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Tuesday, August 16, 2011

विश्व की सबसे खर्चीली भ्रष्टाचारयुक्त लोकतांत्रिक व्यबस्था

 लोकपाल बिल के अंध भक्तों, जरा हमारी भी सुनो,
जो रकम स्वीस बेंक में बतायी जा रही है उसका ना कोई ओर है ना छोर. जिसके मन में जो आ रहा है वो रकम बता रहा है. मुझे जितने भी मेल मिले उसमें कम से कम रकम 6 लाख करोड़ और आज के ताजा इमेल में यह अब 280 लाख करोड़ है. यह सच है की जिस को भी मोका मिला उसने इस देश का पैसा लूटा है और दबाया है. राजा और कलमाडी जेसे लोग तो बस इस बात का इशारा भर है की लूट किस हद तक हो सकती है. चलो इस बार अन्ना ने हम सबको सोचने पर मजबूर कर दिया. चलिये उनकी बात को और आगे बढाते है. उसके बाद हम इस पर एक बहस करेगें...यह बहस जीत या हार के लिये नही होगी, यह बहस समस्या की जड मे जाने की और उसका हल सोचने के लिये होगी..... देखते है हमारी बहस इस बार क्या रंग लाती है.

जिस लोकतंत्र को हम ने अपनाया है लगता है जेसे उस का यह एक दुष्परिणाम  है. जेसे यह इस व्यवस्था की कीमत है जो इस देश का आम नागरिक चुका रहा है. इस देश के नेतृत्व से बहुत सी राजनितिक भूलें हुई है. जिसके भयावह नतीजे आज हमारे सामने है ..
 हम आपके इमेल से सहमत है पर आपने जो समस्या उठाई उसका हल क्या है. यह पहले भी हुआ और आगे भी होगा. यह असली समस्या नहीं है बस यह तो समस्या का एक पहलू भर है. आप कि मुहिम सर आंखो पर चलो इस बहाने लोगों को इस देश व्यवस्था पर एक बार फिर सोचने को मजबूर कर दिया. आप के मेल से लगता है की आप इस देश में लोकपाल नाम की व्यवस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था के उपर लाना चाहते है.
आप को लगता है की संसद और विधान सभाओं में भेजे गये हजारों बेलगाम जन प्रतिनिधियों पर लगाम कसने का काम करेगा, लोकपाल बिल उनकी अक्ल ठिकाने पर ला देगा और रातो रात उन्हे इमानदार और देश के लिये समर्पित निष्टावान कार्यकर्ता में बदल देगा. जो देश लाल फीता शाही, पुलिस, सीबाई, वकील और जजों और लाखों सडे गले कानून के जाल में उलझा हुआ है अब उसे लोकपाल और उसके साथ काम करने वाले लाखों साजिंदों के फोज सब ठीक कर देगी, क्यों ना हो उसे अब इस देश के 120 करोड़ को आबादी को इमानदारी का पाठ जो पढाना है.
शायद आप सही हो..चलिये आप की इजाजत से इस समस्या पर जरा एक बार फिर से गोर करते है. . विश्व की सबसे खर्चीली राजनितिक व्यबस्था अगर कोइ है तो वो हमारा लोकतंत्र है. इसके बाबजूद स्वतंत्रता के बाद इस भूखे नंगे देश ने इसे अपनाया. तो उसका कारण सिर्फ एक था की धर्म जाति रंग बोली प्रांत के आधार पर बटे इस देश में अगर कोई राजनितिक व्यबस्था काम कर सकती थी तो वो लोकतंत्र था. इस देश ने लोकतंत्र को अपनाया और हर खास और आम को एक नजर से देखा और हर उस सख्स को जो इस देश में था उसे वोट देने का अधिकार दिया और साथ मे राज करने का हक भी दिया.
उस समय सोचा गया की जन प्रतिनिधी एक सामज सेवक होगा जो समाज के लिये जियेगा और समाज के लिये मरेगा. जनता भी उसे ही चुनेगी जो उसका सच्चा प्रतिनिधीत्व करे. चुने हुये प्रतिनिधी पहले देश के लिय जबाब देह होंगे उसके बाद वो राज्य या अपने उसे क्षेत्र के प्रति जबाब देह होंगे. कितना लुभावना सपना था. हम उनसे राज करने की जगह सेवा कराने की उम्मीद जो कर रहे थे.
