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Tuesday, July 1, 2025

AI के साथ मंथन : लोकतंत्र सिर्फ एक सभ्य तानाशाही है

 

AI (artificial intelligence )के साथ मंथन 

लोकतंत्र का काला सच  

लोकतंत्र सिर्फ एक सभ्य तानाशाही है 


क्या वोट डालना सच में आजादी का काम है या बस एक दिखावटी आजादी है जो असल में आपकी चुपचाप गुलामी को इजाजत देती है। असल मे जिस सिस्टम को हम इंसानी सभ्यता की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानते हैं वो असल में सिर्फ आज्ञाकारिता है लेकिन अच्छे दिखावे के साथ। इस बात को समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ना पड़ेगा


दशकों से लोकतंत्र पर जो भरोसा था वह अब भ्रम में बदल गया है। जो लोग, वोट की ताकत से दुनिया बदलने का विश्वास रखते थे, उन्होंने अब सोचना शुरू दिया है कि क्या आम लोग सच में समझदारी से राजनीतिक फैसले ले सकते हैं। केसे कोई नेता झूठे चुनावी वादों के भ्रम और धुरवीकरन के सहारे जनता को भ्रमित कर जीत पर जीत हासिल कर सकता हैं । सालों साल सत्ता पर काबिज रह सकता है। दुनिया को खत्म होने की हद तक ले जा सकता है।


यह टूटन गहरी है, लेकिन नई नहीं थी, लगभग 2000 साल पहले प्लेटो ने इसे आते हुए देख लिया था जब उनके गुरु सुकरात को एक लोकतांत्रिक सभा ने मौत की सजा दी तो प्लेटो को न्याय नहीं दिखा उन्हें बहुसंख्यक शासन का खतरा दिखा।


उनका निष्कर्ष डरावना था की लोकतंत्र अत्याचार को खत्म नहीं करता बस वह उसे छुपा देता है आज की मनोविज्ञान की रिसर्च प्लेटो की चेतावनियों को और भी गहरा बना देती है 1950 के दशक में मनोवैज्ञानिक सोलमन ऐश ने दिखाया कि लोग अपने साफ नजरिए को भी छोड़ देते हैं अगर एक पूरा ग्रुप उनसे असहमत हो 75% लोगों ने साफ गलती को सही मान लिया सिर्फ इसलिए ताकि वे अकेले ना पड़े जाए।


अगर हम खुद पर इतना भरोसा नहीं कर सकते तो हम लाखों अनजान लोगों से कैसे उम्मीद करें कि वे अच्छे नेता चुनेंगे पर बात यहीं नहीं रुकती, वैज्ञानिकों ने जब राजनीतिक समर्थकों को उन्हें उनके पसंदीदा नेता की गलतियां दिखाई गई,  तो दिमाग का सोचने वाला हिस्सा शांत रहा लेकिन भावनाओं से जुड़ा हिस्सा तेजी से सक्रिय हो गया उनका दिमाग ना सिर्फ सच्चाई को नकार रहा था बल्कि खुद को इसके लिए इनाम भी दे रहा था लोकतंत्र इन मानसिक कमजोरियों की वजह से ही फलता फूलता है। 


लोकतंत्र की असली चतुराई  इस बात में नहीं है कि वह सत्ता कैसे बांटता है बल्कि इसमें है कि वह असली सत्ता को कैसे छुपाता है खुले तानाशाहों की तुलना में जहां पुलिस सेंसरशिप और हिंसा होती है लोकतंत्र नरम लगता है इंसानी लगता है न्यायपूर्ण लगता है और यही वह धोखा है जिसे प्लेटो ने सबसे बड़ा खतरा बताया था। 


