा है की कंही कुछ गंभीर गडबड है. अगर यह सपना है तो इतनी गहरी चेतना के बाद भी यह टूट क्यों नही रहा है. इससे पहले भी मुझे उल जलूल सपने आये है पर जेसे ही मे इनके प्रति जागरूक हुआ तो थोडे देर बाद वो सपने टूट गये. इस बार भी अगर एसा ही है तो मेरा सपना बस टूटने को है ...हो सकता है इस के बाद मे अपने को किसी अस्पताल के बिस्तर पर पडा हुआ पाउ. हो सकता यह सब डाक्टर द्वारा दिये गये किसी पेन किलर या बेहोशी के इंजेक्शन का कमाल हो. जिसने मुझे इतने गहरे सपने मे डाल दिया है. कुछ भी हो सकता है.

हो सकता है मै कोमा मे हू!  

नही यह कोमा नही हो सकता क्योंकी कोमा मे मरीज सब सुन सकता है महसूस कर सकता है बस रिस्पोंस नही कर पाता. अगर एसा है तो मुझे अब तक किसी की कोई आवाज क्यों नही सुनाइ दी. मै जिस शरीर को देख रहा हू उस पर किसी चोट के निशान क्यों नही है

एक बात पक्की है जिस शरीर को मे देख रहा हू यह मेरा पहले वाल शरीर नही है. क्योंकी इस पर चोट के ताजे निशान तो छोडो, मुझे पुराने निशान तक दिखाइ नही दे रहे है. जिस तरह से मै अपने को  ताजा और स्फूर्ति से भरा महसूस कर रहा हू, एसा तो इससे पहले मेने कभी  महसूस नही किया.   

यह शरीर ना तो सांस ले रहा है ना ही धडक रहा है . ना ही मुझे भूख लग रही है ना प्यास. ना मुझे ठंड का अहसाहस हो रहा है ना  गर्मी का. तापमान इतना नियंत्रित केसे हो सकता है की मुझे गर्म और ठंड का अहसाहस भी ना हो. मुझे बार बार लग रहा है की जो मै देख रहा हू महसूस कर रहा हू वो ना तो सपना है और नाही कोमा... तो फिर क्या है. 

क्या मै मर चुका हू?

हो ना हो मे सच मे मर चुका हू. इस ख्याल के आते ही एक गहरे खाली पन के अहसाहस से मेरा दिमाग भर गया. इस ख्याल के दिमाग मे आते मै समझ गया की अब मे उस दुनिया मे नही हू जिसमे मे कभी रहा करता था. हो ना हो उस भयंकर एक्सीडेंट के बाद सच मे मर चुका हू.

एसे एक्सीडेंट के बाद मे सही सलामत केसे बच सकता था. जेसे जेसे इस बारे मे ओर सोचता जा रहा हू, यह ख्याल मजबूत होता जा रहा है की मे मर चुका हू. जेसे जेसे यह ख्याल दिमाग मे गहरा होता जा रहा है, मेरा खाली पन बढता जा रहा है..हां  सच मे अब मर चुका हू.  

मै  अब समझ चुका हू की मै मर चुका हू कम से कम धरती पर मेरा शरीर अब मर चुका है. मे अब भी देख सुन रहा हू और महसूस कर सकता हू. यहा तक की मे चल फिर सकता हू . चलने फिरने की मुझे कोइ विशेष कोशिश नही करनी पड रही है. सच कहू तो एसा लग रहा है की जेसे मुझे नया शरीर मिल गया हो. उर्जा से भरपूर बेहद लचीला शरीर. मै मर चुका हू इस ख्याल को लेकर ना मुझे कोइ डर लग रहा है न ही मुझे कोइ चिंता महसूस हो रही है बस एक जिज्ञासा है यह जानने की आखिर यह माजरा क्या है.

मै इस कमरे मे कब तक यूंही खडा रहूगा. मुझे सब एक वर्ग पहेली सा लग रहा है जिसे मुझे हल करना है. मै मर चुका हू फिर भी इतना बेफिक्र हू. मै आगे जो कुछ भी होने वाला है उसके बारे मे जानने के लिये बेहद उत्सुक हू. यंहा मेरी मदद के लिये कोइ नही है,

अरे कोइ है जो मेरी मदद कर सके...

मुझे बता सके की मै कंहा हू .

..हेलो...हेलो...कोई है? 



Saturday, November 12, 2011

जंगल ट्रेक

लंच के बाद पता चला की पावर हाउस नहीं जाना हे. 3 बजते–बजते तय किया की क्यों ना आज सामने दिखाइ देती पहाड़ की चोटी पर चढा जाये. 500 मीटर से भी ज्यादा ऊची उसकी चोटी मुझे बार बार ट्रकिंग के लिये ललचाती. साल और सागोन का घना जंगल, दिसंबर की गुलाबी सर्दी. आज वो दिन आ ही गया. बस कही आग जलायेगे और रात भर चाँद की रोशनी और सितारों भरे आसमान. आइडिया रोमानी था...उस पर इस कदर दिल आया की अकेले ही जाने का सोच ली.


सोचा आधे अधूरे चाँद की रोशनी तो साथ रेहेगी. उपर पावर हाउस का इनटेक गेट और जलाशय हे. वहां एक गेस्ट हाउस भी हे...उम्मीद हे वहां रात गुजारने भर के लिये जगह मिल जायेगी...अगर ना भी मिली तो क्या हुआ कही भी जग़ंल में मंगल करेगे. रात भर एफ एम सुनेगे और तारों को निहारेगे. वेसे भी अर्ध रात्री के बाद एफ एम पर पुराने गीत...क्या कहने.