हमारी सबसे बडी भूल उन्हे एक साधु सन्यासी की तरह समझना रहा. हमे लगा हमारा नेता, जो रूखा सूखा उसे मिलेगा वो खायेगा और अपनी खुद के पैसे से हमारी मदद करेगा और प्रभु के गुण गायेगा. हम एसे ही तो एक सच्चे समाज सेवक या जन प्रतिनिधी की कल्पना करते है, हम यह मानकर चलते है की जन प्रतिनिधी का ना कोइ पारिवारिक जिम्मेदारी होती है ना परिवार वो तो बस तन मन धन से अपने समाज या क्षेत्र के लोगोँ का कल्याण करे.
सच तो यह है कि राजनीती राज करने की निती है. यह कोइ समाज सेवा नहीं बल्की समाज से सेवा कराने की नीति है, उस पर राज करने की नीति है. इसका धेय बस किसी तरह सत्ता में बने रहना है. सच भी है..सत्ता उन्हे ताकत रुतबा और पैसा जो देती है.हम आज भी इस बात को नहीं सोचना चाहते की जन प्रतिनिधी को हमसे ज्यादा पैसे और ताकत की जरूरत होगी. वो संगठन चलाने के लिये और चुनाव के लिये पैसा कहां से लाये! वो कब तक और किस हद तक अपना पैसा संग़ठन चलाने में लगाये और क्यों लगाये!
जन प्रतिनिधी को उसे इस काम की कोई तनखाह तो मिलती नहीं है, जब तक कि वो पार्षद या विधायक नहीं बना जाता. और ना ही हम उन्हे खुले दिल से दान देते है. अकसर जो हम देते है वो काम का कमीशन होता है. जिसे पहले ही कानून ने भर्ष्ट घोषित किया हुआ है. क्या कोई पार्ट टाइम राजनिति करके विधायक या एमपी या एमएलए बन सकता है अरे इन सब को छोडिये क्या कोई पार्षद या फिर ग्राम प्रधान भी बन सकता है !
हर कार्य की तरह इसमे भी पूजी और समय लगता है. अब समय और पूजी वो कहां से लाये! क्योंकी अगर पूजी का इतिंजाम उस को करना है तो भ्रष्ट तरीके अपनाना क्या उसकी मजबूरी नहीं है, क्योंकि हम और आप तो बिना किसी बात के उसे पैसा देने से रहे बहुत हुआ तो कुछ चंदा दे दिया. कैसे कोई पाँच दस रुपये के चंदे के बल पर राजनीती कर सकता है, हां चंदे के बल पर कुछ दिन एश जरुर की जा सकती है.
हम सब को मालुम है की सभी राजनैतिक पार्टीयों को पैसा कहां से आता है. किस तरह ये सब काले धन को इस्तेमाल करने को मजबूर है. जिस वयवस्था के विरूध जन विद्रोह खडा किया गया है वो इस देश ने 65 सालों में विकिसित की है. यह सच है की इसमे भ्रष्टाचार, रिशव्तखोरी, कामचोरी, भाईभतीजा वाद जेसी अनगिनीत खाराबीयां है, पर उसका जबाब सिर्फ लोकपाल बिल नहीं हो सकता..सच तो यह है की यह इस को और मजबूत करेगा क्योंकी जिसे आप रिश्वत और भ्रष्टाचार समझ रहे है वो अपने आपने आप में पूरी तरह विकिसित व्यव्स्था है जिसके अंतर्गत यह देश चल रहा है.
यह सच है की इस देश की अधिसंख्य आबादी लूट, भुखमरी, गरीबी और भाई भतीजावाद से क्रस्त है. पर यही वो आबादी है जो वोट देते समय जाति धर्म और अपने पराये को देखती है. यही वो आबादी है जो अपना काम तो साम दाम दंड भेद से करा लेना चाहती है, और दूसरों को उपदेश देती है. जब उसके अपने काला धन कमाये और भर्ष्टाचार में भागीदार बने तो सब जायज . दूसरे करे तो राज अपराध.
सभी पार्टीयों में दागी उम्मीदवारोँ की भरमार है. गभींर अपराधों के आरोपी चुनाव में खडे होते है और जीत हासिल करते है. अपने राजनितिक आकाओं के बल पर देश के लिये अनजाने लोग इसलिये एमपी एमएलए या मंत्री बन जाते है क्योंकी वो किसी दमदार के पुत्र या पुत्री है. यही उनकी इकलोती क्वालिफिकेशन होती है. क्या ऐसा करना इन राजनितिक पार्टीयों कि मजबूरी नहीं.