सबसे असरदार नियंत्रण वही होता है जो महसूस ही नहीं होता वो लगता है जैसे यह आपकी अपनी पसंद हो आधुनिक लोकतंत्र गुस्से और असहमति को कुछ रस्मी कामों में बदल देता है जेसे अहिंसक विरोध प्रदर्शन, चुनाव याचिकाएं, यह सब आपको भावनात्मक राहत देते हैं लेकिन सिस्टम नहीं बदलते। 


आपको लगता है, कि आपकी आवाज सुनी गई, आपको लगता है कि आप शामिल हैं। लेकिन असली ढांचा जैसा का तैसा रहता है, आपको लगता है कि आप सिस्टम से लड़ रहे हैं जब आप किसी नेता को वोट से हटा देते हैं लेकिन हकीकत में आप उसी सिस्टम को और मजबूत कर रहे होते हैं जो आपके विकल्पों को सीमित करता है। प्लेटो ने चेताया था अगर आप राजनीति में हिस्सा नहीं लेते तो आप ऐसे लोगों द्वारा शासित होते हैं जो आपसे कम समझदार हैं। 


लेकिन लोकतंत्र एक कदम आगे चला गया वो आपको यकीन दिलाता है कि आप ही ने उन कमजोर नेताओं को चुना था कि यह सब, आपकी अपनी पसंद थी और आपकी पसंद का नेता या पार्टी गलत केसे हो सकती है, यह भ्रम नशे जैसा है, लोकतंत्र मन को बहलाता है यह वादा करता है कि आप शासन करेंगे, मिलकर फैसले लेंगे समझदारी से चर्चा करेंगे लेकिन इंसानी दिमाग इतनी जटिलता के लिए बना ही नहीं है। 


हमें चाहिए सादगी, यकीन और भावनात्मक साफगोई और यहीं से लोकतंत्र खुद को खोने लगता है। प्लेटो ने इस क्रम को पहले ही देख लिया था लोकतंत्र बहुत ज्यादा विकल्प देता है बहुत ज्यादा जानकारी बहुत सारे फैसले इससे दिमाग उलझ जाता है और जब इंसान उलझन में होता है तो उसे सच्चाई नहीं साफ-साफ जवाब चाहिए होते हैं।  यहीं से मैदान में आता है,  जननेता- एक ऐसा व्यक्ति, जो सब कुछ आसान बना देता है जो आपको बता देता है कि दोष किसका है। जो कहता है आप मत सोचिए,  मैं सोचूंगा। 


न्यूरो साइंस भी यही कहता है जब हमारा दिमाग ज्यादा जानकारी और अनिश्चितता से भर जाता है तो सोचने समझने की शक्ति धीमी पड़ जाती है तब भावनाएं हावी हो जाती हैं हम सोचने की जगह बस प्रतिक्रिया देने लगते हैं और जो भी हमें इस मानसिक थकावट से राहत देता है वे उस ओर खींच जाते हैं। 


वेनेजुएला इसका ताजा उदाहरण है ह्यूगो चावेज ने सत्ता, तख्ता पलट से नहीं ली उसे बहुमत से चुना गया था। उसने लोगों से वादा किया कि वह सारी जटिलताओं का हल निकालेगा उसने भावनात्मक राहत दी, और जब तक जनता को समझ आया कि उन्होंने क्या खो दिया है।  तब तक वह मानसिक रूप से इतना जुड़ चुके थे कि पीछे लौटना लगभग नामुमकिन हो गया। दुनिया भर में यही पैटर्न दोहराया जा रहा है लोकतंत्र को कोई बंदूक की नोक पर खत्म नहीं कर रहा है लोग खुद उसे वोट से खत्म कर रहे हैं। 


यह ऐसे नेताओं को जन्म देता है जो चुनाव जीतने में माहिर हों , ना कि शासन चलाने में। चुनाव जीतने वाले गुण हैं आत्मविश्वास, आसान भाषा, भावनात्मक जुड़ाव लेकिन अच्छा शासक बनने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है वो है ,  गहराई , संतुलन और जटिल समझ, वो इन नेताओ मे अक्सर इनसे उलट होती है। 