तैयारी करते करते 4 बज गये सूरज पश्चिम की तरफ कुछ ज्यादा ही झुक गया, गेस्ट हाउस इचार्ज को बताने के बाद मैं तेजी से चल दिया मुझे बताया गया था की स्विच यार्ड के पास से रास्ता उपर की तरफ जाता हे. स्विच यार्ड 4 km की चढाई…कोइ जाने का साधन नहीं मिला तो पैदल ही चल दिया. स्विच यार्ड पहुचा तो 5 बज गये. वहां कोइ नहीं..किससे पूछू...तभी मुझे एक आदिवासी अपनी गायों के साथ लोटता दिखाई दिया. पास बुलाकर उपर तालाब पर जाने का रास्ता पूछा.

हां साहब जाता हे ना रास्ता… वो उपर महादेव मदिंर से दांई तरफ का रास्ता सीधे उपर बडे तालाब जाता हे साहब...उपर गांव के काम करने वाले लोग इसी रास्ते से रोज आते-जाते हे। आपने थोडी देर कर दी नहीं तो कोई ना कोई आपके साथ जाने वाला मिल जाता।

ठीक हे मुझे तालाब वाला रास्ता बताओ जो मदिंर के करीब से जाता हे.

ठीक हे साहब!

सोचा जरूरत पडी तो मदिंर पर ही रात गुजार देगे.

आसान हे साहब बस ये जो सामने पहाड़ पर जो सूखा झरना देखाइ दे रहा हे बस इसी के सहारे उपर जाइये। 1 घंटे में आप महादेव के मन्दिर पहुच जायेगे. फिर वहां से 30 मिनिट और चलना हे, आप तलाब पर होंगे... जल्द निकल जाइये शाम होने को हे...सर्दीयों के दिन हे जल्द ही अधेरा हो जायेगा.

मैं उसके बात पर मुस्कराया...देखा 5:00 बजे हे...7:00 बजे से पहले अँधेरा नहीं होना था..मेरे पास पूरे 2 घंटे थे. करीब 1 घंटे का महादेव के मदिंर का रास्ता…उसके बाद इनटेक का 30 मिनिट का सफर। मैं उससे विदा लेकर सूखे झरने की तरफ चल दिया.

दूर से आसान ढलान वाला पहाड़। पास से देखा तो होश उड गये। यह तो तीखी चढाइ हे. सामने खडा पहाड़..कहां से शुरू करू. तभी मुझे सूखा झरना दिखाइ दिया...ये एक बरसाती झरना था जो अब सूखा हुआ था...बडे बडे पत्थर...उन पर जमी सूखी काइ...चढाई आसान नही है...पर जाना तो था..

15 मिनिट का चढाई ने हालत खराब कर दी...ये तो rock क्लाईमिंग हो रही थी...हाथो पर शरीर का बोझ संभालते संभालते मेरी हालत खराब हो गई...उगलियां दर्द करने लगी...मुझे समझ नहीं आया...की गडबड क्या हे...अगर ये रोज आने जाने का रास्ता हे तो ऐसा क्यों. 50 मिनिट हो गये कही मन्दिर का नामोनिशान दिखाइ नहीं दे रहा.

सामने डूबने को तैयार सूरज…कुछ समझ नहीं आ रहा हे। खडी ढलान, खडे होने भर की भी जगह दिखाइ नहीं दे रही। उपर अब घना जंगल हे, रास्ता नजर नहीं आ रहा। अंदर से आवाज आने लगी की ....वापस जाओ। पर जिद्दी दिल इसे अपनी हार मान रहा हे…फेसला तुरंत लेना हे। अगर एक बार अँधेरा हो गया तो नीचे उतरना असंभव हो जायेगा। आस पास कोइ एसी जगह नहीं जो रात गुजारने लायक हो।

आखिर नीचे जाने का मन बना लिया। नीचे उतरते हुये जो एक बार पैर लडखडाया तो तेजी से नीचे फिसलता चला गया। शुक्र हे कही चोट नहीं लगी बस थोडे कपडे गंदे हुये। सूरज बस अब डूबने को है. मै नीचे उतर आया था।

सामने देखा तो वही आदवासी आपनी गाय के साथ मुझे घूर रहा हे…साहब मेने आपको नीचे लुढकत हुये देखा…पर साहब आप झरने में क्या कर रहे थे मेने तो आपसे इसके पास से जो ये रास्ता जा रहा हे उस पर जाने के लिये बोला था.

…ओये ये रास्ता हे?

हां साहब …हम इसे ही रास्ता बोलते हे …यहां पहाड़ पर सब ऐसा ही होता हे…पर साहब आप को कही चोट तो नहीं लगी ना…

नहीं लगी...मेंने अपने कपडो से धूल झाडते हुये कहा!



भाग्यशाली हो आप…

अरे काहे का भाग्य …देखा मदिंर तक भी नहीं पहुच पाया।

अरे साहब महादेव ने चाहा तो अभी भी आप मदिंर जा सकते…

क्या फिर से उपर चढने को बोल रहे हो…अपुन पागल नहीं हे…तेरी बांतो में अब में नहीं आने वाला…

आरे नई साहब इससे भी आसान रास्ता…वो जो उधर नीचे देख रहे हे. वहां से सीढियां उपर जाती हे…आप आसानी से मदिंर पहुंच जाओगे…जल्दी जाओगे तो हो सकता हे आपको कोइ साथ जाने वाला भी मिल जये.

अरे ये पहले क्यों नहीं बताया …

अरे साहब यह सीधा रास्ता था ना!