आप लोकपाल की बात करते है बिना इस बत को सोचे की राज नेतिक पार्टीयां कि आमदनी का स्रोत क्या होगा. आप व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रहे है, पर नई वयवस्था क्या होगी यह किसी को पता नहीं है. या आप सोचते है की जो है उसे खत्म कर दो उसके बाद जो होगा अच्छा ही होगा. क्या गारंटी है कि नई व्यवस्था पहले से बेहतर साबित होगी. इसलिये इस व्यवस्था पर आघात करने से पहले यह सोच लें की इस देश में माओवाद, सांमतवाद, आंतकवाद, धर्म वाद और ना जाने कितने वाद इस देश में पल रहे है.कंही एसा ना हो की इन्हे सिर उठाने का मोका हम दे दे. सवाल यह है की क्या हमारे पास इससे बेहतर कोई तंत्र है, या हम लोकपाल बिल के झांसे में हे कि उसके संसद में पास होते ही सब ठीक हो जयेगा?
सवाल तो हमारे देश की हर संस्था पर है. आप बताईये कोन सी संस्था इस समय अपने को पाक साफ बता सकती है. न्याय पालिका? संसद? या फिर चुनाव निर्वाचन आयोग? या फिर CAG. कोन सी राजनैतिक पार्टी एसी है जो पाक साफ है. जो उसे मिलने वाले पाई पाई का वार्षिक आडीट कराती है! या जिस के सदस्य अपराधी पृवति के लोग नहीं है. आज पार्टी के रूप में कोन सा विकल्प हमारे पास है? अगर नही तो शोर किसके लिये...?
लोकपाल बिल पूरी समस्या का हल ना होकर वो बस कुछ देर के लिये उसे छुपाने और दबाने का काम करेगा. वो गलत काम करने से पहले ज्यादा सजग रहेगे और शायद अब पहले से ज्यादा कमीशन की उम्मीद भी करे.
लोकतंत्र जेसी अच्छी खासी व्यवस्था की बेंड हम सब ने मिलकर बजाई है हम सब दोषी है ओर अगर यह सच है तो कोई लोकपाल बिल  भ्रष्टाचार के जाल से नही बचा सकता. इस शोर शराबे का असर बस इतना होगा की इनके चहरे बदल जायेगे. लोकपाल बिल बस ऐसा ही है, की हम जेसे कूडे के ढेर को साफ ना कर उस पर DDT का छिडकाव कर रहे हो. उससे क्या होगा? जब तक लोक पाल जेसी DDT का असर रहेगा कुछ भ्रष्टचार के कीडे कम हो जायेगे पर उसके बाद फिर पहले जेसा. क्योंकी उन पर कुछ दिन बाद DDT का असर ही नहीं होगा. वो उसका भी कोई ना कोई तोड निकाल ही लेगे. फिर देश किसी और दवाई की खोज करेगा...पर ऐसा कब तक !
एक बात समझ लीजिये की DDT का बुरा असर उन पर भी होता है जो कीडे नहीं है. इसकी गांरटी कोन लेगा की लोकपाल का दुर उपयोग नहीं होगा. अगर लोकपाल डर का नाम है तो इस डर का पहला असर तो सीधे सादे और इमान दारों पर होगा क्योंकी आज कोई भी काम क्यों ना हो वो किसी ना किसी कानून को तोडता नजर आयेगा.  इसलिये  हर अच्छा काम करने से पहले हजार बार सोचेगे. इस बात को वो निर्दोष लोग अच्छी तरह समझ पायेगे जिन का पाला इस देश की न्याय पालिका या पुलिस से पडा है.
अब उन्हे लोक पाल का सामना भी करना होगा. क्योंकी इस देश की न्याय व्यवस्था में दोष मुक्त सिद्ध करना उसका काम है जिस पर दोष लगाया गया है. न्याय सबूत और दलील पर टिका होता है. हम सब को मालूम है की सबूत और दलील आसानी से बनाये और मिटाये जाते है. जुगाडू और अपराधी पृवति के लोग इस बात का पूरा ध्यान रखते है की कोई सबूत ना छोडे और दलील के लिये मंहगे से मंहगा वकील उनकी सेवा में मोजूद होता है. पर सीधे सादे लोग क्या करे! ... जब उन्हे इस फंसाया जाता है और उनके पास इतने साधन भी नहीं होते कि वो ढंग का वकील भी कर सके.
इसका सही तरीका हमारे अपने अदंर और समाज में मोजूद कूडे की सफाइ से होना चाहिये क्योंकी कूडे के साफ होते ही कीडे अपने आप साफ हो जाते है. कूडे की सफाइ किसी एक गांधी या अन्ना के बस की बात नहीं है. की उन्हे भूख ह्डताल पर बैठाकर सारा देश रस मलाइ खाता रहे और सोचे अब सब ठीक हो जायेगा.