 

प्लेटो ने इसे एक जहाज की कल्पना से समझाया था। सोचिए एक जहाज पर सवार लोग तय करें कि उसे कौन चलाएगा। असली नाविक जो सितारों और नक्शों की मदद से दिशा समझता है, पर  उसे खुद भी अपनी बात में थोड़ा संकोच होता है क्योंकि सच्चाई हमेशा सीधी नहीं होती।  वहीं एक चालाक तेजतर्रार शख्स कहता है, सब कुछ आसान होगा रास्ता भी आसान और शराब भी फ्री।


सोचिए लोग किसे चुनेंगे और वह जहाज कहां जाएगा!


हम ब्रेन सर्जरी पर वोट नहीं करते, पुल कैसे बने इस पर वोट नहीं करते, वहां हम विशेषज्ञों की बात मानते हैं लेकिन राजनीति में आत्मविश्वास ज्ञान और विशेषज्ञता से जीत जाता है क्यों?


क्योंकि असली विशेषज्ञ कभी पक्के शब्दों में बात नहीं करते वह कहते हैं, यह निर्भर करता है, वह हर चीज को कई पहलुओं से देखते हैं लेकिन हमारा दिमाग इस अस्पष्टता को पसंद नहीं करता।  हम सीधा स्पष्ट जवाब चाहते हैं, और इसी वजह से हम असली नाविक को नजरअंदाज करके उस जहाज को डुबोने वालों को चुन लेते हैं। 


यह कोई सिस्टम की गलती नहीं है यही सिस्टम है। 


अब यह और भी चालाक हो चुका है प्लेटो ने कभी डिजिटल युग की कल्पना नहीं की थी लेकिन उनकी गुफा की कथा जहां लोग अंधेरे में दीवार पर पड़ती परछाइयों को सच्चाई समझते हैं आज की सच्चाई से बिल्कुल मेल खाती है,  आज भी हम परछाइयां ही देख रहे हैं फर्क बस इतना है कि अब यह परछाइयां आपके लिए बनाई गई हैं आपका सोशल मीडिया फीड, जो सिर्फ जानकारी नहीं दे रहा वो आपकी सोच को गढ़ रहा है। 


एल्गोरििदम सीख रहे हैं कि आप किससे डरते हैं, आप क्या चाहते हैं, आपकी कमजोरियां क्या हैं और फिर वह आपको वही दिखाते हैं जो आप देखना चाहते हैं। इसका नतीजा हर इंसान के लिए एक अलग सच्चाई,  पक्के यकीन के साथ बनी झूठी दुनिया। आपको लगता है कि आप पहले से ज्यादा जागरूक हैं जबकि असल में आप पहले से ज्यादा चालाकी से कंट्रोल किए जा रहे हैं। अब AI  चालित सूचना तंत्र , लोगों के मनोविज्ञान को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीख चुकी है। 


जो लोग चिंतित थे उन्हें डरावनी बातें दिखाई जाती है,  जो गर्व से भरे थे उन्हें तारीफें दी,  जो अकेले थे, उन्हें किसी ग्रुप का हिस्सा महसूस कराया गया। यह कोई आम प्रचार नहीं था यह बहुत ही निजी स्तर पर किया गया मानसिक नियंत्रण होता है और यह बखूबी काम कर रहा है।


नतीजा, ऐसा राजनीतिक बंटवारा जो पीढ़ियों से नहीं देखा गया था हर पक्ष को लगता है कि वही समझदार है, वही सही है, और दूसरा पक्ष पागल है,  गुमराह है,  लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों पक्ष एक जैसे तथ्य भी नहीं देख रहे।  वे दो अलग-अलग दुनियाओं में जी रहे हैं और सबसे डरावनी बात आप अब भी सोचते हैं कि आप इस सबसे अलग हैं। 