उससे बहस करना ठिक नहीं लगा. अभी भी मदिंर तक जाने की आस थी…मेने उससे विदा ली और तेजी से नये रास्ते के लिये चल दिया।

सामने सीमेंट की सीढीयां…आसमान पर चाँद आ गया हे…शाम का धुधली रोशनी पर सब कुछ साफ दिखाई दे रहा हे. आसान सी दिखती सीढीयों की चढाई. मेरे पास पेसिल टार्च हे…रात की ट्रेकिंग का मन बना ही लिया. चाँदनी रात में ट्रेक करने का मजा ही कुछ और हे मैं इसे खोना नहीं चाह रहा। मेरे पास आग जलने के लिये माचिस है, रात के खाने का पूरा इतिंजाम है, मुझे चिंता की कोई बात दिखाई नहीं दी.

मैं अकेला ही सीढीया चढने लगा…15 मिनिट बाद ही सीमेंट की सीढीयों की जगह अब बस पत्थर थे…मैं पसीने से लथ-पथ धीरे धीरे उपर चढता रहा, आगे बढता रहा

अब रास्ता घूमकर पहाडी के पीछे आ गया 2 घंटे गुजर गये पर मदिंर अब तक नहीं आया....और ये क्या यह अँधेरा केसे घिर रहा हे…उपर सिर उठाया तो चांद को पहाडी के पीछे पाया …अब ये क्या नई मुसीबत हे इस बारे मे तो मेने सोचा ही नहीं था मुझे लगा था की चाँदनी रात मेरा साथ देगी। पर क्या मालूम था की चाँद इस तरह पहाडी के पीछे ओझल हो जायेगा। मेरे एक तरफ खड़ा पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खडी ढलान हे। चारोंओर सूखी घास. कही कोई रुकने भर की भी जगह नहीं. अब मेरे चारो और घुप्प अँधेरा हे। सन्नाटे को चीरती जंगली जानवरों की आवाज। मेरे अदंर डर समाने लगा। मुझे बार-बार उस आदवासी पर गुस्सा आ रहा हे …एक बार फिर उसने मुझे खतरे में डाल दिया।

मैं हिम्मत कर रात बिताने भर के लिये कोई ठीक जगह तलाशने के लिये टार्च जलाता हू…उसकी पतली सी रोशनी में मुझे अपने चारों सूखी लम्बी घास ओर कंटीली झाडियां… घने जंगल का अहसाहस होता है। मैं जगह की तलाश में किसी तरह टार्च की रोशनी में कदम बढता हू।

एक चट्टान के सहारे थोडी सी समतल जगह मिली. मेने कुछ सूखी घास तोडी और उसे जलाने के लिये माचिस जेब से निकाली। जेसे ही मैं तीली जलाकर नीचे झुका सर सराहट करता हुआ कोइ मेरे पेरों के बीच से निकल गया…तीली भी बुझ गई…पता नहीं क्यों लगा जेसे अभी अभी कोई जहरीला सांप मेरे पास से गुजरा हे। सर्द डर की लहर मेरी रीढ से होकर गुजर गई।

डर मेरे उपर हावी होने लगा। मैं बार बार अपने को कोसने लगा. इस बार मेने साथ लाई मोमबत्ती जलाइ पर उससे भी आग नहीं जला पाया …वो भी बार बार बुझ जाती। अंधेरे में इस तरह रुकना मुझे ठिक नहीं लगा। डरे हुये मन ने जल्दी ही हार मान ली…मेने वापस जाने का एक बार फिर मन बना लिया …चाँदनी रात में एफ़ एम सुनने का भूत कब का उतर गया था। अब तो मुझे बस वापस जाना था…

टार्च के सहारे में वापस कदम बढाने लगा…एक ठोकर लगी टार्च हाथ से छिटक कर दूर जा गिरी। और में तेजी से ढलान पर फिसलता चला गया। हाथों से घास को पकडने की कोशिश में हाथ बुरी तरह छिल गये…पत्थर से पेर टकराया और में और नीचे जाने से बच गया। दोनों हाथों से घास को कस कर पकडे कर खुद को बेलेंस किया.

में पूरे जोर से चिल्ला उठा…ब…चा…ओ

रह रह कर मैं आवाज लगाता रहा. अंधेरे में कुछ समझ नहीं आ रहा …नीचे कितनी गहरी खाइ हे यह भी पता नही चल रहा…मै जेसा था वेसे ही लटका हुआ चिल्लाता रहा।

हे भगवान इस बार मुझे बचा ले… अब अगर कोइ सांप बिच्छू मुझे काट ले तो?

डर से बुरा हाल…गला बुरी तरह सूख रहा है. हातों में चुभे हुये कंटे बुरी तरह टीस मार रहे है. क्या करू...एह भगवान इस बार मुझे बचा ले...

तभी मुझे हलकी सी रोशनी दिखाई दी कोई मेरी तरफ ही आ रहा था…मैं एक बार फिर जोर से फिर चीख उठा। वो दो थे देर रात अपने गांव वापस जाते हुये उन्होने मेरी आवाज सुन ली और मुझे उपर खीच लिया.

मशाल की रोशनी में खाई की गहराई देखकर में सन्न रह गया…मेरी बोलती बंद। मेरे आशचर्य का ठिकाना ना रहा जब मेंने एक बार फिर उस आदवासी को देखा. अब में क्या बोलता जिसे ने मुझे अभी अभी अभी बचाया है उससे क्या शिकायत करता. पता चला वो अपनी एक गाय को खोज रहा था और उसने मेरे चिल्लाने की आवाह सुनी तो इस तरफ आ आ गया.