यह देश कलामाडी और राजा जेसे लोगों के दम पर नहीं चल रहा है.
यह चल रहा है उन करोडॉं लोगों के दम पर जिन्हे ईमान की कमाई पर अब भी भरोसा है. जो अब भी खून पसीने की कमाई पर जीते है और जो रूखा सूखा मिल जाता उसी से संतुष्ट हो जाते है. इसलिये जो लोग इस देश के भले का सोच रहे है उन्हे इस बात का ध्यान रखना होगा की वो आखरी साधारण सा दिखने वाला इंसान मजबूत बने. क्योंकी इस देश में दोषी को महिमा मंडित करने की अजीब प्रथा चलने लग़ी है हम जितनी ताकत इन दोषियों को पता लगाने और उनके कारनामों का बखान रात दिन मिडिया में करने में करते है. उससे कही ज्यादा जरूरी उन लोगों की पहचान करने और उन्हे समाज में सही जगह दिलाने में हे जो रात दिन अपना काम इमांनदारी से कर रहे है. अब वो चाहे रेलवे का अदना सा दिखने वाला लाइन मेंन ही क्यों ना हो....
इससे हम उन लोगो में यह भरोसा दिला सकेगे की जो वो कर रहे है सही है. सही का साथ, गलत को अपने आप खत्म करेगा. अभी तो हम बस गलत को ढूड रहे है और लग रहा है जेसे यह देश बस गलत लोगों का है. इसलिये यह समय आम जनता के भरोसे और उसकी सही ताकत से परिचय कराने में हे. हमे ऐसा कुछ नहीं करना है की लोगों का विशवास लोकतंत्र जेसी व्यवस्था से उठ जाये. क्योंकी दोष व्यव्स्था का नहीं हमारे अदंर में है. ऐसा ना हो जाये की काम ना करना, काम करने से ज्यादा आसान हो जाये. अगर ऐसा हुआ तो वो देश के लिये और भी खतरनाक हो जायेगा. क्योंकी यह निर्णय में देरी का कारण बनेगा.
यह भी समझना जरूरी है आज जिसे काम करने का कमिशन मिलता है, कम से कम वो उसके लिये काम तो करता है. कल जब उसे कमिशन नही मिलेगा तो क्या होगा? ...एसा ना हो की उन्हे कमिशन ना मिलने के कारण फाइले बस एक से दूसरी टेबल पर जाती रहे. क्योंकि इस देश में इतने कानून है की हर अच्छा काम किसी ना किसी कानून का उलंघन करता नजर आयेगा जो काम ना करने का आसान बहाना हो जाता है. आम आदमी ऐसा अकसर हर उस सरकारी कार्यालय में महसूस करता है जहां वो उनको तय कमिशन नहीं देता!
आज भी हम समाज और उसकी व्यवस्था से ज्यादा व्यक्तिवाद को अहमियत देते है. हम यह भूल जाते है कि अगर अन्ना सही है तो हम सब को अन्ना के कदम पर चलना चाहिये ना की अन्ना के नाम का उपयोग कर तमाशा करना चाहिये. क्योंकी उसका असर बस इतना होगा की सरकार चलाने वालों के चेहरे बदल जायेगे. हमे चाहिये को जो जिस जगह है वो अपने आस पास के माहोल के बारे में सजग रहे. कोशिश करे कि हम ना गलत करे ना गलत होने दे. हमे एक और काम करना होगा की जो लोग अपना काम इमानदारी और लगन से कर रहे है उन्हे हम सही पहचान दे सके.
लोक पाल बिल लाने से पहले 1857 से लेकर 1947 तक जो भी कानून अंग्रेज देश में बना कर गये और उसके बाद हमारी सरकारों ने आज तक बनाये. क्या उनकी समिक्षा नहीं होनी चाहिये. क्या पुलिस का रोल अब फिर से परिभाषित नहीं होना चाहिये. ऐसा हुये बिना लोक पाल का कोई मतलब नहीं रह जाता.
अन्ना कहते है राजनेता तो जनता का सेवक होता है. जब की सच यह है की राजनेता सेवक नहीं राजा होता है....जिसका धर्म राज करना है...इसके लिये वो कुछ भी कर गुजरेगा ....किसी भी कीमत पर. उसके लिये अगर लाखों का खून बहता तो बहने दो..अगर करोडों भूखों मरते हो तो मरने दो....विश्व का इतिहास देखो...राजनेता सेवक है या फिर सेवा कराता है सब समझ आ जायेगा