अब फैक्ट चेकिंग लोगों की सोच नहीं बदलती और बहसें प्रायोजित होती हैं। जब आप किसी के बनाए गए निजी नजरिए को चुनौती देते हैं। तो उनका दिमाग खुद ब खुद रक्षा करने लगता है साइकोलॉजिस्ट इसे बैक फायर इफेक्ट कहते हैं। जितना ज्यादा आप किसी को सही बातें दिखाते हैं पर अगर वो उसकी मोजूदा सोच से मेल नहीं खाती , तो वह अपनी पुरानी सोच में और गहराई से जड़ पकड़ लेता है।  


प्लेटो ने भी यह बात पहले ही समझ ली थी उन्होंने कहा था वे उससे नफरत करेंगे जो उन्हें सच्चाई बताएगा आज के लोकतंत्र में सच्चाई को बैन नहीं किया जाता उसे दबा दिया जाता है, शोर, ध्यान , भटकाने वाली चीजें और सोशल मीडिया की असहजता के नीचे उसे आसानी से दबा दिया जाता है। कोई अप्रिय सच बोलिए और देखिए आपकी पहुंच कैसे धीरे-धीरे गायब हो जाती है। 


वजह सरकार नहीं रोकती एल्गोरिद्म रोक देता है अब जरा वाइमर रिपब्लिक को देखिए वहां लोकतंत्र था चुनाव होते थे बोलने की आजादी थी अखबार खुले थे लेकिन जैसे ही संकट आया वहां के लोगों ने लोकतंत्र नहीं बचाया तानाशाही को चुना। 


क्यों? 


उन्होंने अत्याचार को पसंद नहीं किया था,  बल्कि आजादी बहुत भारी लगने लगी थी जब जीवन में अराजकता आ जाती है तो इंसानी दिमाग साफ-साफ आदेश ढूंढता है आसान जवाब चाहता है कोई आवाज जो कहे मैं संभाल लूंगा।

 

हिटलर ने सत्ता छीनी नहीं थी उसे चुना गया था क्योंकि उसने लोगों को जटिलता से भावनात्मक राहत दी यह कोई बीती हुई कहानी नहीं है यह एक आईना है।  जैसे रोम में हुआ था,  जब गणराज्य कमजोर हुआ,  नेताओं ने यह सीखा कि भीड़ को लुभाना तमाशा दिखाना सच्चे शासन से ज्यादा असरदार होता है इसलिए खेल कानूनों की जगह लेने लगे। 


जूलियस सीजर ने लोकतंत्र को तबाह नहीं किया उसने बस लोगों को वहीं दिया जो वह मांग रहे थे और उसी ने उस सिस्टम को मार डाला जिसने वह सब मुमकिन बनाया था आज के पॉपुलिस्ट नेता भी वही स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं हर चीज का वादा करो किसी ना किसी पर  दोष डालो,  तमाशा पेश करो और धीरे-धीरे सत्ता का शिकंजा कसते जाओ। 


हर राजनीतिक सिस्टम कुछ मिथकों पर चलता है फर्क सिर्फ इतना है कि वह मिथक जानबूझकर स्थिरता के लिए गढ़े गए हैं या बिना सोचे समझे हमारे अंदर भरे गए हैं ताकि हम कभी सवाल ना पूछे। 


लोकतंत्र के भी कुछ बहुत ताकतवर मिथक हैं जेसे हर एक आवाज बराबर मायने रखती है, चुनाव से भविष्य तय होता है, नेता जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन जब यह विश्वास हकीकत से टकराते हैं तो दिमाग में कॉग्निटिव डिसोनेंस यानी मानसिक तनाव पैदा होता है।  लोग इन मिथकों को छोड़ते नहीं वह किसी पर दोष मड़ना शुरू कर देते हैं।  जेसे गलती पार्टी की है, गलती मीडिया की है। सिस्टम टूटा नहीं है हमें बस इसे और अच्छे से करना होगा और यही चक्र चलता रहता है।