उसने इसा बार अ[पने साथ को मेरे साथ गेस्ट हाउस तक मेरे साथ जाने को कहा. पर इस हादसे के बाद आग जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. मेने नीचे ही जाना ठीक समझा। मेरी बात मानकर वो मुझे नीचे ले जाने लगे …।

रास्ते में जब रुककर वो हाथ जोडकर नमन करने लगे तो ध्यान से देखा पेड़ के सिहराने रखा एक गोल पत्थर ओर कुछ सूखे फूल. साहब यह भोलेनाथ का मदिंर हे आप भी हाथ जोडकर प्राथना कर लो…इन्होने ही आप को आज बचाया हे…

ओह तो यह मन्दिर हे…

हां सच एसे ही तो मन्दिर होते हे जंगलो में…में देरे तक हाथ जोडे खड़ा रहा। वो मुझे सडक तक छोडकर वापस मुड गये…में उन्हे ठीक से धन्यावाद भी नहीं बोल सका । यह जानकर की में अब पूरी तरह सुरक्षित हू में खुशी से उछल पडा…एक बार चांदनी रात फिर मेरे साथ थी. एफ़ एम पर आते हुइ गाने की आवाज …मैं मस्ती से गुनगुनाता वापस जाने लगा.

अजीब हे ना कुछ देर पहले मौत के इतने करीब था और अब लगा रहा है जेसे कुछ हुआ ही ना हो!

कब गेस्ट हाउस पहुचा मुझे पता ही नहीं चला। चौकीदार मेरे गंदे और फटे हुये कपडे देखकर चोंका। सब ठीक हे ना साहब… हां सब ठीक हे…और में अपने कमरे में चला गया…

बिस्तर पर लेटते ही मुझे अपनी गलतियों अहसाह्स होने लगा। मेने आज एक नहीं बहुत सारी गलतियां की हे। ट्रेक का पहला नियम की रुकने की जगह पर सूरज डूबने से पहले पहुच जाओ को नजर अदांज कर सूरज डूबने के बाद नई अनदेखी जगह पर जाने के लिये सोचा था।

चांद की चाल की तो समझ थी पर यह नहीं सोच पाया की चाँद पहाडी के पीछे भी छुप सकता है, या मैं पहाडी के अधेरी तरफ भी हो सकता हू। मेने डर को अपने उपर हावी होने दिया। पर अंत भला तो सब भला का सोचकर नींद के आगोश में चला गया। ...

तेज तूफानी हवाओं ने मुझे फिर से जगा दिया…हे भगवान क्या तूफान था…रात को अगर जंगल में आग जलाये हुये ये तूफान आया होता ॥तो क्या होता!…सोचकर में आज भी कांप जाता हू।

इस ट्रेक में मेने कई गलतिया की थी…उसके बाद भी सुरक्षित हू! मैं उन सभी को दिल से धन्यावाद देता हू जो मेरे बचने का कारण थे।



Sunday, February 20, 2011

चींटी

जैसे ही मेने ब्रेड प्लेट से उठाइ देखा एक चीटीं तेजी से प्लेट पर ब्रड की तरफ आ रही है. मुझे उस पर थोडा सा गुस्सा आया...इस भुख्ख्ड को मेरी ही ब्रेड मिली...फिर अचानक मुस्कराया...चलो छोटी सी जान हे कितना खायेगी,  इसे ब्रेड खाने देते है... मै इतिंजार करने लग की कब वो ब्रेड खायेगी......मेरे आशचर्य का ठिकाना नहीं रहा जब देखा की वो ब्रेड के नजदीक तो चली आइ पर ब्रेड को छुआ भी नही और वापस लोट गई. ..उसकी इस अजीब हरकत ने मुझे अचंभे में डाल दिया. मैं ब्रेड खाना छोडकर... मेग्नीफाईंग ग्लास लेकर अपनी खोजी नजर उस पर टिका दी.

में ध्यान से उसे देखने लगा. वो कभी दांये..कभी बांये प्लेट पर घूम रही है....बैचेन सी. मैं ध्यान से उसकी हर हरकत को देखने लगा. उसका एटंना कभी दाये होता कभी बाये...जेसे किसी सिग्नल को पकडना चाहती हो. वो अकेली मेरी प्लेट पर थी. वो प्लेट से बाहर की और जाने लगी... वो बिना खाये ही प्लेट से वापस जा रही थी. मुझे उसका बर्ताव समझ नई आया. अगर उसे ब्रेड नहीं खानी थी तो मेज पर आयी क्यों. वो भी प्लेट के उपर ब्रेड के इतने नजदीक.
उसके जाते ही मेने जेम और मख्खन लगी ब्रेड का एक बड़ा सा बाइट लिया और उसे फिर ध्यान से देखने लगा...उसकी चलने की तेजी...पूरी मेज पर भागती फिरती..जैसे कुछ खोज रही हो.

वो पिछले द्स मिनिट से बिना रुके तेजी से इधर उधर भाग रही है ...इन सब मैं मुझे आफिस जाने का ख्याल भी नहीं रहा. लगा जेसे वो रास्ता भटक गई है.
डरी सी सहमी सी छोटी जान. शायद उसे किसी तीखी गंध ने अपने ग्रुप से भटका दिया था...या फिर हो सकता है किसी हवा के झोके ने उस इस मेज पर ला पटका हो. उसने 15 सेंकड से भी कम समय में मेज से एक सिरे से दूसरे सिरे तक की दूरी नाप ली. उसकी तेजी देखनेलायक थी. अगर वो मेरी जितनी बडी होती तो इसका मतलब था 15 सेंकड मेँ 2 किलोमीटर से भी ज्यादा का सफर. ऐसा वो आधे घंटे से कर रही है. उसकी तेजी में अभी भी कोई कमी नहीं.