 उम्मीद है कि मेरे इस तरह के संबोधन से आप नाराज नहीं होंगे और इस पर खुले दिल से विचार करने की कोशिश करेगे. और इस लड़ाई को सार्थक मतलब देगे. मेरी गुजारिश बस इतनी भर है इस देश में पहले से ही इतने कानून और उन पर पल रहा इतना बढा तंत्र है. इसे छोटा और दुरस्त करने की जरूरत है. ना की उसे और जटिल बनाने की...लोगों में आशा और उम्मीद जगाने की जरूरत है ना की निराशा और हताशा ... ईमान दारी से जीना किसे कहते उसे हम अपने काम से साबित करे. इस तरह के भाषण और आंदोलन चेहरे बदलते है व्यव्स्था नहीं..... दुर्वेश

Friday, July 1, 2011

असली परिक्षा

किसी भी व्यक्ति या संगठन की असली परिक्षा विपरीत परिस्थति में होती है. अब तक बाबा रामदेव का भ्रष्टाचार को लेकर किये जा रहे आंदोलन एक तरफा था. वो व्यवस्था पर तीखे वार किये जा रहे थे सरकार की तरफ से पलट वार ना होने से उनका होंसला बढता जा रहा था. सरकार कि तरफ से पलट वार होते ही नाजारा बदल गया मिडिया और वर्तमान व्यवस्था बाबा से सवाल करने लगी. अब बाबा को भी बहुत सारे सवालों का जबाब देना है. उनकी संस्था और कार्य इस देश में मोजूद कानून के घने जाल में फंसे नजर आ रहे है. इस व्यवस्था का चलाने का यही गूण मंत्र है अगर आप उनके साथ हो तो आपके हजार खून माफ और विपरीत जाते ही आप पर बेशर्मी की हद तक जाकर आपको किसी भी धारा में धर लेगे. जिसे चाहे उसे वो कानून के जाल में फंसा सकते है. इस तरह का कार्य सभी सत्ता रूढ दलों ने किया है.