उधर असली सत्ता धीरे-धीरे हाथ से फिसल चुकी होती है चुने हुए नेता सिर्फ संस्कृति और पहचान की बहसों में उलझे रहते हैं जबकि असली फैसले अनचुने संस्थानों द्वारा लिए जाते हैं जैसे सेंट्रल बैंक, रेगुलेटरी एजेंसियां जेसे RBI, IT, और अंतरराष्ट्रीय संगठन जेसे IMF,WHO,WTO ।


यही है लोकतंत्र का पैराडॉक्स जो राजनीति दिखती है वह और ज्यादा शोर मचाती है और ज्यादा बंटी हुई होती है जबकि असली  शासन चुपचाप दूर कहीं पीछे चलता रहता है। जहां आपकी कोई पहुंच नहीं और आप फिर भी वोट डालते रहते हैं ना कि इसीलिए कि इससे कुछ बदलता है बल्कि इसीलिए कि आपको लगता है शायद इस बार कुछ बदलेगा।


यही इस सिस्टम की चालाकी है वह आपको यकीन दिलाता है कि आपकी गुलामी ही आपकी आजादी है कि आज्ञा पालन ही आत्मनिर्णय है कि इस बार कहानी कुछ अलग होगी प्लेटो पूरी तरह सही नहीं थे लेकिन वह पूरी तरह गलत भी नहीं थे। 


लोकतंत्र से तानाशाही की ओर गिरना जरूरी नहीं है, वह रास्ता हमेशा खुला रहता है लोकतंत्र मे मानसिक अपील नकारा नहीं जा सकती लेकिन जैसा कि प्लेटो ने चेतावनी दी थी।  इसकी कमजोरियां सिर्फ सिद्धांत नहीं है वह इंसानी स्वभाव में छुपी होती हैं अगर हम यह कड़वी सच्चाई मान भी लें कि लोकतंत्र आजादी के नाम पर एक सूक्ष्म नियंत्रण का जरिया बन गया है तो एक बड़ा सवाल सामने आता है फिर विकल्प क्या है।

 

प्लेटो ने दर्शन शास्त्री राजा का विचार रखा था ऐसे नेता जिन्हें लोकप्रियता के लिए नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता और चरित्र के लिए चुना जाए लेकिन इस आदर्श के साथ भी मुश्किलें हैं कौन तय करेगा कि कौन बुद्धिमान है कैसे सुनिश्चित करें कि सत्ता उन्हें भ्रष्ट ना कर दे कैसे रोके कि वह आम लोगों की जिंदगी से कट ना जाए,  प्लेटो खुद इन सवालों को समझते थे उनका दर्शन एक राजनीतिक योजना नहीं था बल्कि एक दर्पण था जो हमें दिखाता है कि हम सत्ता और शासन के साथ कैसा संबंध रखते हैं उनका उद्देश्य यह था कि हम खुद से पूछें कैसे इंसान हमें बनना होगा। 


ताकि कोई भी सिस्टम हमारे भले के लिए काम कर सके तो अब जब हम यह असहज सच्चाई जान गए हैं कि लोकतंत्र असल में हमें मानसिक आराम देता है ना कि असली शक्ति।


तो हम क्या करें?


प्लेटो का जवाब था राजनीति से भागो नहीं बल्कि जागो। गुफा की कथा में वह दार्शनिक जो परछाइयों से बाहर निकलकर सच्चाई की रोशनी देखता है वह वहीं नहीं रुकता वह लौटता है गुफा में,  दोबारा जाता है सिस्टम की सेवा के लिए नहीं बल्कि इस जिम्मेदारी के साथ कि जो सच्चाई उसने देखी है उसे दूसरों तक पहुंचाए भले ही लोग उसका विरोध करें उसका मजाक उड़ाएं या हमला करें फिर भी वह कोशिश करता है यही हमारी भी जिम्मेदारी है। 