ना जाने कितनी ताकत समायी है उसमे. उसकी बैचेनी अब देखी नहीं जाती,  मुझे उसकी मदद करनी चाहिये. उसे कागज के टुकडे के सहारे में उठाकर अपने आस पास देखता हू...सामने की दीवार पर एक चीटींयोँ के कतार है, में उसे वहां छोड् देता हू. मुझे नहीं मालूम की वो उसके अपने है या पराये. पर वो उनमेँ घुलमिल गई है. अब मैं उसे नहीं पहचान सकता. आफिस के लिये वेसे ही देर हो गई है काश उस जैसी स्पीड और ताकत मुझे भी मिल जाये

Monday, November 17, 2008

रेगीस्तान ट्रेक


गोपालसर मोड आते ही बस कंडक्टर अवाज ने लगाई...और में उतर गया...ठसाठस भरी बस से बाहर निकलते जेसे सांस में सांस आई। पर तेज गर्म हवा के थपेडों का सामना हुआ। लगा जेसे किसी ने मुझे तंदूर के अदंर झोक दिया हो। जल्दी से अपने चेहरे को टावल से कवर किया। और तेजी से बरगद के पेड़ की छांव की तरफ दौड गया। इन्दरा गांधी नहर होने के कारण पानी हे और हरियाली भी. स्टेट हाइवे से दांयी तरफ का रास्ता रेंज में जाता हे. में अपने सिर और चेहरे को फिर से ढक लेता हू. एक चाय की दुकान, एक साइकिल पंक्चंर जोडने की दुकान, एसटीडी बूथ और एक ककडी बेचने वाले का हाथ ठेला और एक परचूनी की दुकान...बस यही गोपालसर चौराहा हे… भरी दुपहर में बस चाय वाला जागता सा दिखा।


दुपहर 2 बजे हे...मुझे ले जाने के लिये कोई कार या जीप दिखाई नहीं दे रही, 

शायद, आने वाली होगी! पेड की छांव में आराम करते कुछ लोग. चायवाला मुझे देखकर मुस्कराया उसे लगा की में चाय के लिये उससे कहूगा. चलो चाय पी जाये इस बहाने उससे कुछ बात भी हो जायेगी, पर इतनी गर्मी में चाय. बोटल के खोलते गर्म पानी से तो बेहतर ही होगी. मे उसे चाय बनाने का इशारा करता हू और समान लेकर उसके पास आकर बेंच पर बेठ जाता हू. भरी तपती दुपहरी में गर्मा गर्म चाय.

साहब रेंज जायेगे क्या?

हां..

पर अभी-अभी तो एक गाडी रेंज को गई.. बस थोडी सी देर हो गई.

कोई बात नहीं मेरे लिये अलग से गाडी आयेगी...

हां साहब, बिना गाडी के थोडी ही आप जायेगे और वो हंस दिया,

18 km अभी और जाना हे तब कही जाकर गेस्ट हाउस पहुंच पायेगे. देखा एक और बस आकर रुकी, एक जवान उसमे से उतरा और तेजी से हमारी तरफ आया. उसे देखकर में समझ गया की अब मे अकेला नहीं हू...एक मुसकराहट से अजनबी पन जाता रहा..

मेने उसके लिये भी चाय बनाने को कहा. हम दोनों ही एक घंटे तक गाडी का इतिजार करते रहे.
पेड की छांव में भी जेसे आग बरस रही हे...तेज गर्म हवा...मे बार बार पानी से अपना गला तर करता हू...पर ये गाडी क्यों नहीं आई अब तक ...! वो जवान भी शायद मेरे ही भरोसे पर हे...

क्यों तुम कैसे जाओगे...!

बस साहब थोडी देर इतिजार करते हे ..कोई गाडी आती हे तो ठीक वरना पैदल मार्च...

पैदल!!..18 km पैदल.... पागल हो गये हो क्या!

वो हंस दिया...हां साहब ये पागल कर देने वाली जगह हे...आज केंप में रिपोर्ट करना हे मुझे..अगर गाडी नहीं मिली तो पैदल ही जाना होगा...एक बार जा चुका हू...फिर हम तो जवान हे...पर आप...वो भी इतने सामन के साथ..?

‘अगर गाडी नही आई तो आप क्या करेगे’.

‘अरे गाडी ना आने का सवाल ही नहीं हे’.

नहीं साहब इतना भरोसा मत किजिये यहाँ कुछ भी हो सकता हे...

अरे डरा नहीं यार ...मेने हंसते हुये कहा!

डरा नहीं रहे सच कह रहे हे...रास्ता कभी भी बंद हो जाता है..रेत के चलते फिरते टीले...ये रेत के पहाड कभी भी रास्ता बंद कर देते हे. इतनी देर से कोई गाडी आती दिखाई नहीं दी...इसलिये शक बढ रहा है!

देखिये साहब अभी 4 बजे यहां से आखरी बस शहर जायेगी. आप चाहो तो वापस जा सकते हो..उसके बाद शहर जाने का कोई साधन नहीं...वेसे भी यहां रात में रुकने का कोई इतिंजाम नहीं....
देखो भाइ...वापस जाने का तो सवाल ही नहीं...रही गाडी की बात, तो हो सकता हे किसी कारण से देर हो रही हो...वो आयेगी...यार यहां मोबाइल भी तो काम नही कर रहा हे
हां साहब ना रेंज में काम करेगा ना यहां पर...बस इस std बूथ का ही सहारा हे...इसी से रेंज मे बात हो सकती है 

तो करके देखो 

टेलीफोन डेड है?


आखरी बस भी आकर चली गई..अपनी जिद्द या फिर ना समझी के कारण मे वापस नाही गया 

गाडी को ना आना था ना आई...शाम के 5 बज गये..जो लोग रुके हुये थे वो भी चले दिये...चाय वाला भी दुकान बंद करने लगा...जवान भी जाने के लिये बेचेन होने लगा..उसे हर हाल में आज रिपोर्ट करना हे ..