यह सत्ता का अचूक हथियार है इससे कुछ हो या ना हो पर उनके विरूध हो रहे आंदोलन की रफ्तार धीमी हो जाती है क्योंकी उन्हे मजबूरन रक्षात्मक होना पडता है. और लोगों के बीच में संदेह गहरा हो जाता है.

इसा बार भी पलटवार होते ही UPA और NDA का धुर्वीकरण साफ नजर आ रहा है. एक बार फिर वो सब अपनी अपनी पार्टी और वोट को बचाने में लग गये है और इस सब के बीच असल मुद्दा फिर से वही का वही रह गया है. वेसे एक तरह से अच्छा ही हुआ जनता को समझ आ जायेगा की जिसे वो भ्र्ष्टाचार कहते है वो अपने आप में पूरी तरह विकसित वयव्स्था है जिसका फायदा हर राजनितिक दल ने उठाया है. यही उनकी पूंजी का मुख्य स्रोत भी है.

Monday, April 18, 2011

एसे हल की खोज मे, जो देश को भ्रष्टाचार के केंसर से निजात दिला सके ...2

भ्रष्टाचार के केंसर से निजात हल



1. इसकी पहल भ्रष्टाचार की गंगा की गंगोत्री से करनी होगी. ऐसा राजनितिक पार्टीयों को स्वालंबी बनाने से हो सकता है उनके पास आय का कोई ऐसा स्रोत हो जिस से पार्टी के खर्चे को वे उठा सके तो कम से कम इसके लिये उन्हे गलत लोगों के साथ चलने की मजबूरी तो खत्म हो जायेगी. ऐसा प्रवाधान हो की हम आयकर का कुछ हिस्सा सीधे मनचाही पार्टियों को दे सके. राजनैतिक पार्टीया भी अपनी आय और खर्च का हिसाब दें.

2. जन प्रतिनिधी को उसे के काम की कोई तनखाह नहीं मिलती है, जब तक कि वो पार्षद या विधायक नहीं बन जाता. और ना ही हम खुले दिल से दान देते है. अकसर जो हम देते है वो काम का कमीशन होता है. जिसे पहले ही कानून ने गलत घोषित किया हुआ है. क्या ही अच्छा हो की हर पूर्ण कालिक जन प्रतिनिधी को उसकी पार्टी से भुगतान मिले साथ ही वो अपने काम की रेट लिस्ट सार्वजनिक करे. और उससे मिले पेसे को वो आमदनी में दिखा कर उस पर सर्विस टेक्स और इनकमटेक्स दे. हम क्यों नही मान लेते की जब एक वकील अपनी गलत और सही काम की फीस ले सकता है तो नेता या जनप्रतिनिधी क्योँ नहीं!

3. UPSC, PSC, CDS, की तरह कोई आयोग जन प्रतिनिधी और नेता या जन सेवा का कार्य करना चाह्ते हो उनके लिये हो, इसे पास करना पडे या कम से कम लाइसेंस जेसा कुछ हो. यह लाइसेंस कुछ मानदंडो के आधार पर ही दिया जाय और इसे निरस्त करने का अधिकार भी इस आयोग को हो. और चुनाव में खडे होने के लिये उसके पास यह लाइसेंस होना अनिवार्य हो.

4. लोकतंत्र में चुनाव संख्या बल के आधार पर होता है. राजा और रंक लोकतंत्र की नजर में समान बन गये उनके वोटींग का वेटेज एक सा कर दिया जो सुनने में बड़ा लुभावना था पर उस का असर जो हुआ वो बडा ही खतरनाक हुआ. जिसे देश की समस्याओँ से कोई लेना देना नही था ना ही जिसे कूटनितिक समझ थी वो देश का नेतृत्व चुनने लगा. जिस देश की अधिकांश जना संख्या अनपढ, गंवार, गरीब और भुखमरी की श्रेणी में आती थी देश के प्रतिनिधी चुनने लगी. इन्हे आसानी से धर्म जाति रंग बोली के आधार पर बेवकूफ बनाया जा सकता था. इस लोकतंत्र ने सभी को एक समान वोटिंग राइट दिये है. सभी की वोट की कीमत एक समान है. क्यों नहीं हम कुछ मानदंड के आधार पर इन का कीमत बनाते. क्यों एक अनपढ और पढेलिखे के वोटिंग की कीमत एक समान हो. अब तक सब कुछ संख्या बल के आधार पर ही तय होता रहा की कोन चुनकर जायेगा. उसका नतीजा हमारे सामने है. अब इसे बदलने का समय आ गया है.