 

हम एक अधूरे सिस्टम का हिस्सा बने लेकिन खुली आंखों से,  बंद आंखों से नहीं।  हमें वोट देना है,  बोलना है,  कदम उठाना है,  लेकिन इस समझ के साथ कि हमारे व्यवहार को कैसे आकार दिया जाता है। 


हमें अब लोकतंत्र से वह उम्मीदें छोड़नी होंगी, जो कभी उसमें थी ही नहीं-  कि यह सबसे न्यायपूर्ण होगा कि यह हमेशा समझदार नेताओं को चुनेगा या कि हर वोट  बुद्धिमानी से डाले जाते हैं इस सच को जानना है तो, विधान सभा और लोक सभा के जन प्रतिनिधियों पर नजर डालिये जिसे जनता ने लाखो वोटो से जिताकर भेजा है , इनमे से अधिकाँश या तो क्रिमिनल बैकग्राउंड से है या फिर एकमात्र गुण अपने आकाओ की जी हुजूरी है. 543 की लोकसभा में मात्र 40 -50 ही सारग्रभित बहस करते नजर आते है , बाकी का क्या ?


राजनीतक संगठन खुद कितने लोकतांत्रिक और पारदर्शी है। उन्होंने जीतने के लिए जो पैसा खर्च किया, उसका हिसाब कभी उन्होंने उस जनता को दिया? अगर नहीं तो फिर कैसा और किस लोकतंत्र की बात कर रहे है। आज देश में लोकतंत्र को चलाने के लिए शराब-माफिया , भू-माफिया, मेडिकल माफिया, टेक्सचोर पूजीपति, कमीशनएजेंट और ठेकेदारों बड़ी भूमिका है, राजनैतिक दलों को ये भरपूर मदद करते है और उससे मनचाहा लाभ लेते है, आम जनता तो भीड़ है और नेता भीड़ से खेलना जानता है


लोकतंत्र को हमें वैसा देखना सीखना होगा जैसा वह वास्तव में है एक ऐसा ढांचा जो सामूहिक मनोविज्ञान को संभालने के लिए बना है ना कि उससे ऊपर उठने के लिए। लोकतंत्र जनता की चेतना को ऊपर पर नहीं उठाते बल्कि उसकी भावना को भड़काते है। भावनात्मक भाषण कैसे आपके फैसले पर हावी हो जाते हैं। तब आप जान जाते हैं कि आपकी राजनीतिक सोच कहीं ना कहीं कबीलाई पहचान से बन रही है।


जब आप देख लेते हैं कि विरोध को भी कैसे सिस्टम चुपचाप निगल लेता है तो आप सोच सकते हैं,  कि असली बदलाव की रणनीति क्या हो सकती है।  आप अब भी वोट डाल सकते हैं आवाज उठा सकते हैं, हिस्सा बन सकते हैं।  लेकिन इस भ्रम के बिना कि सिर्फ यही सब कुछ बदल देगा। 


यह विमुख होने की बात नहीं है यह परिपक्वता की बात है जैसे, लोकतंत्र भी अपने नागरिकों की मानसिकता का आईना है अगर यह सच है तो हमें एक और कड़वी सच्चाई का सामना करना होगा हमारा राजनीतिक तंत्र इसलिए टूटा हुआ नहीं है क्योंकि लोग बुरे हैं बल्कि इसलिए क्योंकि यह हमारे मानसिक सीमाओं की असहजता से बचने की प्रवृत्ति और सच की जगह आसान जवाब पसंद करने की आदत को दिखाता है। 


हम जागरूक दिखना  चाहते हैं बिना गहराई से सीखे, हम आजादी चाहते हैं बिना जिम्मेदारी उठाए हम नैतिक स्पष्टता चाहते हैं। 