साहब अब में नहीं रुक सकता आप भी मेरे साथ चलिये कहो तो आप का सामान् मैं उठा लेता हू...मेरे पास एक लेप टाप बेग और एक ट्राली बेग और पानी की बोटल.. प्लास्ट्क की थेली में कुछ खाने का सामन.

मुझे भी चिंता ने आ घेरा...गाडी क्यों नही आई..मुझे बोला गया था की गाडी मेरा इतिंजार करेगी...एक बात साफ हो गई की अब यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं...बस अब हम दो....साहब एक काम करते हे धीरे धीरे आगे बडते हे ...अगर कोई गाडी रास्ते में मिल गई तो ठीक वरना 9-10 बजे तक पहुंच ही जायेगे.

उसकी बात में दम था...अब यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं...मुझे नहीं मालूम उन्होने गाडी क्यों नहीं भेजी..जो हुआ बुरा हुआ...अब हमें ही कुछ करना था..

शाम के 5 बज गये पर अभी भी हवा बेहद गर्म ...रेत से निकलती आग ...जवान के पास बस एक रग-शेक बेग उसने उसे कंधे पर लगाया और एक पानी की बोटल...अब वो जाने के लिये तैयार हे ...... आपना बेग मुझे दीजिये.... आप बिना बेग थोडा तेज चल पायेगे...मेरा ही फायदा होगा.. उसने हंसते हुये कहा....
 
लेपटाप मेने सँभाला, उसने Trolly बेग को ले लिया उसमे लगे पहिये..वो आसानी से उसे सड़क पर चलाने लगा...भला हो जिसने पहिये लगे बेग बनाये..जरूर वो एसे ही किसी जगह फंसा होगा और पहिये का ख्याल आया होगा. आदि मानव ने पहिया बनाया और VIP वालों ने पहिये वाला trolly bag...

रेत के पीछे छुपता सूरज का लाल गोला...आशचर्य मुगध और चकित सा उसे डूबता देखता रह गया...जो सारे दिन से आग बरसा रहा था..अब कितना शांत होकर विदा ले रहा हे. सूरज डूबते ही रेत तेजी से ठंडी होने लगी...आसमान में बदलते रंगो की छटा और किशन का गुनगुनाते हुये मस्ती से चलना ...देखा 1 घंटे में ही हम ने 5 km का रास्ता तय कर लिया. अभी भी बार बार पानी पी रहा हू। 2 लीटर की बोटल खत्म होने को आई..अब गला सूखने लगा.. किशन भी पसीने से नहा गया...मुझे देखकर मुस्कराया...

साहब..थक तो नहीं गये...

नहीं मेने अपनी सांसो को काबू में लेते हुये, मेने बोटल से चाय की तरह गर्म पानी के 2 घूटं पीया देखो किशन सामने गांव दिखाइ दे रहा है।

साहब इसे ही गोपाल सर गांव कहते हे इस रास्ते का सबसे बढा गांव. यहाँ से हो सकता हे कोई गाडी मिल जाये..कोई उट वाल जाने को तैयार हो जाये.. 20-25 घर का छोटा सा गांव...जमीन में शायद थोडा पानी हे। सब नहर के कारण. कुछ खेत दिखाई दे रहे हे. और खजूर के बहुत सारे पेड भी. गांव में एक भी ऊठ गाडी दिखाई नहीं दी...सब शहर में जो गये हे देर रात वापस आयेगे..अब क्या करे... अब गाडी मिलने की सारी उम्मीद खत्म हो गई हे...समझ गये सारा रास्ता पेदल ही जाना होगा...

घरो से उठता धुआ..शाम के खाने की तैयारी.....हम लोग थोडा सुस्ताने के बाद फिर से चल दिये...पूरब से उगता चाँद...मंत्र मुग्ध ..शाम के 7 बज गये पर अभी भी काफी रोशनी है। हम चलते रहे …चलते रहे गांव में पानी मिल गया था…वेसे भी अब हवा में ठडंक थी। पूर्व में चाँद उग आया… रेत पर बिखरती चांदनी...

अब मे कैसे बयान करू...बस देखता ही रह गया. शायद आज पूर्णिमा हे. अंधेरा होते–होते हमने आधे से ज्यादा रास्ता तय कर लिया...बस साहब 6-7 km के बाद चौकी मिल जायेगी..हो सकता हे वहां से हमे कुछ मदद मिल जाये.

नहीं किशन भाई आज मदद की कोई उम्मीद मत दिलाओ...मे हंस दिया...वो कुछ ना कुछ गाता रहा... देखा रास्ते के किनारे बंजारे रेत पर डेरा जमाये हुये हे...सडक के किनारे खाट पर हुक्का गुडगुडाता बूढा....मेने उसे नमस्ते की... तेज चलने के कारण पसीने से नहाया बदन..उसने हमें रुकने का इशारा किया

आप लोग पैदल..!!

हां दाद्दा आज गाडी लेने नहीं आई...

मालूम हे ... आज रास्ता बंद हे..आगे रेत ने सारा रास्ता बंद कर दिया...दुपहर बाद कोई गाडी नहीं निकली...मेरे लडके उधर ही काम पर गये हे...

ओह तो यह बात हे...

आप लोग थक गये हो। आज रात आराम करो..सुबह किसी गाडी से चले जाना..नही तो मेरी ऊठ गाडी आपको छोड आयेगी..