5. विधान सभा और लोक सभा में सरकारा बनाने के लिये 50% से ज्यादा मत होना अनिवार्य है. जिसके कारण वैचारिक रूप से विरोधी दल सत्ता में आने के लिये अनुचित समझोते करते है. और सरकार गिरने का भया सत्ता धारी पार्टी पर हर समय लटकता रहता है अधिकांश समय वो ब्लेक मेल की हद तक एक दूसरे का शोष्ण करते है. क्यों नहीं राष्ट्रिय पार्टीयों की संख्या के आधार पर इस प्रतिशतको बदला जाये. अगर 10 राषट्रीय दल है तो प्रतिशत 10 के आसपास हो ना की 50. इसका मतलब यह हुआ की जिस पार्टी का मत प्रतिशत सबसे अधिक हो और अगर साथ ही वो निर्धारित मत प्रतिशत भी हासिल कर ले तो उसे सीधे सरकार बनाने का मोका दिया जाये. उसके बाद अगर वो चाहे तो दूसरे दल का सहयोग ले सकता है. कम से कम उसे मजबूरन गट बंधन बनाने की मजबूरी तो नहीं रहेगी. सरकार गिराने के लिये 2/3 का बहुमत सही है इससे सत्ता धारी पार्टी को स्थायित्व मिलेगा.

6. हम किस लिये 546 की संख्या के साथ पार्लियामेंट चलाना चाहते है. क्यों हम अपने राज्योँ में 250 से 400 तक विधायक चुनकर विधानसभा में भेजते है जब की हमे मालूम है की अधिकांश को इन सब से कुछ लेना देना ही नहीं है. हम यह क्यों नही समझते की निर्णय एक छोटे ग्रुप में करना ज्यादा आसान और कारगर होगा. इतनी बढी संख्या के वाबजूद हमारी पार्लियामेंट और विधानसभा के निर्णय जन विरोधी और देश हित के विरूध होते है. अधिकांश समय वो जिस तरह अधिवेशन का समय बरबाद करते है उसे देख कर आम आदमी का सिर भी शर्म से झुक जाता है.

7. मिडिया के रोल को अब अनदेखा नहीं किया जा सकता जिस तरह वो लोकतंत्र में सक्रिय भूमिका निभाते हुये मुद्दो पर राष्ट्र व्यापी बहस कराने में मदद की है. जब हमारे सांसद और विधायक सोते रहते है उन्हे जगाने का काम भी ये करता है. इनकी मदद लेते हुये किसी भी राष्ट्रिय महत्व में मुद्दे पर निर्णय लेते समय इनका उपयोग किया जा सकता है.

8. अब हालत ये है कि सभी पार्टीयों में दागी उम्मीदवारोँ की भरमार है. गभींर अपराधों के आरोपी चुनाव में खडे होते है. वो जेल में रहते हुये चुनाव पर्चे दाखिल करते है और विजय हासिल भी करते है. अकसर देखा गया है राजनितिक प्रतिद्व्दिंता के चलते झूठे आरोप लगाकर सत्ता पर काबिज अपना उल्लू सीधा करते है. इसलिये जब तक न्याय अपना निर्णय ना दे उन्हे दोष मुक्त मानकर चुनाव लडने दिया जाये. पर जब तक वो दोष मुक्त ना हो जाये उन्हे कोई पोस्ट ना दी जाये. और अगर वो दोषी पायेजाते है तो उनका चुनाव निरस्त माना जाये. इस तरह के केस फास्ट कोर्ट के जरिये निपटाये जाये.

9. पिछले 100 सालों में बने कानूनों की समिक्षा की जाये. और जनता पर इसके बोझ को कम किया जाये.