लोकतंत्र हमें एक एहसास देता है जैसे हम सब कुछ नियंत्रित कर रहे हो यह हमें यह भरोसा दिलाता है कि हमारे फैसले समझदारी से भरे हैं हमारे नेता जवाबदेह हैं और हमारी आवाज में ताकत है यह हमें नियंत्रण का मंच देता है जबकि असली फैसले वहां लिए जाते हैं जहां हमारी नजर नहीं पहुंचती इस सच्चाई को समझना मायूसी नहीं है बल्कि यही असली आजादी की शुरुआत है जब आप लोकतंत्र से ज्यादा की उम्मीद करना छोड़ देते हैं तभी आप इसका सही इस्तेमाल करना सीखते हैं। 


आप इसे समझदारी से नेविगेट कर सकते हैं आप पहचान सकते हैं कब आपको भ्रमित किया जा रहा है।  आप सवाल उठा सकते हैं जब जटिल बातों को जानबूझकर आसान दिखाया जा रहा हो आप बोल सकते हैं भले ही आपकी बात से कुछ ना बदले क्योंकि जागरूक होकर बोली गई बात का मूल्य सिर्फ असर में नहीं , आत्मा में होता है। 


आज वही ताकतें जिन्होंने जर्मनी के बीमार गणराज्य को तोड़ा, वेनेजुएला की लोकतांत्रिक संस्थाओं को गिराया और दुनिया के कई देशों में आजादी को मिटाया वही ताकतें आज आपके देश में भी सक्रिय हैं आपकी सोच को एल्गोरिद्म ढाल रहे हैं भावनात्मक थकान आपके विवेक को  कमजोर कर रही है।  करिश्माई नेता उभर रहे हैं जो आपको राहत दे रहे हैं,  पर सच छिपा कर ।


लोग इन सबको हां कह रहे हैं, नफरत से नहीं थकावट से , वे थक गए हैं,  सोचने से थक गए हैं,  चुनाव करने से थक गए हैं,  जिम्मेदारी उठाने से,  और यही वह पल है जिससे प्लेटो डरते थे। 


सवाल यह नहीं है कि क्या लोकतंत्र एक सभ्य तानाशाही बन रहा है सवाल यह है कि क्या आप अब भी सोए रहेंगे या जागेंगे यह लड़ाई निराशा और उम्मीद के बीच नहीं है।  यह चुनाव है बेहोशी और जागरूकता के बीच।  2000 साल पहले प्लेटो ने देखा था कैसे एथेंस के लोग सोक्रेटीज की आवाज दबा देते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि वह  उन्हें असहज कर देता था। 


उन्होंने देखा कि जब लोग सच्चाई से ज्यादा दिलासा चाहते हैं तो तानाशाही टालना मुश्किल हो जाती है। गुफा आज भी है अब वह डिजिटल बन गई है और उसमें दिखने वाली परछाइयां अब ऐसे एल्गोरिदम बना रहे हैं जो आपकी पसंद के हिसाब से आपको सच का भ्रम दिखाते हैं। लेकिन काम अब भी वही है पीछे मुड़ो इन झूठी तस्वीरों पर सवाल उठाओ उस रोशनी की तरफ बढ़ो चाहे वो चुभती हो, क्योंकि परछाइयां सुंदर हैं पर वह असली नहीं है और सिर्फ सच्चाई ही आजाद कर सकती है।  प्लेटो की सीख यह नहीं थी कि राजनीति से भागो बल्कि यह थी राजनीति में दिमाग खोलकर  प्रवेश करो। 


जिस लोकतंत्र पर सवाल ना उठाया जाए वह बचाने लायक नहीं और जो नागरिक खुद पर सवाल ना उठाए वह सच में आजाद नहीं, क्योंकिआजादी कभी आराम नहीं देती वह हमेशा यह मांग करती है कि हम वह भी देखें जिसे देखने से डरते हैं और फिर कुछ करें यह चुनाव अब भी तुम्हारा है। 


 

दुर्वेश