दद्दू की शुद्ध हिंदी सुनकर में चोंक गया...किशन थोडा सुस्ता लेते हे...उसने अपने पास ही दूसरी खाट लगवा दी...पता चला वो सेना में कभी जवान था...उसके लडके भी रेंज में ठेका लेते हे,..थोडी देर सुस्ताने के बाद किशन जाने की जिद्द करने लगा..उसे हर हाल में आज रिपोर्ट जो करना था...पर में उस बुजुर्ग के निमंत्रण को ना ठुकरा सका..चूल्हे पर सिकती रोटिया..भूख भडक उठी...उपर से थकान और चांदनी रात... यह दिलचस्प बुजर्ग...उससे बहुत सारी बाते करनी थी...मेने किशन को अपनी जरुरी जानकारी देकर उसे विदा किया...और में रुक गया.

खुली जगह पर लगा डेरा..सेकडो की तादाद में भेडे...4-5 ऊठ गाडी पर लदा घर का समान.... शाम का खाना खाते और मस्ती करते 10-12 बच्चे, 2 जलते चूल्हे..और उनके किनारे बेठी औरते. ये भरी दुपहर मे भी खुली जमीन पर डेरा लगाते हे. किसी पेड के नीचे डेरा लगाना इन्हे पसंद नही. तपती धूप मे उनके बच्चे यों रेत पर खेलते रहते हे जेसे दिस्मबर की सर्द सुबह मे धूप का आनंद ले रहे हो. अभी तक इन्हे दूर से ही देखा था..आज पहले बार इनके पास बैठा हू,,,किशन चला गया...

दद्दू...इस तपते रेगीस्तान मे बसे लोगों को लेकर बहुत से सवाल हे...आपने तो सेना की जिदंगी जी हे...शहर में भी रहे हो..वापस इस जिदंगी में आ गये कुछ समझ नहीं आया. एसा क्या हे यहां कि, लोगों यहा बसे हुये हे...क्या ये व्यवसायिक मजबूरी हे या फिर जमीन से जुडना हमारी फितरत ...कि जो जहां पैदा हुआ उसी जगह से जुड गया..उसे उसी जगह से प्यार हो गया. जीवन देने वाला एसा कुछ भी यहां नही हे...फिर भी आप यहां हो..और यह बंजारा जिदंगी..!

साहब आपने सच्च कहा...अब अगर इस जगह के बारे में समझना हे तो यहाँ कुछ दिन रह कर देखो. या तो भाग जाओगे...या फिर रुक जाओगे...अगर रुके तो सारे सवालों का जबाब तुम्हे खुद मिल जायेगा...और अगर भाग खडे हुये तो इसका मतलब यह की आपको मेरी बात समझ नहीं आयेगी...उसने गोल मोल जबाब दिया...और अपनी मूछों पर ताव देता हुआ मुस्कराने लगा.

उसकी बातों में दम हे...पर मेरा भूख से बुरा हाल...ब्च्चे मुझे घेर कर खडे हो गये..मै उन्हें टाफी देता हू...वो खुशी खुशी ले लेते हे...

आते ही बच्चो को बिगाडने लगी आप...वो हंसते हुये बोला.

अच्छा अब हाथ मूह धो लो ...और खाना खाओ...उसने पानी का लोटा मेरी और बढाते हुये कहा...

दद्दा एक बात बोलो आप पानी कहां से लाते हो।

साहब लडके उठ गाडि से रास्ते में जो गांव मिला था ना वहां से ले आते हे।

वो तो ठीक हे पर इतने सारे लोग फिर तुम्हारे जानवर भी हे नहाने धोने का काम …पानी तो बहुत लगता होगा।

नहीं साहब हमने कम पानी में जिंदा रहना सीख लिया हे कई बार तो एक बालटी पानी से ही हम सब का गुजारा हो जाता हे।

बस एक बाल्टी पानी …???दद्दू आपको मालूम हे अभी अभी 2-3 घटे में ही मेने इस पूरी बोतल का पानी पी लिया वो भी शाम के समय में।

जिंदगी सब सिखा देती हे साहब! जानवर क्या और आदमी क्या सब पानी का मोल जानते हे।

खाना शानदार रहा ..और शानदार रही उनकी मेहमानबाजी...देर रात तक वो गाते बजाते रहे..कुछ समझा..और बहुत कुछ ना समझ में आने वाले गीत संगीत...ठंडी रेत पर, नंगे पाँव घूमने लगा ...

साह्ब राते ठंडी होती हे...और खतरनाक भी...अकसर सांप और बिच्छू निकलते रहते हे. जरा देखकर चलना...

वो चाहे तो आसानी से इससे अच्छी जगह बस सकते हे पर फिर भी यहां हे और खुश हे..जिदगी को कुछ एसा बना लिया की, जो हे, जितना हे, उसी मे खुश...ये आधी बालटी पानी...मे 2 दिन निकाल देते हे...और हम 2 घंटे नही निकाल पाते. अपनी शारारिक जरूरतो को उसी हिसाब से ढाल लिया. खुश होने और खुश रहने के अपने- अपने तरीके...एक ही बात समझ आयी की कष्ट और दुख तुलनात्मक होता हे. अब यह हम पर हे की हम किससे तुलना करते हे.

सुबह 4 बजे ही ऊठों की आवाज ने मुझे जगा दिया...वो अभी अभी वापस आये हे, रास्ता साफ हो गया हे..सुबह होने को हे...पूर्व में लाली हवा में ठंडक...सूरज की सुनहरी किरणों के साथ भेड का दूध और रोटी का नाश्ता...अब ऊट की सवारी का आनंद लेने के लिये तैयार हू..

अरे तुम ...स्वामी की आंखे मुझे इतनी सुबह देखकर आश्चर्य से फेल गई. और फिर जेसे उसे कुछ समझ आ गया हो वो खुशी से चीख उठा ....और मुझे से कस कर लिपट गया...

मुझे कुछ समझ नही आया ...

क्या हुआ...!!

यार कल तुम्हे आना था..रास्ता बंद था तो गाडी नहीं भेज पाये..सब बोले की तुम गाडी नहीं देखकर 4 बजे वाली बस से वापस चले जाओगे...पर मुझे पता नहीं क्यों लगा की तुम नहीं जाओगे और किसी भी तरह बेस पर आजाओगे..बात की बात...हम लोगों में शर्त लग गई थी...अब जब रात तक तुम नहीं आये तो में यह शर्त के 500/- हार गया.

..पर अब लग रहा हे की तुम सच में वापस नहीं गये थे...तभी तो इतने सुबह बेस पर हो...हां तुमने सही कहा ...

पर मेरी खबर लेकर जवान नहीं आया आपके पास.?

नहीं तो!

हो सकता हे वो दूसरी रेजीमेंट का जवान रहा होगा..और फिर रात थी..जाने दो... मेरा हाथ पकडकर मेस ले जाने लगा...चलो अभी तो 500/- वसूल किये जाये।

देखा सब नाश्ते पर जमे हे..मुझे देखकर हेरत में...स्वामी को 500 मिल गये..वो जीत गया था...आज रात को जीत की पार्टी तय हे...पर उन्हे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा की में रात भर बंजारो के साथ था. उन्हें अभी भी लग रहा हे की में शहर से कार किराये पर लेकर सीधे बेस तक आ गया हू. वो बाहर आकर पक्का करते हे की में कोई गाडी लेकर नहीं आया हू.....और फिर बोले ..एक और सिरफिरा...

Friday, August 15, 2008

हाथी के बच्चे से मुलाकात


बांस का घना जंगल, सुबह के चार बजे है. पूर्वी आसमान में हल्की सी लाली पर जंगल में अभी घना अंधेरा है. घने अंधेरे को चीरती जीप की हेड लाइट. सुबह की ठंडी हवा मेरे थके चेहरे से टकरा कर मुझे सुकून भरी राहत दे रही है. मेरी आंखे बंद है घाटी में से आती बांस के टूटने की आवाजें... हमे हाथियों के इस इलाके में होने की खबर फोरेस्ट अधिकारीयों ने पहले से दे दी है जिस से हम जरूरी एतिहायत बरत सके. हमे बोला गया की जब भी हम इस जंगल से गुजरे तो कुछ पटाखे हमेशा साथ रखे, जो जरूरत पडने पर हाथियों को भगाने के काम आ सके. यह एक जरूरी छोटा सा सुरक्षा उपाय है जिसे करने की उम्मीद हम से वो करते है. पर जब सुबह के चार बजे स्टोर बंद हो और स्टाफ गहरी नींद में हो तो किसी को जगाना वो भी इस थके शरीर के साथ जो अब थक कर चूर गया है. अब तो बस गेस्ट हाउस का बिस्तर दिमाग में है.

यह गजब का जानवर है. इसकी भूख ने इसे इतनी सुबह जगा दिया है. क्या पता ये सारी रात से खा रहे हो. बांस के टूटने की आवाज इस गहरी खाइ में इन्ही से आ रही है. रात भर से हम टरबाइन बियरींग के तापमान की समस्या पर काम कर रहे थे. अब सब कंट्रोल में है.

जीप ने तीखा घुमाव लिया ....तेजी से लगे ब्रेक से मेरा सिर डेश बोर्ड से टकराते बचा मेंने घूर कर डराइवर को देखा ...पर उसकी आंखो की दहश्त ...ने मुझे सामने देखने को मजबूर किया. वो चार थे उनका बच्चा बीच रोड पर में बाकी दो उसके दोनों तरफ एक उसके ठीक पीछे...ड्राइवर ने तुरंत हेडा लाइट बुझा दी अब हमे कुछ दिखाई नहीं दे रहा. बस उम्मीद कर रहे है की वो घाटी में नीचे उतर जायेगे....पांच मिनिट हम सांस रोके अंधरे में घूरते रहे...अब लगा की वो जा चुके है. ड्राइवर ने पार्किंग लाईट जलाई. हमे जो दिखाई दिया उसे देख कर हमारी जान हलक में आ गई. नांरगी पार्किंग लाइट में देखा की बच्चा अपनी सूड विंड स्क्रीन पर घुमा रहा है. दो उसके पीछे और एक ठीक मेरे बगल में. एक ठंडी लहर मेरी रीढ से गुजर गई. अब हम पूरी तरह उनकी दया पर थे. मेरे बगल वाले हाथी से अपना पेर दरवाजे पर रगडा जेसे वो अपनी खुजली मिटा रहा हो. उसके ऐसा करने से ही जीप बुरी तरह हिलने लग़ी. हम दोनों अपने इश्वर को याद कर रहे है. बस एक जरा सा धक्का और हम सेकडो फीट गहरी खाई में होंगे

अचानक बच्चे ने ग्लास वाइपर को एक झटाके में उसे पानी सूढ से खीच लिया शायद उसने बांस का टुकडा समझा था. उसने पीछे मुडकर शायद अपनी मां को देखा. पर उसने बच्चे को अपनी सूढ के नीचे ले लिया और वो धीरे से हमारी बगल से निकलने लगे बच्चा फिर से रुका उसने मुझे देखा और सूढ मेरी तरफ बढाई पर गिलास उपर चढा होने से वो ऐसा नहीं कर सका. उसने और कोशिश की पर उसकी मां ने उसकी पूछ से पकडकर अपनी तरफ खीचा ....1 मिनिट...2 मिनिट वो जा चुके थे ...मेने ड्राइवर की तरफ देखा ...हमे अब भी एक दूसरे के दिल की धडकन सुनाई दे रही है.